Atharvaveda kand 4 sukta 16


 

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि **देवों की सर्वव्यापक दृष्टि** और उनकी शक्ति के बारे में कह रहे हैं। “बृहन्न् एषामधिष्ठाता” – जो इन सभी देवताओं का अधिष्ठाता है, वह बड़ा और महान है। “अन्तिकादिव पश्यति” – जैसे सीमा या अन्त तक देखता है, वैसे ही उसकी दृष्टि सब कुछ अवलोकित करती है। “य स्तायन् मन्यते चरन्त्सर्वं” – जो स्थिर और चलित सभी क्रियाओं का ज्ञान रखता है। “देवा इदं विदुः” – और देवता भी उसे इस रूप में जानते हैं। यह मंत्र हमें यह बताता है कि **सभी क्रियाएँ और जीवन के पहलू ब्रह्मांडीय दृष्टि और दिव्य ज्ञान के अधीन हैं।** ---

शब्दार्थ

- **बृहन्न्** – महान, विशाल - **एषामधिष्ठाता** – इन सबका अधिष्ठाता - **अन्तिकादिव** – सीमा, अंत, दूरस्थ तक - **पश्यति** – देखता है, अवलोकित करता है - **य** – जो - **स्तायन्** – स्थिर, स्थित - **मन्यते** – समझा जाता है, माना जाता है - **चरन्त्सर्वं** – चलित और स्थिर सभी क्रियाएँ - **देवा इदं विदुः** – देवता इसे जानते हैं ---

सरल अर्थ

हे देव! जो सभी देवताओं का अधिष्ठाता है, और जिसकी दृष्टि सीमा या अन्त तक फैली हुई है, जो स्थिर और चलित सभी कर्मों को जानता है, देवता उसे इस रूप में जानते हैं। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **बृहन्न् एषामधिष्ठाता** – दिव्य सत्ता और ब्रह्मांडीय संरचना ✔ **अन्तिकादिव पश्यति** – चेतना और ऊर्जा की सर्वव्यापक दृष्टि ✔ **चरन्त्सर्वं** – जीवन और क्रियाओं पर नियंत्रण और ज्ञान यह मंत्र जीवन की **संपूर्ण दृष्टि और सुरक्षा** का बोध कराता है। ---

दार्शनिक संकेत

- सभी क्रियाएँ और कर्म किसी न किसी **दिव्य शक्ति के अवलोकन में** रहते हैं। - स्थिर और चलित दोनों प्रकार के कर्म इस दृष्टि से अछूते नहीं हैं। - देवता और ब्रह्मांडीय शक्तियाँ जीवन के संतुलन और न्याय की निगरानी करती हैं। ---

योगिक व्याख्या

- **बृहन्न्** = विशाल चेतना और परम शक्ति - **अन्तिकादिव पश्यति** = सीमाहीन दृष्टि - **चरन्त्सर्वं** = जीवन के स्थिर और गतिशील पहलू जब साधक इस सृष्टि की दिव्यता और उसकी सर्वव्यापक शक्ति को समझता है, तो वह **सभी दिशाओं और कर्मों में संतुलित रहता है।** ---

वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि

- **सर्वव्यापक अवलोकन** = प्राकृतिक घटनाओं और नियमों का निरीक्षण - **स्थिर और गतिशील प्रक्रिया** = जीवन के संतुलन और विकास का प्रतीक - **देवीय अधिष्ठाता** = ब्रह्मांडीय शक्ति और चेतना का प्रतीक ---

समग्र निष्कर्ष

✔ जीवन के सभी कर्म और क्रियाएँ किसी न किसी दिव्य शक्ति के अवलोकन में रहती हैं। ✔ स्थिर और गतिशील सभी पहलुओं का ज्ञान परम दृष्टि से होता है। ✔ यह मंत्र साधक को चेतावनी और सुरक्षा का बोध कराता है। ✔ ब्रह्मांडीय दृष्टि जीवन में संतुलन और न्याय सुनिश्चित करती है। ---

English Insight

The great presiding deity, whose vision extends to the farthest boundaries, observes all actions, stationary and moving, and the gods themselves recognize this divine oversight.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि ब्रह्मांडीय शक्ति और देवों की दृष्टि का ध्यान कर रहे हैं। “बृहन्न् एषामधिष्ठाता” – यह शक्ति सभी का अधिष्ठाता है। “अन्तिकादिव पश्यति” – यह शक्ति सब कुछ सटीक रूप से देखती है, जैसे हमारे आसपास के वस्तुएँ। “य स्तायन् मन्यते” – जो स्थिर है और ध्यान में रहता है। “चरन्त्सर्वं देवा इदं विदुः” – देवता समझते हैं कि सब कुछ गतिशील है और स्थिरता एवं गति का संतुलन बना रहता है। ---

शब्दार्थ

- **बृहन् एषाम् अधिष्ठाता** – सभी का अधिष्ठाता, विराट शक्ति - **अन्तिकादिव पश्यति** – सब कुछ निकट और दूर दोनों दृष्टि से देखता है - **य स्तायन् मन्यते** – जो स्थिर है, स्थायित्व को पहचानता है - **चरन्त्सर्वं** – सब कुछ गतिशील है - **देवा इदं विदुः** – देवता जानते हैं ---

सरल अर्थ

हे शक्तिमान! आप सभी का अधिष्ठाता हैं। आप सब कुछ स्पष्ट रूप से देखते हैं। जो स्थिर है, और जो गतिशील है, देवता इसे समझते हैं। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **बृहन्** – विराट और सर्वव्यापी चेतना ✔ **अन्तिकादिव पश्यति** – कर्म और परिणाम पर पूर्ण दृष्टि ✔ **चरन्त्सर्वं** – संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है ✔ **स्तायन्** – स्थिरता, ध्यान और आत्मनियंत्रण यह मंत्र हमें **संतुलन और जागरूकता** का संदेश देता है। ---

दार्शनिक संकेत

- स्थिरता और गति, दोनों आवश्यक हैं। - देवता और ब्रह्मांडीय शक्ति सभी कर्मों और प्रवृत्तियों को देखती हैं। - साधक को स्थिर ध्यान और जागरूकता के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए। ---

योगिक व्याख्या

- **स्तायन्** – ध्यान और स्थिर मन - **चरन्त्सर्वं** – संसारिक गतिविधियाँ - साधक को स्थिर मन और जागरूक दृष्टि से जीवन के संघर्षों का सामना करना चाहिए। ---

English Insight

O cosmic power, you are the presiding force of all. Like the closest or the farthest, you see everything. The gods recognize what is stable and what moves; all is known to you.

भूमिका

इस मंत्र में **राजा, कर्म और मंत्र** के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। - “यस्तिष्ठति चरति” – जो स्थिर है और गतिशील भी है। - “यश्च वञ्चति” – जो छल या कपट से कार्य करता है। - “यो निलायं चरति यः प्रतङ्कम्” – जो अपने स्थायित्व को बनाए रखता है या भ्रम में है। - “द्वौ संनिषद्य यन् मन्त्रयेते” – जो दोनों प्रकार के कर्मों को संतुलित कर मंत्र (आहुति/साधना) करता है। - “राजा तद्वेद वरुणस्तृतीयः” – राजा वही है जो इस संतुलन और ज्ञान को जानता है; वरुण तीसरे दृष्टि से इसे नियंत्रित करता है। ---

शब्दार्थ

- **यस्तिष्ठति** – जो स्थिर है - **चरति** – जो गतिशील है - **यश्च वञ्चति** – जो छल करता है - **यो निलायं चरति यः प्रतङ्कम्** – जो स्थायित्व या भ्रम में रहता है - **द्वौ संनिषद्य** – दोनों को मिलाकर - **यन् मन्त्रयेते** – साधना या आहुति करता है - **राजा** – शासन और ज्ञान वाला - **तद्वेद** – वही जानता है - **वरुणः तृतीयः** – ब्रह्मांडीय न्याय और नियंत्रण ---

सरल अर्थ

जो स्थिर है और जो गतिशील है, जो छल करता है और जो स्थायित्व में है, उन्हें समझकर और संतुलित कर, राजा वही है जो मंत्र (साधना) द्वारा उनका ज्ञान रखता है, और वरुण उसे तीसरी दृष्टि से नियंत्रित करता है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **स्थिरता और गति का संतुलन** – जीवन में संतुलन आवश्यक है ✔ **साधना और ज्ञान** – राजा का वास्तविक ज्ञान मन और कर्मों के संतुलन में है ✔ **वरुण** – ब्रह्मांडीय न्याय और नियंत्रण का प्रतीक ---

दार्शनिक संकेत

- वास्तविक राजा वही है जो केवल शासन नहीं करता, बल्कि **कर्म, स्थिरता और छल** के संतुलन को जानता है। - ब्रह्मांडीय शक्ति और न्याय (वरुण) उसकी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। - साधक को जीवन में स्थिरता, जागरूकता और आंतरिक न्याय के साथ कर्म करना चाहिए। ---

योगिक व्याख्या

- **स्थिरता** = ध्यान और आत्मसंयम - **गतिशीलता** = कर्म और क्रिया - **संतुलन** = मन, बुद्धि और कर्मों में सामंजस्य - **वरुण दृष्टि** = ब्रह्मांडीय नियम और न्याय ---

English Insight

He who is stable, he who moves, he who deceives, he who maintains his dwelling or goes astray— the king who harmonizes both through sacred rites, he alone understands; Varuna observes with the third eye.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि **वरुण और ब्रह्मांडीय शक्ति** का ध्यान कर रहे हैं। यह मंत्र पृथ्वी, आकाश और समुद्र को वरुण की सत्ता और नियमन से जोड़ता है। - “उतेयं भूमिर्वरुणस्य” – यह भूमि वरुण के अधीन है। - “राज्ञ उतासौ द्यौर्बृहती दूरेअन्ता” – आकाश और उसकी विशालता दूरस्थ है, वरुण का नियम उसमें है। - “उतो समुद्रौ वरुणस्य कुक्षी” – समुद्र वरुण के पेट/कुक्षी के समान है। - “उतास्मिन्न् अल्प उदके निलीनः” – समुद्र के भीतर पानी सीमित नहीं, यह वरुण की सत्ता में विलीन है। यह मंत्र **प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय संतुलन** का प्रतीक है और बताता है कि वरुण सभी तत्वों में व्याप्त हैं। ---

शब्दार्थ

- **उतेयं भूमिः** – यह भूमि - **वरुणस्य राज्ञ** – वरुण के अधीन - **उतासौ द्यौः बृहती दूरेअन्ता** – आकाश विशाल और दूरस्थ - **उतो समुद्रौ** – समुद्र भी वरुण का अधीन - **वरुणस्य कुक्षी** – वरुण की पेट/कुक्षी - **उतास्मिन्न् अल्प उदके निलीनः** – उसमें पानी पूरी तरह विलीन है, सीमित नहीं ---

सरल अर्थ

यह भूमि, आकाश और समुद्र सभी वरुण के अधीन हैं। सारी ब्रह्मांडीय सत्ता उनके नियम और नियंत्रण में है। समुद्र और जल तत्व भी वरुण की शक्ति में विलीन हैं। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **भूमि और आकाश** – स्थिर और व्यापक दृष्टि ✔ **समुद्र** – स्थिरता और जीवन ऊर्जा का प्रतीक ✔ **वरुण** – ब्रह्मांडीय न्याय और संतुलन का प्रतीक ✔ **निलीन जल** – सब कुछ ब्रह्मांडीय शक्ति में विलीन यह मंत्र हमें सिखाता है कि **सभी प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय तत्व वरुण की सत्ता के अधीन हैं**, और यही जीवन में स्थिरता और संतुलन बनाए रखता है। ---

दार्शनिक संकेत

- जीवन और प्रकृति का संतुलन **वरुण और ब्रह्मांडीय शक्ति** पर निर्भर है। - जल, भूमि और आकाश सभी ब्रह्मांडीय नियमों से जुड़े हैं। - साधक को भी अपने जीवन में **स्थिरता और संतुलन** बनाए रखना चाहिए। ---

योगिक व्याख्या

- **भूमि** = स्थिरता - **आकाश** = व्यापक दृष्टि - **समुद्र** = जीवनशक्ति और ऊर्जा - **वरुण** = नियंत्रक और न्यायदाता साधक जब अपने जीवन में इन तत्वों और शक्तियों का सम्मान करता है, तो वह **संतुलन और स्थिरता के मार्ग पर चलता है**। ---

English Insight

This earth is under Varuna’s rule. The vast heavens extend far away. The ocean is Varuna’s belly, and all waters are immersed within His power.

भूमिका

इस मंत्र में वरुण की सर्वव्यापक दृष्टि और नियंत्रण का वर्णन किया गया है। वरुण केवल नियमों के रक्षक ही नहीं हैं, बल्कि उनकी दृष्टि **सभी दिशाओं और जीवों पर व्याप्त** है। - “उत यो द्यामतिसर्पात्परस्तान्” – वह कोई भी जो आकाश या आकाशीय शक्तियों से परे हो, - “न स मुच्यातै वरुणस्य राज्ञः” – वरुण के राज्य से बच नहीं सकता। - “दिव स्पशः प्र चरन्तीदमस्य” – आकाश में चलने वाले, दिव्य दृष्टि वाले, - “सहस्राक्षा अति पश्यन्ति भूमिम्” – सहस्राक्ष (हजार नेत्र) जैसे वे पृथ्वी को पूरी तरह देखते हैं। यह मंत्र बताता है कि वरुण का नियम **सभी परिप्रेक्ष्य और जीवों तक फैला हुआ है**, और कोई भी इससे बच नहीं सकता। ---

शब्दार्थ

- **उत** – भी, विशेष रूप से - **यो** – जो - **द्यामतिसर्पात्परस्तान्** – आकाश या आकाशीय शक्तियों से परे - **न स** – वह नहीं - **मुच्यातै** – बच सकता, स्वतंत्र हो सकता - **वरुणस्य राज्ञः** – वरुण के राज्य से - **दिव स्पशः** – आकाश में दृष्टि रखने वाले - **प्र चरन्ती** – विचरते हुए - **एतस्मिन** – इस (भू-मंडल) में - **सहस्राक्षा** – हजार नेत्रों वाले - **अति पश्यन्ति** – पूरी तरह देखते हैं - **भूमिम्** – पृथ्वी ---

सरल अर्थ

जो भी आकाश या आकाशीय शक्तियों से परे हो, वरुण के राज्य से बच नहीं सकता। वे जो दिव्य दृष्टि रखते हैं, हजार नेत्रों वाले, पृथ्वी को पूरी तरह देखते हैं। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **वरुण की दृष्टि** – सब कुछ पर व्यापक और सर्वज्ञ दृष्टि। ✔ **सहस्राक्षा** – हर कृत्य, हर विचार और हर जीव पर नजर। ✔ **भ्रष्ट और दुष्ट कृत्य का नियंत्रण** – कोई भी कर्म वरुण से छुपा नहीं रहता। यह मंत्र हमें **जीवन में सतर्क और न्यायप्रिय** रहने की सीख देता है। ---

दार्शनिक संकेत

- **सर्वव्यापक चेतना** – ब्रह्मांडीय नियम और दैवीय दृष्टि - **कर्म और नतीजे** – कोई भी कृत्य अनदेखा नहीं रहता - **सत्य और न्याय** – वरुण का शासन स्थिर और न्यायपूर्ण है ---

योगिक व्याख्या

- **सहस्राक्षा वरुण** = आंतरिक चेतना और जीवन की सतर्क निगरानी - **भ्रमणशील जीव** = मन और इन्द्रिय - साधक जब अपने कर्मों में सतर्क और विवेकशील होता है, तो वह **आत्मिक और बाह्य संतुलन** बनाए रख सकता है। ---

English Insight

Even those who try to transcend the heavens cannot escape Varuna’s rule. His thousand-eyed vision surveys all beings and all of the earth. Nothing in creation escapes his divine oversight.

भूमिका

इस मंत्र में वरुण की **सर्वव्यापक दृष्टि और नियंत्रण** का वर्णन है। वरुण राजा के रूप में सभी दिशाओं और प्राणियों पर नजर रखते हैं। वे सब कुछ जानने वाले हैं और किसी भी कृत्य या जीव से छुपा नहीं रह सकता। - “सर्वं तद्राजा वरुणो वि चष्टे” – राजा वरुण सब कुछ देखता और नियंत्रित करता है। - “यदन्तरा रोदसी यत्परस्तात्” – चाहे वह आकाश में हो या पृथ्वी पर, कोई भी वस्तु, कोई भी प्राणी नहीं छुपता। - “संख्याता अस्य निमिषो जनानामक्षान्” – उनकी दृष्टि तेज है; जैसे एक पल में वे सभी जीवों की नज़र को गिनते हैं। - “इव श्वघ्नी नि मिनोति तानि” – जैसे एक कुत्ता वस्तु को पकड़ता है, वैसे ही वरुण की दृष्टि किसी भी कृत्य या जीव से नहीं छूटती। ---

शब्दार्थ

- **सर्वं** – सब कुछ - **तद्राजा वरुणः** – राजा वरुण - **वि चष्टे** – देखते और नियंत्रित करते हैं - **यदन्तरा** – आकाश में - **रोदसी** – और रोशनी में, प्रकाश में - **यत्परस्तात्** – और परस्तात्, दूर-दूर तक - **संख्याता अस्य निमिषः** – उनकी दृष्टि तेज और संख्यात्मक रूप से नियंत्रित - **जनानामक्षान्** – प्राणियों की आँखें - **इव** – जैसे - **श्वघ्नी** – श्वान (कुत्ता) वस्तु पकड़ता है - **नि मिनोति तानि** – पकड़ लेता है, नियंत्रित करता है ---

सरल अर्थ

वरुण राजा सब कुछ देखता है, चाहे वह आकाश में हो या पृथ्वी पर। उनकी दृष्टि तेज और सर्वव्यापक है; जैसे कुत्ता अपनी दृष्टि से वस्तु पकड़ लेता है, वैसे ही वरुण सब कुछ नियंत्रित करते हैं। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **वरुण का शासन** – कर्म और जीवन पर दैवीय निगरानी ✔ **सर्वव्यापक दृष्टि** – कोई भी कृत्य या जीव उनके ज्ञान से नहीं छुपता ✔ **नैतिक और आध्यात्मिक चेतना** – यह मंत्र हमें सतर्क और धर्मपरायण रहने की सीख देता है ---

दार्शनिक संकेत

- **सर्वज्ञता और नियंत्रण** – वरुण का दृष्टिकोण बताता है कि ब्रह्मांडीय न्याय हमेशा सक्रिय है। - **कर्म का फल** – कोई भी कर्म छुपा नहीं रहता; हर क्रिया का परिणाम आता है। - **जीवन में सावधानी** – हम अपने विचार और कर्म में सजग रहें। ---

योगिक व्याख्या

- **वरुण = आंतरिक चेतना** - **सहस्राक्ष दृष्टि = सतत जागरूकता** - **जनानामक्षान् = जीवन के प्राण और इन्द्रिय** जब साधक अपने कर्म, विचार और इन्द्रिय पर नियंत्रण रखता है, तो वह **आत्मिक और बाह्य संतुलन** बनाए रख सकता है। ---

English Insight

King Varuna sees everything, whether in the sky or on the earth. His vision is sharp and all-encompassing, like a dog that seizes its object; nothing among beings escapes his watchful eye.

भूमिका

इस मंत्र में वरुण के पाशों (बंधन या शक्तियों) का वर्णन है जो **सत्य की रक्षा और असत्य के विनाश** के लिए कार्य करते हैं। - “ये ते पाशा वरुण सप्तसप्त त्रेधा तिष्ठन्ति” – वरुण के सात-सात त्रैतीयक पाश हर दिशा में स्थित हैं। - “विषिता रुषन्तः” – ये क्रोधित और प्रभावशाली हैं। - “छिनन्तु सर्वे अनृतं वदन्तं” – वे सभी झूठ बोलने वालों को भस्म कर दें। - “यः सत्यवाद्यति तं सृजन्तु” – और जो सत्य बोलता है, उसे सुरक्षित और उन्नत करें। यह मंत्र **सत्य और न्याय के स्थायित्व** को प्रकट करता है और असत्य, छल तथा अनैतिक कृत्यों का नाश करता है। ---

शब्दार्थ

- **ये** – ये - **ते पाशा** – आपके बंधन, शक्तियाँ - **वरुण** – वरुण देव - **सप्तसप्त त्रेधा** – सात-सात त्रैतीयक, व्यापक शक्तियाँ - **तिष्ठन्ति** – स्थित हैं, क्रियाशील हैं - **विषिता** – प्रभावशाली, क्रोधित - **रुषन्तः** – क्रोधी, सशक्त - **छिनन्तु** – भस्म कर दें, नष्ट कर दें - **सर्वे** – सभी - **अनृतं वदन्तं** – झूठ बोलने वाले - **यः** – जो - **सत्यवाद्यति** – सत्य बोलता है - **तं सृजन्तु** – उसे सुरक्षित रखें, पुष्ट करें ---

सरल अर्थ

वरुण के पाश पूरे ब्रह्मांड में फैले हुए हैं। वे असत्य बोलने वालों को नष्ट कर दें और सत्य बोलने वालों को सुरक्षित रखें। सत्य और न्याय की विजय सुनिश्चित हो। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **सत्य की रक्षा** – जीवन में सत्य बोलने वाले हमेशा संरक्षित होते हैं। ✔ **असत्य का नाश** – झूठ, छल और अनैतिकता को दैवीय शक्ति से समाप्त किया जाता है। ✔ **सर्वव्यापक न्याय** – वरुण का शासन केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना और कर्मों पर भी लागू होता है। ---

दार्शनिक संकेत

- सत्य और असत्य का अंतर स्पष्ट है; - सत्य बोलने वाले को हमेशा जीवन में लाभ और सुरक्षा मिलती है; - असत्य बोलने वाले अपने कर्मों के अनुसार विनष्ट होते हैं। - ब्रह्मांडीय नियम (धर्म) की रक्षा के लिए दैवीय शक्तियाँ हमेशा सक्रिय रहती हैं। ---

योगिक व्याख्या

- **वरुण पाश = जीवन में नियम और बाध्यता** - **सत्य = आत्मा का प्रकाश** - **अनृत = अहंकार और भ्रांति** साधक जब सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है, तो ब्रह्मांडीय शक्तियाँ उसे **सुरक्षित और समर्थ** बनाती हैं। ---

English Insight

Varuna’s ropes, strong and all-encompassing, strike down all who speak falsehoods. Those who speak truth are protected and uplifted. The cosmic law preserves justice and punishes deceit.

भूमिका

इस मंत्र में वरुण के **सत्य और असत्य पर नियंत्रण** का वर्णन है। - “शतेन पाशैरभि धेहि वरुणैनं” – वरुण के पाशों से हजारों रूप में बाधित करो। - “मा ते मोच्यनृतवाङ्नृचक्षः” – झूठ बोलने वाले और नीतिहीन दृष्टि वालों को मत छोड़ो। - “आस्तां जाल्म उदरं श्रंशयित्वा” – उनका उदर जाल्म (पेट या मूलभूत शक्ति) द्वारा संकुचित करो। - “कोश इवाबन्धः परिकृत्यमानः” – जैसे एक कोश (भंडार) बंद किया जाता है, वैसे ही उन्हें पाशों में सीमित कर दो। यह मंत्र **सत्य की रक्षा और असत्य के विनाश** में वरुण की शक्ति को प्रकट करता है। ---

शब्दार्थ

- **शतेन** – सैंकड़ों, हजारों - **पाशैः अभि धेहि** – बंधनों द्वारा बाधित करो - **वरुणैनं** – वरुण के - **मा ते मोच्यनृतवाङ्** – झूठ बोलने वालों को मत छोड़ो - **नृचक्षः** – नीतिहीन दृष्टि वाले, असत्य की दृष्टि वाले - **आस्तां** – उनके लिए - **जाल्म उदरं** – पेट या मूल शक्ति द्वारा - **श्रंशयित्वा** – संकुचित करके, दबा कर - **कोश इव** – भंडार या संदूक की तरह - **आबन्धः परिकृत्यमानः** – बंधन में सीमित किया गया ---

सरल अर्थ

वरुण के पाशों से झूठ बोलने वालों और नीतिहीन दृष्टि वालों को सीमित और नियंत्रित करो। जैसे भंडार के डिब्बे में वस्तु बंद की जाती है, वैसे ही उन्हें पाशों में सीमित कर दो। सत्य बोलने वाले सुरक्षित रहें, और असत्य का नाश हो। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **सत्य की रक्षा** – सत्य बोलने वाले सुरक्षित रहेंगे। ✔ **असत्य का बंधन** – झूठ और छल के प्रवृत्तियों को सीमित करना। ✔ **वरुण पाश = ब्रह्मांडीय न्याय और कर्म** यह मंत्र हमें सिखाता है कि **सत्य और धर्म की रक्षा के लिए दैवीय शक्तियाँ हमेशा सक्रिय रहती हैं।** ---

दार्शनिक संकेत

- असत्य बोलने वाले जीवन में अपने कर्मों से बंधते हैं। - ब्रह्मांडीय न्याय उन्हें नियंत्रित करता है और उनके कृत्यों को सीमित करता है। - सत्य बोलने वालों की सुरक्षा आंतरिक और बाह्य शक्तियों से सुनिश्चित होती है। ---

योगिक व्याख्या

- **पाश = कर्म और नियम का बंधन** - **सत्यवाद = आत्मा की स्वतंत्रता और उज्जवलता** - **अनृतवाद = अहंकार और भ्रांति का बंधन** साधक जब सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है, तो ब्रह्मांडीय शक्ति उसे **सुरक्षित और समर्थ** बनाती है। ---

English Insight

Bind the untruthful and those with impure vision with hundreds of Varuna’s ropes. Restrict them like a treasure chest, while protecting those who speak the truth. This manifests the cosmic law of justice and truth.

भूमिका

इस मंत्र में वरुण की **सर्वव्यापक शक्ति और न्याय** का वर्णन है। - “यः समाभ्यो वरुणो” – वह वरुण जो सभी ओर से (समान रूप से) उपस्थित है। - “यो व्याभ्यो” – वह जो आंतरिक और बाहरी दोनों ओर फैला हुआ है। - “यः संदेश्यो वरुणो” – वह जो संदेश पहुँचाने और मार्गदर्शन करने वाला है। - “यो विदेश्यो” – वह जो दूरस्थ स्थानों में व्याप्त है। - “यो दैवो वरुणो” – वह दैवीय वरुण है। - “यश्च मानुषः” – और वही मानव भी है। यह मंत्र **वरुण की सर्वव्यापक शक्ति, न्याय और मानव-दैवीय संबंध** को प्रकट करता है। ---

शब्दार्थ

- **यः** – जो - **समाभ्यो वरुणो** – सभी ओर से उपस्थित वरुण - **यो व्याभ्यो** – जो फैला हुआ है, आंतरिक और बाहरी रूप से - **संदेश्यो वरुणो** – जो संदेश, मार्गदर्शन और निर्देशन देता है - **विदेश्यो** – जो दूरस्थ और अन्यत्र फैला है - **दैवो वरुणो** – दैवीय वरुण - **यश्च मानुषः** – और वही मानव भी है ---

सरल अर्थ

वरुण हर दिशा और हर क्षेत्र में विद्यमान है। वह न केवल स्थानीय या व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि सार्वभौमिक और दैवीय भी है। वरुण का आभास मनुष्य के कर्म और जीवन में भी होता है। सत्य और न्याय का पालन करना उसकी इच्छा के अनुसार होता है। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **सर्वव्यापकता** – वरुण का प्रभाव हर ओर है, आंतरिक और बाहरी दोनों रूप में। ✔ **मानव और दैवीय संबंध** – मानव कर्म वरुण के न्याय से प्रभावित होता है। ✔ **सत्य और धर्म** – वरुण के मार्गदर्शन में सत्य और धर्म की विजय सुनिश्चित होती है। ---

दार्शनिक संकेत

- वरुण केवल देवता नहीं, बल्कि **सर्वव्यापक शक्ति और नियम** का प्रतीक है। - वह सभी दिशाओं, स्थानों और प्राणियों में उपस्थित है। - मनुष्य अपने कर्मों से इस न्याय और शक्ति का अनुभव करता है। - यह मंत्र **सत्य, न्याय और धर्म के सार्वभौमिक सिद्धांत** को दर्शाता है। ---

योगिक व्याख्या

- **वरुण = ब्रह्मांडीय नियम और जल-प्रकृति** - **मानुष = चेतना और कर्मकर्ता** - **सर्वव्यापकता = जीवन और कर्मों में न्याय का आधार** साधक जब सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है, तो वह वरुण की सर्वव्यापक शक्ति द्वारा संरक्षित और मार्गदर्शित होता है। ---

English Insight

Varuna is present in all directions and realms, spreading across both near and far. He is divine, guiding, and also manifests within humans. Through Varuna, truth, justice, and universal law are maintained.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि **दुष्ट और नकारात्मक शक्तियों** को नियंत्रित करने की प्रार्थना कर रहे हैं। - “तैस्त्वा सर्वैरभि ष्यामि पाशैः” – उन सभी के ऊपर पाश बांध दूँ। - “सावामुष्यायणामुष्याः पुत्र” – जो मनुष्यों और उनके पुत्रों के रूप में दुष्ट कर्म करते हैं। - “तान् उ ते सर्वान् अनुसंदिशामि” – उन सभी को मैं अनुसंधान करके नियंत्रित करूँ। यह मंत्र दर्शाता है कि **वरुणीय शक्ति और ब्रह्मांडीय न्याय** के माध्यम से नकारात्मक और हानिकारक कर्मों का नियंत्रण किया जा सकता है। ---

शब्दार्थ

- **तैः** – उनके द्वारा - **त्वा सर्वैः** – सभी के ऊपर - **अभि ष्यामि** – बांध दूँ, नियंत्रित करूँ - **पाशैः** – बंधन, रस्सी या जाल - **सावामुष्यायणामुष्याः** – मनुष्यों और उनके पुत्रों के रूप में - **तान् उ ते सर्वान्** – उन सभी को - **अनुसंदिशामि** – अनुसंधान करूँ, नियंत्रण करूँ ---

सरल अर्थ

हे देवता! मैं उन सभी नकारात्मक और दुष्ट शक्तियों पर पाश बांधता हूँ। जो मनुष्य और उनके अनुयायी दुष्ट कर्म करते हैं, उन्हें नियंत्रित करूँ। इस प्रकार, वे अपने हानिकारक कार्यों में असमर्थ रहें और न्याय स्थापित हो। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ **पाश = नियंत्रण और बंधन** – दुष्ट कर्मों को नियंत्रित करना। ✔ **नकारात्मक शक्तियों का विनाश** – असत्य और अधर्म का संहार। ✔ **अनुसंधान = सतर्क निगरानी** – ब्रह्मांडीय न्याय के अनुसार कर्मों का आकलन। यह मंत्र यह भी सिखाता है कि **सत्य और न्याय की रक्षा के लिए सक्रिय प्रयास और ब्रह्मांडीय शक्ति का संयोजन आवश्यक है।** ---

दार्शनिक संकेत

- हर व्यक्ति और शक्ति के कर्मों का परिणाम होता है। - दुष्ट कर्मों को **बंधन और नियंत्रण** के माध्यम से रोका जा सकता है। - ब्रह्मांडीय नियम और वरुणीय शक्ति हमेशा सत्य की रक्षा करती है। ---

योगिक व्याख्या

- **पाश = आंतरिक और बाह्य नियंत्रण का प्रतीक** - **दुष्ट मनुष्य = नकारात्मक प्रवृत्तियाँ** - **अनुसंधान = आत्मनिरीक्षण और जागरूकता** साधक जब अपने जीवन में सतर्क रहता है और नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करता है, तो वह **सत्य, धर्म और आंतरिक शांति** में स्थिर रहता है। ---

English Insight

I bind all malevolent forces, those who act wickedly in human or progeny forms, with ropes of divine restraint. I track and control them, ensuring they cannot harm, while upholding truth and cosmic order.

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