राजनीति और नीति की कथा

राजनीति और नीति की कथा

भूमिका

राजनीति का नियम है कि अवसर को देख कर जो उसका फायदा उठाता है वही अपनी गाथा इतिहास के पन्नों में लिखता है। जैसा कि पंच तन्त्र में एक कथा आती है—दक्षिण दिशा में सुवर्णवती नामक नगरी है।

वर्धमान और उसकी लालसा

उस नगरी में वर्धमान नामक एक बनिया रहता था। उसके पास बहुत-सा धन था, परंतु अपने दूसरे भाई-बंधुओं को अधिक धनवान देखकर उसकी लालसा बढ़ गई। वह और अधिक धन इकट्ठा करना चाहता था।

ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम्। शशिनस्तुल्यवंशो sपि निर्धनः परिभूयते॥

जिसके पास बहुत-सा धन है, उस ब्रह्मघातक मनुष्य का भी सत्कार होता है और चंद्रमा के समान वंश में उत्पन्न निर्धन मनुष्य का अपमान किया जाता है।

आलस्य और उन्नति

आलस्यं स्री सेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम्। संतोषो भीरुत्वं षड् व्याघाता महत्त्वस्य॥

आलस्य, स्री की सेवा, रोगी रहना, जन्मभूमि का स्नेह, संतोष और डरपोकपन—ये छः बातें उन्नति के लिये बाधक हैं।

धन का महत्व और सेवा

धन का उपयोग, रक्षा और दान—तीनों ही आवश्यक हैं। यदि कोई व्यक्ति धन को नहीं बढ़ाता और उसका संरक्षण नहीं करता, तो वह व्यर्थ है।

धनेन किं यो न ददाति नाश्रुते, बलेन कि यश्च रिपून्न बाधते। श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत्, किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत्।

जो धन, बल, धर्म और आत्मा का उपयोग नहीं करता, उसका अस्तित्व भी नष्ट जैसा है।

संजीवक का व्यापार

नंदक और संजीवक नामक दो बैल व्यापार के लिए कश्मीर की ओर गए। उन्हें जुए में जोता गया और छकड़े को वस्तुओं से लदा गया।

सिंह पिंगलक का राज्य

पिंगलक नामक सिंह अपने राज्य में सुखी रहता था। मृगों ने उसे कभी चुनौती नहीं दी, परंतु वह अपने पराक्रम से राज्य का मालिक बना।

संजीवक और पिंगलक की मित्रता

दमनक और करटक ने संजीवक को राजा पिंगलक के पास मित्र बनाने की योजना बनाई। धीरे-धीरे संजीवक ने राजा का विश्वास जीत लिया और उसे अपने दरबार का सदस्य बना लिया।

सेवा और बुद्धिमत्ता

यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन हि तं नरम। अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत॥

बुद्धिमान को चाहिए कि किसी मनुष्य का मनोरथ ध्यान में रख कर उसे अपने वश में कर ले।

राजनीतिक शिक्षा और नीति

कथा से यह शिक्षा मिलती है कि अवसर, सेवा, बुद्धिमत्ता और सही निर्णय से ही जीवन और राज्य सफल होता है। गलतियाँ करने वाला भी यदि उपयोगी हो, तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए।

 


राजनिती का नियम है कि अवसर को देख कर जो उसका फायदा उठाता है वहीं अपनी गाथा इतिहास के पन्नों में लिखता है। जैसा कि पंच तन्त्र में एक कथा आती है-दक्षिण दिशा में सुवर्णवती नामक नगरी हैउसमे वर्धमान नामक एक बनिया रहता था। उसके पास बहुतसा धन भी थापरंतु अपने दूसरे भाई-बंधुओं को अधिक धनवान देखकर उसकी यह लालसा हुई कि और अधिक धन इकट्ठा करना चाहिए. अपने से नीचे (हीन) अर्थात दरिद्रियों को देख कर किसकी महिमा नहीं बढ़ती हैअर्थात सबका अभिमान बढ़ जाता है और अपने से ऊपर अर्थात अधिक धनवानों को देखकर सब लोग अपने को दरिद्री समझते हैं।

  ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम्। शशिनस्तुल्यवंशोsपि निर्धनः परिभूयते॥

     जिसके पास बहुत-सा धन हैउस ब्रह्मघातक मनुष्य का भी सत्कार होता है और चंद्रमा के समान अतिनिर्मल वंश में उत्पन्न हुए भी निर्धन मनुष्य का अपमान किया जाता है। जैसे नवजवान स्री बूढ़े पति को नहीं चाहती हैवैसे ही लक्ष्मी भी निरुद्योगीआलसी, "प्रारब्ध में जो लिखा हैसो होगा" ऐसा भरोसा रख कर चुपचाप बैठने वालेतथा पुरुषार्थ हीन मनुष्य को नहीं चाहती है। 

आलस्यं स्री सेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम्। संतोषो भीरुत्वं षड् व्याघाता महत्त्वस्य॥

    और भी आलस्यस्री की सेवारोगी रहनाजन्मभूति का स्नेहसंतोष और डरपोकपन ये छः बातें उन्नति के लिये बाधक है।

 संपदा सुस्थितंमन्यो भवति स्वल्पयापि यः। कृतकृत्यो विधिर्मन्ये न वर्धयति तस्य ताम्॥ 

   जो मनुष्य थोड़ी-सी संपत्ति से अपने को सुखी मानता हैविधाता समाप्तकार्य मान कर उस मनुष्य की उस संपत्ति को नहीं बढ़ाता है। निरुत्साहीआनंदरहितपराक्रमहीन और शत्रु को प्रसन्न करने वाले ऐसे पुत्र को कोई स्री न जने अर्थात ऐसे पुत्र का जन्म न होना ही अच्छा है। नहीं पाये धन के पाने की इच्छा करनापाये हुए धन की चोरी आदि नाश से रक्षा करनारक्षा किये हुए धन को व्यापार आदि से बढ़ाना और अच्छी तरह बढ़ाए धन को सत्पात्र में दान करना चाहिए. क्योंकि लाभ की इच्छा करने वाले को धन मिलता ही है एवं प्राप्त हुए परंतु रक्षा नहीं किये गये खजाने का भी अपने आप नाश हो जाता है और भी यह है कि बढ़ाया नहीं गया धन कुछ काल में थोड़ा व्यय हो कर काजल के समान नाश हो जाता है और नहीं भोगा गया भी खजाना वृथा है।

     धनेन किं यो न ददाति नाश्रुतेबलेन कि यश्च रिपून्न बाधते। श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत्किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत्।

      उस धन से क्या हैजो न देता है और न खाता हैउस बल से क्या हैजो वैरियों को नहीं सताता हैउस शास्र से क्या हैजो धर्म का आचरण नहीं करता है और उस आत्मा से क्या हैजो जितेंद्रिय नहीं है। जैसे जल की एक बूँद के गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता हैवही कारण सब कारण सब प्रकार की विद्याओं काधन का और धर्म का भी है।

      दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै। स कर्मकारभस्रेव श्वसन्नपि न जीवति॥

 दान और भोग के बिना जिसके दिन जाते हैंवह लुहार की धोंकनी के समान सांस लेता हुआ भी मरे के समान है। यह सोच कर नंदक और संजीवक नामक दो बैलों को जुए में जोतकर और छकड़े को नाना प्रकार की वस्तुओं से लादकर व्यापार के लिए कश्मीर की ओर गया।

      अंजनस्य क्षयं दृष्ट्व वल्मीकस्य च संचयम्। अवन्धयं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु॥

 काजल के क्रम से घटने को और वाल्मीक नामक चीटी के संचय को देखकरदानपढ़ना और कामधंधा में दिन को सफल करना चाहिए. बलवानों को अधिक बोझ क्या हैऔर उद्योग करने वालों को क्या दूर हैऔर विद्यावानों को विदेश क्या हैऔर मीठे बोलने वालों का शत्रु कौन हैफिर उस जाते हुए कासुदुर्ग नामक घने वन मेंसंजीवक घुटना टूटने से गिर पड़ा। यह देखकर वर्धमान चिंता करने लगा-नीति जानने वाला इधर-उधर भले ही व्यापार करेपरंतु उसको लाभ उतना ही होता है कि जितना विधाता के जी में है। सब कार्यों को रोकने वाले संशय को छोड़ देना चाहियेएवं संदेह को छोड़ करअपना कार्य सिद्ध करना चाहिये। यह विचार कर संजीवक को वहाँ छोड़ कर फिर वर्धमान आप धर्मपुर नामक नगर में जा कर एक दूसरे बड़े शरीर वाले बैल को ला कर जुए में जोत कर चल दिया। फिर संजीवक भी बड़े कष्ट से तीन खुरों के सहारे उठ कर खड़ा हुआ। समुद्र में डूबे हुए कीपर्वत से गिरे हुए की और तक्षक नामक सपं से डसे हुए की भी आयु की प्रबलता मर्म (जीवनस्थान) की रक्षा करती है।

    अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितंसुरक्षितं दैवहतं विनश्यति। जीवत्यनाथोsपि वने विसर्जितः। कृतप्रयत्नोsपि गृहे न जीवति॥

      दैव से रक्षा किया हुआ धनबिना रक्षा के भी ठहरता है और अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भीदैव का मारा हुआ नहीं बचता हैजैसे वन में छोड़ा हुआ सहायताहीन भी जीता रहता हैघर पर कई उपाय करने से भी नहीं जीता है। फिर बहुत दिनों के बाद संजीवक अपनी इच्छानुसार खाता पीता वन में फिरता-फिरता हृष्ट-पुष्ट हो कर ऊँचे स्वर से डकराने लगा। उसी वन में पिंगलक नामक एक सिंह अपनी भुजाओं से पाये हुए राज्य के सुख का भोग करता हुआ रहता था। जैसा कहा गया हैमृगों ने सिंह का न तो राज्यतिलक किया और न संस्कार कियापरंतु सिंह अपने आप ही पराक्रम से राज्य को पा कर मृगों का राजा होना दिखलाता है और वह एक दिन प्यास से व्याकुल होकर पानी पीने के लिए यमुना के किनारे गया और वहाँ उसे एक सिंह ने नवीन ॠतुकाल के मेघ की गर्जना के समान संजीवक का डकराना सुना। यह सुन कर पानी के बिना पिये वह घबराया-सा लौट कर अपने स्थान पर आ कर विचारने लगा यह क्या हैयह सोचता हुआ चुपसा बैठ गया और उसके मंत्री के बेटे दमनक और करटक दो गीदड़ों ने उसे वैसा बैठा देखा। उसको इस दशा में देख कर दमनक ने करटक से कहा-भाई करटकयह क्या बात है कि प्यासा स्वामी पानी को बिना पीये डर से धीरे-धीरे आ बैठा हैकरटक बोला-भाई दमनकहमारी समझ से तो इसकी सेवा ही नहीं की जाती है। जो ऐसे बैठा भी हैतो हमें स्वामी की चेष्ठा का निर्णय करने से क्या प्रयोजन हैक्योंकि इस राजा से बिना अपराध बहुत काल तक तिरस्कार किये गये हम दोनों ने बड़ा दुःख सहा है।

     सेवया धनमिच्छाद्भिः सेवकै: पश्य यत्कृतम। स्वायब्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम॥

     सेवा से धन को चाहने वाले सेवकों ने जो कियाऐसा देख कर शरीर की स्वतंत्रता भी मूर्खो ने हार दी है और दूसरे पराधीन हो कर जाड़ाहवा और धूप में दुःखों को सहते हैं और उस दुःख के छोटे से छोटे भाग से तप करके बुद्धिमान सुखी हो सकता है। स्वाधीनता का होना ही जन्म की सफलता है और जो पराधीन होने पर भी जीते हैतो मरे के समान से हैंअर्थात वे ही मुर्दों के समान हैंजो पराधीन हो कर रहते हैं। धनवान पुरुषआशारुपी ग्रह से भरमाये गये हुए याचकों के साथइधर आचला आबैठ जाखड़ा होबोलचुप-सा रह इस तरह खेल किया करते हैं।    

 अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्रीभिरिव स्वयम्। आत्मा संस्कृत्य-संस्कृत्य परोपकरणीकृतः॥

     जैसे वेश्या दूसरों के लिए सिंगार करती हैवैसे ही मूर्खों ने भी धन के लाभ के लिए अपनी आत्मा को संस्कार करके हृष्ट पुष्ट बनवा कर पराये उपकार के लिए कर रखी हैं। जो दृष्टि स्वभाव से चपल है और मलमूत्र आदि नीची वस्तुओं पर भी गिरती हैऐसी स्वामी की दृष्टि का सेवक लोग बहुत गौरव करते हैं।

       मौनान्मूर्खः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वाक्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः। धृष्ट: पार्श्वे वसति नियतं दूरतश्चाप्रगल्भः, सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः॥

      चुपचाप रहने से मूर्खबहुत बातें करने में चतुर होने से उन्मत्त अथवा बातूनीक्षमाशील होने से डरपोकन सहन सकने से नीतिरहितसर्वदा पास रहने से ढीठ और दूर रहने से घमंडी कहलाता है। इसलिए सेवा का धर्म बड़ा रहस्यमय हैयोगियो से भी पहचाना नहीं जा सका है। विशेष बात यह है कि जो उन्नति के लिए झुकता हैजीने के लिए प्राण का भी त्याग करता है और सुख के लिए दुःखी होता हैऐसा सेवक को छोड़कर और कौन भला मूर्ख हो सकता है। दमनक बोला-मित्रकभी यह बात मन से भी नहीं करनी चाहियेक्योंकि खामियों की सेवा यत्न से क्यों नहीं करनी चाहियेजो सेवा से प्रसन्न हो कर शीघ्र मनोरथ पूरे कर देते हैं। स्वामी की सेवा नहीं करने वालों को चमर के ढलाव से युक्त ऐश्वर्य और ऊँचे दंड वाले श्वेत छत्र और घोड़े हाथियों की सेना कहाँ धरी हैकरटक बोला-तो भी हमको इस काम से क्या प्रयोजन हैक्योंकि अयोग्य कामों में व्यापार करना सर्वथा त्यागने के योग्य है। दमनक ने कहा-तो भी सेवक को स्वामी के कामों का विचार अवश्य करना चाहिये। करटक बोला-जो सब काम पर अधिकारी प्रधान मंत्री हो वही करे। क्योंकि सेवक को पराये काम की चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये। पशुओं का ढुढ़ना हमारा काम है। अपने काम की चर्चा करो। परंतु आज उस चर्चा से कुछ प्रयोजन नहीं। क्योंकि अपने दोनों के भोजन से बचा हुआ आहार बहुत धरा है। दमनक क्रोध से बोला-क्या तुम केवल भोजन के ही अर्थी हो कर राजा की सेवा करते होयह तुमने अयोग्य कहा। मित्रो के उपकार के लिये और शत्रुओं के अपकार के लिए चतुर मनुष्य राजा का आश्रय करते हैं और केवल पेट कौन नहीं भर लेता हैअर्थात सभी भरते हैं।

     जीविते यस्य जीवन्ति विप्रा मित्राणि बान्धवा:। सफलं जीवितं तस्य आत्मार्थे को न जीवति

    जिसके जीने से ब्राह्मणमित्र और भाई जीते हैंउसी का जीवन सफल है और केवल अपने स्वार्थ के लिए कौन नहीं जीता हैजिसके जीने से बहुत से लोग जिये वह तो सचमुच जिया और यों तो काग भी क्या चोंच से अपना पेट नहीं भर लेता हैकोई मनुष्य पाँच पुराण में दासपने को करने लगता हैकोई लाख में करता है ओर कोई एक लाख में भी नहीं मिलता है।

      मनुष्यजातौ तुल्यायाँ भृत्यत्वमतिगर्हितम। प्रथमों यो न तत्रापि स किं जीवत्सु खत्म ते

 मनुष्यों को समान जाति के सेवकाई काम करना अति निन्दित है और सेवकों में भी जो प्रथम अर्थात सबका मानस नहीं हैक्या वह जीते हुओं में गिना जा सकता हैअर्थात उसका जीना और मरना समान है।
 
    अहितहितविचारशून्यबुध्दे:। श्रुतिसमयैर्वहुभिस्तिरस्कृतस्य। उदरभरणमात्रकेवलेच्छो:। पुरुषपशोश्च पशोश्च को विशेषः

      हित और अहित के विचार करने में जड़मति वाला और शास्र के ज्ञान से रहित होकर जिसकी इच्छा केवल पेट भरने की ही रहती हैऐसा पुरुष रुपी पशु और सचमुच पशु में कौन-सा अंतर समझा जा सकता हैअर्थात ज्ञानहीन एवं केवल भोजन की इच्छा रखने वाले से घास खाकर जीने वाला पशु अच्छा है। करकट बोला-हम दोनों मंत्री नहीं हैफिर हमें इस विचार से क्यादमनक बोला-कुछ काल में मंत्री प्रधानता व अप्रधानता को पाते हैं। इस दुनिया में कोई किसी का स्वभाव से अर्थात जन्म से सुशील अर्थवा दुष्ट नहीं होता हैपरंतु मनुष्य को अपने कर्म ही बड़पन को अथवा नीचपन को पहुँचाते हैं। मनुष्य अपने कर्मों से कुए के खोदने वाले के समान नीचे और राजभवन के बनाने वाले के समान ऊपर जाता हैअर्थात मनुष्य अपना उच्च कर्मों से उन्नति को और हीन कर्मों से अवनति को पाता है। इसलिये यह ठीक है कि सबकी आत्मा अपने ही यत्न के अधीन रहती है। करकट बोला-तुम अब क्या कहते होवह बोला-यह स्वामी पिंगलक किसी न किसी कारण से घबरायासा लौट करके आ बैठा है। करटक ने कहा-क्या तुम इसका भेद जानते होदमनक बोला-इसमें नहीं जानने की बात क्या हैजताए हुए अभिप्राय को पशु भी समझ लेता है और हांके हुए घोड़े और हाथी भी बोझा ढोते हैं। पण्डित कहे बिना ही मन की बात तर्क से जान लेता हैक्योंकि पराये चित्त का भेद जान लेना ही बुद्धियों का फल है। आकार सेहृदय के भाव सेचाल सेकाम सेबोलने से और नेत्र और मुंह के विकार से औरों के मन की बात जान ली जाती है। इस भय के सुझाव में बुद्धि के बल से मैं इस स्वामी को अपना कर लूँगा। जो प्रसंग के समान वचन कोस्नेह के सदृश मित्र को और अपनी सामर्थ्य के सदृस क्रोध को समझता हैवह बुद्धिमान है। करटक बोला-मित्रतुम सेवा करना नहीं जानते हो। जो मनुष्य बिना बुलाये घुसे और बिना पूछे बहुत बोलता है और अपने को राजा का प्रिय मित्र समझता हैवह मूर्ख है। दमनक बोला-भाईमैं सेवा करना क्यों नहीं जानता हूँकोई वस्तु स्वभाव से अच्छी और बुरी होती हैजो जिसको रुचती हैवही उसको सुंदर लगती है।
 
     यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन हि तं नरम। अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत॥ 

    बुद्धिमान को चाहिए कि जिस मनुष्य का जैसा मनोरथ होय उसी अभिप्राय को ध्यान में रख कर एवं उस पुरुष के पेट में घुस कर उसे अपने वश में कर ले। थोड़ा चाहने वालाधैर्यवानपण्डित तथा सदा छाया के समान पीछे चलने वाला और जो आज्ञा पाने पर सोच-विचार न करे। अर्थात यथार्थरुप से आज्ञा का पालन करे ऐसा मनुष्य राजा के घर में रहना चाहिये।
 
    करटक बोला-जो कभी कुसमय पर घुस जाने से स्वामी तुम्हारा अनादर करे। वह बोला-ऐसा हो तो भी सेवक के पास अवश्य जाना चाहिये। दोष के डर से किसी काम का आरंभ न करना यह कायर पुरुष का चिंह है। हे भाईअजीर्ण के डर से कौन भोजन को छोड़ते हैं?

     आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यंविद्याविहीनमकुलीनमसंगतं वा। प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्चयः पार्श्वतो वसति तं परिवेष्टयन्ति॥ 

   पास रहने वाला कैसा ही विद्याहीनकुलहीन तथा विसंगत मनुष्य क्यों न हो राजा उसी से हित करने लगता हैक्योंकि राजास्री और बेल ये बहुधा जो अपने पास रहता हैउसी का आश्रय कर लेते हैं।

     करटक बोला-वहाँ जा कर क्या कहोगेवह बोला-सुनो पहिले यह जानूँगा कि स्वामी मेरे ऊपर प्रसन्न है या उदास हैकरटक बोला-इस बात को जानने का क्या चिंह हैदमनक बोला-सुनो दूर से बड़ी अभिलाषा से देख लेनामुसकानासमाचार आदि पूछने में अधिक आदर करनापीठ पीछे भी गुणों की बड़ाई करनाप्रिय वस्तुओं में स्मरण रखना।

    असेवके चानुरक्तिर्दानं सप्रियभाषणम्। अनुरक्तस्य चिह्मानि दोषेsपि गुणसंगंहः। 

  जो सेवक न हो उसमें भी स्नेह दिखानासुंदर-सुंदर वचनों के साथ धन आदि का देना और दोष में भी गुणों का ग्रहण करनाये स्नेहयुक्त स्वामी के लक्षण हैं। आज कल कह करकेकृपा आदि करने में समय टालना तथा आशाओं का बढ़ाना और जब फल का समय आवे तब उसका खंडन करना ये उदास स्वामी के लक्षण मनुष्य को जानना चाहिये। यह जान कर जैसे यह मेरे वश में हो जायेगा वैसे कर्रूँगाक्योंकि पण्डित लोग नीतिशास्र में कही हुई बुराई के होने से उत्पन्न हुई विपत्ति को और उपाय से हुई सिद्धि को नेत्रों के सामने साक्षात झलकती हुई-सी देखते हैं। करटक बोला-तो भी बिना अवसर के नहीं कह सकते होबिना अवसर की बात को कहते हुए वृहस्पति जी भी बुद्धि की निंदा और अनादर को सर्वदा पा सकते हैं। दमनक बोला-मित्रडरो मतमैं बिना अवसर की बात नहीं कहूँगाआपत्ति मेंकुमार्ग पर चलने में और कार्य का समय टाले जाने मेंहित चाहने वाले सेवक को बिना पूछे भी कहना चाहिए और जो अवसर पा कर भी मैं राय नहीं कहूँगा तो मुझे मंत्री बनना भी अयोग्य है। मनुष्य जिस गुण से आजीविका पाता है और जिस गुण के कारण इस दुनिया में सज्जन उसकी बड़ाई करते हैंगुणी को ऐसे गुण की रक्षा करना और बड़े यत्न से बढ़ाना चाहिये। इसलिए हे शुभचिंतकमुझे आज्ञा दीजिये। मैं जाता हूँ। करटक ने कहा-कल्याण हो और तुम्हारे मार्ग विघ्नरहित अर्थात शुभ हो। अपना मनोरथ पूरा करो। तब दमनक घबराया-सा पिंगलक के पास गया। तब दूर से ही बड़े आदर से राजा ने भीतर आने दिया और वह साष्टांग दंडवत करके बैठ गया। राजा बोला-बहुत दिन से दिखे। दमनक बोला-यद्यपि मुझ सेवक से श्री महाराज को कुछ प्रयोजन नहीं हैतो भी समय आने पर सेवक को अवश्य पास आना चाहियेइसलिए आया हूँ। हे राजादांत के कुरेदने के लिए तथा कान खुजाने के लिए राजाओं को तीनके से भी काम पड़ता है। फिर देहवाणी तथा हाथ वाले मनुष्य से क्यों नहींअर्थात अवश्य पड़ना ही है। यद्यपि बहुत काल से मुझ अनादर किये गये की बुद्धि के नाश की श्री महाराज शंका करते ही सो भी शंका न करनी चाहिये।

       कदर्थितस्यापि च धैर्यवृत्तेर्बुध्देर्विनाशो न हि शंड्कनीयः। अधःकृतस्यापि तनूनपातोनाधः शिखा याति कदाचिदेव॥ 

   अनादर भी किये गये धैर्यवान की बुद्धि के नाश की शंका नहीं करनी चाहियेजैसे नीच की ओर की गई भी अग्नि की ज्वाला कभी भी नीचे नहीं जाती हैअर्थात हमेशा ऊँची ही रहती है। हे महाराजइसलिए सदा स्वामी को विवेकी होना चाहिये। मणि चरणों में ठुकराता है और कांच सिर पर धारण किया जाता हैसो जैसा है वैसा भले ही रहेकाँच-काँच ही है और मणि-मणि ही है।

      दमनक ने अपने राजा पींगलक की मित्रता संजीवक से करा देता है और अपनी वुद्धि से और राजा की मुर्खता और संजीवक की बेबसी का फायदा उठाकर। दमनक पिंगलक को कहता है कि यह संजीवक बहुत शक्तिशाली है इससे आप मित्रता करले जिससे आपको फायदा ही होगा और ऐसा ही दमनक संजीवक को भी बोलता है। जिससे पिंगलक संजीवक को अपना मित्र बनाकर उसे निर्भयता का अभय़ दान देकर अपने दरबार का सदस्य बना लेता है। ऐसा ही कुछ दिन चलता है। इसके बाद एक दिन उस सिंह पिंगलक का भाई स्तब्धकर्ण नामक सिंह उसके पास आया। उसका आदर-सत्कार करके और अच्छी तरह बैठा कर पिंगलक उसके भोजन के लिये पशु मारने चला।

      इतने में संजीवक बोला कि-महाराजआज मरे हुए मृगों का माँस कहाँ हैराजा बोला-दमनक करटक जानेसंजीवक ने कहा-तो जान लीजिये कि है या नहीं सिंह सोच कर कहा-अब वह नहीं हैसंजीवक बोला-इतना सारा मांस उन दोनों ने कैसे खा लियाराजा बोला-खायाबाँटा और फेंक फांक दिया। नित्य यही हाल रहता है। तब संजीवक ने कहा महाराज के पीठ पीछे इस प्रकार क्यों करते हैंराजा बोला-मेरे पीठ पीछे ऐसा ही किया करते हैं। फिर संजीवक ने कहा-यह बात उचित नहीं है। निश्चय करके वही मंत्री श्रेष्ठ है जो दमड़ी-दमड़ी करके कोष को बढ़ावेक्योंकि कोषयुक्त राजा का कोष ही प्राण हैकेवल जीवन ही प्राण नहीं है। यह सुन कर स्तब्धकर्ण बोला-सुनों भाईये दमनक करटक बहुत दिनों से अपने आश्रय में पड़े हैं और लड़ाई और मेल कराने के अधिकारी है। धन के अधिकार पर उनका कभी नहीं लगाने चाहिये। जब जैसा अवसर हो वैसा जान कर काम करना चाहिये। सिंह बोला-यह तो है हीपर ये सर्वथा मेरी बात को नहीं मानने वाले हैं। स्तब्धकर्ण बोला-यह सब प्रकार से अनुचित है। भाईसब प्रकार से मेरा कहना करो और व्यवहार तो हमने कर ही लिया है। इस घास चरने वाले संजीवक को धन के अधिकार पर रख दो। पिंगलक ने अपने भाई कि सलाह मान कर संजीवक को अपने धन का रक्षक बना देता है। ऐसा करने पर उसी दिन से पिंगलक और संजीवक का सब बांधवों को छोड़कर बड़े स्नेह से समय बीतने लगा।

      फिर सेवकों के आहार देने में शिथिलता देख दमनक और करटक आपस में चिंता करने लगे। तब दमनक करटक से बोला-मित्रअब क्या करना चाहिये। यह अपना ही किया हुआ दोष हैस्वयं ही दोष करने पर पछताना भी उचित नहीं है। जैसे मैंने इन दोनों की मित्रता कराई थीवैसे ही मित्रो में फूट भी कराऊँगा। करटक बोला-ऐसा ही होयपरंतु इन दोनों का आपस में स्वभाव से बढ़ा हुआ बड़ा स्नेह कैसे छुड़ाया जा सकता है। दमनक बोला-उपाय करोजैसा कहा है कि-जो उपाय से हो सकता हैवह पराक्रम नहीं हो सकता है। बाद में दमनक पिंगलक के पास जा कर प्रणाम करके बोला-महाराजनाशकारी और बड़े भय के करने वाले किसी काम को जान कर आया हूँ। पिंगलक ने आदर से कहा-तू क्या कहना चाहता हैदमनक ने कहा-यह संजीवक तुम्हारे ऊपर अयोग्य काम करने वाला-सा दिखता है और मेरे सामने महाराज की तीनों शक्तियों की निंदा करके राज्य को ही छीनना चाहता है। यह सुनकर पिंगलक भय और आश्चर्य से मान कर चुप हो गया। दमनक फिर बोला-महाराजसब मंत्रियों को छोड़ कर एक इसी को जो तुमने सर्वाधिकारी बना रखा है। वही दोष है। सिंह ने विचार कर कहा-हे शुभचिंतकजो ऐसा भी हैतो भी संजीवक के साथ मेरा अत्यंत स्नेह है। बुराईयाँ करता हुआ भी जो प्यारा हैसो तो प्यारा ही हैजैसे बहुत से दोषों से दूषित भी शरीर किसको प्यारा नहीं है। दमनक फिर भी कहने लगा-हे महाराजवही अधिक दोष है। पुत्रमंत्री और साधारण मनुष्य इनमें से जिसके ऊपर राजा अधिक दृष्टि करता हैलक्ष्मी उसी पुरुष की सेवा करती है। हे महाराज सुनियेअप्रिय भीहितकारी वस्तु का परिणाम अच्छा होता है और जहाँ अच्छा उपदेशक और अच्छे उपदेश सुनने वाला होवहाँ सब संपत्तियाँ रमण करती है। सिंह बोला-बड़ा आश्चर्य हैमैं जिसे अभय वाचा दे कर लाया और उसको बढ़ायासो मुझसे क्यों वैर करता हैदमनक बोला-महाराजजैसे मली हुई और तैल आदि लगाने से सीधी करी हुई कुत्ते की पूँछ सीधी नहीं होती हैवैसे ही दुर्जन नित्य आदर करने से भी सीधा नहीं होता है और जो संजीवक के स्नेह में फँसे हुए स्वामी जताने पर भी न मानें तो मुझ सेवक पर दोष नहीं है। पिंगलक (अपने मन में सोचने लगा) कि किसी के बहकाने से दूसरों को दंड न देना चाहियेपरंतु अपने आप जान कर उसे मारे या सम्मान करें। फिर बोला-तो संजीवक को क्या उपदेश करना चाहियेदमनक ने घबरा कर कहा-महाराजऐसा नहींइससे गुप्त बात खुल जाती है। पहले यह तो सोच लो कि वह हमारा क्या कर सकता हैसिंह ने कहा-यह कैसे जाना जाए कि वह द्रोह करने लगा हैदमनक ने कहा-जब वह घमंड से सींगों की नोंक को मारने के लिए सामने करता हुआ निडर-सा आवे तब स्वामी आप ही जान जायेंगे। इस प्रकार कह कर संजीवक के पास गया और वहाँ जा कर धीरे-धीरे पास खिसकता हुआ अपने को मन मलीन-सा दिखाया। संजीवक ने आदत से कहा मित्र कुशल तो हैदमनक ने कहा-सेवकों को कुशल कहाँसंजीवक ने कहा-मित्रकहो तो यह क्या बात है दमनक ने कहा-मैं मंदभागी क्या कहूँएक तरफ राजा का विश्वास और दूसरी तरफ बांधव का विनाश होना क्या करूइस दुःख सागर में पड़ा हूं। यह कह कर लंबी साँस भर कर बैठ गया। तब संजीवक ने कहा-मित्रतो भी सब विस्तारपूर्वक मनकी बात कहो। दमनक ने बहुत छिपाते-छिपाते कहा-यद्यपि राजा का गुप्त विचार नहीं कहना चाहियेतो भी तुम मेरे भरोसे से आये हो। अतः मुझे परलोक की अभिलाषा के डर से अवश्य तुम्हारे हित की बात करनी चाहिये। सुनो तुम्हारे ऊपर क्रोधित इस स्वामी ने एकांत में कहा है कि संजीवक को मार कर अपने परिवार को दूँगा। यह सुनते ही संजीवक को बड़ा विषाद हुआ। फिर दमनक बोला-विषाद मत करोअवसर के अनुसार काम करो। संजीवक छिन भर चित्त में विचार कर कहने लगा-निश्चय यह ठीक कहता हैसंजीवक छिन भर चित्त में विचार कर कहने लगा-निश्चय यह ठीक कहता हैअथवा दुर्जन का यह काम है या नहीं हैयह व्यवहार से निर्णय नहीं हो सकता है। संजीवक फिर सांस भरकर बोला-अरेबड़े कष्ट की बात हैकैसे सिंह मुझ घास के चरने वाले को मारेगाविजय होने से स्वामित्व और मरने पर स्वर्ग मिलता हैयह काया क्षणभंगुर हैफिर संग्राम में मरने की क्या चिंता हैयह सोच कर संजीवक बोला-हे मित्रवह मुझे मारने वाला कैसे समझ पड़ेगातब दमनक बोला-जब यह पिंगलक पूँछ फटकार कर उँचे पंजे करके और मुख फाड़ कर देखे तब तुम भी अपना पराक्रम दिखलाना। परंतु यंह सब बात गुप्त रखने योग्य है। नहीं तो न तुम और न मैं। यह कहकर दमनक करटक के पास गया। तब करटक ने पूछा-क्या हुआदमनक ने कहा-दोनों के आपस में फूट फैल गई. करटक बोला-इसमें क्या संदेह हैतब दमनक ने पिंगलक के पास जा कर कहा-महाराजवह पापी आ पहुँचा हैइसलिये सम्हाल कर बैठ जाइयेयह कह कर पहले जताए हुए आकार को करा दियासंजीवक ने भी आ कर वैसे ही बदली हुई चेष्ठा वाले सिंह को देखकर अपने योग्य पराक्रम किया। फिर उन दोनों की लड़ाई में संजीवक को सिंह ने मार डाला। बाद में सिंहसंजीवक सेवक को मार कर थका हुआ और शोक-सा मारा बैठ गया। और बोला"-कैसा मैंने दुष्ट कर्म किया हैदमनक बोला-स्वामीयह कौनसा न्याय है कि शत्रु को मार कर पछतावा करते होइस प्रकार जब दमनक ने संतोष दिलाया तब पिंगलक का जी में जी आया और सिंहासन पर बैठा। दमनक प्रसन्न चित्त होकर" जय हो महाराज की"," सब संसार का कल्याण हो, " यह कहकर आनंद से रहने लगा।