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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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Atharvaveda kand 4 Sukta 14

भूमिका

यह मंत्र अग्नि और देवताओं के माध्यम से जीवन और चेतना की उच्चतर अवस्था की ओर इंगित करता है। यहाँ “अजो” (अजात) अग्नि को दर्शाता है, जो निरंतर उत्पन्न होती रहती है और जीवन में प्रकाश फैलाती है। देवता और मेध्य (बुद्धि, मेधा) इससे ऊपर उठकर दिव्य स्तर पर आरोहण करते हैं। ---

शब्दार्थ

अजः = अजात, जन्महीन ह्यग्निः = निश्चित रूप से अग्नि अजनिष्ट = अविनाशी, शोक से मुक्त शोकात् = दुःख से सो = वह अपश्यत् = देखा जनितारम् = उत्पन्न होने वाला अग्रे = पहले, प्रारंभ में तेन = उसके द्वारा देवाः = देवता देवता-अग्रा = देवताओं के अग्रभाग में आयन् = आए तेन = उसी के द्वारा रोहान् = आरोही रुरुहु: = उठते हैं, बढ़ते हैं मेध्याः = मेधा, बुद्धि, विवेक ---

सरल अर्थ

अग्नि, जो जन्महीन और अविनाशी है, शोक और दुख को देखकर उत्पन्न होती है। देवता उसकी ओर बढ़ते हैं, और उसी से उनकी बुद्धि और चेतना ऊपर उठती है। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ अग्नि = ऊर्जा और चेतना का प्रतीक ✔ शोक से उत्पन्न अग्नि = कठिनाइयों से उत्पन्न ज्ञान ✔ देवता = चेतना के उच्च स्तर यह मंत्र बताता है कि कठिन परिस्थितियाँ और विपत्तियाँ चेतना को ऊँचा उठाती हैं। ---

आध्यात्मिक अर्थ

अग्नि और देवता का आरोहण जीवन के आध्यात्मिक उन्नयन का प्रतीक है। ✔ अज्ञान और दुःख के माध्यम से अनुभव बढ़ता है ✔ चेतना और विवेक की वृद्धि होती है ✔ मेधा (बुद्धि) उच्चतर स्तर पर पहुँचती है ---

योगिक दृष्टि

✔ ध्यान और प्राणायाम से मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा ऊपर उठती है ✔ कठिनाइयाँ साधक को चेतना के नए आयाम पर ले जाती हैं ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ दुःख और विपत्तियाँ मानसिक वृद्धि के अवसर हैं ✔ कठिन परिस्थितियाँ चेतना को मजबूत बनाती हैं ✔ ध्यान और सजगता से जीवन का आरोहण संभव है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — तनाव और चुनौतियाँ मस्तिष्क और चेतना को सक्रिय करती हैं। ब्रह्मज्ञान कहता है — कठिनाइयाँ और अनुभव चेतना के आरोहण के साधन हैं। दोनों मिलकर संकेत देते हैं — जीवन की आग और विपत्तियाँ बुद्धि को ऊँचा उठाती हैं। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.1 का यह मंत्र अग्नि और देवताओं के माध्यम से चेतना और मेधा के आरोहण का संदेश देता है। ✔ जन्महीन अग्नि प्रकाश फैलाती है ✔ देवता उससे ज्ञान प्राप्त करते हैं ✔ मेधा और विवेक उच्चतर स्तर पर पहुंचते हैं ---

English Insight

The unborn, imperishable fire, witnessing sorrow, arises at the forefront. By it, the Devas ascend, and intellect rises toward higher consciousness. Fire and challenge illuminate wisdom.

भूमिका

यह मंत्र अग्नि के माध्यम से शुद्धि और दिव्य आरोहण को दर्शाता है। अग्नि, जो नाक, मुख और हाथों में प्रवाहित होती है, जीवन और कर्म को शुद्ध करती है। इसके बाद व्यक्ति दिव्य प्रकाश के साथ देवताओं के मार्ग में मिश्रित होता है। ---

शब्दार्थ

क्रमध्वम् = क्रम और मार्ग अग्निना = अग्नि द्वारा नाकमुख्यान् = नाक और मुख में हस्तेषु = हाथों में बिभ्रतः = वह वहन करता है, लेकर चलता है दिवः = दिव्य, आकाशीय स्पृष्ठम् = स्पर्शित, छूकर स्वर्गत्वा = स्वर्ग के समान उच्च अवस्था में मिश्रा = मिलकर देवेभिः = देवताओं के साथ आध्वम् = मार्ग में, यात्रा में ---

सरल अर्थ

अग्नि क्रम से नाक, मुख और हाथों में प्रवाहित होती है, और व्यक्ति दिव्य रूप से स्वर्ग के समान उच्च स्तर पर पहुँचता है। वह देवताओं के मार्ग में उनके साथ मिश्रित होता है। ---

वैज्ञानिक और चिकित्सीय संकेत

✔ अग्नि = जीवन शक्ति और ऊर्जा ✔ नाक, मुख, हाथ = संवेदनशील और ऊर्जा-संचार केंद्र ✔ शुद्धि = रोग और दोषों का निवारण यह दिखाता है कि वैदिक संस्कारों में शरीर के प्रमुख अंगों के माध्यम से स्वास्थ्य और शक्ति का संचरण होता था। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ अग्नि के माध्यम से शरीर और मन शुद्ध होते हैं ✔ देवताओं के मार्ग में मिलना = चेतना का उच्चतम स्तर ✔ क्रम और मार्ग = जीवन में अनुशासन और नियम ---

योगिक दृष्टि

✔ प्राणायाम और अग्नि साधना से शरीर के ऊर्जाकेंद्र सक्रिय होते हैं ✔ ध्यान और संस्कार से चेतना का आरोहण संभव है ✔ हाथ, मुख, नाक = ऊर्जा संचार के प्रमुख केंद्र ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ अनुशासन और क्रम जीवन को ऊँचा उठाते हैं ✔ शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाती है ✔ देवताओं के साथ मिलन = मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — सांस और हाथों के माध्यम से ऊर्जा संचरण महत्वपूर्ण है। ब्रह्मज्ञान कहता है — शुद्धि और अनुशासन से चेतना ऊँची होती है। दोनों मिलकर कहते हैं — शारीरिक और मानसिक अनुशासन से उच्चतर जीवन संभव है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.2 का यह मंत्र अग्नि के माध्यम से शुद्धि और दिव्य मार्ग पर आरोहण का संदेश देता है। ✔ नाक, मुख और हाथ से ऊर्जा प्रवाहित होती है ✔ व्यक्ति देवताओं के मार्ग में मिश्रित होता है ✔ अनुशासन और शुद्धि जीवन को ऊँचाई प्रदान करती है ---

English Insight

Fire flows through nose, mouth, and hands in proper order. Touched by the divine, one ascends like heaven, blending with the path of the Devas. Purification and disciplined ascent lead to higher consciousness.

भूमिका

यह मंत्र जीवन और चेतना के क्रमिक आरोहण को दर्शाता है। यहाँ साधक पृथ्वी से उठकर अंतरिक्ष और फिर दिव्य स्तर पर पहुंचता है। नाक को मार्ग के रूप में दर्शाया गया है, जिससे दिव्य प्रकाश प्राप्त होता है। ---

शब्दार्थ

पृष्ठात् = पीछे से, पृष्ठभूमि से पृथिव्या = पृथ्वी से अहम् = मैं अन्तरिक्षम् = अंतरिक्ष अरुहम् = आरोहण करता हूँ अन्तरिक्षात् = अंतरिक्ष से दिवम् = आकाश या दिव्य स्तर अरुहम् = आरोहण करता हूँ दिवः = दिव्य नाकस्य = नाक के माध्यम से पृष्ठात् = पृष्ठभूमि या आधार से स्व = स्वयं ज्योतिः = प्रकाश अगम् = प्राप्त करता हूँ अहम् = मैं ---

सरल अर्थ

मैं पृथ्वी से उठकर अंतरिक्ष में प्रवेश करता हूँ, अंतरिक्ष से उठकर दिव्य आकाश में आरोहण करता हूँ। नाक के मार्ग से मैं दिव्य प्रकाश प्राप्त करता हूँ। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ पृथ्वी = स्थूल शरीर ✔ अंतरिक्ष = मन और चेतना ✔ दिव्य = उच्चतर चेतना और आत्मा ✔ नाक = प्राण और ऊर्जा का मुख्य मार्ग यह सूक्ति चेतना के क्रमिक विकास और ऊर्जा प्रवाह को दर्शाती है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ जीवन का आरोहण क्रमशः होता है ✔ स्थूल शरीर से मानसिक और फिर आध्यात्मिक स्तर तक ✔ नाक द्वारा प्राण ऊर्जा का संचरण और प्रकाश प्राप्ति ---

योगिक दृष्टि

✔ प्राणायाम के माध्यम से नासिका से ऊर्जा का संचरण ✔ ध्यान और मंत्र साधना से चेतना का दिव्य स्तर पर आरोहण ✔ शरीर, मन और आत्मा का संतुलित विकास ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ आधार से उच्च स्तर तक उठना ✔ क्रमबद्ध प्रयास और साधना से चेतना का विकास ✔ प्रकाश और ज्ञान प्राप्ति का मार्ग ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — नासिका मार्ग से श्वास और ऊर्जा का संवहन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। ब्रह्मज्ञान कहता है — ऊर्जा का प्रवाह और क्रमिक आरोहण आत्मज्ञान की दिशा है। दोनों मिलकर कहते हैं — शारीरिक आधार से चेतना और ज्ञान की ऊँचाई तक यात्रा संभव है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.3 का यह मंत्र पृथ्वी से दिव्य प्रकाश तक चेतना के आरोहण का संदेश देता है। ✔ स्थूल से सूक्ष्म तक यात्रा ✔ नाक के माध्यम से प्राण और प्रकाश ✔ क्रमबद्ध साधना और ऊर्जा का प्रवाह ---

English Insight

From the earth I rise, ascending to the sky, from the sky to the divine realm I ascend. Through the nose I receive the divine light, a journey from the physical to the celestial consciousness.

भूमिका

यह मंत्र सूर्य और आकाश के द्वारा विश्व और यज्ञ के महत्व को दर्शाता है। सूर्य और आकाश (दिव्य तत्व) स्वयं की ओर ध्यान नहीं रखते, बल्कि सभी जीवों और देवताओं के लिए प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करते हैं। साधक, जो यज्ञ और ज्ञान में निपुण है, वही इसे ग्रहण कर पाता है। ---

शब्दार्थ

स्वर्यन्तः = सूर्य की ओर नापेक्षन्त = निर्लिप्त, अपेक्षा न रखते हुए आ द्यां = आकाश की ओर रोहन्ति = आरोहण करते हैं, बढ़ते हैं रोदसी = प्रकाशमान, चमकदार यज्ञं = यज्ञ, कर्मकुंड ये = जो विश्वतो = सर्वत्र, पूरे विश्व में धारम् = धारण करने वाला सुविद्वांसः = ज्ञानी, बुद्धिमान वितेनिरे = वितरित करते हैं, प्रदान करते हैं ---

सरल अर्थ

सूर्य और आकाश स्वयं के लिए नहीं, बल्कि सब जीवों के लिए प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करते हैं। जो ज्ञानी और यज्ञ-कुशल हैं, वे इसका लाभ ग्रहण करते हैं और इसे वितरित करते हैं। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ सूर्य = जीवन ऊर्जा का स्रोत ✔ आकाश = विस्तार और चेतना का प्रतीक ✔ यज्ञ = कर्म, साधना और अनुशासन यह दर्शाता है कि ज्ञान और साधना के माध्यम से ही संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का लाभ लिया जा सकता है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ आत्म-अनुकूलता छोड़कर दूसरों के लिए कार्य करना ✔ यज्ञ और कर्मकुंड में भाग लेना चेतना को ऊँचा उठाता है ✔ ज्ञानी और विद्वान व्यक्ति इसे ग्रहण करता है और फैलाता है ---

योगिक दृष्टि

✔ सूर्य और आकाश का ध्यान करके ध्यान साधना ✔ यज्ञ और मंत्र साधना से ऊर्जा का संचरण ✔ ब्रह्मांडीय ऊर्जा से चेतना का आरोहण ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ अपने स्वार्थ से ऊपर उठना ✔ कर्म और सेवा के माध्यम से ज्ञान और शक्ति प्राप्त करना ✔ दूसरों के कल्याण में योगदान करना ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — सूर्य और प्रकाश का मानव शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव है। ब्रह्मज्ञान कहता है — स्वार्थ त्याग कर कर्म और साधना से ऊर्जा का आदान-प्रदान संभव है। दोनों मिलकर कहते हैं — ऊर्जा और ज्ञान का संतुलित उपयोग जीवन को ऊँचाई प्रदान करता है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.4 का यह मंत्र सूर्य, आकाश और यज्ञ के माध्यम से ज्ञान और ऊर्जा के वितरण का संदेश देता है। ✔ सूर्य और आकाश सबके लिए हैं ✔ ज्ञानी और यज्ञकर्ता इसे ग्रहण और वितरित करते हैं ✔ स्वयं को लाभ नहीं, परन्तु सबके लिए योगदान ---

English Insight

The Sun and the sky do not seek for themselves, they rise in brilliance for all beings. Those skilled in sacrifice and wise in knowledge, receive and distribute this universal energy.

भूमिका

यह मंत्र अग्नि के माध्यम से देवताओं और मानवों की रक्षा और कल्याण का निर्देश देता है। अग्नि देवताओं का पहला चक्षु है और यजमानों की भलाई करता है। भृगु ऋषियों की कृपा से यजमानों को सुव्यवस्थित और स्वस्थ जीवन प्राप्त होता है। ---

शब्दार्थ

अग्ने = हे अग्नि प्रेहि = भेज, प्रदान कर प्रथमो = पहला देवतानां = देवताओं का चक्षुः = आँख, दृष्टि देवानाम् = देवताओं का उत = और मानुषानाम् = मानवों का इयक्षमाणा = निरीक्षक, जो देखता है भृगुभिः = भृगु ऋषियों द्वारा सजोषाः = सज्जन, भद्र स्वर्यन्तु = लाभ दें, वृद्धि करें यजमानाः = यज्ञ करने वाले, साधक स्वस्ति = कल्याण, सुख ---

सरल अर्थ

हे अग्नि! देवताओं और मानवों के लिए पहला दृष्टि बनकर यजमानों को भृगु ऋषियों के सहयोग से स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि प्रदान कर। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ अग्नि = चेतना और शक्ति का प्रतीक ✔ यज्ञ = कर्म और अनुशासन ✔ भृगु = मार्गदर्शन और ज्ञान यह मंत्र बताता है कि दिव्य ऊर्जा और सही मार्गदर्शन से जीवन में कल्याण संभव है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ अग्नि द्वारा मार्गदर्शन ✔ यज्ञ और साधना से आध्यात्मिक सुरक्षा ✔ भृगु ऋषियों की कृपा से मानसिक और शारीरिक कल्याण ---

योगिक दृष्टि

✔ अग्नि साधना (हवन, यज्ञ) से ऊर्जा और चेतना का संचार ✔ ध्यान और प्रार्थना से दिव्यता प्राप्ति ✔ भृगु मार्गदर्शन = सही साधना और अनुशासन ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ देवताओं और गुरु मार्गदर्शक के माध्यम से संरक्षण ✔ अनुशासन और साधना से स्वास्थ्य और समृद्धि ✔ यजमानों का कल्याण = कर्म और विश्वास का फल ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — सर्वप्रथम ऊर्जा का ध्यान और मार्गदर्शन मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। ब्रह्मज्ञान कहता है — सही मार्गदर्शन और दिव्य ऊर्जा के साथ साधना जीवन को कल्याणकारी बनाती है। दोनों मिलकर कहते हैं — सुरक्षा, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए ऊर्जा, अनुशासन और मार्गदर्शन आवश्यक है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.5 का यह मंत्र अग्नि के माध्यम से देवताओं और यजमानों की सुरक्षा, कल्याण और समृद्धि का संदेश देता है। ✔ अग्नि = दृष्टि और सुरक्षा ✔ भृगु = मार्गदर्शन और ज्ञान ✔ यजमान = साधक और कर्मशील व्यक्ति ✔ स्वस्ति = कल्याण, स्वास्थ्य और सफलता ---

English Insight

O Agni! Be the first eye for the Devas, observe humans, and grant welfare. With the guidance of the Bhrigus, let the sacrificers prosper and rise in well-being. Energy, guidance, and discipline ensure protection and prosperity.

भूमिका

यह मंत्र दिव्य पेय (अमृत) के माध्यम से साधक के लोक आरोहण का वर्णन करता है। अजन्मा (जन्मरहित) दिव्य पेय, घृत और शुद्ध दूध से प्राप्त होता है। इससे सुकृत कर्म करने वाले व्यक्ति की चेतना उच्चतम स्तर तक उठती है, नाकमार्ग से दिव्य प्रकाश और ज्ञान प्राप्त होता है। ---

शब्दार्थ

अजमनज्मि = जन्महीन, अजन्मा पयसा = दूध से घृतेन = घृत से दिव्यं = दिव्य सुपर्णं = पंखयुक्त, विशाल, दिव्य रूप पयसं = अमृत या दिव्य पेय बृहन्तम् = बड़ा, महान तेन = उसके द्वारा गेष्म = जो साधक सुकर्म करता है सुकृतस्य = सुकर्मकर्ता लोकं = लोक, चेतना का स्तर स्वरारोहन्तः = अपने स्वर या चेतना को ऊपर उठाते हुए अभि = ऊपर नाकम् = नाक उत्तमम् = श्रेष्ठ, उच्चतम ---

सरल अर्थ

जन्मरहित, घृत और दूध से बना दिव्य पेय सुकृत कर्म करने वाले को अपने लोक (चेतना) को उच्चतम स्तर तक उठाने में सहायता करता है। नाक के मार्ग से यह दिव्य प्रकाश और ज्ञान प्राप्त होता है। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ अमृत और घृत = पोषण और ऊर्जा का प्रतीक ✔ लोक आरोहण = चेतना और मानसिक ऊर्जा का विस्तार ✔ नाक = प्राण और ऊर्जा के केंद्र यह दिखाता है कि शुद्ध और सकारात्मक साधना मानसिक और आध्यात्मिक उन्नयन में मदद करती है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ अजन्मा दिव्य पेय = उच्चतर ज्ञान और अनुभव ✔ सुकृत = अच्छे कर्म और अभ्यास ✔ नाकमार्ग = ऊर्जा का संचार ✔ लोक आरोहण = चेतना का उच्चतम स्तर ---

योगिक दृष्टि

✔ प्राणायाम और शुद्ध आहार से ऊर्जा का संचरण ✔ ध्यान और साधना से चेतना का आरोहण ✔ दिव्य ऊर्जा के माध्यम से मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ कर्म और साधना से चेतना ऊँचाई पर जाती है ✔ शुद्ध आहार और ऊर्जा का संचरण मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है ✔ साधक को अपने भीतर के दिव्य प्रकाश का अनुभव होता है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — शुद्ध आहार और ऊर्जा का संचरण शरीर और मस्तिष्क के लिए आवश्यक है। ब्रह्मज्ञान कहता है — अमृत और घृत के माध्यम से उच्चतर चेतना और अनुभव संभव हैं। दोनों मिलकर कहते हैं — शुद्ध कर्म, साधना और ऊर्जा का संचरण जीवन को उच्चतर बनाता है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.6 का यह मंत्र दिव्य पेय और सुकृत कर्म के माध्यम से चेतना के उच्चतम आरोहण का संदेश देता है। ✔ अजन्मा दिव्य पेय = ज्ञान और ऊर्जा ✔ सुकृत कर्म = साधक की तैयारी ✔ नाकमार्ग = ऊर्जा और प्रकाश का संचार ✔ लोक आरोहण = चेतना का उच्चतम स्तर ---

English Insight

The unborn, divine drink made of milk and ghee, helps the virtuous practitioner ascend to higher realms. Through the nasal pathway, divine light and knowledge are received, elevating consciousness to its supreme level.

भूमिका

यह मंत्र राक्षस (अज) और पंचांग (पाँच अंगों) के माध्यम से दिशाओं और ऊर्जा के संतुलन को दर्शाता है। साधक पंचभुज और पंचांगुलियों से दिशा निर्धारित करता है, जिससे चेतना और जीवन में सामंजस्य और शक्ति आती है। ---

शब्दार्थ

पञ्चौदनं = पांच अंगों वाला, पंचांग पञ्चभिः = पांच (अंगुलियाँ) अङ्गुलिभिः = उंगलियों से दर्व्योद्धर = ऊपर उठाने वाला पञ्चधैतमोदनम् = पांच अंगों को प्रकट करना प्राच्यां दिशि = पूर्व दिशा में शिरो = सिर अजस्य = अज, यहां दिव्य या प्रतीकात्मक रूप धेहि = स्थापित कर दक्षिणायां दिशि = दक्षिण दिशा में दक्षिणं = दक्षिण पार्श्वम् = पार्श्व या साइड ---

सरल अर्थ

साधक अपने पंचांग और पाँच उंगलियों का उपयोग करके पूर्व दिशा में अज के सिर को, दक्षिण दिशा में उसका पार्श्व स्थापित करता है। यह ऊर्जा और चेतना के संतुलन का प्रतीक है। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ पंचांग और उंगलियाँ = शरीर और ऊर्जा केंद्र ✔ दिशा = ऊर्जा प्रवाह और ध्यान ✔ अज = स्थिर और शुद्ध ऊर्जा का प्रतीक यह दिखाता है कि साधना और ऊर्जा संचरण में दिशा का महत्व है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ पंचांगुलियों से ऊर्जा का संचरण ✔ पूर्व दिशा = नई ऊर्जा, दक्षिण दिशा = स्थिरता ✔ दिशा और अंगों का संतुलन = मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन ---

योगिक दृष्टि

✔ योग और प्राणायाम में अंग और दिशा का ध्यान ✔ शरीर के ऊर्जा केंद्र और दिशाओं का संतुलन ✔ साधना से चेतना का स्थायीत्व और आरोहण ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ संतुलन और ध्यान जीवन में स्थिरता लाते हैं ✔ अंग और दिशा के माध्यम से मानसिक ऊर्जा का वितरण ✔ ध्यान और कर्म से जीवन में सामंजस्य ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — ऊर्जा केंद्र और दिशाओं का संतुलित उपयोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाता है। ब्रह्मज्ञान कहता है — साधना और दिशा-उर्जा का संतुलन चेतना को उच्चतम स्तर पर ले जाता है। दोनों मिलकर कहते हैं — संतुलित दिशा और ऊर्जा जीवन को शक्ति और स्थिरता प्रदान करती है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.7 का यह मंत्र पंचांग और अंगुलियों से दिशा और ऊर्जा संतुलन का संदेश देता है। ✔ पंचभुज और पांच उंगलियाँ = ऊर्जा केंद्र ✔ पूर्व और दक्षिण दिशा = ऊर्जा का प्रवाह ✔ अज = दिव्य शक्ति और स्थिरता ---

English Insight

With five limbs and five fingers, the practitioner positions the Aj (divine energy) towards the East (head) and South (side). This establishes balance and harmony in energy and consciousness.

भूमिका

यह मंत्र दिशा और ऊर्जा संतुलन के उच्चतर तकनीकी और आध्यात्मिक पहलुओं को दर्शाता है। साधक प्रत्येक दिशा में अपने अंगों, शक्तियों और चेतना केंद्रों को स्थापित करता है। इससे शरीर, मन और चेतना के मध्य सामंजस्य और ऊर्जा का प्रवाह सुनिश्चित होता है। ---

शब्दार्थ

प्रतीच्यां दिशि = पश्चिम दिशा में भसदमस्य = अज या दिव्य शक्ति धेहि = स्थापित कर उत्तरस्यां दिशि = उत्तर दिशा में उत्तं धेहि पार्श्वम् = उत्तर को पार्श्व में स्थापित कर ऊर्ध्वायां = ऊपर की दिशा में दिश्यजस्य = आकाश या दिव्य केंद्र अनूकं = समानान्तर, संगत ध्रुवायां = ध्रुव दिशा में पाजस्य = केंद्र, मध्य अन्तरिक्षे = आकाश में मध्यतः = मध्य में मध्यमस्य = मध्य का ---

सरल अर्थ

साधक पश्चिम दिशा में अज के भसद भाग को, उत्तर दिशा में उसके पार्श्व को, ऊर्ध्व दिशा में उसकी उपयुक्त ऊर्जा को, ध्रुव दिशा में केंद्र को आकाश में स्थापित करता है। इससे ऊर्जा और चेतना का संतुलन और समेकन होता है। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ दिशा = ऊर्जा प्रवाह और ध्यान केंद्र ✔ अंग और ऊर्जा = शरीर और मानसिक संतुलन ✔ अज/भसद = दिव्य शक्ति का प्रतीक यह मंत्र बताता है कि चेतना और ऊर्जा का संतुलन दिशाओं और केंद्रों के सही प्रबंधन से सुनिश्चित होता है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ प्रत्येक दिशा और केंद्र में ऊर्जा का संतुलन ✔ चेतना का आरोहण और स्थिरता ✔ साधना से मन, शरीर और आत्मा का समन्वय ---

योगिक दृष्टि

✔ योग और प्राणायाम में शरीर के ऊर्जा केंद्रों और दिशाओं का ध्यान ✔ साधना से ऊर्जा का प्रवाह और चेतना का विकास ✔ मध्य और ध्रुव केंद्र का ध्यान स्थिरता और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ जीवन में संतुलन और समन्वय महत्वपूर्ण ✔ दिशाओं और ऊर्जा केंद्रों का सही उपयोग मानसिक स्वास्थ्य बढ़ाता है ✔ साधना और अभ्यास से चेतना उच्च स्तर तक पहुँचती है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — ऊर्जा और दिशा के संतुलन से शरीर और मस्तिष्क का स्वास्थ्य बेहतर होता है। ब्रह्मज्ञान कहता है — दिशा और ऊर्जा केंद्रों का संयोजन चेतना को दिव्य स्तर तक ले जाता है। दोनों मिलकर कहते हैं — संतुलित ऊर्जा और सही दिशा जीवन में स्थिरता, शक्ति और ज्ञान प्रदान करती है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.8 का यह मंत्र दिशाओं और ऊर्जा केंद्रों में संतुलन स्थापित करने का संदेश देता है। ✔ पश्चिम और उत्तर दिशा = भौतिक और मानसिक ऊर्जा ✔ ऊर्ध्व और ध्रुव = आध्यात्मिक ऊर्जा ✔ मध्य = चेतना का केंद्र और संतुलन ---

English Insight

In the West, position the Aj's primary force, in the North, set its side, upwards, place the corresponding energy, at the Pole, fix the central point in the sky. This ensures balance and flow of energy and consciousness.

भूमिका

यह मंत्र विश्वरूप अज के अंगों और दिशाओं के माध्यम से संपूर्ण ऊर्जा और चेतना संतुलन का वर्णन करता है। साधक अपनी चेतना और शरीर के सभी अंगों को विश्व रूप अज के अनुरूप स्थापित करता है। यह उच्चतम आध्यात्मिक और योगिक अनुभव का संकेत है। ---

शब्दार्थ

शृतमजं = अज (दिव्य शक्ति) जो श्रुत (सुनाई देने योग्य) है शृतया = सुनाई देने योग्य, निर्देशित प्रोर्णुहि = स्थापित कर, फैलाकर त्वचा = त्वचा, आवरण सर्वैः अङ्गैः = सभी अंगों के माध्यम से संभृतं = संरक्षित, व्यवस्थित विश्वरूपम् = पूरे ब्रह्मांड रूप का स = वह उत्तिस्ठेतो = उठे, आरोहण करे अभि = ऊपर नाकम् = नाक उत्तमम् = श्रेष्ठ, उच्चतम पद्भिः = चरणों से चतुर्भिः = चारों प्रति तिष्ठ = प्रत्येक दिशा में स्थित रहे दिक्षु = दिशाओं में ---

सरल अर्थ

साधक अज (विश्वरूप) को त्वचा और सभी अंगों के माध्यम से व्यवस्थित करता है। यह अज अपने चरणों से चारों दिशाओं में स्थिर रहता है। नाकमार्ग से यह उच्चतम ऊर्जा और चेतना प्राप्त होती है। ---

वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत

✔ अज = दिव्य ऊर्जा और चेतना का प्रतीक ✔ अंग और त्वचा = ऊर्जा केंद्र और संवेदनाएँ ✔ चारों दिशाएँ = ऊर्जा का प्रवाह और संतुलन यह दर्शाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अनुभव संतुलित अंग और दिशा प्रबंधन से संभव है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ विश्वरूप अज के अनुसार शरीर और चेतना का संरेखण ✔ चारों दिशाओं में ऊर्जा का प्रवाह ✔ उच्चतम चेतना और आध्यात्मिक स्थायीत्व ---

योगिक दृष्टि

✔ प्राणायाम और ध्यान में अंगों और दिशाओं का संयोजन ✔ चेतना का चारों दिशाओं में विस्तार ✔ नाकमार्ग से दिव्य ऊर्जा का आरोहण ---

मनोवैज्ञानिक संदेश

✔ संतुलित शरीर और चेतना मानसिक शक्ति बढ़ाती है ✔ दिशाओं और ऊर्जा केंद्रों का नियंत्रण जीवन में सामंजस्य लाता है ✔ साधना से मन, शरीर और आत्मा का समेकन ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

विज्ञान कहता है — शरीर के सभी अंगों और दिशा केंद्रों का संतुलन स्वास्थ्य और ऊर्जा को बढ़ाता है। ब्रह्मज्ञान कहता है — विश्वरूप अज के अनुसार ऊर्जा और चेतना का संतुलन आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है। दोनों मिलकर कहते हैं — संतुलित ऊर्जा और दिशाओं से चेतना का सर्वोच्च अनुभव संभव है। ---

समग्र निष्कर्ष

अथर्ववेद 4.14.9 का यह मंत्र विश्वरूप अज और अंगों के माध्यम से ऊर्जा, चेतना और दिशा संतुलन का संदेश देता है। ✔ त्वचा और अंग = ऊर्जा केंद्र ✔ चारों दिशाएँ = ऊर्जा का वितरण ✔ नाकमार्ग = दिव्य चेतना का आरोहण ✔ विश्वरूप अज = सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय शक्ति ---

English Insight

Arrange the Shrutam Aj (divine universal form) through all limbs and the skin. Let it stand with its feet in the four directions, rising through the nasal pathway to the highest consciousness. This establishes universal energy, balance, and spiritual ascent.

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