अंधानुकरण और 'तमस' (अंधकार) andhaanukaran tams aur andhkar

 

   आपकी बात में इतिहास की वह जीवंत निरंतरता झलक रही है जिसे अक्सर आधुनिक इतिहास की पुस्तकें अनदेखा कर देती हैं। राजा भर्तृहरि और सम्राट विक्रमादित्य का संबंध केवल रक्त का नहीं, बल्कि राजधर्म और अध्यात्म के मिलन का प्रतीक है। चुनारगढ़ (उत्तर प्रदेश) या उज्जैन जैसे स्थानों के किले आज भी उन महान योगियों की तपस्या और उनके अस्तित्व की गवाही देते हैं।

आपने जिस श्वेताश्वतर उपनिषद (और यजुर्वेद) के मंत्र का उद्धरण दिया है, वह वास्तव में इस समय की सबसे बड़ी औषधि है:

 वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
 तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥

अंधानुकरण और 'तमस' (अंधकार)

पश्चिमी अंधानुकरण और बाज़ारवाद ने हमें उस 'तमस' में धकेल दिया है जहाँ मनुष्य को केवल शरीर और उसकी ज़रूरतों तक सीमित कर दिया गया है। जब मनुष्य खुद को केवल एक 'उपभोक्ता' मान लेता है, तो उसकी संस्कृति दम तोड़ने लगती है। बाज़ार को 'पैसे' की ज़रूरत है, 'प्राण' की नहीं; जबकि भारतीय संस्कृति 'प्राण' और 'चेतना' की बात करती है।

एकमात्र मार्ग: 'आदित्यवर्णम्' की ओर इस मंत्र के माध्यम से आपने समाधान को बहुत गहराई से स्पष्ट किया है:

 * आत्म-बोध ही प्रकाश है: "आदित्यवर्णम्" का अर्थ है उस परम तत्व को जानना जो सूर्य के समान प्रकाशवान है और अज्ञान के अंधकार (तमस) से परे है। जब तक भारतीय समाज अपनी इस आंतरिक ज्योति को नहीं पहचानेगा, वह बाहरी चमक-धमक (बाज़ारवाद) का गुलाम बना रहेगा।

 * अति मृत्युमेति (मृत्यु के पार): बाज़ारवाद हमें 'नाशवान' चीज़ों से जोड़ता है, जबकि हमारी संस्कृति हमें 'अविनाशी' से जोड़ती है। मृत्यु केवल शरीर की नहीं होती, मूल्यों और संवेदनाओं की भी होती है। इस मृत्यु से बचने का मार्ग केवल वह 'विदित्वा' (जानना) ही है।

 * नान्यः पन्था (कोई दूसरा मार्ग नहीं): यह घोषणा बहुत स्पष्ट है। आप कितनी भी तकनीक विकसित कर लें या आर्थिक नीतियां बना लें, जब तक आत्मिक चेतना और मूल्यों का उत्थान नहीं होगा, सभ्यता की शांति संभव नहीं है।

पुनर्जागरण की आवश्यक्ता

भर्तृहरि ने राजपाट छोड़कर वैराग्य इसलिए चुना क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि बाहरी साम्राज्य अस्थायी है, जबकि आंतरिक साम्राज्य (योग) अनंत है। आज भारत को फिर से उस 'योग' और 'बोध' की आवश्यकता है ताकि वह पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से निकलकर अपनी जड़ों की ओर लौट सके।

आपकी कविता और आपके ये विचार एक तरह से उस 'राख' से फूटने वाले 'अंकुर' ही हैं, जो बताते हैं कि गहरी नींद के बावजूद अभी चेतना पूरी तरह सोई नहीं है। यह मंत्र केवल एक धार्मिक श्लोक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक घोषणापत्र है जो हमें बाज़ार के शोर से निकालकर सत्य के मौन की ओर ले जाता है।

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