AtharvaVeda kand 4 sukta 28

 

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि “भव” और “शर्व” नामक रुद्र के स्वरूपों की स्तुति करते हैं। ये दोनों नाम शिव के उग्र एवं रक्षक रूप का संकेत देते हैं। ऋषि स्वीकार करते हैं कि सम्पूर्ण दिशाओं में जो कुछ प्रकाशित है, वह सब उन्हीं की सत्ता के अधीन है। ---

शब्दार्थ

- भव = उत्पत्ति का कारण, अस्तित्वदाता - शर्व = संहारकर्ता, पीड़ा हरने वाला - मन्वे = मैं मानता हूँ - वां = तुम दोनों का - वित्तम् = धन, सामर्थ्य - प्रदिशि = सभी दिशाओं में - विरोचते = प्रकाशित होता है - यावस्य ईशाथे = जिनके अधीन है - द्विपदः = दो पैरों वाले (मनुष्य) - चतुष्पदः = चार पैरों वाले (पशु) - तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें पाप/कष्ट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे भव और शर्व! मैं जानता हूँ कि दिशाओं में जो कुछ प्रकाशित है, वह सब आपकी ही शक्ति है। आप ही द्विपद (मनुष्य) और चतुष्पद (पशु) के स्वामी हैं। आप हमें पाप और संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ भव = सृजन की शक्ति ✔ शर्व = नाश के माध्यम से शुद्धि यह मंत्र बताता है कि सृष्टि और संहार दोनों एक ही दैवी सत्ता के अंग हैं। ---

दार्शनिक संकेत

जीवन में जो भी प्रकाश है — ज्ञान, चेतना, अस्तित्व — वह परम सत्ता से ही प्रकाशित है। द्विपद और चतुष्पद का उल्लेख समस्त जीव-जगत की एकता को दर्शाता है। ---

योगिक व्याख्या

भव = भीतर की जीवन ऊर्जा शर्व = भीतर के दोषों का विनाश जब साधक दोनों शक्तियों को स्वीकार करता है, तभी पूर्ण संतुलन प्राप्त होता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

✔ सम्पूर्ण जैव विविधता एक ही ऊर्जा स्रोत से संचालित है ✔ जीवन चक्र = उत्पत्ति + विकास + विनाश ---

निष्कर्ष

यह मंत्र सार्वभौमिक ईश्वरत्व की घोषणा है। सृष्टि का हर प्रकाश, हर जीवन — उसी एक परम सत्ता के अधीन है। ---

English Insight

O Bhava and Sharva, all that shines in every direction belongs to You. You rule over all beings — two-footed and four-footed. May You free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि भव और शर्व की सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापक शक्ति का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं — जो निकट और दूर दोनों में विद्यमान हैं, जो धनुर्धारियों (विषुभृताम्) में श्रेष्ठ और प्रसिद्ध हैं, जो द्विपद और चतुष्पद के स्वामी हैं — वे हमें पाप और संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- ययोः = जिन दोनों के - अभ्यभ्व = निकट स्थित - उत = तथा - यत् दूरे चित् = जो दूर भी है - विदितौ = प्रसिद्ध, ज्ञात - इषु-भृताम् = बाण धारण करने वालों में - असिष्ठौ = श्रेष्ठतम - यौ = जो दोनों - अस्य ईशथे = इसके (संसार के) स्वामी हैं - द्विपदः = दो पैरों वाले - चतुष्पदः = चार पैरों वाले - तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें पाप से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे भव और शर्व! आप जो निकट और दूर दोनों में विद्यमान हैं, जो धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और प्रसिद्ध हैं, जो समस्त द्विपद और चतुष्पद के स्वामी हैं — आप हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ निकट = हृदय में स्थित परमात्मा ✔ दूर = विराट ब्रह्मांड में व्यापी सत्ता ✔ इषुभृत् = कर्मफल का संचालन करने वाली शक्ति यह मंत्र बताता है कि ईश्वर अंतर्यामी भी है और विश्वरूप भी। ---

दार्शनिक संकेत

- ईश्वर सर्वव्यापक है — सूक्ष्म में भी और विशाल में भी। - “धनुर्धारी” प्रतीक है न्याय और कर्मफल का। - जीवन में जो भी घटित होता है, वह दैवी व्यवस्था के अधीन है। ---

योगिक व्याख्या

✔ निकट = आत्मा में स्थित चेतना ✔ दूर = सहस्रार की दिव्य अनुभूति ✔ बाण = एकाग्रता की शक्ति साधक जब भीतर की चेतना को पहचानता है, तो उसे बाहर भी वही शक्ति दिखाई देती है। ---

निष्कर्ष

यह मंत्र सर्वव्यापकता और संरक्षण का मंत्र है। भव और शर्व — सृजन और संहार के अधिपति — जीवन के प्रत्येक स्तर पर उपस्थित हैं। ---

English Insight

O Bhava and Sharva, present both near and far, renowned among the bearers of arrows, rulers of all two-footed and four-footed beings— free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि भव और शर्व को “सहस्राक्ष” (हजार नेत्रों वाले), “वृत्रहन्” (अवरोधों का नाश करने वाले) और “उग्र” (प्रचंड शक्ति) के रूप में पुकारते हैं। वे निकट और दूर दोनों से उनकी स्तुति करते हुए उनसे रक्षा और मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। ---

शब्दार्थ

- सहस्राक्षौ = हजार नेत्रों वाले (सर्वदर्शी) - वृत्रहना = अवरोधों/दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले - हुवे अहम् = मैं आह्वान करता हूँ - दूरे-गव्यूती = दूर तक विस्तृत क्षेत्रों में - स्तुवन् = स्तुति करते हुए - एमि = मैं आता हूँ / पहुँचता हूँ - उग्रौ = प्रचंड शक्तिशाली - यौ = जो दोनों - अस्य ईशथे = इस जगत के स्वामी हैं - द्विपदः = दो पैरों वाले - चतुष्पदः = चार पैरों वाले - तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें संकट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे सहस्र नेत्रों वाले, अवरोधों का नाश करने वाले उग्र देवों! मैं आपकी स्तुति करते हुए, निकट और दूर से आपको पुकारता हूँ। आप जो द्विपद और चतुष्पद के स्वामी हैं, हमें पाप और संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ सहस्राक्ष = सर्वज्ञ चेतना ✔ वृत्र = अज्ञान, भय, मानसिक अवरोध ✔ हन = उनका विनाश यह मंत्र भीतर के अंधकार और बंधनों को हटाने का आह्वान है। ---

दार्शनिक संकेत

- ईश्वर सर्वदर्शी है — कोई कर्म छिपा नहीं। - “वृत्र” प्रतीक है रुकावटों का — चाहे वे बाहरी हों या आंतरिक। - दैवी शक्ति न्याय और संतुलन स्थापित करती है। ---

योगिक व्याख्या

✔ सहस्राक्ष = सहस्रार चक्र की चेतना ✔ वृत्रहन् = नाड़ियों के अवरोध का नाश ✔ उग्र = तीव्र साधना शक्ति जब साधक भीतर की प्रखर चेतना को जगाता है, तो जीवन के अवरोध हटने लगते हैं। ---

निष्कर्ष

यह मंत्र दैवी संरक्षण और आंतरिक शक्ति का संगम है। भव और शर्व — सृजन और संहार के अधिपति — जीवन के हर स्तर पर संतुलन स्थापित करते हैं। ---

English Insight

O thousand-eyed, slayers of obstacles, fierce and mighty Lords, I invoke You from near and far. Rulers of all beings, two-footed and four-footed, free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि भव और शर्व की उस शासन-शक्ति का वर्णन करते हैं जो सृष्टि के आरम्भ से ही प्रजा और राष्ट्रों पर प्रभावी रही है। वे अग्रणी, समर्थ और जनसमूहों के अधिपति हैं। ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे हमें संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- यौ = जो दोनों - आरेभाथे = आरम्भ से धारण/संचालित करते हैं - बहु = अनेक - साकम् = साथ-साथ - अग्रे = प्रारम्भ में - प्र चेदस = बुद्धिमान, चेतनाशील - राष्ट्रम् = राज्य, समाज - अभिभाम् = अधिपत्य करते हैं, प्रभाव डालते हैं - जनेषु = लोगों में - अस्य ईशथे = इसके स्वामी हैं - द्विपदः = दो पैरों वाले (मनुष्य) - चतुष्पदः = चार पैरों वाले (पशु) - तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें पाप/कष्ट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे भव और शर्व! आप सृष्टि के आरम्भ से ही अनेक प्रजाओं और राष्ट्रों पर अधिपत्य रखते हैं। आप बुद्धिमान और सब पर प्रभावशाली हैं। आप जो द्विपद और चतुष्पद के स्वामी हैं, हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ राष्ट्र = केवल राज्य नहीं, बल्कि चेतना का समूह ✔ अग्रे = मूल चेतना का आरम्भ ✔ अभिभाम् = आत्मबल का प्रभाव यह मंत्र दर्शाता है कि दैवी सत्ता केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक जीवन को भी संचालित करती है। ---

दार्शनिक संकेत

- समाज और राष्ट्र का संतुलन दैवी नियमों पर आधारित है। - शासन की वास्तविक शक्ति धर्म और सत्य में निहित है। - जीवन के सभी स्तरों पर वही परम सत्ता अधिष्ठाता है। ---

योगिक व्याख्या

✔ राष्ट्र = शरीर की इन्द्रियाँ और मन ✔ अभिभाम् = आत्मा का नियंत्रण ✔ अग्रे = मूलाधार से सहस्रार तक ऊर्जा प्रवाह जब आत्मा का शासन स्थापित होता है, तो आंतरिक “राष्ट्र” संतुलित होता है। ---

निष्कर्ष

यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि दैवी शक्ति व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर शासन करती है। भव और शर्व के आश्रय में ही जीवन का संतुलन और सुरक्षा संभव है। ---

English Insight

O Bhava and Sharva, who from the beginning rule over many peoples and realms, wise and powerful among all beings, rulers of two-footed and four-footed creatures— free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि भव और शर्व की अजेय शक्ति का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं — जिनके वध (प्रहार, दंड, शक्ति) से देवताओं में या मनुष्यों में कोई भी बच नहीं सकता, जो समस्त द्विपद और चतुष्पद के स्वामी हैं — वे हमें पाप और संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- ययोः = जिन दोनों के - वधान् = प्रहार, दंड, शक्ति - न अपपद्यते = नहीं बच सकता, नहीं टलता - कश्चन = कोई भी - अन्तः देवेषु = देवताओं में भी - उत मानुषेषु = तथा मनुष्यों में - यौ = जो दोनों - अस्य ईशथे = इसके (जगत के) स्वामी हैं - द्विपदः = दो पैरों वाले - चतुष्पदः = चार पैरों वाले - तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें पाप/कष्ट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे भव और शर्व! आपके दंड से न देवता बच सकते हैं न मनुष्य। आप जो सभी जीवों के स्वामी हैं, हमें पाप और संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ वध = कर्मफल का दंड ✔ देवेषु = सूक्ष्म शक्तियाँ ✔ मानुषेषु = स्थूल जगत यह मंत्र बताता है कि दैवी न्याय से कोई भी परे नहीं है। ---

दार्शनिक संकेत

- कर्म का नियम सार्वभौमिक है। - दैवी व्यवस्था निष्पक्ष है। - जो सृष्टि का पालन करता है, वही संतुलन हेतु दंड भी देता है। ---

योगिक व्याख्या

✔ वध = भीतर के दोषों का विनाश ✔ भव = सृजनात्मक चेतना ✔ शर्व = शुद्धि का प्रचंड बल जब साधक अहंकार त्यागता है, तभी मुक्ति संभव होती है। ---

निष्कर्ष

यह मंत्र दैवी न्याय और संरक्षण दोनों का प्रतीक है। भव और शर्व — सृष्टि के अधिपति — न्यायपूर्वक शासन करते हैं और साधक को शुद्धि की ओर ले जाते हैं। ---

English Insight

O Bhava and Sharva, whose strike none can escape, neither among gods nor among men, rulers of all beings— free us from distress.

भूमिका

इस मंत्र में ऋषि भव और शर्व से प्रार्थना करते हैं कि जो कृत्या (अभिचार/हानिकारक क्रिया) करने वाला, जो मूल को नष्ट करने वाला यतुधान (दुष्ट शक्ति) है, उस पर आप अपना उग्र वज्र स्थापित करें। आप जो द्विपद और चतुष्पद के स्वामी हैं, हमें पाप और संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- यः = जो - कृत्या-कृत् = अभिचार करने वाला - मूल-कृत् = जड़ को नष्ट करने वाला - यातुधानः = राक्षसी/हानिकारक शक्ति - नि = नीचे / उस पर - तस्मिन् = उस पर - धत्तम् = स्थापित करें - वज्रम् = वज्र (प्रचंड दंड/शक्ति) - उग्रौ = हे प्रचंड देवों (भव-शर्व) - यौ = जो दोनों - अस्य ईशथे = इसके (जगत के) स्वामी हैं - द्विपदः = दो पैरों वाले - चतुष्पदः = चार पैरों वाले - तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें पाप/कष्ट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे भव और शर्व! जो अभिचार करने वाला, जो मूल को नष्ट करने वाला दुष्ट है, उस पर आप अपना प्रचंड वज्र प्रहार करें। आप हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ कृत्या = नकारात्मक कर्म ✔ मूलकृत् = जड़ में बैठा अज्ञान ✔ यातुधान = भीतर की दुष्प्रवृत्ति ✔ वज्र = दृढ़ संकल्प और दिव्य शक्ति यह मंत्र बाहरी नहीं, भीतर के अंधकार के विनाश का भी आह्वान है। ---

दार्शनिक संकेत

- हर विनाशकारी शक्ति का मूल अज्ञान है। - दिव्य न्याय जड़ से शुद्धि करता है। - संरक्षण तभी संभव है जब मूल दोष हटे। ---

योगिक व्याख्या

✔ मूलकृत् = मूलाधार में संचित विकार ✔ वज्र = प्राणशक्ति की तीव्रता ✔ उग्र = साधना की दृढ़ता जब साधक प्राण और चेतना को जाग्रत करता है, तो भीतर के “यातुधान” नष्ट होते हैं। ---

निष्कर्ष

यह मंत्र संरक्षण और शुद्धि दोनों का मंत्र है। भव और शर्व केवल रक्षक ही नहीं, दुष्टता के मूल का विनाश करने वाले भी हैं। ---

English Insight

O fierce Lords, strike with your thunderbolt the one who performs harmful acts and destroys at the root. Rulers of all beings, free us from distress.

भूमिका

यह मंत्र सूक्त का समापन है। ऋषि भव और शर्व से प्रार्थना करते हैं — हे युद्धों में उग्र देवों! हमारे पक्ष में बोलें, वज्र से उस दुष्ट (किमीदी – हानिकारक शक्ति) का संहार करें। मैं आपका आश्रय लेकर स्तुति करता हूँ — आप हमें संकट से मुक्त करें। ---

शब्दार्थ

- अधि = हमारे पक्ष में - नः = हमारे लिए - ब्रूतम् = कहें, समर्थन करें - पृतनासु = युद्धों में - उग्रौ = प्रचंड शक्तिशाली - सं सृजतम् = प्रक्षेप करें, छोड़ें - वज्रेण = वज्र से - यः किमीदी = जो हानिकारक/रोगकारी शक्ति है - स्तौमि = मैं स्तुति करता हूँ - भव-शर्वौ = भव और शर्व - नाथितः = आश्रय लेकर - जोहवीमि = पुकारता हूँ - तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे हमें पाप/कष्ट से मुक्त करें ---

सरल अर्थ

हे भव और शर्व! युद्धों में उग्र देवों, हमारे पक्ष में बोलें। अपने वज्र से उस दुष्ट शक्ति का नाश करें। मैं आपका आश्रय लेकर आपको पुकारता हूँ — हमें संकट से मुक्त करें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ पृतना = जीवन का संघर्ष ✔ किमीदी = सूक्ष्म नकारात्मक शक्ति / रोग / भय ✔ वज्र = अडिग आत्मबल यह मंत्र भीतर के भय, संशय और दुर्बलता पर दैवी संकल्प का प्रहार है। ---

दार्शनिक संकेत

- जीवन स्वयं एक युद्धभूमि है। - रक्षा केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी है। - दैवी समर्थन = धर्म का साथ। ---

योगिक व्याख्या

✔ वज्र = प्राण की दृढ़ता ✔ किमीदी = मन का विकार ✔ नाथितः = ईश्वर में पूर्ण शरणागति जब साधक पूर्ण समर्पण करता है, तो भीतर की नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट होती हैं। ---

समग्र निष्कर्ष (4.28 सूक्त सार)

यह पूरा सूक्त भव और शर्व — सृजन और संहार की संयुक्त शक्ति — की स्तुति है। ✔ वे सर्वव्यापक हैं ✔ वे सर्वदर्शी हैं ✔ वे न्यायकारी हैं ✔ वे रक्षक और शुद्धिकर्ता हैं सूक्त का मुख्य भाव: **दैवी शक्ति ही जीवन के संघर्षों में अंतिम आश्रय है।** ---

English Insight

O fierce Bhava and Sharva, stand for us in battle. Strike down harmful forces with your thunderbolt. Taking refuge in you, I invoke your grace— free us from distress.

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