🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🕉️🙏नमस्ते जी🙏
दिनांक - - १९ जनवरी २०२५ ईस्वी
दिन - - रविवार
🌖 तिथि -- पञ्चमी ( ७:३० तक तत्पश्चात षष्ठी )
🪐 नक्षत्र - - उत्तराफाल्गुन ( १७:३० तक तत्पश्चात हस्त )
पक्ष - - कृष्ण
मास - - माघ
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:१४ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:५० पर
🌖 चन्द्रोदय -- २२:५५ पर
🌖 चन्द्रास्त - - १०:२७ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥प्रश्न :- धर्म क्या है ? किसे कहते हैं ? मनुष्य का क्या धर्म है ?
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उत्तर :- ' धर्म ' धृ धारणे धातु से बना है जिसका अर्थ है ' ' 'धारण करना ' अर्थात् वे सत्य और अटल सिद्धांत या ईश्वरीय नियम जिनके धारण करने से यह समस्त संसार थमा हुआ है। ईश्वर की रची सृष्टि के हर कार्य में जो सत्यरूपी नियम पूर्ण रूप से प्रत्येक वस्तु में रमा हुआ है वही धर्म है।
मनुस्मृति में धर्म शब्द की परिभाषा इस प्रकार की गयी है कि - ' धारणाद्धर्ममित्याहु:' अर्थात् जिसके धारण करने से किसी वस्तु की स्थिति रहती हैं वह धर्म है।
मनुष्य का धर्म मानवता है इतना तो सभी जानते हैं , वैशेषिक दर्शनकार कहते है -
यतोऽभयुदयनि:श्रेयससिद्धि स धर्म: ( वैशेषिक १\२ )
अर्थात् जिसे भोग और मोक्ष की सिद्धि हो वह धर्म है।
मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए है ।जिस मनुष्य में ये दस गुण विधमान है और उन्हीं के अनुसार जीवन व्यतीत करता है वही धार्मिक प्रवृत्ति वाला है। मनु महाराज ने इस श्लोक में धर्म के दस लक्षण बताए है।
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणमं।। ( मनुस्मृति ६\९२ )
धृति ( धैर्य), क्षमा,दम (आत्म-संयम ), अस्तेय ( चोरी न करना), शौच ( स्वच्छता), इन्द्रिनिग्रह ( इन्द्रियों पर नियंत्रण), धी: ( विवेकशीलता ), विद्या ( ज्ञान), सत्य बोलना, अक्रोध ( क्रोध न करना) - ये वैदिक धर्म के दस लक्षण है।
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने 'धर्म किसको कहते है ' बड़े ही आसान तरीके से सत्यार्थ प्रकाश में बताया है।
" धर्म वह है जिसमें परस्पर किसी का विरोध न हो अर्थात् धर्म एक सार्वभौम वस्तु है जिसका किसी विशेष देश , जाति तथा काल से खास सम्बन्ध नही होता।
" " जो ईश्वर की आज्ञा का यथावत् पालन और पक्षपात रहित सर्वहित न्याय करना है।, जो कि वेदोक्त होने से सब मनुष्यों के लिए एक ही मानने योग्य हैं, वह धर्म कहाता है। ( महर्षि दयानंद सरस्वती)
ईश्वर एक है अत: उसके द्वारा प्रदत्त धर्म भी एक ही होता है, अनेक नही। जो अनेक है वे मत, मज़हब, पंथ हो सकते हैं जो मनुष्य कृत अपने-अपने विचार है, मान्यताएँ हैं , देश- काल परिस्थितियों के अनुसार बनाए नियम है ।प्रन्तु जहाँ धर्म की बात आती है वहाँ धर्म सबके लिए एक है।धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है, जीने का तरीका बताता है, सत्यासत्य का बोध कराता है, कर्तव्यों की जानकारी देता है, वरना धर्महीन मनुष्य दिखने में तो मनुष्य-जैसा लगता है, प्रन्तु वह मनुष्य कहलाने के काबिल नहीं होता।
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💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏
🌷ओ३म् शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णु: ( ऋग्वेद ७\३५\५)
🌷अर्थ :' पहले स्तुति किये हुए द्युलोक और पृथ्वी लोक हमारे लिए शान्तिदायक हो, सूर्य-चन्द्रमा वाला अन्तरिक्ष हमारी नेत्र ज्योति के लिये शान्ति देने वाला हो, औषधियाँ-अन्नादि और वन पदार्थ हमें शान्तिकारक हो , जगत् का स्वामी जयशील परमेश्वर हमें सदा शान्तिदायक हो।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, माघ - मासे, कृष्ण पक्षे,पञ्चमयां
तिथौ,
उत्तराफाल्गुन नक्षत्रे, रविवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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