🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🕉️🙏नमस्ते जी🙏
दिनांक - - २० जनवरी २०२५ ईस्वी
दिन - - सोमवार
🌖 तिथि -- षष्ठी ( ९:५८ तक तत्पश्चात सप्तमी )
🪐 नक्षत्र - - हस्त ( २०:३० तक तत्पश्चात चित्रा )
पक्ष - - कृष्ण
मास - - माघ
ऋतु - - शिशिर
सूर्य - - उत्तरायण
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:१४ पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:५० पर
🌖 चन्द्रोदय -- २३:४८ पर
🌖 चन्द्रास्त - - १०:५३ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🌷प्रश्न :- क्या वेदों में यज्ञ का वर्णन है ?
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उत्तर :- यजुर्वेद में यज्ञकर्म के ही बारे में बताया गया है। यजुर्वेद का मुख्य विषय कर्मकांड है। मनुष्य को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, इन बातों को बताया गया है। जितने पुराने वेद है उतने ही पुराने ' यज्ञ ' है। ऋग्वेद वेद का सर्वप्रथम मंत्र है -
ओ३म् अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातम्। ( ऋग्वेद १\१\१ )
यज्ञ - पुरोहित- ऋत्विज् और होता सबका स्पष्ट वर्णन है, अत: यज्ञ उतने ही पुराने है , जितना पुराना ऋग्वेद का पहला मंत्र।
अरं कृण्वन्तु वेदिं समग्निमिन्धतां पुर: ( ऋग्वेद १\१७०\४ )
अर्थात् ईश्वर की आज्ञा है कि " तुम यज्ञवेदी को अलंकृत करो और उसमें अग्नि को प्रज्वलित करो " ।
आ वक्षि देवाँ इहाँ विप्र यक्षि च ( ऋग्वेद २\३६\४ )
अर्थात् हे विद्वान ! तुम देवों को लाओं और यज्ञ करो।
जुहोत प्र च तिष्ठत ( ऋग्वेद १\१५\९ )
ईश्वर आज्ञा है कि " तुम यज्ञ करो और प्रगति करो।"
चारों वेदों में यज्ञकर्म को सर्वश्रेष्ठ कहा है और यज्ञ करने की प्ररेणा दी गई है , क्योंकि यज्ञ से सब कार्य सिद्ध होते है।
प्र यज्ञमन्सा वृजनं तिराते ( ऋग्वेद ७\६१\४)
अर्थात् यज्ञ की ओर प्रवृत्ति परिवार को दु :खों से पार लगाती है।
यज्ञो हि त इन्द्र वर्धन: ( ऋग्वेद ३\३२\१२ )
अर्थात् यज्ञ ही वृद्धि और सम्पन्नता का सूचक हैं।
" यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म "
यज्ञ की महिमा का वर्णन करते हुए शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि संसार में सबसे श्रेष्ठ कार्य यज्ञ है।
योगेश्वर कृष्ण ने तो गीता में यहाँ तक कह दिया है कि जो व्यक्ति बिना यज्ञ किये भोजन करता है वह अन्न नही पाप खाता है। भुज्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्म कारणात् " गीता "
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💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏
🌷ओ३म् शं न: सोमो भवतु ब्रह्म शं न: शं नो ग्रावाण: शमु सन्तु यज्ञा:।
शं नो स्वरूणां मितयो भवन्तु शं : प्रशव: शम्वस्तु वेदि: ( ७\३५\७ )
🌷अर्थ :- परमैश्वर्यवान ईश्वर हमे सुखदायक हो, वेद-ज्ञान हमें सुखकारी हो, यज्ञकुण्ड तथा भवनादि हमे सुखदायी हो, यज्ञ-स्तम्भ परिमाण हमारे लिए सुख देने वाले हो, औषधियाँ हमें कल्याण देने वाली हों तथा यज्ञ व यज्ञवेदी हमें शान्तिदायक हो।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , शिशिर -ऋतौ, माघ - मासे, कृष्ण पक्षे, षष्ठम्यां
तिथौ,
हस्त नक्षत्रे, सोमवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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