1. अज का रहस्य – ब्रह्मांड, शरीर और चेतना का समन्वय
अथर्ववेद 4.14.9 और इससे जुड़े मंत्रों में “अज” शब्द बार-बार आता है। सामान्यतः इसे “अजन्मा” या “जन्मा नहीं होने वाला” समझा जाता है। लेकिन उपनिषद, नीरुक्त और वैदिक दर्शन इसे कहीं अधिक व्यापक दृष्टि से देखते हैं।
✦ अज = ब्रह्मांडीय चेतना
- विश्वरूप अज केवल कोई व्यक्तिगत शक्ति नहीं है, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व है।
- यह वही चेतना है जो सृष्टि को संचालित करती है, चाहे वह सूर्य, ग्रह, पृथ्वी, नदियाँ या मानव शरीर हो।
- उपनिषदों में इसे सर्वव्यापी आत्मा (सर्वम् आत्मा) या ब्राह्मण चेतना कहा गया है।
✦ अज और शरीर
- मंत्र में “त्वचा सर्वैरङ्गैः संभृतं” कहकर स्पष्ट किया गया है कि यह शक्ति हमारे शरीर के प्रत्येक अंग में प्रवाहित होती है।
- यह चेतना हमारे अणु, कोशिका, अंग और ऊर्जा केंद्रों (चक्र) में सक्रिय है, जिससे मानव का जीवन और जागरूकता संचालित होती है।
✦ अज और राक्षस
- कुछ मंत्रों में अज = राक्षस रूप में भी आता है।
- यह प्रतीकात्मक है: राक्षस = अविकसित, अज्ञान और अराजक शक्ति।
- साधना द्वारा अज (शक्ति) को नियंत्रित और संरचित किया जाता है – राक्षस के रूप से जो असंगठित ऊर्जा है, उसे विश्वरूप चेतना में परिवर्तित किया जाता है।
2. ब्रह्मांडीय जाग्रत चेतना और ईश्वर
- अज, राक्षस, मानव और ब्रह्मांड – यह सब एक ही संपूर्ण चेतना के अलग-अलग रूप हैं।
- ईश्वर = विश्व चेतना = अज का सर्वोच्च रूप।
- मानव में यह सूक्ष्म रूप (microcosm) के रूप में आता है, ब्रह्मांड में महामानव रूप (macrocosm) के रूप में।
उपनिषद उदाहरण
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छान्दोग्य उपनिषद् 6.2.1 –
“सर्वं आत्मा विश्वोऽत्मनि” – सम्पूर्ण ब्रह्मांड और जीव का स्वरूप आत्मा में निहित है।
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प्रश्नोपनिषद् 4.6 –
“प्राणो हि पञ्चधा विश्वम्” – शरीर और प्राण के पंचमूलक अंग ब्रह्मांडीय ऊर्जा के समकक्ष हैं।
यह दिखाता है कि अज = प्रकृति = ब्रह्मांड = चेतना = ईश्वर = जीव
3. सूक्ष्म और स्थूल रूप
- सूक्ष्म रूप – मानव का जीवन, प्राण, चेतना, मन और शरीर में अज का अनुभव।
- स्थूल रूप – सूर्य, ग्रह, नदियाँ, पर्वत और समस्त जीव-जगत।
मंत्र में यह स्पष्ट है कि अज को शरीर और दिशाओं के अनुसार व्यवस्थित करना
→ यह सूक्ष्म और स्थूल ब्रह्मांड का समन्वय है।
4. निष्कर्ष – ब्रह्माण्ड, मानव और अज का रहस्य
- अज = जन्मा नहीं, शाश्वत शक्ति
- राक्षस = असंगठित, अज्ञान ऊर्जा
- मानव = सूक्ष्म ब्रह्मांड
- विश्व = स्थूल ब्रह्मांड
- ईश्वर = चेतना, ब्रह्मांडीय जाग्रत शक्ति
अतः मंत्र हमें यह सिखाता है कि सभी रूप – अज, राक्षस, मानव और ब्रह्मांड
मूलतः एक ही चेतना और ऊर्जा के विभिन्न अभिव्यक्त रूप हैं।
साधना का उद्देश्य है – इन सबको पहचानना और संतुलित करना, ताकि मानव का जीवन और चेतना विश्वरूप अज के अनुरूप सामंजस्यपूर्ण हो जाए।
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