दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
यह मंत्र ईशाण और भेषज (औषधियों) की शक्ति का वर्णन करता है।
साधक ईशाण की ओर प्रेरित होकर भेषजों के माध्यम से सहस्रवीर्य (अत्यधिक शक्ति) प्राप्त करता है।
यह मंत्र प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संयोग को दर्शाता है।
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शब्दार्थ
ईशाणां = ईशा, ईश्वर, प्रधान शक्ति
त्वा = तुम्हें, इस शक्ति को
भेषजानाम् = औषधियों, चिकित्सा साधनों
उज्जेष = प्रेरित करता हूँ, उन्नत करता हूँ
आ रभामहे = हम प्राप्त करते हैं, कामना करते हैं
चक्रे = बनाया, क्रियान्वित किया
सहस्रवीर्यं = हजार गुना शक्ति, अत्यधिक ऊर्जा
सर्वस्मा = सभी से
ओषधे = औषधियों के माध्यम से
त्वा = तुम्हें
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सरल अर्थ
साधक ईशाण (ईश्वर या उच्च शक्ति) के द्वारा
भेषजों के माध्यम से अत्यधिक शक्ति (सहस्रवीर्य) प्राप्त करता है।
यह शक्ति सभी औषधियों और प्राकृतिक साधनों में व्याप्त है।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ ईशाण = प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय शक्ति
✔ भेषज = औषधियां और जीवन ऊर्जा
✔ सहस्रवीर्य = उच्चतम क्षमता और ऊर्जा
✔ सर्वस्मा = सभी स्तरों और माध्यमों में शक्ति
यह दर्शाता है कि चेतना और औषधियों का संयोजन
अत्यधिक ऊर्जा और स्वास्थ्य प्रदान करता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ ईशाण की ओर प्रेरणा = दिव्य मार्गदर्शन
✔ भेषज = साधना और स्वास्थ्य साधन
✔ सहस्रवीर्य = चेतना का उच्चतम विकास
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योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम और ध्यान में औषधियों और ऊर्जा केंद्रों का उपयोग
✔ चेतना और शरीर में सहस्रवीर्य का संवर्धन
✔ ईशाण की ओर साधक का ध्यान
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का उपयोग जीवन शक्ति बढ़ाता है
✔ औषधियों और साधना का संयोजन मानसिक और शारीरिक संतुलन लाता है
✔ उच्च शक्ति का अनुभव चेतना और स्वास्थ्य को मजबूत करता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
औषधियों और प्राकृतिक साधनों के माध्यम से ऊर्जा और शक्ति बढ़ाई जा सकती है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
ईशाण की शक्ति और भेषजों के माध्यम से साधक सहस्रवीर्य प्राप्त करता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
ऊर्जा, स्वास्थ्य और चेतना का सर्वोच्च विकास संभव है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.1 का यह मंत्र
ईशाण और भेषजों के माध्यम से उच्च शक्ति, ऊर्जा और चेतना के विकास का संदेश देता है।
✔ ईशाण = ब्रह्मांडीय शक्ति
✔ भेषज = औषधियां और ऊर्जा साधन
✔ सहस्रवीर्य = अत्यधिक शक्ति
✔ सर्वस्मा = सभी स्तरों में प्रभाव
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English Insight
By invoking the Ishaana (divine power)
through the medium of medicinal herbs,
the practitioner attains thousandfold energy (Sahasra-Virya),
enhancing both body and consciousness.
भूमिका
अथर्ववेद 4.17.2 मंत्र में **सत्य, नियम और औषधियों के माध्यम से सुरक्षा** का गहन संदेश है।
साधक और समाज दोनों के लिए यह मंत्र संकेत देता है कि केवल प्राकृतिक साधन या औषधियाँ ही पर्याप्त नहीं हैं; उन्हें **नैतिकता, अनुशासन और सत्यजित (सत्य की विजय)** के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
यह मंत्र बताता है कि मानव जीवन और चेतना के सर्वोच्च विकास के लिए **नैतिक नियम और औषधियों का संयोजन** आवश्यक है।
यह मंत्र हमें यह भी याद दिलाता है कि **सभी मनुष्य और जीवन रूपों के लिए समान सुरक्षा और कल्याण** आवश्यक है।
साधक केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और प्रकृति के लिए कार्य करता है।
सत्य और नियम का पालन करने वाला व्यक्ति ही औषधियों और प्राकृतिक शक्ति के माध्यम से **सुरक्षा और समृद्धि** प्राप्त करता है।
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शब्दार्थ
- सत्यजितं = सत्य का पालन करने वाला, सत्य से विजय पाने वाला
- शपथयावनीं = नियम और व्रत का पालन करने वाला, अनुशासित
- सहमानां = सभी के लिए समान रूप से
- पुनःसराम् = पुनः सुरक्षित करे, संरक्षित करे
- सर्वाः = सभी
- समह्व्य = समुचित तरीके से व्यवस्थित
- औषधीरितः = औषधियों के अनुसार
- नः = हमारे लिए, हमें
- पारयादि = मार्गदर्शन, सुरक्षा, समृद्धि
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विस्तृत अर्थ (700 शब्द)
यह मंत्र हमें यह गहन समझ देता है कि **सत्य और नैतिक अनुशासन के बिना कोई भी शक्ति पूर्ण नहीं होती**।
साधक यदि केवल औषधियों और भेषजों पर निर्भर रहता है, तो वह अस्थायी लाभ ही प्राप्त कर सकता है।
वास्तविक शक्ति और सुरक्षा तब आती है जब व्यक्ति **सत्य का पालन करे, अपने नियमों और व्रतों का सम्मान करे, और सभी प्राणी और समाज के कल्याण की भावना रखे।**
"सत्यजितं" शब्द दर्शाता है कि **सत्य की विजय ही वास्तविक शक्ति है**।
यह केवल बाहरी शक्ति या औषधियों के प्रभाव से नहीं आता, बल्कि आंतरिक नियम और अनुशासन के माध्यम से आता है।
"शपथयावनीं" यह बताता है कि **प्रतिज्ञा, व्रत और नियम का पालन करने वाला ही स्थायी और सुरक्षित जीवन प्राप्त करता है**।
"सहमानां पुनःसराम्" शब्द दर्शाता है कि **सभी मनुष्यों और प्राणियों के लिए समान सुरक्षा और कल्याण** सुनिश्चित होना चाहिए।
यह केवल व्यक्तिगत लाभ का मंत्र नहीं है; यह **सामाजिक और वैश्विक कल्याण** की भी शिक्षा देता है।
"सर्वाः समह्व्य औषधीरितो" में बताया गया है कि **औषधियों, प्राकृतिक संसाधनों और चिकित्सा साधनों का सही तरीके से प्रयोग** करना आवश्यक है।
इस मंत्र का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि **प्रकृति और औषधियों की शक्ति को नैतिक नियमों और चेतना के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिए**।
अनुशासन और नैतिकता के बिना भेषज केवल बाहरी लाभ देते हैं, लेकिन स्थायी सुरक्षा और स्वास्थ्य नहीं।
"नः पारयादि" यह स्पष्ट करता है कि यह सुरक्षा और कल्याण केवल साधक या समूह तक सीमित नहीं है।
यह पूरे समाज, मानवता और प्रकृति के लिए होना चाहिए।
वास्तव में, यह मंत्र **सामूहिक चेतना और कल्याण के महत्व को उजागर करता है**, जो वैदिक दर्शन में हमेशा प्रमुख रहा है।
सामान्यतः, यह मंत्र हमें **सत्य, नियम और प्राकृतिक साधनों के संयोजन** की शिक्षा देता है।
यदि साधक इन तीनों का पालन करता है, तो वह अपने जीवन और समाज के लिए **सुरक्षा, स्वास्थ्य, शक्ति और चेतना के सर्वोच्च अनुभव** को प्राप्त कर सकता है।
यह मंत्र केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य की भी बात करता है।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ सत्य और नैतिक अनुशासन = स्थायी शक्ति और मानसिक संतुलन
✔ औषधियाँ = प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय ऊर्जा
✔ सभी के लिए समान सुरक्षा = सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन
यह दर्शाता है कि **ऊर्जा, स्वास्थ्य और चेतना का विकास केवल तकनीकी या औषधियों से नहीं होता**, बल्कि **नैतिक और आध्यात्मिक संतुलन** से संभव है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन में सत्य और नियम का पालन
✔ प्राकृतिक और औषधीय साधनों के माध्यम से स्वास्थ्य और चेतना का संवर्धन
✔ सभी प्राणियों के लिए कल्याण
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योगिक दृष्टि
✔ साधक के व्रत, नियम और औषधियों का संयोजन
✔ प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से ऊर्जा का संवर्धन
✔ सामाजिक और व्यक्तिगत चेतना का विकास
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नियम और अनुशासन मानसिक शक्ति बढ़ाते हैं
✔ औषधियों और प्राकृतिक साधनों का संयोजन जीवन में सामंजस्य लाता है
✔ सत्य और नैतिकता का पालन जीवन को सुरक्षित और स्थिर बनाता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सत्य और नियम के साथ औषधियों का संतुलित उपयोग स्वास्थ्य और ऊर्जा बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
सत्य और नैतिकता के साथ प्राकृतिक साधनों का पालन
सभी जीवों के कल्याण और चेतना के विकास के लिए आवश्यक है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सत्य, नियम और प्राकृतिक शक्ति का संयोजन सर्वोच्च अनुभव और सुरक्षा देता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.2 का यह मंत्र
सत्य, नियम और भेषजों के माध्यम से **व्यक्तिगत और सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और चेतना** का संदेश देता है।
✔ सत्यजितं = आंतरिक शक्ति और नैतिक विजय
✔ शपथयावनीं = अनुशासन और व्रत
✔ औषधीरितो = प्राकृतिक और औषधीय साधन
✔ पारयादि = सुरक्षा और कल्याण
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English Insight
By upholding truth and moral discipline,
and applying medicinal herbs and natural remedies properly,
one ensures protection, well-being, and spiritual as well as physical balance for all.
भूमिका
अथर्ववेद 4.17.3 मंत्र में **शशाप (शक्ति का एक रूप), रस और आहार के माध्यम से ऊर्जा और चेतना** का संदेश दिया गया है।
यह मंत्र बताता है कि **शरीर और चेतना के विकास के लिए सही पदार्थ, रस और शक्ति का संयोजन आवश्यक है।**
साधक जो अपनी आंतरिक और बाह्य ऊर्जा को समझता है, वह इन साधनों से अपनी चेतना को विकसित कर सकता है।
यह मंत्र प्राकृतिक शक्ति, औषधीय पदार्थों और आहार के माध्यम से **ऊर्जा संचयन और चेतना संवर्धन** का वर्णन करता है।
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शब्दार्थ
- या = जो
- शशाप = शाश्वत शक्ति, या चंद्र और पानी जैसी जीवनदायिनी शक्ति
- शपनेन = व्रत, साधना या अनुशासन के माध्यम से
- याघं = आहार, रस, या पोषण
- मूरमादधे = व्यवस्थित रूप से ग्रहण किया गया
- या = जो
- रसस्य = जीवनरस, शक्ति, ऊर्जा
- हरणाय = ग्रहण करने के लिए, अवशोषित करने के लिए
- जातमारेभे = उत्पन्न या प्रकट हुई
- तोकमत्तु = शक्ति का संचय
- सा = वह, यह शक्ति
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विस्तृत अर्थ (700 शब्द)
इस मंत्र का मूल संदेश है कि **शरीर और चेतना का विकास केवल बाहरी साधनों पर निर्भर नहीं करता**, बल्कि **सत्य, अनुशासन और पोषण का संतुलित संयोजन** आवश्यक है।
"शशाप शपनेन याघं मूरमादधे" यह संकेत करता है कि साधक **सत्य और नियम के पालन से पोषण और रस का ग्रहण करता है।**
यह केवल आहार का नहीं है, बल्कि **ऊर्जा का सही ग्रहण, उसकी दिशा और साधना** के माध्यम से हो रहा है।
"या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा" में बताया गया है कि यह रस, यानी जीवन और चेतना की शक्ति, **सही तरीके से ग्रहण और संचालित होने पर** साधक के लिए **शक्तिसंपन्न और चेतनाशील ऊर्जा** का स्रोत बनती है।
यह दर्शाता है कि **ऊर्जा का संचयन केवल भौतिक आहार से नहीं होता**, बल्कि **आध्यात्मिक अनुशासन और प्राकृतिक शक्ति के संयोजन से स्थायी और उच्चतम स्तर पर प्राप्त होता है।**
साधक जो इस मंत्र के अनुसार कार्य करता है, वह **शरीर, चेतना और जीवन ऊर्जा को नियंत्रित और संवर्धित कर सकता है।**
मंत्र यह भी इंगित करता है कि केवल औषधि या आहार ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि **सत्य, नियम और साधना के साथ उनका ग्रहण और उपयोग** आवश्यक है।
इसमें शैक्षिक और वैज्ञानिक संदेश भी छिपा है:
✔ रस और आहार = जीवन ऊर्जा और पोषण
✔ शपना = अनुशासन, नियम, साधना
✔ शशाप = प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय शक्ति
सभी मिलकर **शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन** का निर्माण करते हैं।
मंत्र का आध्यात्मिक संदेश यह है कि **साधक अपनी ऊर्जा और चेतना को नियंत्रित करके उच्चतम चेतना और स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है।**
यह केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं है, बल्कि **सामूहिक कल्याण और प्रकृति के संतुलन के लिए भी आवश्यक है।**
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ शशाप = ब्रह्मांडीय ऊर्जा और प्राकृतिक शक्ति
✔ रस और याघ = पोषण और जीवन शक्ति का स्रोत
✔ शपनेन = अनुशासन और साधना
✔ ऊर्जा का संचय और चेतना का विकास
यह दर्शाता है कि **ऊर्जा और चेतना का विकास केवल बाहरी साधनों या औषधियों से नहीं**, बल्कि **नैतिक अनुशासन, सही पोषण और प्राकृतिक शक्ति के संयोजन से संभव है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ शरीर और चेतना का संवर्धन
✔ प्राकृतिक शक्ति और आहार के माध्यम से ऊर्जा का संतुलन
✔ उच्च चेतना और आध्यात्मिक स्थायीत्व
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योगिक दृष्टि
✔ साधक आहार, औषधि और साधना का संयोजन करता है
✔ प्राणायाम और ध्यान से ऊर्जा का संवर्धन
✔ चेतना का उच्चतम स्तर प्राप्त होता है
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ अनुशासन, नियम और सही पोषण मानसिक शक्ति बढ़ाते हैं
✔ ऊर्जा का सही संचयन जीवन में संतुलन लाता है
✔ साधना और आहार का संयोजन चेतना और स्वास्थ्य का विकास करता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सही पोषण, ऊर्जा स्रोत और अनुशासन जीवन शक्ति को बढ़ाते हैं।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
शाश्वत शक्ति और रस का सही ग्रहण चेतना और स्वास्थ्य के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचाता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सत्य, अनुशासन और पोषण के माध्यम से ऊर्जा का संपूर्ण विकास संभव है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.3 का यह मंत्र
शरीर, चेतना और जीवन ऊर्जा के **संतुलन, सुरक्षा और संवर्धन** का संदेश देता है।
✔ शशाप = प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय शक्ति
✔ शपनेन = अनुशासन और साधना
✔ याघ = पोषण और रस
✔ तोकमत्तु = ऊर्जा का संचय और संवर्धन
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English Insight
By following discipline and proper nourishment,
the practitioner channels Shashapa (divine cosmic power) and the vital essence (Rasa) to accumulate and expand consciousness, health, and energy.
भूमिका
अथर्ववेद 4.17.4 मंत्र में **शक्ति, क्रिया और साधना के माध्यम से चेतना और शरीर के संतुलन** की गहन शिक्षा दी गई है।
यह मंत्र बताता है कि साधक अपने कर्मों और साधनाओं को **सही पात्र और साधनों के माध्यम से नियंत्रित करता है**, ताकि उसकी चेतना और ऊर्जा का **पूर्ण विकास** हो सके।
यह केवल बाह्य क्रियाओं का निर्देश नहीं है; बल्कि यह **आंतरिक चेतना और शक्ति के संयोजन** का भी संदेश है।
मंत्र यह भी इंगित करता है कि **सभी कार्य, चाहे वे शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक हों, सही पात्र और साधनों के अनुसार किए जाएं।**
इसके द्वारा साधक अपने जीवन और चेतना में **संतुलन, सुरक्षा और प्रभावशीलता** प्राप्त करता है।
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शब्दार्थ
- यां = जिसे, जो
- ते = तुम्हारे लिए, साधक के लिए
- चक्रुरामे = बनाए गए, घुमाए गए, नियंत्रित
- पात्रे = पात्र या साधन
- नीललोहिते = नीले और लाल रंग में, प्रतीकात्मक रूप से तत्वों या ऊर्जा की स्थिति
- आमे = इनमें, उन तत्वों में
- मांसे = शरीर में, शारीरिक या मांसिक स्तर पर
- कृत्यां = क्रिया, कार्य
- तया = उसके द्वारा
- कृत्याकृतो = किया और न किया, नियंत्रण और निरीक्षण
- जहि = त्याग, परित्याग, छोड़ दो
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विस्तृत अर्थ (700 शब्द)
यह मंत्र हमें यह सिखाता है कि **साधना और कार्य केवल सही पात्र और साधनों के अनुसार किए जाने चाहिए**।
"यां ते चक्रुरामे पात्रे" यह संकेत करता है कि साधक अपने कर्म और ऊर्जा को **विशिष्ट पात्र और साधनों के माध्यम से नियंत्रित करता है**, ताकि उनकी शक्ति और प्रभाव सही दिशा में प्रवाहित हो।
"यां चक्रुर्नीललोहिते" यह दर्शाता है कि यह साधन या पात्र **विशेष गुणों वाले होते हैं**, जैसे नीला और लाल रंग प्रतीकात्मक रूप से ऊर्जा, तत्व या चेतना की अवस्थाएँ दर्शाते हैं।
"आमे मांसे कृत्यां" में बताया गया है कि यह शक्ति और क्रिया **सिर्फ बाहरी माध्यमों तक सीमित नहीं है**, बल्कि **शरीर और मांसपेशियों, जीवनशक्ति और चेतना के स्तर पर क्रियाशील होती है।**
साधक अपने शरीर, मानसिक शक्ति और ऊर्जा केंद्रों को इन पात्रों और साधनों के माध्यम से नियंत्रित करता है।
"यां चक्रुस्तया कृत्याकृतो जहि" का संदेश है कि साधक को **अनावश्यक या असंतुलित क्रियाओं को त्याग देना चाहिए**।
कृत्य और अकृत्य का संतुलन साधक की चेतना और शरीर को सुरक्षित और सशक्त बनाता है।
यह मंत्र यह भी स्पष्ट करता है कि **ऊर्जा और चेतना का सही प्रवाह केवल नियंत्रण और निरीक्षण से संभव है।**
इस मंत्र का **वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत** यह है कि:
✔ नीला और लाल = ऊर्जा के विभिन्न स्तर और तत्व
✔ पात्र = साधन और माध्यम
✔ क्रियाएँ = जीवन और चेतना के संतुलन के लिए निर्देशित कार्य
✔ त्याग = अनावश्यक ऊर्जा व्यर्थ न करना
इस मंत्र से यह सिद्ध होता है कि **ऊर्जा और चेतना का संतुलन केवल बाह्य साधनों पर निर्भर नहीं है**, बल्कि **सही क्रिया, निरीक्षण और अनुशासन से स्थायी और उच्चतम रूप में संभव है।**
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक अपने कर्म और ऊर्जा को नियंत्रित करता है
✔ सही पात्र और साधनों के माध्यम से चेतना का विकास
✔ अनावश्यक कार्यों का त्याग
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योगिक दृष्टि
✔ साधना और प्राणायाम में सही माध्यम और उपकरण का प्रयोग
✔ शरीर, मांस और ऊर्जा केंद्रों का संयोजन
✔ चेतना और शक्ति का संतुलन
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ कार्य और ऊर्जा का नियंत्रण मानसिक शक्ति बढ़ाता है
✔ अनुशासन और निरीक्षण जीवन में सामंजस्य लाते हैं
✔ अनावश्यक और असंतुलित क्रियाओं का त्याग जीवन को स्थिर बनाता है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सही उपकरण और माध्यम का प्रयोग ऊर्जा, शक्ति और स्वास्थ्य बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक के कार्य, साधना और पात्रों का संतुलित संयोजन चेतना और जीवन शक्ति को उच्चतम स्तर पर ले जाता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सही क्रिया, सही माध्यम और निरीक्षण से ऊर्जा और चेतना का पूर्ण विकास संभव है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.4 का यह मंत्र
साधक को चेतना, शक्ति और कर्म में संतुलन स्थापित करने की शिक्षा देता है।
✔ पात्र और साधन = ऊर्जा का मार्गदर्शन
✔ नीला और लाल = ऊर्जा और तत्वों की अवस्थाएँ
✔ क्रिया और अकृत्य = संतुलन
✔ त्याग = अनावश्यक क्रियाओं से बचाव
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English Insight
By utilizing proper instruments (Patra) and balancing action with restraint,
the practitioner channels energy and consciousness effectively,
discarding unnecessary actions and harmonizing the body, mind, and life force.
भूमिका
अथर्ववेद 4.17.5 मंत्र में **रक्षा, नकारात्मक ऊर्जा और विपरीत शक्तियों के निवारण** का संदेश दिया गया है।
साधक की चेतना और जीवन शक्ति पर बाहरी और आंतरिक नकारात्मक शक्तियाँ असर डालती हैं।
यह मंत्र उन शक्तियों का **नाश और नियंत्रण** करने की प्रक्रिया को दर्शाता है, ताकि साधक **शरीर, मन और चेतना में संतुलन** प्राप्त कर सके।
मंत्र में दुर्जन, दुर्विचार और नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव को समाप्त करने का निर्देश दिया गया है।
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शब्दार्थ
- दौष्वप्न्यं = बुरे सपने, नकारात्मक मानसिक प्रभाव
- दौर्जीवित्यं = दुर्जन, दुष्ट जीव, बाधक प्राणी
- रक्षो = रक्षा, सुरक्षा, बल या शक्ति
- अभ्वमराय्यः = अपने चारों ओर से उत्पन्न होने वाले खतरे
- दुर्णाम्नीः = नकारात्मक क्रियाओं के लिए उत्पन्न सभी साधन
- सर्वा = सभी
- दुर्वाचस्ता = बुरे, हानिकारक वचन
- अस्मन् = हम, साधक
- नाशयामसि = नष्ट कर देता हूँ, समाप्त करता हूँ
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विस्तृत अर्थ (700 शब्द)
यह मंत्र हमें यह समझाता है कि **साधक को न केवल आंतरिक शक्ति और चेतना पर ध्यान देना चाहिए**, बल्कि अपने चारों ओर की **नकारात्मक शक्तियों और दुर्जनों से सुरक्षा** भी आवश्यक है।
"दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभ्वमराय्यः" में बताया गया है कि **बुरे सपने, नकारात्मक विचार और दुर्जन मानसिक बाधाएँ** साधक के विकास में बाधक हो सकती हैं।
साधक को इन्हें पहचानना और उनसे सुरक्षित रहना चाहिए।
"दुर्णाम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन् नाशयामसि" का संदेश यह है कि **सभी नकारात्मक क्रियाएँ, बुरे वचन और विपरीत शक्तियाँ** साधक से दूर होनी चाहिए।
यह मंत्र **साधक की चेतना को सुदृढ़, ऊर्जा को शुद्ध और मन को स्थिर** बनाने का निर्देश देता है।
साधक जो इस मंत्र के अनुसार कार्य करता है, वह **मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा के साथ अपनी शक्ति और चेतना का विकास** कर सकता है।
यह केवल बाहरी सुरक्षा नहीं है; यह **आंतरिक शक्ति, अनुशासन और चेतना के नियंत्रण** का भी संदेश है।
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वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत
✔ दौष्वप्न्यं = मानसिक अवरोध और नकारात्मक प्रभाव
✔ दुर्जीवित्यं = नकारात्मक प्राणी या ऊर्जा
✔ रक्षो = चेतना और जीवन शक्ति का संरक्षण
✔ दुर्णाम्नीः, दुर्वाचस्ता = नकारात्मक क्रियाएँ और वचन
यह दर्शाता है कि **साधक को मानसिक, आध्यात्मिक और ऊर्जा स्तर पर नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रहना चाहिए।**
संतुलित चेतना और ऊर्जा के लिए **सकारात्मक और संरक्षित वातावरण** आवश्यक है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक की चेतना और शक्ति का संरक्षण
✔ नकारात्मक विचार, वचन और शक्तियों का निवारण
✔ आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के माध्यम से आध्यात्मिक स्थायीत्व
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योगिक दृष्टि
✔ साधक ध्यान और प्राणायाम से मानसिक और ऊर्जा स्तर पर सुरक्षा करता है
✔ नकारात्मक भावनाओं और शक्तियों का नाश
✔ चेतना और शरीर का संतुलन
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नकारात्मक ऊर्जा और विचारों का नियंत्रण मानसिक स्थिरता लाता है
✔ सुरक्षा और संरक्षण से चेतना और शक्ति का विकास
✔ साधना और मानसिक अनुशासन जीवन में संतुलन और सफलता देते हैं
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
सकारात्मक और संरक्षित वातावरण मानसिक शक्ति, स्वास्थ्य और ऊर्जा बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक अपने मन, शरीर और चेतना को नकारात्मक प्रभावों से बचाकर **ऊर्जा और चेतना के सर्वोच्च स्तर** पर पहुँच सकता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सुरक्षा, निगरानी और नकारात्मक प्रभावों का निवारण चेतना और शक्ति के विकास के लिए आवश्यक है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.5 का यह मंत्र
साधक को नकारात्मक शक्तियों और दुर्जनों से सुरक्षा और मानसिक स्थिरता प्राप्त करने की शिक्षा देता है।
✔ दौष्वप्न्यं = बुरे सपने, नकारात्मक प्रभाव
✔ दुर्जीवित्यं = दुर्जन और बाधक प्राणी
✔ रक्षो = सुरक्षा और चेतना का संरक्षण
✔ दुर्वाचस्ता = नकारात्मक वचन
✔ नाशयामसि = समाप्त करना, नष्ट करना
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English Insight
By recognizing and dispelling negative influences, harmful words, and adversarial forces,
the practitioner protects consciousness, maintains mental stability, and harmonizes energy and life force.
भूमिका
अथर्ववेद 4.17.6 मंत्र में **भूख, तृष्णा और जीवन-आधार जल का संरक्षण** पर गहन ध्यान दिया गया है।
यह मंत्र साधक को यह सिखाता है कि केवल बाहरी साधन और क्रियाएँ ही नहीं, बल्कि **आंतरिक ऊर्जा और प्राकृतिक तत्वों का संतुलन** भी जीवन और चेतना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
साधक जल, आहार और जीवन शक्ति के मार्ग को नियंत्रित करके अपनी चेतना और स्वास्थ्य को सुरक्षित रखता है।
मंत्र में यह संदेश है कि **भूख और तृष्णा केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं हैं**, बल्कि यह चेतना और जीवन शक्ति के लिए **ऊर्जा और संतुलन का संकेत** भी हैं।
सही मार्ग (अपामार्ग) का उपयोग कर साधक सभी प्रकार की ऊर्जा और जीवनदायिनी शक्ति को नियंत्रित कर सकता है।
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शब्दार्थ
- क्षुधामारं = भूख से उत्पन्न रोग या बाधा
- तृष्णामारम् = प्यास से उत्पन्न रोग, तृष्णा
- अगोताम = संतानों और जीवन के विकास में बाधाएँ
- अनपत्यताम् = संतानहीनता या उत्पादकता की कमी
- अपामार्ग = जल का मार्ग, जीवनदायिनी धारा
- त्वया = तुम्हारे द्वारा, साधक की चेतना द्वारा
- वयं सर्वं = हम सभी, सभी प्रकार के प्रभाव
- तदप मृज्महे = उसे दूर या नष्ट करते हैं, समाप्त करते हैं
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विस्तृत अर्थ (700 शब्द)
यह मंत्र हमें यह स्पष्ट करता है कि **साधक को जीवन शक्ति और प्राकृतिक तत्वों की सुरक्षा करनी चाहिए**।
"क्षुधामारं तृष्णामारम्" यह संकेत करता है कि **भूख और प्यास केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि चेतना और ऊर्जा के स्तर पर भी बाधाएँ उत्पन्न करती हैं।**
यदि इनको नियंत्रित न किया जाए, तो साधक की चेतना अस्थिर हो सकती है और ऊर्जा का प्रवाह बाधित हो सकता है।
"अगोताम अनपत्यताम" यह दर्शाता है कि जीवन के **सृजनात्मक पहलू**, जैसे संतान या नए जीवन के लिए ऊर्जा, भी इन बाधाओं से प्रभावित हो सकते हैं।
साधक को अपने आहार, जल और जीवन शक्ति के स्रोतों का **संतुलन बनाए रखना** आवश्यक है।
"अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे" का संदेश है कि **जल और जीवनदायिनी शक्तियों के मार्ग को नियंत्रित करके सभी प्रकार की नकारात्मक और बाधक शक्तियों को दूर किया जा सकता है।**
यह केवल बाहरी जल का संरक्षण नहीं है, बल्कि **चेतना और ऊर्जा का मार्गदर्शन** भी है।
साधक जलमार्ग और ऊर्जा केंद्रों को नियंत्रित करके **ऊर्जा प्रवाह, स्वास्थ्य और चेतना के संतुलन** को सुनिश्चित करता है।
इस मंत्र का **वैज्ञानिक और दार्शनिक संकेत** यह है कि:
✔ भूख और प्यास = ऊर्जा और चेतना के संकेत
✔ अपामार्ग = जीवनदायिनी धारा, ऊर्जा का मार्ग
✔ अनपत्यताम = सृजन और ऊर्जा का विकास
✔ निवारण = बाधाओं का नियंत्रण और संतुलन
मंत्र से यह सिद्ध होता है कि **साधक केवल बाहरी क्रियाओं पर निर्भर नहीं है**, बल्कि अपने आहार, जल, ऊर्जा केंद्रों और चेतना के मार्ग को नियंत्रित करके **आंतरिक और बाह्य संतुलन** प्राप्त कर सकता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक अपने जल और जीवनदायिनी ऊर्जा का संरक्षण करता है
✔ भूख और प्यास से उत्पन्न बाधाओं का निवारण
✔ जीवन शक्ति और चेतना का संतुलन
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योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से जलमार्ग और ऊर्जा केंद्रों का संतुलन
✔ शरीर और चेतना में ऊर्जा प्रवाह का नियंत्रण
✔ संतुलित आहार और जल सेवन के माध्यम से स्थायीत्व
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ भूख और प्यास के नियंत्रण से मानसिक शक्ति बढ़ती है
✔ ऊर्जा और जीवन शक्ति का संतुलन मानसिक स्थिरता लाता है
✔ अनुशासन और जागरूकता जीवन और चेतना में संतुलन बनाती है
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल, आहार और जीवन शक्ति के मार्ग का संतुलन स्वास्थ्य और ऊर्जा बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक अपने जलमार्ग और जीवनदायिनी शक्तियों का संरक्षण करके चेतना और ऊर्जा को उच्चतम स्तर पर ले जा सकता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
सही मार्ग और संतुलन से जीवन, चेतना और ऊर्जा का पूर्ण विकास संभव है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.6 का यह मंत्र
भूख, तृष्णा और जीवनदायिनी जल मार्ग के संतुलन और सुरक्षा का संदेश देता है।
✔ भूख और तृष्णा = ऊर्जा संकेत
✔ जलमार्ग (अपामार्ग) = जीवन शक्ति का प्रवाह
✔ अनपत्यताम = सृजन और ऊर्जा विकास
✔ बाधाओं का निवारण = चेतना और स्वास्थ्य संतुलन
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English Insight
By controlling hunger, thirst, and the flow of life-giving waters,
the practitioner safeguards consciousness, harmonizes energy,
and ensures the balanced development of life, body, and mind.
भूमिका
अथर्ववेद 4.17.7 मंत्र में **भूख, प्यास और अक्षर (वाणी और ज्ञान) से उत्पन्न बाधाओं का नियंत्रण** सिखाया गया है।
यह मंत्र हमें यह बताता है कि केवल शारीरिक या मानसिक साधन ही नहीं, बल्कि **ज्ञान, भाषा और चेतना की शक्ति** भी जीवन और चेतना के संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
साधक को नकारात्मक प्रभावों, मानसिक भ्रम और अक्षर या ज्ञान से उत्पन्न बाधाओं से मुक्त रहना चाहिए।
मंत्र में अपामार्ग (जल और ऊर्जा के मार्ग) के माध्यम से सभी बाधाओं का नाश करने का संदेश है।
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शब्दार्थ
- तृष्णामारं = प्यास से उत्पन्न बाधा, जल की आवश्यकता का असंतुलन
- क्षुधामारम् = भूख से उत्पन्न बाधा, ऊर्जा और जीवन शक्ति का अभाव
- अथो = तथा, इसके साथ
- अक्षपराजयम् = अक्षर या ज्ञान के क्षेत्र में उत्पन्न बाधाएँ, वाणी और चेतना से जुड़ी बाधाएँ
- अपामार्ग = जल या ऊर्जा का मार्ग
- त्वया = साधक की चेतना या कर्म द्वारा
- वयं सर्वं = सभी प्रकार की बाधाएँ और विपरीत शक्तियाँ
- तदप मृज्महे = समाप्त करना, नष्ट करना, दूर करना
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विस्तृत अर्थ (700 शब्द)
यह मंत्र हमें यह समझाता है कि **साधक को केवल शारीरिक भूख और प्यास का ही नहीं, बल्कि मानसिक और ज्ञानात्मक बाधाओं का भी नियंत्रण करना चाहिए।**
"तृष्णामारं क्षुधामारम्" यह संकेत देता है कि **भूख और प्यास न केवल शरीर की आवश्यकता हैं**, बल्कि यह चेतना और ऊर्जा के संतुलन के लिए संकेत भी हैं।
यदि इन्हें नियंत्रित नहीं किया गया तो साधक की चेतना अस्थिर हो सकती है और जीवन शक्ति का प्रवाह बाधित हो सकता है।
"अक्षपराजयम्" यह बताता है कि **ज्ञान, वाणी और अक्षर के माध्यम से उत्पन्न बाधाएँ** भी साधक के विकास में रोड़ा डाल सकती हैं।
असत्य वचन, भ्रमित विचार और ज्ञान की गलत व्याख्या चेतना के विकास में बाधक होती हैं।
"अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे" का संदेश है कि **जलमार्ग, ऊर्जा केंद्र और चेतना के मार्ग को नियंत्रित करके सभी बाधाओं का नाश किया जा सकता है।**
यह केवल शारीरिक जल का नियंत्रण नहीं है, बल्कि **सभी प्रकार की नकारात्मक और अवरोधक शक्तियों का नियंत्रण** भी है।
साधक अपने आहार, जलमार्ग और चेतना के मार्ग को नियंत्रित करके **ऊर्जा, शक्ति और चेतना का सर्वोच्च संतुलन** प्राप्त करता है।
वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से:
✔ तृष्णा और भूख = ऊर्जा और चेतना संकेत
✔ अक्षपराजयम् = वाणी, ज्ञान और चेतना से उत्पन्न बाधाएँ
✔ अपामार्ग = ऊर्जा और जीवन शक्ति का मार्ग
✔ नाशयामे = बाधाओं का निवारण और संतुलन
यह मंत्र स्पष्ट करता है कि **साधक का ध्यान केवल बाहरी साधनों पर नहीं, बल्कि चेतना, ज्ञान और ऊर्जा के मार्ग पर भी होना चाहिए।**
संतुलित आहार, जल और ऊर्जा केंद्रों का नियमन साधक को **आंतरिक स्थायीत्व, मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक विकास** प्रदान करता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ साधक अपने जलमार्ग और ऊर्जा केंद्रों को नियंत्रित करता है
✔ भूख, प्यास और ज्ञानात्मक बाधाओं का निवारण करता है
✔ चेतना और जीवन शक्ति का संतुलन बनाए रखता है
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योगिक दृष्टि
✔ प्राणायाम, ध्यान और मंत्र साधना से आंतरिक ऊर्जा और जलमार्ग का नियंत्रण
✔ ज्ञान और वाणी की शक्ति का सही मार्गदर्शन
✔ शरीर, मन और चेतना में संतुलन और स्थायीत्व
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ भूख, प्यास और मानसिक बाधाओं का नियंत्रण मानसिक स्थिरता लाता है
✔ ज्ञान और चेतना की शक्ति का सही उपयोग जीवन में सफलता देता है
✔ संतुलित आहार, जल और चेतना के मार्ग से जीवन और चेतना में सामंजस्य
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
जल, आहार और ऊर्जा केंद्रों का संतुलन मानसिक शक्ति, स्वास्थ्य और चेतना बढ़ाता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
साधक अपने जलमार्ग, ऊर्जा और ज्ञान के मार्ग को नियंत्रित करके चेतना और ऊर्जा के उच्चतम स्तर पर पहुँच सकता है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
संतुलन, अनुशासन और मार्गदर्शन से जीवन, चेतना और ऊर्जा का पूर्ण विकास संभव है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.7 का यह मंत्र
भूख, तृष्णा और अक्षर शक्ति से उत्पन्न बाधाओं का निवारण और जीवन शक्ति का संतुलन सिखाता है।
✔ तृष्णामारं = प्यास और ऊर्जा असंतुलन
✔ क्षुधामारं = भूख और शक्ति असंतुलन
✔ अक्षपराजयम् = ज्ञान, वाणी और चेतना से बाधाएँ
✔ अपामार्ग = जल और ऊर्जा का मार्ग
✔ तदप मृज्महे = बाधाओं का नाश और नियंत्रण
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English Insight
By controlling hunger, thirst, and obstacles arising from knowledge and speech,
the practitioner safeguards consciousness, harmonizes life energy, and ensures the steady flow of universal power.
अथर्ववेद 4.17.8
भूमिका
अथर्ववेद 4.17.8 मंत्र में **अपामार्ग औषधि** को सभी औषधियों में विशेष और प्रधान बताया गया है।
यह मंत्र केवल एक वनस्पति की प्रशंसा नहीं करता, बल्कि यह दर्शाता है कि प्रकृति में कुछ शक्तियाँ ऐसी होती हैं जो अनेक रोगों, दोषों और नकारात्मक प्रभावों का समूल नाश करने की क्षमता रखती हैं।
अपामार्ग यहाँ केवल एक भौतिक औषधि नहीं है, बल्कि **शुद्धि, परिमार्जन और संतुलन की प्रतीक शक्ति** है।
यह मंत्र हमें यह सिखाता है कि यदि जीवन में कोई प्रमुख शुद्धिकारक तत्व हो, तो वह अनेक दोषों को दूर कर सकता है — चाहे वे शारीरिक हों, मानसिक हों या आध्यात्मिक।
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शब्दार्थ
- अपामार्ग = एक प्रमुख औषधि, शुद्धि करने वाली वनस्पति
- ओषधीनां = सभी औषधियों में
- सर्वासाम् = सबकी
- एक इद् वशी = एक ही नियंत्रक, प्रधान, प्रभावशाली
- तेन = उसके द्वारा
- ते मृज्म = तुझे शुद्ध करते हैं, परिमार्जन करते हैं
- आस्थितम् = जो स्थित है, जो स्थापित है
- अथ = तत्पश्चात्
- त्वम् अगदः चर = तू रोगरहित होकर विचरण कर
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विस्तृत अर्थ (लगभग 700 शब्द)
यह मंत्र एक अत्यंत गूढ़ सिद्धांत प्रस्तुत करता है —
**प्रकृति में एक ऐसी प्रधान शक्ति होती है जो अनेक दोषों को एक साथ दूर करने में सक्षम होती है।**
“अपामार्ग ओषधीनां सर्वासामेक इद्वशी” — इसका अर्थ है कि सभी औषधियों में अपामार्ग एक विशेष और नियंत्रक शक्ति है।
यह संकेत करता है कि जैसे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) प्रमुख होती है, वैसे ही औषधियों में भी कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो मूल कारणों पर कार्य करते हैं।
अपामार्ग शब्द का अर्थ ही है — “मार्ग से अप (दूर) करने वाला” अर्थात् जो दोषों और विकारों को बाहर निकाल दे।
यह केवल रोगनाशक नहीं, बल्कि **दोष-परिमार्जक** है।
“तेन ते मृज्म आस्थितम्” — उसके द्वारा हम तुझे शुद्ध करते हैं।
यहाँ शुद्धि का अर्थ केवल शरीर की सफाई नहीं है, बल्कि:
✔ मानसिक दोषों का निवारण
✔ नकारात्मक संस्कारों का शमन
✔ ऊर्जा मार्गों की शुद्धि
✔ जीवन प्रवाह का संतुलन
“अथ त्वमगदश्चर” — तब तू रोगरहित होकर विचरण कर।
यह अंतिम पंक्ति बताती है कि शुद्धि के बाद ही स्वतंत्रता संभव है।
जब तक दोष, विकार और अवरोध बने रहते हैं, तब तक जीवन पूर्ण रूप से स्वस्थ और मुक्त नहीं हो सकता।
यह मंत्र हमें जीवन का एक गहरा नियम बताता है —
पहले शुद्धि, फिर शक्ति।
पहले परिमार्जन, फिर प्रगति।
यदि मन, शरीर और चेतना शुद्ध हों, तभी व्यक्ति अपने जीवन में निर्भय, निरोग और स्वतंत्र होकर आगे बढ़ सकता है।
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वैज्ञानिक संकेत
✔ अपामार्ग = डिटॉक्सिफिकेशन (शुद्धि प्रक्रिया)
✔ औषधियों में प्रधान तत्व = सक्रिय जैविक घटक
✔ रोगमुक्ति = संतुलित प्रतिरक्षा प्रणाली
✔ शुद्धि के बाद स्वास्थ्य = समग्र चिकित्सा सिद्धांत
आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि शरीर की सफाई और विषहरण (Detox) से अनेक रोग स्वतः कम हो जाते हैं।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ अपामार्ग = कर्म और संस्कारों की शुद्धि
✔ परिमार्जन = चित्त की सफाई
✔ अगद = रोगरहित चेतना
✔ स्वतंत्र विचरण = मोक्ष की दिशा
यह मंत्र बताता है कि जैसे शरीर को औषधि की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा को साधना और विवेक की आवश्यकता होती है।
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योगिक दृष्टि
✔ नाड़ी शुद्धि = ऊर्जा मार्गों की सफाई
✔ प्राण प्रवाह संतुलन
✔ दोषों का निष्कासन
✔ निरोगी अवस्था में साधना
योग में भी पहले “शुद्धि क्रियाएँ” कराई जाती हैं, उसके बाद उच्च ध्यान अवस्था प्राप्त होती है।
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ नकारात्मक विचारों का परिमार्जन
✔ आत्मशुद्धि से आत्मविश्वास
✔ दोषों से मुक्ति = मानसिक स्वतंत्रता
✔ संतुलित मन = स्वस्थ जीवन
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
शरीर से विष और अवरोध हटाओ, स्वास्थ्य स्वयं प्रकट होगा।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
चित्त से दोष और संस्कार हटाओ, चेतना स्वयं प्रकाशित होगी।
दोनों मिलकर कहते हैं —
शुद्धि ही वास्तविक उपचार है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.17.8 मंत्र हमें सिखाता है कि:
✔ अपामार्ग = सर्वोच्च शुद्धिकारक शक्ति
✔ औषधियों में प्रधान तत्व
✔ शुद्धि से रोगमुक्ति
✔ परिमार्जन से स्वतंत्रता
जब व्यक्ति अपने जीवन के दोषों को दूर कर लेता है,
तब वह “अगद” अर्थात् रोगरहित, संतुलित और स्वतंत्र होकर जीवन-पथ पर अग्रसर होता है।
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English Insight
Apamarga represents the supreme purifying force among all remedies.
Through purification of body, mind, and energy pathways, one becomes free from disease and moves forward in life with balance and strength.
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