🔱 न्याय दर्शन सूत्र 1.1.5
अनुमान का लक्षण और उसके तीन भेद
📜 मूल सूत्र
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधम् अनुमानं पूर्ववत् शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च ।। ५ ।।
(अनुमानलक्षण सूत्र)
🌼 सरल अर्थ (Simple Hindi)
प्रत्यक्ष के बाद अनुमान आता है।
अनुमान तीन प्रकार का होता है —
पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट।
अर्थात्—
जब हम किसी वस्तु को सीधे नहीं देखते, लेकिन
चिन्ह, कारण या सामान्य नियम के आधार पर
उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं,
तो उसे अनुमान प्रमाण कहते हैं।
🔍 अनुमान क्या है? (Very Simple)
अनुमान = जो दिखाई नहीं दे रहा,
उसे दिखाई देने वाले संकेत से जानना।
👉 धुआँ दिख रहा है → आग का ज्ञान
👉 बादल दिख रहे हैं → वर्षा का अनुमान
🧠 “अथ तत्पूर्वकं” का भाव
इसका अर्थ है—
अनुमान, प्रत्यक्ष पर आधारित होता है।
पहले कभी हमने प्रत्यक्ष रूप से जाना होता है कि—
- जहाँ धुआँ होता है, वहाँ आग होती है
इसी पुराने प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर
नया अनुमान बनता है।
📚 अनुमान के तीन प्रकार (त्रिविध अनुमान)
1️⃣ पूर्ववत् अनुमान (Pūrvavat Anumāna)
अर्थ
कारण को देखकर भविष्य के कार्य का अनुमान।
उदाहरण
- काले बादल दिखे → वर्षा होगी
- गर्भ ठहरा → आगे संतान जन्म लेगी
👉 यहाँ कारण पहले, कार्य बाद में।
2️⃣ शेषवत् अनुमान (Śeṣavat Anumāna)
अर्थ
कार्य को देखकर कारण का अनुमान।
उदाहरण
- नदी में पानी बढ़ा → ऊपर वर्षा हुई होगी
- घर में धुआँ → कहीं आग लगी है
👉 यहाँ कार्य दिख रहा, कारण अनुमान से जाना गया।
3️⃣ सामान्यतोदृष्ट अनुमान (Sāmānyato-dṛṣṭa Anumāna)
अर्थ
सामान्य नियम या अनुभव के आधार पर अनुमान।
यह न कारण-कार्य पर आधारित होता है,
न प्रत्यक्ष समय-संबंध पर।
उदाहरण
- सूर्य चलता हुआ प्रतीत होता है
- घड़ी की सुई घूमती है → समय आगे बढ़ रहा है
- शरीर में परिवर्तन → आत्मा स्थिर है
👉 यह दार्शनिक अनुमान है।
🌸 भक्ति और अध्यात्म में अनुमान
भक्ति में भी अनुमान की बड़ी भूमिका है—
- शरीर नश्वर है → आत्मा नित्य है
- संसार बदल रहा है → कोई शाश्वत तत्त्व है
- नियम है → नियंता (ईश्वर) है
ईश्वर को प्रत्यक्ष न देखकर भी
हम उसके अस्तित्व का अनुमान करते हैं।
🕊️ गीता से साम्य
गीता 2.16
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः
जो नित्य है, वह बना रहता है —
यह सामान्यतोदृष्ट अनुमान है।
📚 Roman Transliteration
atha tatpūrvakaṃ trividham anumānaṃ pūrvavat śeṣavat sāmānyato-dṛṣṭaṃ ca || 5 ||



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