🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷
दिनांक - -१३ नवम्बर २०२४ ईस्वी
दिन - - बुधवार
🌔 तिथि -- द्वादशी ( १३:०१ तक तत्पश्चात त्रयोदशी )
🪐 नक्षत्र - - रेवती ( २७:११ तक तत्पश्चात अश्विनी )
पक्ष - - शुक्ल
मास - - कार्तिक
ऋतु - - हेमन्त
सूर्य - - दक्षिणायन
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ६:४२ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:२८ पर
🌔चन्द्रोदय -- १५:३३ पर
🌔 चन्द्रास्त - - २८:४३ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥मनुष्य एक चेतन प्राणी है। यह चेतन प्राणी इसलिए है कि इसके शरीर में एक चेतन पदार्थ आत्मा विद्यमान होता है। यह आत्मा अनादि, नित्य, सनातन, शाश्वत, अमर, अविनाशी, अल्प परिमाण, एकदेशी, आकार रहित, ससीम, अल्पज्ञ, ज्ञान प्राप्ति व कर्मों को करने में समर्थ, उपासना से ईश्वर को प्राप्त होकर जन्म मरण से छूटकर मुक्ति प्राप्त करने वाला है। हमारी आत्मा ऐसी है जिसको अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकती और शस्त्र से यह काटा नहीं जा सकता। यह सदा से है और सदा रहेगा।
आत्मा जन्म-मरण धर्मा होने से जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसा हुआ है और इसका जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म होता रहता है। हम अर्थात् हमारी आत्मा सदैव सुख चाहती है। सुख का कारण शुभ कर्म होते हैं। हमें जो दुःखों की प्राप्ति होती है उसका कारण हमारे अज्ञान युक्त अशुभ कर्म होते हैं। ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति व सृष्टि सहित अपने कर्तव्य व अकर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त करना मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। ज्ञान से ही अमृत अर्थात् दुःखों की निवृत्ति और सुखों की प्राप्ति होती है। अज्ञानी मनुष्य का जीवन दुःखों से युक्त होता है और वह बलहीन तथा रोगों से ग्रस्त होकर अल्पायु में ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है।
अतः सत्य ज्ञान के आदि स्रोत वेदों की शरण में जाकर मनुष्य को अपने कर्तव्य एवं अकर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और असत्य का त्याग तथा सत्य को ग्रहण करना चाहिये। आर्यसमाज के नियमों पर दृष्टि डाल कर उसके अनुरूप कर्म व व्यवहार करने से भी मनुष्य दुःखों से बच सकता है। वेदों का अध्ययन करने पर हमें सत्यासत्य एवं कर्तव्याकर्तव्यों का ज्ञान होता है। सत्य के ज्ञान और उसके अनुरूप कर्तव्यों का पालन कर हम विद्या की वृद्धि कर जीवन के लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।
इतिहास में अनेक ऋषि, महर्षि, योगी और विद्वान हुए हैं जिन्होंने वेदों के अध्ययन-अध्यापन में ही अपना जीवन व्यतीत किया और जीवन भर सन्तोष का अनुभव करते हुए अज्ञान व अकर्तव्यों के आचरण से स्वयं को दूर रखा। वह सब देश, समाज व प्राणीमात्र के हित के कार्यों को करते हुए लम्बी आयु का भोग कर ईश्वर को प्राप्त रहे व उसके ज्ञान व योगाभ्यास से समाधि को सिद्ध कर ईश्वरानन्द के अनुभव से उन्होंने अपनी जीवन यात्रा को इसके ध्येय तक पहुंचाया और सफलता दिलाई।
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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩
🌷ओ३म् अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम् ।आये बर्हिरासदम्।।( ऋग्वेद ४|९|१)
💐 अर्थ :- ( अग्ने! य: त्वम् माहान असि)
हे अग्नि के समान प्रकाशमान प्रभो! जो तू महान् है, पूजनीय है, वह तू !
( ईभ् देवयुं जनं मृड)
सब प्रकार व सब प्रकार से आत्मन: जो तू परमेश्वर को चाहने वाला है ऐसे उस मुझ उपासक को सुखी कर। हे प्यारे और सब जग से न्यारे मेरे भगवन्!
( आसदं बर्हि: आ इयेथ)
तू भलीभांति बैठने योग्य मेरे ह्रदयासन पर आ विराजमान हो।
हे प्रभुवर ! जो तू महान् है, अपने मान से,अपने यश और प्रयश से सबको पीछे छोड़ देने वाला है ।जो तू पूजनीय है, सब प्रकार से स्तुति - प्रार्थना और उपासना के योग्य है, वह तू सब प्रकार से और सब ओर से, जो उपासक तुझ महान्, तुझ पूजनीय प्रभु पर मुग्ध होकर तुझ देवाधिराज को चाहता है, तुझ दिव्य गुण-कर्म- स्वभाव वाले परमदेव की अन्त:करण की टीस के साथ कामना करता है,उस मुझ श्रद्धा और विश्वास से ओत - प्रोत भक्त को तू सुखी कर, तृप्त कर,आनन्दित कर।इतना ही नहीं वरन् इससे और आगे बढ़कर मेरे उस ह्रदयासन पर आ विराजमान हो, जिसको मैने सब प्रकार से बड़े जप-तप से निर्मल और स्वच्छ करके तेरे बैठने योग्य बनाया है ।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने , हेमन्त -ऋतौ, कार्तिक - मासे, शुक्ल पक्षे , द्वादश्यां
तिथौ, रेवती
नक्षत्रे, बुधवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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