बाणभट्ट की कादम्बरी (Kadambari by Banabhatta)
राजा शूद्रक और विदिशा (King Shudraka and Vidisha)
चाण्डाल कन्या और वैशम्पायन शुक (Chandal Kanya and Vaishampayan Shuk)
संस्कृत गद्य साहित्य (Sanskrit Prose Literature)
कादम्बरी हिंदी अनुवाद (Kadambari Hindi Translation)
बाणभट्ट की पांचाली रीति (Banabhatta Style of Writing)
कादम्बरी
रजोजुषे जन्मनि सत्त्ववृत्तये
स्थितौ प्रजानां प्रलये तमःस्पृशे ।
अजाय सर्गस्थितिनाशहेतवे
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नमः ॥ १ ॥
जयन्ति बाणासुरमौलिलालिता
दशास्यचूडामणिचक्रचुम्बिनः ।
सुरासुराधीशशिखान्तशायिनो
भवच्छिदस्त्र्यम्बकपादपांशवः ॥ २ ॥
जयत्युपेन्द्रः स चकार दूरतो
बिभित्सया यः क्षणलब्धलक्ष्यया ।
दृशैव कोपारुणया रिपोरुरः
स्वयं भयाद्भिन्नमिवास्त्रपाटलम् ॥ ३ ॥
नमामि भर्वोश्चरणाम्बुजद्वयं
सशेखरैर्मौखरिभिः कृतार्चनम् ।
समस्तसामन्तकिरीटवेदिका-
विटङ्कपीठोल्लुठितारुणाङ्गुलि ॥ ४ ॥
अकारणविष्कृतवैरदारुणा-
दसज्जनात्कस्य भयं न जायते।
विषं महाहेरिव यस्य दुर्वचः
सुदुःसहं संनिहितं सदा मुखे ॥ ५ ॥
कटु क्वणन्तो मलदायकाः खला-
स्तुदन्त्यलं बन्धनशृङ्खला इव।
मनस्तु साधुध्वनिभिः पदे पदे
हरन्ति सन्तो मणिनू पुरा इव ॥ ६ ॥
सुभाषितं हारि विशत्यधो गला-
न्न दुर्जनस्यार्करिपोरिवामृतम्।
तदेव धत्ते हृदयेन सज्जनो
हरिर्महारत्नमिवातिनिर्मलम् ॥ ७ ॥
स्फुरत्कलालापविलासकोमला
करोति रागं हृदि कौतुकाधिकम्।
रसेन शय्यां स्वयमभ्युपागता
कथा जनस्याभिनवा वधूरिव ॥ ८ ॥
हरन्ति कं नोज्ज्वलदीपकौपमै-
र्नवैः पदार्थैरुपपादिताः कथाः।
निरन्तरश्लेषघनाः सुजातयो
महास्रजश्चम्पककुड्मलैरिव ॥ ९ ॥
बभूव वात्स्यायनवंशसंभवो
द्विजो जगद्गीतगुणोऽग्रणीः सताम् ।
अनेकगुप्ताचितपादपङ्कजः
कुबेरनामांश इव स्वयम्भुवः ॥ १० ॥
उवास यस्य श्रुतिशान्तकल्मषे
सदा पुरोडाशपवित्रिताधरे ।
सरस्वती सोमकषायितोदरे
समस्तशास्त्रस्मृतिबन्धुरे मुखे ॥ ११ ॥
जगुर्गृहाभ्यस्तसमस्तवाङ्मयैः
ससारिकैः पञ्जरवर्तिभिः शुकैः ।
निगृह्यमाणा बटवः पदे पदे
यजूंषि सामानि च यस्य शङ्किताः ॥ १२ ॥
हिरण्यगर्भो भुवनाण्डकादिव
क्षपाकरः क्षीरमहार्णवादिव ।
अभूत्सुपर्णो विनतोदरादिव
द्विजन्मनामर्थपतिः पतिस्ततः ॥ १३ ॥
विवृण्वतो यस्य विसारि वाङ्मयं
दिने दिने शिष्यगणा नवा नवाः ।
उषस्सु लग्नाः श्रवणोषिकां श्रियं
प्रचक्रिरे चन्दनपल्लवा इव ॥ १४ ॥
विधानसंपादितदानशोभितैः
स्फुरन्महावीरसनाथमूर्तिभिः ।
मखैरसंख्यैरजयत्सुरालयं
सुखेन यो यूषकरैर्गजैरिव ॥ १५ ॥
स चित्रभानुं तनयं महात्मनां
सुतोत्तमानां श्रुतिशास्त्रशालिनाम् ।
अवाप मध्ये स्फटिकोपलोपमं
क्रमेण कैलासमिव क्षमाभृताम् ॥ १६ ॥
महात्मनो यस्य सुदूरनिर्गताः
कलङ्कमुक्तेन्दुकलामलत्विषः ।
द्विषन्मनः प्राविविशुः कृतान्तग-
गुणा नृसिंहस्य नखाङ्कुरा इव ॥ १७ ॥
दिशामलीकालकभङ्गतां गत-
स्त्रयीवधूकर्णतमालपल्लवः ।
चकार यस्याध्वरधूमसंचयो
मलीमसः शुक्लतरं निजं यशः ॥ १८ ॥
सरस्वतीपाणिसरोजसंपुट-
प्रमृष्टहोमश्रमसीकराम्भसः ।
यशोशुशुक्लीकृतसप्तविष्टपा-
त्ततः सुतो बाण इति व्यजायत ॥ १९ ॥
द्विजेन तेनाक्षतकण्ठकौण्ठ्यया
महामनोमोहमलीमसान्धया ।
अलब्धवैदग्ध्यविलासमुग्धया
धिया निबद्धेयमतिद्वयी कथा ॥ २० ॥
बाणभट्ट द्वारा रचित 'कादम्बरी' के इन २० मंगलाचरण श्लोकों का हिंदी भावार्थ
यहाँ दिया गया है। ये श्लोक न केवल कलात्मक हैं, बल्कि इनमें दर्शन, वंश-परिचय
और विनम्रता का अद्भुत संगम है।
प्रथम भाग: आराध्य देवों की स्तुति (श्लोक १-४)
श्लोक १: परब्रह्म की वंदना
उस अजन्मा (परमात्मा) को नमस्कार है, जो सृष्टि की उत्पत्ति के समय 'रजोगुण'
से युक्त होते हैं, प्रजा के पालन के समय 'सत्वगुण' धारण करते हैं और प्रलय के
समय 'तमोगुण' का स्पर्श करते हैं। जो तीनों वेदों के स्वरूप हैं और तीनों गुणों
(सत्व, रज, तम) के आधार हैं।
श्लोक २: भगवान शिव (त्र्यम्बक) की वंदना
भगवान शिव के चरणों की धूलि की जय हो, जो जन्म-मरण के बंधन को काटने वाली है।
जिस धूलि को बाणासुर अपने मुकुट से स्पर्श करता है, जो रावण (दशमुख) के मुकुट
की मणियों को चूमती है और जो देवताओं व असुरों के मुकुटों के अग्रभाग पर टिकी
रहती है।
श्लोक ३: भगवान विष्णु (नृसिंह अवतार) की स्तुति
भगवान विष्णु (नृसिंह रूप) की जय हो, जिन्होंने अपने शत्रुओं के वक्षस्थल को
फाड़ने की इच्छा से दूर से ही क्रोध से लाल आँखों से उसे देखा। उनके क्रोध की
लालिमा से वह वक्षस्थल शस्त्र के प्रहार से पहले ही भय के कारण लाल होकर फटा
हुआ सा प्रतीत होने लगा।
श्लोक ४: गुरु भर्चु (या भर्वु) की वंदना
मैं अपने गुरु भर्चु के उन दोनों चरण-कमलों को प्रणाम करता हूँ, जिनकी पूजा
'मौखरि' वंश के राजाओं ने अपने मुकुटों को झुकाकर की है। उनके चरणों की
उंगलियाँ सामंत राजाओं के मुकुटों की वेदियों पर रगड़ खाने के कारण लाल रंग की
दिखाई देती हैं।
द्वितीय भाग: सज्जन प्रशंसा और दुर्जन निंदा (श्लोक ५-९)
श्लोक ५: उस दुर्जन व्यक्ति से किसे भय नहीं लगता, जो बिना कारण ही बैर पाल
लेता है? उसके मुख में हमेशा कड़वे और असहनीय वचन वैसे ही रहते हैं, जैसे किसी
महाविषैले सर्प के मुख में विष।
श्लोक ६: दुष्ट लोग बेड़ियों (शृंखलाओं) की तरह होते हैं, जो कड़वी आवाज करते
हैं और केवल बंधन या कष्ट देते हैं। इसके विपरीत, सज्जन लोग मणियों वाले पायजेब
(नूपुर) की तरह होते हैं, जो अपने मधुर वचनों से कदम-कदम पर मन को प्रसन्न करते
हैं।
श्लोक ७: दुर्जन के गले से सुंदर वचन (सुभाषित) नीचे नहीं उतरते, जैसे राहु के
गले से अमृत नीचे नहीं उतरा था। जबकि सज्जन व्यक्ति सुंदर वचनों को अपने हृदय
में वैसे ही धारण करता है, जैसे भगवान विष्णु कौस्तुभ मणि को।
श्लोक ८: वह कथा (कहानी) जिसके शब्दों में कला और विलास की कोमलता है, जो हृदय
में उत्सुकता पैदा करती है और रस से भरपूर है—वह किसी व्यक्ति के पास स्वयं
चलकर वैसे ही आती है, जैसे कोई नई नवेली वधू (अभिनवा वधू) अपने प्रिय के पास
आती है।
श्लोक ९: वे कथाएँ किसे आकर्षित नहीं करतीं, जिनमें दीपक के समान चमकते हुए नए
अर्थों का प्रयोग हो? जो श्लेष अलंकार से भरी हों और श्रेष्ठ जाति की हों—वे
वैसी ही लगती हैं जैसे चम्पे की कलियों से बनी हुई फूलों की माला।
तृतीय भाग: कवि का वंश परिचय (श्लोक १०-१५)
श्लोक १०: वात्स्यायन वंश में 'कुबेर' नाम के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हुए, जिनके
गुणों का गान सारा संसार करता था। अनेक राजाओं द्वारा उनके चरणों की पूजा की
जाती थी और वे साक्षात् ब्रह्मा के अंश के समान थे।
श्लोक ११: उनके मुख में साक्षात् सरस्वती निवास करती थी। वह मुख जो वेदों के
पाठ से पवित्र था, जिसमें यज्ञों के अन्न (पुरोडाश) की पवित्रता थी और जो सभी
शास्त्रों एवं स्मृतियों का आधार था।
श्लोक १२: उनके घर की स्थिति ऐसी थी कि पिंजरों में रहने वाले तोते और मैना भी
वेदों का शुद्ध पाठ करते थे। जब ब्राह्मण बालक पाठ में गलती करते, तो ये पक्षी
उन्हें टोक देते थे, जिससे वे बालक संकोच में पड़ जाते थे।
श्लोक १३: जिस प्रकार ब्रह्मा हिरण्यगर्भ से, चंद्रमा क्षीर सागर से और गरुड़
विनता से उत्पन्न हुए, उसी प्रकार कुबेर के वंश में 'अर्थपति' उत्पन्न हुए, जो
ब्राह्मणों के स्वामी थे।
श्लोक १४: उनके यहाँ प्रतिदिन नए-नए शिष्यों की भीड़ लगी रहती थी, जो उनके
द्वारा फैलाए गए ज्ञान को ग्रहण करते थे। वे शिष्य गुरु के ज्ञान को अपने कानों
के आभूषण की तरह धारण करते थे।
श्लोक १५: उन्होंने विधानपूर्वक किए गए अनेक यज्ञों (मखों) से देवलोक को जीत
लिया। उनके यज्ञों की शोभा वैसे ही थी जैसे हाथियों की सेना की, जिनमें दान
(यज्ञ का दान/हाथी का मद) और महावीर (योद्धा/यज्ञ पुरुष) विद्यमान थे।
चतुर्थ भाग: पिता का वर्णन और उपसंहार (श्लोक १६-२०)
श्लोक १६: उन अर्थपति के पुत्र 'चित्रभानु' हुए, जो अत्यंत विद्वान और श्रेष्ठ
पुरुषों में उत्तम थे। वे विद्वानों के बीच वैसे ही सुशोभित थे जैसे पर्वतों के
बीच स्फटिक मणि के समान उज्ज्वल कैलाश पर्वत।
श्लोक १७: महात्मा चित्रभानु के गुण (यश) कलंक रहित चंद्रमा की कला के समान
निर्मल थे। उनके ये गुण शत्रुओं के हृदय में वैसे ही समा जाते थे, जैसे भगवान
नृसिंह के नाखून हिरण्यकशिपु के हृदय में धँस गए थे।
श्लोक १८: उनके द्वारा किए गए यज्ञों से निकलने वाला धुएँ का समूह आकाश में
ऐसा लगता था जैसे दिशाओं के माथे पर लटें झूल रही हों। उस काले धुएँ ने भी उनके
यश को और अधिक सफेद (उज्ज्वल) बना दिया।
श्लोक १९: जिनकी थकान माता सरस्वती स्वयं अपने हाथों से मिटाती थीं और
जिन्होंने अपने यश से सातों लोकों को सफेद कर दिया था, उन्हीं चित्रभानु से
'बाण' (बाणभट्ट) नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक २०: (उपसंहार)
मुझ बाणभट्ट द्वारा—जिसकी बुद्धि अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं हुई है, जिसकी
वाणी में अभी थोड़ी जड़ता है और जिसमें पाण्डित्य की चतुराई का अभाव है—अपनी
इसी सरल बुद्धि से यह 'कादम्बरी' कथा रची गई है, जो पूर्व की अन्य प्रसिद्ध
कथाओं से भी बढ़कर है।
यह मंगलाचरण केवल ईश्वर की स्तुति नहीं है, बल्कि यह बाणभट्ट के गौरवशाली वंश
और उनके लेखन के आत्मविश्वास को भी दर्शाता है।
शूद्ध संस्कृत पाठ:-
आसीद्दीर्घप्रत्यवस्थितिः सम्यग्यवस्थितशासनः पाकशासन इवापर-५
श्रुतपूर्वधर्मालम्बनया सुभो भर्ति प्रतापादुरगवत्समस्तसामन्त-
चक्रवर्तीव लक्ष्मणोपेतव्यक्षर इव करतलोपदर्श्यमानशशाङ्क-
लाञ्छनो हरि इव जितमनम्यो युधि इवाप्रतिहतगतिकः कम-
ललोचन इव विमलकीर्तिराजहंसमण्डलो जलधिरिव लक्ष्मीप्रसूति-
गर्भप्रवाह इव भणितगम्भीरः रविरिव प्रतिदिनवर्धमानः। १०
नद्यः मेरुरिव सकलसुभूतापनीयमातापच्छायो दिगन्त-
विस्तारितयशः तथान्यैरपि दृष्टः कर्ता महाश्रयणमहार्णवो रत्न-
सागरः सर्वशास्त्रपारगः कलानां कुशलो गुणानामागारः।
कालान्तरात् तस्य दुर्यशो मित्रमण्डलेनापहृतजनस्य प्र-
वर्तिता गम्भीरधारामेव रसिकानां प्रयच्छन् धनुर्धरः। १५
रेखः साहसिकानामपि विभूषितानां वैनतेय इव विनतानन्दजनो
वैद्य इव चापकोटिसुसंस्थितसकलार्तिहरश्चलो राजा “सु-
त्रको” नाम।
तस्यैव यो निर्गुणातिशयदुर्धियो विरचिततारसिंहासनकव्यम्-
कविक्रियाकान्तसकलसुभवन्तलो विक्रमन्यायस्थितिं च जहासेव वा-२०
सुदेवम्। अतिचिरकालमतिक्रान्तदृष्टपतितानां संपर्कलब्धोऽपि
शाश्वतीं यस्य विपुलं कृपणाधारराज्ये चिरस्थायि राज्यं।
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
यह गद्यांश महाकवि बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के 'कथामुख' से लिया गया है, जहाँ वे
राजा शूद्रक का वर्णन कर रहे हैं। बाणभट्ट की शैली अपनी लंबी संधियों और उपमाओं
के लिए प्रसिद्ध है।
यहाँ इसका प्रवाहपूर्ण हिंदी अनुवाद दिया गया है:
राजा शूद्रक का वर्णन
वहाँ 'शूद्रक' नाम के एक राजा थे। वे साक्षात् दूसरे इंद्र (पाकशासन) के समान
थे, जिनका शासन अत्यंत सुव्यवस्थित और अडिग था। जिस प्रकार शेषनाग पृथ्वी के
भार को सँभाले रहते हैं, वैसे ही उन्होंने पूर्व-निर्धारित धर्म का आश्रय लेकर
संपूर्ण पृथ्वी का भार वहन किया। उनके प्रताप से समस्त सामंतों का चक्र (समूह)
वैसे ही नतमस्तक रहता था जैसे गरुड़ के भय से सर्पों का समूह।
वे श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त थे और उनके हाथ की रेखाओं में चंद्रमा के चिह्न
(शशाङ्क-लाञ्छन) स्पष्ट दिखाई देते थे। वे भगवान विष्णु (हरि) के समान थे
जिन्होंने कामदेव (मन्मथ) को जीत लिया था। युद्धभूमि में उनकी गति अजेय और
अप्रतिहत थी। उनकी कीर्ति राजहंसों के समूह के समान अत्यंत विमल (सफेद) थी और
उनकी आँखें कमल के समान सुंदर थीं।
वे समुद्र के समान थे क्योंकि वे लक्ष्मी (संपत्ति) के जन्मस्थान थे; वे गंगा
के प्रवाह के समान गम्भीर वाणी वाले थे और सूर्य के समान प्रतिदिन बढ़ते हुए
तेज (प्रताप) से युक्त थे। वे सुमेरु पर्वत के समान थे क्योंकि उनके आश्रय में
समस्त प्रजा ताप (कष्ट) से मुक्त और सुखद छाया में रहती थी। उनका यश समस्त
दिशाओं के छोर तक फैला हुआ था।
वे महान पुरुषों के आश्रय, रत्नों के सागर, समस्त शास्त्रों के पारंगत, कलाओं
में कुशल और गुणों के भंडार थे। उन्होंने अपने मित्र-मंडली के साथ मिलकर
शत्रुओं के अपयश को हर लिया था। वे एक ऐसे महान धनुर्धर थे जो रसज्ञों
(प्रेमियों) को आनंद और शत्रुओं को भय प्रदान करते थे। साहसियों में अग्रणी, वे
गरुड़ (वैनतेय) के समान अपनी माता (विनता/प्रजा) को आनंद देने वाले थे।
एक कुशल वैद्य के समान, वे अपनी धनुष की कोटि (नोक) से प्रजा की समस्त पीड़ाओं
को हरने वाले चंचल किंतु तेजस्वी राजा थे। उनके पराक्रम और न्याय की स्थिति ने
मानो भगवान वासुदेव (विष्णु) के वैभव का भी उपहास किया हो। अत्यंत लंबे समय तक
शासन करने वाले पूर्ववर्ती राजाओं के इतिहास को पीछे छोड़ते हुए, उन्होंने एक
ऐसे विशाल राज्य की स्थापना की जो दीन-दुखियों का आधार और चिरस्थायी था।
विशेष ध्यान देने योग्य उपमाएँ:-
पाकशासन इवापरः दूसरे इंद्र के समान।
वैनतेय इव विनतानन्दजनो: जिस प्रकार गरुड़ अपनी माता विनता को आनंद देते
हैं, वैसे ही राजा अपनी 'विनत' (विनम्र) प्रजा को सुख देते थे।
वैद्य इव: जैसे वैद्य रोगों को दूर करता है, राजा अपने धनुष से शत्रुओं
और कष्टों का निवारण करते थे।
बाणभट्ट ने यहाँ शब्दालंकार (विशेषकर श्लेष) का इतना सुंदर प्रयोग किया है कि
राजा की तुलना एक साथ भगवान, प्रकृति और शस्त्रों से की गई है।
यह कादम्बरी का एक और अत्यंत प्रसिद्ध पृष्ठ है, जिसमें राजा शूद्रक (या
तारापीड, प्रसंगानुसार) के प्रताप और उनकी राजधानी विदिशा का वर्णन है। इस
पृष्ठ में बाणभट्ट ने 'परिसंख्या अलंकार' का बहुत सुंदर प्रयोग किया है, जहाँ
वे बताते हैं कि राजा के राज्य में 'बुराइयाँ' केवल शब्दों या कलाओं में
सीमित थीं, वास्तविक जीवन में नहीं। नीचे इसका शुद्ध संस्कृत पाठ और
हिंदी अनुवाद दिया गया है:
शुद्ध संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
"...यस्य मनसि धर्मेण, कोपे यमेन, प्रसादे धनदेन, प्रतापे वह्निना, भुजे
भुवा, दृशि श्रिया, वाचि सरस्वत्या, मुखे शशिना, बले मरुता, प्रज्ञायां
सुरगुरुणा, रूपे मनसिजेन, तेजसि सवित्रा च वसता सर्वदेवमयस्य
प्रकटितविश्वरूपाकृतेरनुकरोति भगवतो नारायणस्य।
यस्य च मकलकरिकुम्भपीठपाटनमाचरतो लभस्थूलमुक्ताफलेन
दृढमुष्टिनिपीडनान्निष्प्यूतधाराजलविन्दुदन्तुरेणेव कृपाणेनाकृष्यमाणा
सुभटोरःकपाटविघटितकवचसहस्रान्धकारमध्यवर्तिनी
करिकरटतटगलितमदजलासारदुर्दिनस्वभिसारिकेव समरनिशासु समीपमसकृदाजगाम
राजलक्ष्मीः।
यस्य च हृदयस्थितानपि पतीन्दिधक्षुरिव प्रतापानलो वियोगिनीनामपि
रिपुसुन्दरीणामन्तर्जनितदाहो दिवानिशं जज्वाल। यस्मिंश्च राजनि जितजगति
परिपालयति महीं **चित्रकर्मसु वर्णसंखरा, रतेषु केशग्रहाः, काव्येषु
दृढबन्धाः, शास्त्रेषु चिन्ता, स्वप्नेषु विप्रलम्भाश्छलेषु कनकदण्डा,
ध्वजेषु प्रकम्पा, गीतेषु रागविलसितानि, करिषु मदविकाराश्चापेषु गुणच्छेदा,
गवाक्षेषु जालमार्गाः, शास्त्रेकृपाणकवचेषु कलङ्का, रतिकलहेषु
दूतसंप्रेषणानि, शार्यक्षेषु शून्यगृहाः प्रजानामासन्।**
...तस्य च राज्ञः... वेत्रवत्या सरिता परिगता विदिशाभिधाना नगरी राजधानी
आसीत्।"
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
"जिनके मन में धर्म, कोप (क्रोध) में यमराज, प्रसन्नता में कुबेर, प्रताप
में अग्नि, भुजाओं में पृथ्वी, दृष्टि में लक्ष्मी, वाणी में सरस्वती, मुख
में चंद्रमा, बल में वायु, बुद्धि में बृहस्पति, रूप में कामदेव और तेज में
सूर्य का वास है; जो साक्षात् सभी देवताओं के स्वरूप होकर भगवान नारायण के
विश्वरूप की आकृति का अनुकरण करते हैं।
जिनके युद्धों में, शत्रुओं के हाथियों के मस्तक फाड़ने से निकले हुए बड़े-बड़े
मोतियों के कारण और तलवार की चमक के कारण, ऐसा प्रतीत होता था मानो वीर
योद्धाओं के वक्षस्थल रूपी किवाड़ों को तोड़कर 'राजलक्ष्मी' स्वयं अंधकार भरी
रातों में अभिसारिका (प्रेमी से मिलने जाने वाली नायिका) की तरह उनके पास
बार-बार चली आती थी।
उन राजा के प्रताप की अग्नि, शत्रु की सुंदरियों के हृदयों में उनके (मृत)
पतियों को जलाने की इच्छा से जैसे दिन-रात जलती रहती थी।
जब वे महाप्रतापी राजा पृथ्वी का पालन करते थे, तब बुराइयाँ केवल यहाँ
थी:
वर्णसंकर (रंगों का मिश्रण): केवल 'चित्रों' में था (समाज में जातियों
का मिश्रण नहीं था)।
केशग्रह (बाल पकड़ना): केवल 'रति-क्रीड़ा' में था (हिंसा में किसी के
बाल नहीं पकड़े जाते थे)।
दृढबन्ध (कठोर बंधन): केवल 'काव्यों के छंदों' में थे (जेलों में लोग
नहीं थे)।
चिन्ता: केवल 'शास्त्रों के मनन' में थी (प्रजा को कोई मानसिक चिंता नहीं
थी)।
विप्रलम्भ (बिछड़ना/धोखा): केवल 'स्वप्नों' में था (वास्तविक जीवन में कोई
किसी को धोखा नहीं देता था)।
कनक-दण्ड (सुवर्ण दंड): केवल 'राजसी ध्वजों' के डंडे थे (जुर्माने के रूप
में दंड नहीं था)।
प्रकम्प (काँपना): केवल 'ध्वजाओं' में था (डर से कोई नहीं काँपता था)।
राग (मोह/सुर): केवल 'संगीत' में था (द्वेष वाला मोह नहीं था)।
गुणच्छेद (डोरी टूटना/गुणों का नाश): केवल 'धनुषों की डोरी' टूटती थी
(किसी के सद्गुणों का नाश नहीं होता था)।
शून्यगृह (खाली घर): केवल 'शतरंज (चौपड़) के खानों' में थे (किसी का घर
दरिद्रता से खाली नहीं था)।
...उन राजा की राजधानी विदिशा नाम की नगरी थी, जो वेत्रवती (बेतवा) नदी से
घिरी हुई थी।"
विशेषताएँ:-
1. परिसंख्या अलंकार: बाणभट्ट ने शब्दों के दोहरे अर्थ (Sleṣa) का
प्रयोग करके यह बताया है कि राजा के राज्य में अनैतिकता पूरी तरह समाप्त हो
चुकी थी। जो शब्द नकारात्मक हैं (जैसे दंड, कलंक, बंधन), वे केवल कला या
साहित्य के संदर्भ में ही प्रयोग होते थे।
2. विदिशा वर्णन: अंत में उनकी राजधानी 'विदिशा' का परिचय दिया गया
है।
कादम्बरी - संस्कृत पाठ
...विगतराज्यचिन्ताभारनिर्वृतः, अनेकभूमिपालमौलिमालालालितचरणयुगलो, वलयजाल इव
भुवनभारमुद्वहन्नमरगुरुमपि प्रज्ञयोपहसद्भिः,
सकृदालोचितनीतिशास्त्रनिर्मलमनोभिरलुब्धैः स्निग्धैः परिरुतः,
समानवयोविद्यालङ्कारैरनेकमूर्धाभिषिक्तपार्थिवकुलकमलकलापालोचनकठोरमतिभिरतिप्रगल्भैः
कालविद्भिः प्रहृदयैरग्राम्यपरिहासकुशलैरिङ्गिताकारवेदिभिः
काव्यनाट्याख्यायिकालेख्यव्याख्यानादिक्रियानिपुणैरतिकठिनपीवरस्कन्धैरसकृद्वदलितसमदरिपुगजघटापीठबन्धैः
केसरिकिशोरकैरिवैकरसैरपि विनयव्यवहारिभिरात्मनः प्रतिबिम्बैरिव राजपुत्रैः सह
रममाणः प्रथमे वयसि सुखमतिचिरमुवास।
तस्य विजिगीषुतया महासत्त्वतया च तृणमिव लघुवृत्ति स्त्रैणमाकल्पयतः, प्रथमे
वयसि वर्तमानस्यापि रूपवतोऽपि सन्तानार्थिभिरगम्यक्षितस्यापि सुरतसुखस्योपरि
द्वेष इवासीत्। सत्यपि रूपसोपहसितरतिविभ्रमे लावण्यवति विनयवत्यन्वयवति
हृदयहारिणि चावरोधजने, स कदाचिदनवरतदोलायमानरत्नवलयो
घर्षणोत्फालनप्रकम्पझणझणायमानमणिकर्णपूरः, स्वयमलब्धमृदङ्गवाद्यकप्रसङ्गेन,
कदाचिदविरलविमुक्तशरासारशून्यीकृतकाननो मृगयाव्यापारेण,
कदाचिदाबद्धविद्वन्मण्डलः काव्यप्रबन्धरचनेन, कदाचिच्छास्त्रालापेन,
कदाचिदाख्यानकाख्यायिकेतिहासपुराणाकर्णनेन, कदाचिदालेख्यविनोदेन,
कदाचिद्वीणया, कदाचिद्दर्शनगतमुनिजनचर्यया,
कदाचिदक्षरच्युतकमात्राच्युतकबिन्दुमतीगूढचतुर्थपादप्रहेलिकाप्रदानादिभिर्विनितासंभोगसुखपराङ्मुखः
सुहृत्परिवृतो दिवसमनयत्।
यह बाणभट्ट की अद्भुत अलंकारिक शैली का हिंदी अनुवाद है। उन्होंने राजा के
व्यक्तित्व और उनकी दिनचर्या को बहुत ही विस्तार से चित्रित किया है।
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
"...राज्य की चिंता का भार (मंत्रियों पर) छोड़कर निश्चिंत हुए, अनेक राजाओं
के मुकुटों की मालाओं से जिनके चरण युगल चूमे जाते थे (अर्थात् अनेक राजा
जिनके चरणों में झुकते थे), शेषनाग के समान पृथ्वी के भार को उठाने वाले,
अपनी बुद्धि से देवगुरु बृहस्पति का भी उपहास करने वाले, नीतिशास्त्र के गहन
चिंतन से निर्मल मन वाले, लोभ-रहित और स्नेह करने वाले मंत्रियों से घिरे
हुए—वे राजा (तारापीड) सुखपूर्वक रहने लगे।
वे अपनी ही समान अवस्था, विद्या और अलंकारों वाले राजपुत्रों के साथ रमण
करते थे। वे राजपुत्र अनेक राजकुलों के कमलों के समान थे, उनकी बुद्धि
शास्त्रों के अध्ययन से परिपक्व थी, वे अत्यंत चतुर, समय के ज्ञाता, उदार
हृदय, शिष्ट परिहास (मजाक) में कुशल और दूसरों के मन के भावों को जान लेने
वाले थे।
वे काव्य, नाटक, आख्यायिका (कहानी) और चित्रकला की व्याख्या करने
में निपुण थे। सिंह के बच्चों के समान सुदृढ़ कंधों वाले और युद्ध में शत्रुओं
के हाथियों के मस्तक को विदीर्ण करने वाले वे राजपुत्र राजा के प्रतिबिंब के
समान ही अनुशासित थे। उनके साथ राजा ने अपनी युवावस्था का लंबा समय सुखपूर्वक
बिताया।
विजय की इच्छा और अदम्य साहस के कारण उन्होंने स्त्रियों के प्रति आसक्ति को
तिनके के समान तुच्छ माना। युवा और अत्यंत सुंदर होने पर भी, केवल संतान की
प्राप्ति के लिए ही वे भोग की मर्यादा को स्वीकार करते थे, अन्यथा काम-सुख के
प्रति उनके मन में जैसे द्वेष (अरुचि) ही था। उनके अंतःपुर (महल) में रति के
सौंदर्य को भी लज्जित करने वाली, लावण्यमयी, विनयी और कुलीन स्त्रियाँ थीं,
फिर भी वे काम-सुख से विमुख रहते थे।
वे अपना दिन इस प्रकार बिताते थे:
कभी निरंतर हिलते हुए रत्नजड़ित कंगन और झंकार करते हुए मणिकर्णपुरों (कान के
आभूषण) के साथ स्वयं मृदंग बजाने के प्रसंग में;
कभी निरंतर चलते हुए बाणों की वर्षा से वन को सूना कर देने वाले शिकार
(मृगया) के व्यापार में;
कभी विद्वानों की मंडली जमाकर काव्य की रचना करने में; कभी शास्त्रों
की चर्चा करने में; कभी कथा, आख्यायिका, इतिहास और पुराणों को सुनने
में; कभी चित्रकारी के विनोद में; कभी वीणा वादन में; कभी
दर्शन के लिए आए हुए मुनियों की चर्या (जीवन पद्धति) के विषय में; और
कभी अक्षरच्युतक, मात्राच्युतक (शब्दों की पहेलियाँ) और जटिल प्रहेलिकाओं
(बुझौवल) के समाधान में। इस प्रकार, वे अपनी इंद्रियों को वश में रखते
हुए, मित्रों से घिरे रहकर अपना दिन व्यतीत करते थे।"
विशेष टिप्पणी:-
बाणभट्ट यहाँ यह दिखाना चाहते हैं कि एक आदर्श राजा केवल भोग-विलास में नहीं
डूबा रहता, बल्कि वह कला (Music/Painting), साहित्य (Poetry/History),
शारीरिक कौशल (Hunting) और अध्यात्म (Sages)—इन सभी क्षेत्रों में निपुण होता
है।
यहाँ इस पृष्ठ का शुद्ध संस्कृत और हिंदी पाठ दिया गया है। इस पृष्ठ में उस
घटना का वर्णन है जब चाण्डाल कन्या एक पिंजरे में शुक (तोता) लेकर राजा के
दरबार में आती है।
शुद्ध संस्कृत पाठक:-
एकदा तु नातिदूरोदिते नवनलिनदलसम्पुटभिदि पाटलिम्नि भगवति सहस्रमरीचिमालिनि
राजानमस्थाने स्थितं... वामपार्श्वलम्बिना कौशेयकेण... भीष्ममपि
चन्दनलतामिव राजलक्ष्मीं... विन्ध्यवनभूमिरिव वेत्रलतावती राज्याधिदेवतेव
वेत्रदण्डधारिणी प्रतीहारी समुपसृत्य क्षितितलनिहितजानुकरकमला
सविनयमब्रवीत्।
देव! द्वारस्थिता सुरलोकमरोहतस्त्रिशङ्कोरिव कुपितशतमन्युहुंकारनिपातिता
राजलक्ष्मीर्दक्षिणापथादागता चाण्डालकन्यका पञ्जरस्थं शुकमादाय देवं
विज्ञापयति। सकलभुवनतलसर्वरत्नानामुदधिरिवैकमभाजनं देवो
विहंगमश्चायमाश्चर्यभूतो निखिलभुवनतलरत्नमिति कृत्वा
देवपादमूलादायाताऽस्मि, इच्छामि देवदर्शनसुखमनुभवितुमिति। एतदाकर्ण्य देवः
प्रमाणम्। इत्युक्त्वा विरराम। उपजातकुतूहलस्तु राजा समीपवर्तिनां
राज्ञामालोक्य मुखानि को दोषः प्रवेश्यतामित्यादिदेश।
अथ प्रतीहारी नरपतिवचनानन्तरमुत्थाय तां मातङ्गकुमारीं प्रावेशयत्।
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
एक समय की बात है, जब भगवान सूर्य (सहस्रमरीचिमालि) अभी बहुत ऊँचे नहीं चढ़े
थे और उनकी लालिमा खिले हुए नए कमल की पंखुड़ियों के समान थी, तब राजा
राजसभा में विराजमान थे। उसी समय विन्ध्य वन की भूमि के समान वेत्रलता (बेत
की छड़ी) धारण किए हुए राजलक्ष्मी की अधिष्ठात्री देवी के समान एक
द्वारपालिनी (प्रतीहारी) राजा के पास आई। उसने अपने हाथ और घुटने पृथ्वी पर
टिकाकर विनयपूर्वक निवेदन किया।
उसने कहा कि हे देव! द्वार पर एक चाण्डाल कन्या खड़ी है जो दक्षिण दिशा से
आई है। वह अपने साथ पिंजरे में एक शुक (तोता) लेकर आई है। उसकी स्थिति ऐसी
प्रतीत हो रही है मानो स्वर्ग की ओर चढ़ते हुए त्रिशंकु को इंद्र के हुंकार
ने नीचे गिरा दिया हो और वह साक्षात् राजलक्ष्मी की तरह शोभायमान हो। उसका
कहना है कि हे महाराज, आप संपूर्ण पृथ्वी के रत्नों के एकमात्र पात्र
(समुद्र के समान) हैं और यह पक्षी भी इस जगत का एक अद्भुत रत्न है, इसलिए
मैं इसे आपके चरणों में अर्पित करने और आपके दर्शन का सुख प्राप्त करने आई
हूँ। मैंने उसकी बात आप तक पहुँचा दी है, अब इस पर आपका निर्णय ही प्रमाण
है। इतना कहकर वह रुक गई।
राजा के मन में भी कौतूहल जागा। उन्होंने अपने पास बैठे अन्य राजाओं के मुख
की ओर देखा और आदेश दिया कि इसमें क्या दोष है? उसे भीतर प्रवेश कराओ। राजा
की आज्ञा पाते ही द्वारपालिनी उठी और उस मातंग कुमारी (चाण्डाल कन्या) को
सभा में ले आई।
यह पृष्ठ बाणभट्ट की जादुई लेखनी का एक और नमूना है, जिसमें राजा शूद्रक
के राजसी ठाट-बाट और उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसमें राजा
के वस्त्रों, आभूषणों और उनके बैठने के स्थान की उपमाओं की झड़ी लगा दी
गई है।
शुद्ध संस्कृत पाठ
लम्बितस्थूलमुक्ताकलापस्य कनकशृङ्खलानियमितमणिदण्डिकातस्थस्य
गगनसिन्धुफेनपटलपाण्डुरस्य नातिमहतो
दुकूलवितानस्याधस्तादिन्दुकान्तमणिपर्यङ्कानिषण्णमुद्धूयमानकनकदण्डचामरन्मयूखमुखकान्तिविजयपराभवप्रणते
शशिनीव स्फटिकविन्यस्तवामपादमिन्द्रनीलमणिकुट्टिमप्रभासंपर्कश्यामायमानैः
श्वासमलिनीकृतैरिव
चरणनखमयूखजालैरुपशोभमानमातपद्मरागकिरणपाटलीकृतेनाभिमृदितमधुकैटभरुधिरारुणेन
ऊरुयुगलेन विराजमानममृतफेनधवले गोरोचनालिखितहंसमिथुनपर्यन्ते
चारुचामरपवनप्रनर्तितदशे दुकूले वसानं
चन्दनानुलेपनधवलितोरःस्थलमपरिविन्यस्तकुङ्कुमस्र्थासकमन्तर्विततबालातपच्छेदमिव
कैलासशिखरिमपरशशिशङ्कया येव हारलतया
कृतमुखपरिवेषमतिचपलराजलक्ष्मीबन्धपाशशङ्कामुपजनयतेन्द्रनीलकेयूरयुगलेन
मलयजरसगन्धलुब्धभुजंगद्वयेनेव
वेष्टितबाहुशिखरमीषदालम्बिकर्णोत्पलमुन्नतघोटरीलोचनममलकलधौतपट्टायतमुष्टमीचन्द्रशकलाकारमशेषभुवनराज्याभिषेकसलिलपूतमूर्णासनाथं
ललाटदेशमुद्वहन्तमामोदिमालतीकुसुमशेखरमुषसि शिखरपर्यस्ततारकापुञ्जमिव
पश्चिमाचलमाभरणप्रभापिशङ्कितार्ङ्गतया लग्नहरहुताशमिव
मकरध्वजमावर्तिनीभिः सर्वतः सेवार्थमागताभिरिव दिग्वधूभिर्वारविलासिनीभिः
परवृतममलमणिकुट्टिमसंक्रान्तसकलदेहप्रतिबिम्बतया वसुंधरया
हृदयेनेवोह्यमानमशेषजनभोग्यतामुपनीतयाप्यसाधारण्या राजलक्ष्म्या
समालिङ्गितदेहमपरिमितपरिवारजनमप्यद्वितीयं गजतुरगसाधनमपि
खड्गमात्रसहायमेकदेशस्थितमपि व्याप्त...।
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
राजा शूद्रक एक छोटे लेकिन सुंदर रेशमी चंदोवे (वितान) के नीचे बैठे थे,
जो आकाशगंगा के झाग के समान सफेद था और जिसमें सोने की जंजीरों से बंधी
मणियों की कतारें और बड़े-बड़े मोती लटक रहे थे। वे चंद्रमा के समान
कांति वाले 'इन्दुकान्त' मणियों से बने पलंग पर विराजमान थे। उनके ऊपर
सोने की डंडियों वाले चामर डुलाए जा रहे थे। राजा ने अपना बायां पैर
स्फटिक के पादपीठ (पायदान) पर रखा हुआ था। नीचे के फर्श पर नीलम मणियाँ
जड़ी थीं, जिनकी नीली आभा जब राजा के पैरों के नाखूनों की चमक से मिलती
थी, तो ऐसा लगता था मानो साँसों की गर्मी से नाखून कुछ धुंधले पड़ गए
हों।
उन्होंने अमृत के झाग के समान सफेद और रेशमी धोती पहनी हुई थी, जिसके
किनारों पर गोरोचन से हंसों के जोड़े बने हुए थे और चामर की हवा से उसके
सिरे नाच रहे थे। उनके चौड़े वक्षस्थल पर सफेद चंदन का लेप था और उस पर
केसर के छापे लगे थे, जो ऐसा लग रहा था मानो कैलास पर्वत के शिखर पर सुबह
की धूप खिली हो। उनके गले में मोतियों का हार ऐसा शोभा दे रहा था मानो
चंचल राजलक्ष्मी को बांधने के लिए कोई फंदा हो। उनकी भुजाओं में नीलम के
बाजूबंद ऐसे लग रहे थे मानो चंदन की खुशबू के लोभ में दो काले सांप उनकी
बाहों से लिपट गए हों।
उनके कान में नीले कमल का कुंडल थोड़ा झुका हुआ था। उनका ललाट (माथा)
अष्टमी के चंद्रमा के समान विशाल और चमक रहा था, जो समस्त पृथ्वी के
राज्याभिषेक के जल से पवित्र था। उनके सिर पर मालती के फूलों का सेहरा
ऐसा लग रहा था मानो अस्ताचल पर्वत के शिखर पर तारों का समूह हो। उनके
शरीर और आभूषणों की चमक ऐसी थी मानो वे साक्षात् कामदेव हों, जिन पर शिव
जी की अग्नि का प्रभाव अभी भी शेष हो। वे चारों ओर से वेश्याओं
(परिचारिकाओं) से घिरे थे, जो ऐसी लग रही थीं मानो दसों दिशाएं स्वयं
उनकी सेवा में उपस्थित हुई हों। फर्श की मणियों में उनके शरीर का
प्रतिबिंब ऐसा दिख रहा था मानो पृथ्वी ने उन्हें अपने हृदय में धारण कर
लिया हो। यद्यपि उनके पास विशाल सेना और परिवार था, फिर भी वे अपने
प्रभाव में अद्वितीय थे।
इस अंश में बाणभट्ट ने राजा के वैभव को अलौकिक रूप देने के लिए
'उत्प्रेक्षा' (कल्पना) और 'उपमा' अलंकारों का भारी प्रयोग किया
है।
चाण्डाल कन्या का राजा की सभा में प्रवेश और उसके अद्भुत सौंदर्य का
वर्णन है। यहाँ बाणभट्ट ने विरोधाभास और उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग
करके उसके प्रभाव को दर्शाया है। यहाँ इसका शुद्ध पाठ हिंदी अनुवाद दिया
गया है:
शुद्ध संस्कृत पाठ:-
आलोक्य च सा दूरस्थितैव प्रचलितरत्नवलयेन रक्तकुवलयकोमलेन पाणिना
जर्जरितमुखभागां वेणुलतामादाय नरपतिबोधनार्थमसकृत्सभाकुट्टिममाजघान। येन
सकलमेव तद्राजकमेकमपि करियूथमिव तालशब्देन तेन वेणुलताध्वनिना
युगपद्वर्तितवदनमवनिपालमुखादाकृष्य चक्षुस्तदभिमुखमासीत्।
अवनिपतिस्तु दूरादालोकयेत्यभिधाय प्रतीहार्या निर्दिष्टां तां...
चाण्डालकन्यकामद्राक्षीत्।
असुरगृहीतामृतहरणकृतकपटपटुविलासिनीवेषहरिश्यामतया भगवतो
हरेरिवानुकुर्वन्तीं संचारिणीमिवेन्दनीलमणिपुत्रिकाम्। आगुल्फालम्बिना
नीलकाञ्चुकेनावच्छन्नशरीरामुपरि रक्तांशुकं रचितावगुण्ठनां
नीलोत्पलस्थलीमिम
निपतितसंध्यातपामेकाभरणामसकृद्दन्तपङ्कप्रभाधवलितकपोलमण्डलामुदयिन्दुकिरणच्छुरितमुखीमिव
विभावरीमाकपिलगोरोचनारचिततिलकतृतीयलोचनां नरसिंहानुरचितकिरातवेषामिव
भवानीम्।
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
उस चाण्डाल कन्या ने दूर से ही खड़ी होकर, रत्नजड़ित कंगनों से सुशोभित और
लाल कमल के समान कोमल हाथ से एक बांस की छड़ी (वेणुलता) ली और राजा का
ध्यान खींचने के लिए उसे सभा के फर्श पर जोर से पटका। उस बांस की छड़ी की
आवाज से पूरी सभा के राजाओं का ध्यान अचानक राजा के चेहरे से हटकर उस
कन्या की ओर चला गया, ठीक वैसे ही जैसे तालियों की गड़बड़ाहट से हाथियों के
झुंड का ध्यान भटक जाता है।
राजा ने जब द्वारपालिनी के कहने पर दूर से देखा, तो उन्हें वह चाण्डाल
कन्या दिखाई दी। उसका सांवला रंग ऐसा लग रहा था मानो भगवान विष्णु ने
असुरों से अमृत छीनने के लिए मोहिनी का रूप धारण किया हो। वह ऐसी शोभा दे
रही थी मानो इंद्रनील मणि (नीलम) की बनी हुई कोई प्रतिमा चल-फिर रही हो।
उसने पैरों के टखनों तक लंबा नीला चोला पहना हुआ था और उसके ऊपर लाल रंग
की ओढ़नी से घूंघट निकाला हुआ था। वह ऐसी लग रही थी जैसे नील कमलों की
क्यारी पर शाम की लाल धूप पड़ रही हो।
उसके दांतों की चमक से उसके गाल सफेद दिखाई दे रहे थे, जो ऐसा आभास दे
रहे थे मानो उगते हुए चंद्रमा की किरणों से रात चमक उठी हो। उसके माथे पर
गोरोचन से तिलक लगा था, जो माता पार्वती के तीसरे नेत्र के समान प्रतीत
होता था, मानो वे स्वयं किरात (भीलनी) का रूप धारण कर भगवान शिव के पास
आई हों।
विशेष बातें:
इस वर्णन में बाणभट्ट ने चाण्डाल कन्या की तुलना मोहिनी (विष्णु का रूप),
नीलम की प्रतिमा और पार्वती से की है। यह उनकी शैली की विशेषता है कि वे
एक साधारण पात्र को भी अपनी कल्पना से अलौकिक बना देते हैं।
यह 'कादम्बरी' का ग्यारहवाँ पृष्ठ (11) है, जिसमें चाण्डाल कन्या के
अद्वितीय और विरोधाभासी सौंदर्य का वर्णन जारी है। यहाँ बाणभट्ट अपनी
उपमाओं के माध्यम से यह दिखा रहे हैं कि वह कन्या सांवली होने के
बावजूद कितनी तेजस्वी और अलौकिक लग रही थी।
यहाँ इसका शुद्ध संस्कृत पाठ और स्वच्छ हिंदी अनुवाद दिया गया है:
शुद्ध संस्कृत पाठ:-
शयणदेहप्रभाश्यामलितमिव श्रियं कुपितेहरहुताशनदह्यमानमदधूममलिनीकृतामिव
रतिमिवोन्मदहलिहलाकर्षणभयप्रपलायितामिव
यमुनामतिबहलपिण्डालक्तकरसरागपल्लवितपादपङ्कजामचिरमृदितमहिषासुररुधिररक्तचरणामिव
कात्यायनीमालोहिताङ्गुलिप्रभापाटलितनखमयूखामतिकठिनमणिकुट्टिमस्पर्शमसहमानां
क्षितितले पल्लवभङ्गानिव निधाय संचरन्तीमापिञ्जगेनोत्सर्पिणा
नूपुरमणीनां प्रभाजालेन रञ्जितशरीरतया पावकेनेव भगवता रूप एव
पक्षपातिनः प्रजापतिमप्रमाणीकुर्वता
जातिसंशोधनार्थमालिङ्गितदेहामनङ्गवारणशिरोनक्षत्रमालायमानेन
रोमराजिलतालवालकेन मेखलादाम्ना परिगतजघनस्थलामतिस्थूलमुक्ताफलघटितेन
शुचिना हारेण गङ्गास्रोतेसेव कालिन्दीशङ्कया कृतकण्ठग्रहां शरदमिव
विकसितपुण्डरीकलोचनां प्रावृषमिव घनकेशजालां मलयमेखलामिव
चन्दनपल्लवावतंसां नक्षत्रमालामिव चित्रश्रवणाभरणभूषितां श्रियमिव
हस्तस्थितकमलशोभां मूर्च्छामिव मनोहारिणीमरण्याभूमिमिवाक्षतरूपसंपन्नां
दिव्ययोषितमिवाकुलीनां निद्रामिव लोचनग्राहिणीमरण्यकमलिनीमिव
मातङ्गकुलदूषिताममूर्तामिव स्पर्शवर्जितामालेख्यगतामिव दर्शनमात्रफलां
मधुमासकुसुमसमृद्धिमिव विजातिमनङ्गकुसुमचापलेखामिव मुष्टिग्राह्यमध्यां
यक्षाधिपलक्ष्मीमिवालकोद्भासिनीमचिरोरूढयौवनामतिशयरूपाकृतिमनिमेषलोचनो
ददर्श।
समुपजातविस्मयस्य चाभून्मनसि महीपतेः। अहो विधातुस्थाने
रूपनिष्पादनप्रयत्नः। तथाहि। यदि
नामेयमात्मरूपोपहसिताशेषरूपसंपदुत्पादिता किमर्थमपगतस्पर्शसंभोगसुखे
कृतं कुले जन्म।
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
राजा शूद्रक ने उस चाण्डाल कन्या को एकटक (बिना पलक झपकाए) देखा। वह
ऐसी लग रही थी मानो भगवान विष्णु के शरीर की सांवली आभा से रंगी हुई
स्वयं लक्ष्मी हों, या कामदेव के जलने से निकले धुएं से मलिन हुई रति
हों। उसके पैरों के तलवे गाढ़े महावर (आलक्तक) से लाल थे, जो ऐसे लग
रहे थे मानो उसने अभी-अभी महिषासुर का मर्दन किया हो और उसके पैरों में
रक्त लगा हो। जब वह सभा के फर्श पर पैर रखती थी, तो ऐसा लगता था मानो
वह मणियों के कठोर फर्श पर कोमल पत्तों को बिछाकर चल रही हो।
उसके शरीर की चमक और उसके नूपुरों (पायल) की मणियों का प्रकाश ऐसा था
मानो अग्निदेव ने स्वयं उसे गले लगाया हो ताकि उसकी जाति का शोधन
(शुद्धिकरण) कर सकें। उसके गले में मोतियों का सफेद हार उसके सांवले
शरीर पर ऐसा लग रहा था मानो यमुना (कालिन्दी) के काले जल को गंगा की
श्वेत धारा ने गले लगा लिया हो।
उनकी उपमाएं:-
वह खिली हुई कमलों जैसी आंखों के कारण 'शरद ऋतु' जैसी थी। अपने घने
काले बालों के कारण वह 'वर्षा ऋतु' जैसी थी। चंदन के पत्तों के कान के
आभूषणों के कारण वह 'मलय पर्वत' जैसी थी। उसके हाथ में पकड़े हुए कमल
के कारण वह 'लक्ष्मी' जैसी थी। वह नींद की तरह आंखों को लुभाने वाली
थी। वह वन की कमलिनी के समान थी, जो हाथियों (चाण्डाल कुल) द्वारा
स्पर्श की गई थी। वह किसी चित्र की तरह थी जिसे केवल देखा जा सकता था
(छुआ नहीं जा सकता था)। उसकी कमर इतनी पतली थी जिसे मुट्ठी में भरा जा
सके।
उसे देखकर राजा के मन में आश्चर्य हुआ। राजा ने सोचा कि विधाता का यह
कैसा निर्माण है? यदि उन्होंने संपूर्ण जगत के सौंदर्य का तिरस्कार
करने वाला ऐसा अद्भुत रूप बनाया था, तो इसे ऐसे कुल (चाण्डाल कुल) में
जन्म क्यों दिया जहाँ स्पर्श और भोग का सुख ही वर्जित है? विधाता ने
निश्चित ही इसे बनाते समय इसके कुल का विचार नहीं किया।
इस पृष्ठ में बाणभट्ट ने विरोध' अलंकार का बहुत प्रभावशाली उपयोग किया
है—अर्थात् रूप तो दिव्य है, लेकिन जन्म 'अधम' (नीच) कुल में है।
यह कादम्बरी का 12वाँ पृष्ठ है, जहाँ वह चाण्डाल कन्या राजा
को प्रणाम करती है और उसके साथ आया हुआ पुरुष उस 'वैशम्पायन'
नामक शुक (तोते) का परिचय राजा को देता है। इस पृष्ठ के अंत में तोता
स्वयं राजा की स्तुति में एक आर्या छंद पढ़ता है, जो अत्यंत
विस्मयकारी है।
यहाँ इसका शुद्ध संस्कृत पाठ और हिंदी अनुवाद है:
शुद्ध संस्कृत पाठ:-
...इत्येवमादि चिन्तयन्तमेव राजानमभिवदन्वलितकर्णपल्लवावतंसा
प्रगल्भवनितेव कन्यका प्रणाम। कृतप्रणामायां च तस्यां
मणिकुट्टिमोपदिष्टायां स पुरुषस्तं विहंगमादाय पञ्जरगतमेव
किंचिदुपसृत्य राज्ञे न्यवेदयदब्रवीच्च।
देव! विदितसकलशास्त्रार्थो राजनीतिप्रयोगकुशलः
पुराणेतिहासकथालापनिपुणो वेदिता गीतश्रुतीनां
काव्यनाटकआख्यायिकाख्यानकप्रभृतीनामपरिमितानां सुभापितानामभ्येता
स्वयं च कर्ता परिहासालापपेशलो वीणावेणुमुरजप्रभृतीनां
वाद्यविशेषाणामसमः श्रोता नृत्तप्रयोगदर्शननिपुणश्चित्रकर्मणि
प्रवीणो द्यूतव्यापारे प्रगल्भः प्रणयकलहकुपितकामिनीप्रसादनोपायचतुरो
गजतुरगपुरुषस्त्रीलक्षणाभिज्ञः सकलभूतलरत्नभूतोऽयं
वैशम्पायनो नाम शुकः सर्वरत्नानां चोदधिरिव देवो
भाजनमिति कृत्वैनमादायास्मत्स्वामिदुहिता देवपादमूलायाता।
तदयमात्मीयः क्रियताम्। इत्युक्त्वा नरपतेः पुरो निधाय
पञ्जरमसावपससार।
अपसृते च तस्मिन्स विहंगराजो राजाभिमुखो भूत्वा समुन्नम्य दक्षिणं
चरणमतिस्पष्टवर्णस्वरसंस्कारया गिरा कृतजयशब्दो
राजानमुद्दिश्यार्यामिमां पपाठ।
स्तनयुगमश्रुस्नातं समीपतरवर्ति हृदयशोकाग्नेः।
चरति विमुक्ताहारं व्रतमिव भवतो रिपुस्त्रीणाम्॥
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
जब राजा मन ही मन उस कन्या के रूप और कुल के विषय में सोच रहे थे,
तभी उस कन्या ने, जिसके कान के कुंडल (पल्लव) हिल रहे थे, एक प्रौढ़
वनिता की भाँति राजा को प्रणाम किया। उसके प्रणाम करने के बाद जब वह
मणियों वाले फर्श पर बैठ गई, तब उसके साथ आए हुए उस पुरुष ने पिंजरे
सहित उस पक्षी को लेकर राजा के समीप जाकर निवेदन किया:
"हे देव! यह वैशम्पायन नाम का शुक (तोता) है। यह समस्त
शास्त्रों के अर्थ को जानने वाला, राजनीति के प्रयोग में कुशल,
पुराण, इतिहास और कथाओं के वर्णन में निपुण है। इसे संगीत की
श्रुतियों का ज्ञान है और यह अनगिनत काव्यों, नाटकों और कथाओं का न
केवल ज्ञाता है, बल्कि स्वयं उनका रचयिता भी है। यह वीणा, बांसुरी और
मृदंग जैसे वाद्यों को समझने में अद्वितीय है। यह नृत्य कला का
पारखी, चित्रकला में प्रवीण और जुए (द्यूत) के खेल में चतुर है। यहाँ
तक कि रूठी हुई कामिनियों को मनाने के उपायों में भी यह निपुण है। यह
हाथी, घोड़े, पुरुष और स्त्रियों के लक्षणों को जानने वाला है। पृथ्वी
का साक्षात् रत्न होने के कारण, हमारी स्वामिनी (चाण्डाल कन्या) ने
यह सोचकर कि आप ही समस्त रत्नों के एकमात्र पात्र हैं, इसे आपके
चरणों में अर्पित किया है। कृपया इसे स्वीकार करें।" ऐसा कहकर वह
पिंजरा राजा के सामने रखकर पीछे हट गया।
उसके पीछे हटते ही, उस पक्षीराज (तोते) ने राजा की ओर मुख किया और
अपना दाहिना पैर उठाकर, अत्यंत स्पष्ट वर्णों और शुद्ध स्वर में राजा
की जय-जयकार की। फिर राजा को संबोधित करते हुए उसने यह
आर्या छंद पढ़ा:
"हे राजन्! आपके शत्रुओं की स्त्रियों के जोड़े (स्तन), जो हृदय की
शोक रूपी अग्नि के अत्यंत समीप हैं, वे आँसुओं से स्नान कर रहे हैं
और उन्होंने मोतियों का हार त्याग दिया है; वे ऐसे प्रतीत होते हैं
मानो आपके भय से उन्होंने निराहार रहने का व्रत धारण कर लिया हो।
विशेष टिप्पणी:
इस श्लोक में 'विमुक्ताहारम्' शब्द के दो अर्थ हैं (श्लेष
अलंकार):
1. हार त्याग देना: शत्रुओं की स्त्रियाँ विधवा हो गई
हैं, इसलिए उन्होंने मोतियों के हार उतार दिए हैं।
2. भोजन त्याग देना: व्रत की तरह उन्होंने भोजन (आहार)
करना छोड़ दिया है।
एक पक्षी के मुख से इतनी शुद्ध संस्कृत और गूढ़ श्लोक सुनकर पूरी सभा
चकित रह गई।
शुद्ध संस्कृत पाठ :-
खिलमन्त्रिमण्डले प्रधानममात्यं **कुमारपालित**नामानमब्रवीत्— "श्रुता
भवद्भिरस्य विहंगमस्य स्पष्टता वर्णोच्चारणे स्वरे च मधुरता। प्रथमं
तावदिदमेव
महदाश्चर्यमसंकीर्णवर्णप्रविभागामभिव्यक्तमात्रानुस्वारसंस्कारयोगां
विशेषयुक्तां यदियमतिपरिस्फुटाक्षरां गिरमुदीरयति।
तत्र पुनरपरमभिमतविषये तिरश्चोऽपि मनुजस्येव संस्कारवतो बुद्धिपूर्वा
प्रवृत्तिः। तथा हि। अनेन समुत्क्षिप्तदक्षिणचरणेनोच्चार्य
जयशब्दमियमार्या मामुद्दिश्यातिस्फुटाक्षरं गीता। प्रायेण हि पक्षिणः
पशवश्च भ्याहारमैथुननिद्रासंज्ञामात्रवेदिनो भवन्ति। इदं तु
महच्चित्रम्।" इत्युक्तवति भूभुजि कुमारपालितः किंचित्स्मितवदनो
नृपमवादीत्— "देव किमत्र चित्रम्। एते हि शुकसारिकाप्रभृतयो विहंगमविशेषा
यथाश्रुतं वाचमुच्चारयन्तीयधिगतमेव देवेन।
तत्राप्यन्यजन्मोपात्तसंस्कारानुबन्धेन वा पुरुषप्रयत्नेन वा
संस्कारातिशय उपजायत इति नातिचित्रम्। अन्यदेतेषामपि पुरा
पुरुषाणामिवातिपरिस्फुटाभिधाना वागासीत्। अभिशापात्त्वपरिसुटांलपतां
शुकानामुपजाता, करिणां च जिह्वापरिवृत्तिः।" इत्येवमुच्चारयत्येव
तस्मिन्शिशिरकिरणमम्बरतलस्य
मध्यमारूढमावेदयन्ताडिकाच्छेदप्रहतपटुपटहनादानुसारी
मध्याह्नशङ्खध्वनिरुदतिष्ठत्। तमाकर्ण्य च समासन्नस्नानसमयौ
विसर्जितराजलोकः क्षितिपतिरास्थानमण्डपादुत्तस्थौ।
अथ चलति महीपतावन्योन्यमतिरभससंचलनाच्चालिताङ्गदपल्लवझङ्कारकोटिपातिभिः
शुकपटानामाक्षेपदोलायमानकण्ठदाम्नामंसस्थलोल्लसितकुङ्कुमपटवासधूलिपिञ्जरितदिशामलोलमालतीकुसुमशेखरीतपतदलिकदम्बकानामर्धावलम्बिभिः
कर्णोत्पलैश्चुम्ब्यमानगण्डस्थलानां गम...।
यह पृष्ठ संख्या 13 का हिंदी अनुवाद है, जिसमें राजा की शुक (तोते) के
प्रति जिज्ञासा और मंत्री कुमारपालित का उत्तर वर्णित है:
हिन्दी अनुवाद पाठ कादंबरी कथामुख:-
(राजा ने) समस्त मंत्री-मंडल में प्रधान, कुमारपालित नामक मंत्री से
कहा— "क्या आपने इस पक्षी के वर्णों (अक्षरों) के उच्चारण की स्पष्टता
और स्वर की मधुरता सुनी? सबसे पहले तो यही महान आश्चर्य है कि यह बिना
किसी अक्षरों को मिलाए, स्पष्ट मात्राओं और अनुस्वारों के शुद्ध
संस्कार के साथ इतने साफ शब्दों में वाणी बोल रहा है।
उस पर भी दूसरी बात यह कि इस पक्षी की रुचि के विषयों में, किसी मनुष्य
की भाँति ही संस्कारवान और बुद्धिपूर्वक प्रवृत्ति दिखाई देती है। जैसा
कि इसने अपना दाहिना पैर उठाकर, जय शब्द का उच्चारण करते हुए, मेरे
प्रति इतने स्पष्ट अक्षरों में यह 'आर्या' (छंद) गाया है। प्रायः पशु
और पक्षी केवल आहार, मैथुन, निद्रा और भय जैसी संज्ञाओं को ही जानते
हैं, लेकिन यह तो बहुत ही अद्भुत है।"
जब राजा ने ऐसा कहा, तब मंत्री कुमारपालित ने थोड़ा मुस्कुराते हुए राजा
से कहा— "देव, इसमें आश्चर्य कैसा? यह तो आप जानते ही हैं कि शुक और
मैना जैसे पक्षी विशेष रूप से सुनी हुई वाणी का वैसा ही उच्चारण कर
लेते हैं।
उसमें भी पिछले जन्म के संस्कारों के कारण या फिर मनुष्य के विशेष यत्न
(प्रशिक्षण) के कारण वाणी में ऐसा निखार आ जाता है, अतः इसमें बहुत
अधिक आश्चर्य नहीं है। वैसे भी, प्राचीन काल में इन पक्षियों की वाणी
भी मनुष्यों की तरह ही स्पष्ट हुआ करती थी, परंतु किसी श्राप के कारण
शुकों की वाणी अस्पष्ट हो गई और हाथियों की जीभ उलट गई।"
जब वे ऐसा कह ही रहे थे, तभी आकाश के मध्य में सूर्य के पहुँचने की
सूचना देने वाला, नगाड़ों और शंख की ध्वनि के साथ दोपहर का शंखनाद गूँज
उठा। उसे सुनकर और स्नान का समय निकट जानकर, राजा ने उपस्थित राजसभा को
विसर्जित किया और स्वयं आस्थान-मण्डप (सभा भवन) से उठ खड़े हुए।
जैसे ही राजा चले, वहाँ उपस्थित अन्य राजाओं के जल्दबाजी में उठने से
उनके बाजूबंदों और आभूषणों की झंकार होने लगी। उनके हिलते हुए कंठहारों
और वस्त्रों से केसर की धूल उड़ने लगी जिससे दिशाएँ रंगीन हो गईं। उनके
सिर पर लगे मालती के फूलों पर भँवरे मँडराने लगे और कानों के कुंडल
उनके गालों को चूमने लगे...।
बाणभट्ट की 'कादम्बरी' संस्कृत साहित्य में अपनी अलंकारिक और जटिल
गद्य शैली के लिए विश्वविख्यात है। बाणभट्ट के बारे में कहा जाता है— "बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्" (अर्थात् संसार का सारा ज्ञान बाण की जूठन
है)।
'कादम्बरी' में प्रयुक्त
मुख्य अलंकारों का विवरण यहाँ दिया गया है:
1. श्लेष अलंकार (Pun)
यह बाणभट्ट का सबसे प्रिय अलंकार है। इसमें एक ही शब्द के दो या दो से
अधिक अर्थ निकलते हैं।
उदाहरण: 'विमुक्ताहारम्' शब्द का प्रयोग (पेज 12)। इसके दो
अर्थ हैं— 'मोतियों का हार त्याग देना' और 'भोजन का त्याग करना'। राजा के
शत्रुओं की स्त्रियाँ हार भी त्याग देती हैं और शोक में भोजन भी।
2. परिसंख्या अलंकार (Exclusion)
इस अलंकार का प्रयोग बाणभट्ट ने राजा शूद्रक के राज्य की आदर्श स्थिति
बताने के लिए किया है (पेज 5)। इसमें दिखाया जाता है कि कोई 'बुराई' समाज
में नहीं, बल्कि केवल कला या प्रकृति में है।
उदाहरण: "चित्रकर्मसु वर्णसंखरा" (रंगों का मिश्रण केवल
चित्रों में है, समाज में वर्ण-संकरता या अशुद्धता नहीं है)। "शास्त्रेषु
चिन्ता" (चिंता केवल शास्त्रों के अर्थ समझने में है, मानसिक कष्ट के रूप
में नहीं)।
3. उत्प्रेक्षा अलंकार (Poetic Fancy)
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाए। बाणभट्ट छोटी-सी बात में
भी दैवीय संभावना ढूँढ लेते हैं।
उदाहरण: चाण्डाल कन्या के सांवले रंग को देखकर वे कल्पना
करते हैं कि मानो 'अग्निदेव ने उसे शुद्ध करने के लिए गले लगा लिया हो'
या वह 'चलती-फिरती नीलम की प्रतिमा' हो (पेज 10-11)।
4. उपमा अलंकार (Simile)
बाणभट्ट उपमा देने में अत्यंत निपुण हैं। वे अक्सर 'इव' शब्द का प्रयोग
करके वस्तुओं की तुलना करते हैं।
उदाहरण: "केसरिकिशोरकैरिव" (सिंह के बच्चों के समान तेजस्वी
राजपुत्र) या "गङ्गास्रोतेसेव" (काली गर्दन पर सफेद मोतियों का हार जैसे
यमुना में गंगा की धारा)।
5. विरोधाभास अलंकार (Paradox)
जहाँ दो विपरीत बातें एक साथ कही जाएँ।
उदाहरण: चाण्डाल कन्या के वर्णन में वे कहते हैं कि वह
'दिव्य' (ईश्वरीय) भी है और 'अकुलीना' (नीच कुल की) भी। वह 'आलेख्यगता'
(चित्र के समान) है जिसे केवल देखा जा सकता है, स्पर्श नहीं किया जा
सकता।
6. अतिशयोक्ति अलंकार (Hyperbole)
किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहना।
उदाहरण: राजा के प्रताप का वर्णन करते हुए कहना कि उनके
क्रोध की अग्नि शत्रुओं की पत्नियों के हृदय में जल रही है, जबकि वे
स्वयं उनसे कोसों दूर हैं।
निष्कर्ष
बाणभट्ट की अलंकार योजना केवल सजावट नहीं है, बल्कि वह पाठक के सामने एक
भव्य दृश्य खड़ा कर देती है। उनकी शैली को 'पाञ्चाली रीति' कहा जाता
है, जहाँ शब्द और अर्थ दोनों समान रूप से प्रभावशाली होते हैं।
'कादम्बरी' का हर वाक्य एक चित्र की तरह है जिसे अलंकारों के रंगों से
सजाया गया है।