कादम्बरी कथामुखम्: राजा शूद्रक, वैशम्पायन तोता और शबर सेनापति का वर्णन 02

 

कादम्बरी कथामुखम्: राजा शूद्रक, वैशम्पायन तोता और शबर सेनापति का वर्णन 02

विषय सूची (Table of Contents)

[1] वैशम्पायन का आगमन और राजा शूद्रक की जिज्ञासा

राजा शूद्रक द्वारा तोते से उसके जन्म और अतीत के विषय में प्रश्न।

[2] विन्ध्याटवी वन का अलंकृत वर्णन

पृथ्वी की मेखला के समान विशाल विन्ध्य जंगल की भव्यता।

[3] अगस्त्य मुनि का आश्रम और पावन पंचवटी

महर्षि अगस्त्य का प्रभाव और भगवान राम के वनवास की स्मृतियाँ।

[4] पम्पा सरोवर का अनुपम सौंदर्य

नीले कमलों और राजहंसों से सुशोभित दिव्य जलाशय का चित्रण।

[5] प्राचीन शाल्मली वृक्ष: पक्षियों का आश्रय स्थल

हज़ारों शुक-कुलों का निवास और विशाल सेमल वृक्ष की विशेषताएँ।

[6] शुक-शावक का बचपन और करुण वृत्तान्त

माता का देहान्त और वृद्ध पिता द्वारा किया गया पालन-पोषण।

[7] वन में भयानक मृगया (शिकार) का प्रारम्भ**

जंगल के शांत वातावरण में अचानक उठा शिकारियों का कोलाहल।

[8] शबर सेना और सेनापति मातङ्गक का उदय**

भील सेना का आतंक और क्रूर सेनापति के व्यक्तित्व का सूक्ष्म चित्रण।

कादम्बरी कथामुखम् (Kadambari Kathamukham)

​बाणभट्ट की गद्य शैली (Banabhatta Prose Style)

​विन्ध्याटवी वर्णन (Vindhyatavi Varnanam)

​पम्पा सरोवर और शाल्मली वृक्ष (Pampa Sarovar & Shalmali Tree)

​शबर सेनापति मातङ्गक (Shabar Senapati Matangak)

​संस्कृत साहित्य का इतिहास (Sanskrit Literature)

​वैशम्पायन शुक वृत्तान्त (Vaishampayan Shuk Vruttant)

शुद्ध संस्कृत पाठ (संशोधित)

"...नृपणामुत्थासानामहमहमिकया वक्षःस्थलप्रेङ्खितहारलतानामुत्तिष्ठतामासीदतिमहान्संभ्रमो महीपतीनाम्। इतस्ततश्च निष्पतन्तीनां स्कन्धदेशासक्तचामराणां चामरग्राहिणीनां कमलुमधुपानमत्तकलहंसनादेन पदे पदे रणितमणीनां मणिनू पुराणां निनादेन, वारविलासिनीजनस्य संचरतो जघनस्थलास्फालनरसितरत्नमाणिक्यानां मेखलानां मनोहारिणा झंकारेण, नूपुररवाकृष्टानां च धवलतस्तस्तमण्डपसोपानफलकानां भवनदीर्घिकाकलहंसकानां कोलाहलेन, रसनारसितोत्सुकितानां च तारतरविराविणामुद्धूयमानकांस्यकलाचीदीर्घेण गृहसारसानां कूजितेन, सरभसप्रचलितसामन्तचरणतलाभिहतस्य चास्थानमण्डपस्य निषादनिर्घोषगम्भीरेण कम्पयतेव वसुमतीं ध्वनिना, प्रतीहाराणां च पुरः ससंभ्रमं समुत्सारितजनानां दण्डिनां समारब्धहेमुदैरारयताम् 'आलोकयत आलोकयत' इति तारतरविराविणा भवनप्रासादकुञ्जप्रतिशब्दतया दीर्घतामुपगतेनालोकशब्देन, सह च संभ्रमावर्जितमौलिठुठच्चूडामणीनां प्रणमताममलमणिशालादन्तुराभिः किरीटकोटिभिरुलिख्यमानस्य मणिकुट्टिमस्य स्वनेन, प्रणामपर्यस्तानामतिकठिनमणिकुट्टिमनिपतितरणरणायितानां च मणिकर्णपूराणां निनादेन, मङ्गलपाठकानां च पुरोयायिनां 'जय जीव' इति मधुरवचनानुयातेन पठतां दिगन्तव्यापिना कलकलेन, प्रचलितजनचरणशतसंक्षोभमयादपहाय कुसुमप्रकरमुत्पततां च मधुपारावातानां मधुरहुंकृतेन, संभ्रमादतित्वरितपदप्रवृत्तैर्महीपतिभिः केयूरकोटिताडितानां क्वणितमुखररदाम्नां च मणितम्भानां रणितेन सर्वतः क्षुभितमिव तदास्थानभवनमभवत्। अथ विसर्जितराजलोको 'विश्राम्यताम्' इति स्वयमेवाभिधाय..."

बाणभट्ट द्वारा रचित 'कादम्बरी' का यह अंश राजसभा (आस्थान मण्डप) के विसर्जन के समय की गहमागहमी का अत्यंत सजीव चित्रण है। इसका पूर्ण हिन्दी अनुवाद नीचे दिया गया है:

हिन्दी अनुवाद

जब राजा (शूद्रक) सभा से उठने लगे, तब:

"मैं पहले, मैं पहले" (अहमहमिका) की होड़ में एक साथ उठते हुए अन्य राजाओं में भारी खलबली मच गई, जिनके वक्षस्थल पर हार हिल रहे थे। इधर-उधर दौड़ती हुई उन चँवर-ग्राहिणियों (चँवर डुलाने वाली परिचारिकाओं) के मणियों वाले नूपुरों की आवाज़, जो कमलों का रस पीकर मतवाले हुए हंसों के स्वर जैसी मधुर थी, प्रत्येक कदम पर गूँजने लगी।

इधर-उधर घूमती हुई वारांगनाओं (नर्तकियों) की कटि-मेखलाओं (करधनियों) के मणियों और माणिक्यों के आपस में टकराने से उत्पन्न मनोहर झंकार सुनाई देने लगी। नूपुरों की आवाज़ से आकर्षित होकर राजभवन की बावड़ियों के कलहंस सफ़ेद मण्डप की सीढ़ियों पर कोलाहल करने लगे। करधनियों की आवाज़ सुनकर (उसे अपनी जाति की पुकार समझकर) चहकने वाले पालतू सारस पक्षियों की वैसी ही गूँज उठने लगी जैसे किसी काँसे के पात्र पर चोट करने से दीर्घ स्वर निकलता है।

तेजी से चलते हुए सामंतों के चरणों की धमक से आस्थान-मण्डप (राजसभा) में वैसी ही गम्भीर ध्वनि गूँजने लगी, जो मानो पृथ्वी को कँपा रही हो। द्वारपालों ने भीड़ को हटाते हुए ऊँचे स्वर में "देखिये! देखिये! (आलोकयत! आलोकयत!) पुकारना शुरू किया, जिसकी प्रतिध्वनि राजमहल के झरोखों और कोनों से टकराकर और भी गहरी हो गई।

प्रणाम करने के लिए झुके हुए राजाओं के मस्तक से लुढ़कती हुई चूडामणियों और उनके किरीटों (मुकुटों) के अग्रभाग जब मणियों से जड़े हुए फर्श (मणिकुट्टिम) को कुरेदने लगे, तो उससे एक विशिष्ट रगड़ की आवाज़ उत्पन्न हुई। प्रणाम के लिए झुकते समय नीचे फर्श पर गिरकर झनझनाते हुए मणियुक्त कान के कुण्डलों (कर्णपूर) का स्वर भी उसमें मिल गया।

आगे चलते हुए मंगल-पाठक (बंदीजन) "जय हो! चिरंजीवी हों!" के मधुर वचनों के साथ स्तुति गान करने लगे, जिससे चारों दिशाएँ गूँज उठीं। सैकड़ों लोगों के पैरों की हलचल के डर से फूलों के ढेर को छोड़कर उड़ते हुए कबूतरों की 'गुटरगूँ' की आवाज़ आने लगी। हड़बड़ी में अत्यंत तीव्र गति से चलते हुए राजाओं के बाजूबंदों (केयूर) की नोक से टकराकर मणियों के खंभों से झनझनाहट होने लगी।

इस प्रकार, वह राजसभा-भवन उस समय सब ओर से विक्षुब्ध (शोर-शराबे से भरा हुआ) हो गया। इसके बाद, राजा ने उपस्थित राज-समूह को "आप सब विश्राम करें" ऐसा स्वयं कहकर विदा किया और..."

अनुवाद की मुख्य विशेषताएँ:

ध्वन्यात्मकता: बाणभट्ट ने यहाँ केवल दृश्यों का नहीं, बल्कि ध्वनियों का वर्णन किया है—जैसे नूपुरों की छम-छम, पक्षियों का कलरव, और मुकुटों की फर्श पर रगड़।

राजसी वैभव: यह गद्यांश राजा की सत्ता और उसके सामंतों के अनुशासन व सम्मान प्रदर्शन को दर्शाता है।

अलंकार: इसमें 'उत्प्रेक्षा' और 'अनुप्रास' अलंकार की छटा है, जहाँ पक्षियों की आवाज़ की तुलना काँसे के बर्तन की गूँज से की गई है।

यह अंश भी बाणभट्ट की 'कादम्बरी' (कथामुखम्) से है। इसमें राजा शूद्रक की दिनचर्या के अंतर्गत उनके व्यायाम (Exercise) और स्नान (Bath) का अत्यंत अलंकृत वर्णन है।

नीचे इसका शुद्ध संस्कृत पाठ दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...चण्डालकन्यकां वैशम्पायनः प्रवेश्यतामभ्यन्तरमिति, ताम्बूलकरङ्कवाहिनीमादिश्य कतिपयआप्तराजपुत्रपरिवृतो नरपतिरभ्यन्तरं प्राविशत्। अपनीताशेषभूषणश्च दिवसक्षयविगलितकिरणजालश्चन्द्रतारकासमूहशून्य इव गगनाभोगः, समुपाहतसमुचितव्यायामोपकरणां व्यायामभूमिमयासीत्। स तस्यां च समानवयोभिः सह राजपुत्रैः कृतमधुरव्यायामः, श्रमवशादुन्मिषन्तीभिः कपोलयोरीषद्विकसितसिन्धुवारकुसुममञ्जरीविभ्रमाभिः, उरसि इव भ्रमच्छिद्रहारनिगलितमुक्ताफलप्रकरानुकारिणीभिः, ललाटपट्टेऽष्टमीचन्द्रशकलतलोल्लसदमृतबिन्दुविडम्बिनीभिः स्वेदजलकणिकासंततिभिरलङ्क्रियमाणमूर्तिः, इतस्ततः स्नानउपकरणसंपादनसत्वरेण पुरः प्रधावता परिजनेन, तत्कालं विरक्षणेऽपि राजकुले समुत्सारणाधिकारोचितमाचरद्भिर्दण्डिभिरुपदिश्यमानमार्गो, विततसितवितानामनेकचारणगणाबध्यमानमण्डलां गन्धोदकपूर्णकनकमयजलद्रोणासनाथमध्यामुपस्थापितस्फटिकस्नानपीठामेकान्तनिहितैरतिसुरभिगन्धसलिलपूर्णैः परिमलावकृष्टमधुकरकुलान्धकारितमुखैरातपमयान्नीलकर्पेटावगुण्ठितमुखैरिव स्नानकलशैरुपशोभितां स्नानभूमिमगच्छत्। अवतीर्णस्य जलद्रोणीं वारविलासिनीकरमदितसुगन्धामलकप्रक्षालितशिरसो राज्ञः समन्तात्समुपतस्थुः अंशुकनिबिड़बद्धस्तनपरिकराः दूरसमुत्सारितवलयबाहुलताः समुत्क्षिप्तकर्णाभरणाः कर्णोत्सङ्गोत्सारितालका गृहीतजलकलशाः स्नानाय अभिषेकदेवता इव वारयोषितः। ताभिश्च समुन्नतकुचकुम्भमण्डलाभिर्वारिमध्यप्रविष्टः करििणीभिरिव वनकरी परीतः स राजा रराज। जलद्रोणीसलिलादुत्थाय च स्नानपीठममलस्फटिकधवलं वरुण इव राजहंसमारुह्य..."


हिन्दी भावार्थ

राजा शूद्रक ने चांडाल कन्या और तोते (वैशम्पायन) को भीतर ले जाने का आदेश दिया और स्वयं अपने विश्वसनीय राजकुमारों के साथ महल के भीतर चले गए। उन्होंने अपने आभूषण उतार दिए, जिससे वे वैसे ही लग रहे थे जैसे सूर्यास्त के बाद बिना किरणों और बिना तारा-मंडल के आकाश होता है।

वे व्यायामशाला में गए और समान आयु के राजकुमारों के साथ हल्का व्यायाम किया। व्यायाम की थकान से उनके शरीर पर पसीने की बूंदें निकल आईं, जो कपोलों पर 'सिन्धुवार' के फूलों जैसी और ललाट पर 'अष्टमी के चंद्रमा' से टपकती अमृत बूंदों जैसी सुशोभित हो रही थीं।

ततपश्चात, वे स्नान-भूमि की ओर बढ़े। वहां सोने के द्रोण (टब) सुगन्धित जल से भरे थे। दासियों ने उनके सिर पर सुगन्धित आँवले का लेप लगाया। रेशमी वस्त्र पहने और अपने गहनों को ऊपर समेटे हुए वे दासियाँ जल के कलश लेकर राजा को घेरकर खड़ी हो गईं, मानो साक्षात 'अभिषेक की देवियाँ' हों। उन स्त्रियों के बीच राजा ऐसे सुशोभित हुए जैसे हथिनी के बीच वन-गजराज (जंगली हाथी) शोभा पाता है। अंत में जल से निकलकर वे स्फटिक के सफ़ेद स्नान-पीठ पर बैठ गए।
यह गद्यांश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के 'शूद्रक-वर्णन' प्रसंग से है, जहाँ राजा के अभिषेक (स्नान) और उसके बाद की पूजा-भोजन विधि का अत्यंत आलंकारिक चित्रण किया गया है।

नीचे इसका शुद्ध संस्कृत पाठ और पूर्ण हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...ररोह। ततस्ताः, काश्चिन्मरकतकलशप्रभाश्यामायमाना निन्युरिव मूर्तिमतः पातालपङ्काः, काश्चिद्रजतकलशहस्ता रजनिमिवामृतमयमरीचिचन्द्रमण्डलविनिर्गतेन ज्योत्स्नाप्रवाहेण, काश्चित्कलशविक्षेपश्रमस्वेदार्द्रशरीरा जलदेवता इव स्फाटिकैः कलशैस्तीर्थजलेन, काश्चिन्मलयसारत इव चन्दनरसमिश्रेण सलिलेन, काश्चिदुत्क्षिप्तकलशपाश्र्वविन्यस्तहस्तपल्लवाः प्रकीर्यमाणनखमयूखजालकाः प्रसवमुखविवरविनिर्गतजलधाराः सलिलयन्त्रदेवता इव, काश्चिद्जाड्यमपनेतुमातपेनेव दिवसश्रिय इव कनककलशहस्ताः कुङ्कुमजलेन वाराङ्गनाः क्रमेण राजानमभिषिषिचुः।
अनन्तरमुदपादि च स्फोटयन्निव श्रुतिपथमनेकप्रहतपटुपटहझल्लरीमृदङ्गवेणुवीणागीतनिनादानुगम्यमानो बन्दिबृन्दकोलाहलानुगतो भुवनविवरव्यापी स्नानशङ्खानापूर्यमाणानामतिमुखरो ध्वनिः। एवं च क्रमेण निर्वर्तित-अभिषेको विषधरनिर्मोकपरिलघुनी धवले परिधाय धौतवाससी, क्षीरदम्बरैकदेश इव जलक्षालनविमलतरतिर्यग्वृत्तधवलजलधरच्छेदच्छविना दुकूलपटपल्लवेन तुहिनगिरिरिव गगनसलिलोत्सिक्तशिरोवेष्टनः संपादितपितृयज्ञक्रियः मन्त्रपूतेन तोयेन दिवसकरमभिप्रणम्य देवगृहमगमत्। उपस्पृष्टपरिजनश्च निष्क्रम्य देवगृहात्, अभिहितविलेपनभूमौ झंकारिभिरलकुलैरभिद्रुयमानपरिमलेन मृगमदकर्पूरवाससुरभिणा चन्दनेनानुुलिप्तसर्वाङ्गो विरचितामोदमालतीकुसुमशेखरः कृताम्बरपरिवर्तो रत्नमात्रभरणः समुचितमोजनैः सह भूपतिभिराहारमभिमतरसास्वादजातप्रीतिरवनिपो निर्वर्तयामास। अपनीतधूपधूमविलुप्तदृष्टिश्च गृहीतताम्बूलस्तस्मात्सृष्टमणि..."

हिन्दी अनुवाद

जब राजा स्फटिक के स्नान-पीठ पर बैठ गए, तब:
उन वाराङ्गनाओं (सुन्दरियों) ने क्रम से राजा का अभिषेक (स्नान) शुरू किया। उनमें से कुछ स्त्रियाँ मरकत (पन्ने) के घड़ों की प्रभा से ऐसी साँवली लग रही थीं मानो पाताल की कीचड़ मूर्तिमान होकर जल उड़ेल रही हो। कुछ स्त्रियाँ हाथों में चाँदी के कलश लिए ऐसी लग रही थीं मानो रात के समय चन्द्रमण्डल से निकली हुई अमृतमयी चाँदनी की धारा बहा रही हों। कुछ स्त्रियाँ घड़े उठाने के श्रम से पसीने में भीग गई थीं, जो साक्षात् 'जल-देवताओं' के समान स्फटिक के कलशों से तीर्थ-जल डाल रही थीं।

कुछ स्त्रियाँ चन्दन-रस मिले हुए शीतल जल से, तो कुछ सोने के कलशों से कुङ्कुम (केसर) मिश्रित जल से राजा को स्नान करा रही थीं। वे ऐसी लग रही थीं मानो दोपहर की धूप की गर्मी दूर करने के लिए साक्षात् 'दिन की शोभा' (दिवस-श्री) प्रकट हो गई हो।

इसके बाद, कानों के पर्दों को फाड़ देने वाला गूँजता हुआ स्वर उठा। अनेक नगाड़ों, झल्लरी, मृदङ्ग, बाँसुरी और वीणा के संगीत के साथ वन्दीजनों (स्तुति करने वालों) का जयघोष मिल गया। चारों दिशाओं में शंखों का गम्भीर शब्द गूँजने लगा। इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान करने के बाद, राजा ने साँप की केंचुल के समान पतले और सफ़ेद दो वस्त्र (धोती और उत्तरीय) धारण किए।

स्नान के बाद उन्होंने अपने पूर्वजों का तर्पण (पितृयज्ञ) किया और मन्त्रों से पवित्र जल द्वारा सूर्य देव को अर्ध्य देकर प्रणाम किया। इसके बाद वे देवमन्दिर (पूजा घर) गए। वहाँ से निकलकर, चन्दन लगाने के स्थान पर उन्होंने कस्तूरी और कपूर की सुगन्ध वाला चन्दन अपने शरीर पर लगाया, जिसकी महक पर भौंरे मंडरा रहे थे। उन्होंने मालती के फूलों का सेहरा (शेखर) पहना, वस्त्र बदले और केवल रत्नजड़ित हल्के आभूषण धारण किए।

तत्पश्चात, राजा ने अन्य राजाओं के साथ बैठकर मनपसंद स्वादिष्ट भोजन किया। भोजन के उपरांत सुगन्धित धूप ली, जिससे उनकी आँखें थोड़ी धुंधली हुईं (धूम्र के कारण), और फिर ताम्बूल (पान) ग्रहण कर वे मणियों से जड़े हुए..."

प्रमुख संस्कृत शब्द और अर्थ:

 विषधरनिर्मोकपरिलघुनी: साँप की केंचुल के समान अत्यंत हल्का और बारीक वस्त्र।

 दिवसकरमभिप्रणम्य: सूर्य देव को प्रणाम करके।

 मृगमदकर्पूर: कस्तूरी और कपूर।

 मालतीकुसुमशेखरः मालती के फूलों का मुकुट या माला।

 दुकूलपट: रेशमी वस्त्र।

यह गद्यांश 'कादम्बरी' के 'कथामुख' भाग से है। इसमें राजा शूद्रक के स्नान और भोजन के बाद के विश्राम तथा वैशम्पायन (तोते) के साथ दोबारा मिलने का वर्णन है।

नीचे इसका शुद्ध संस्कृत पाठ और पूर्ण हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...शयनादुत्थाय नातिदूरवर्तिन्या ससंभ्रमप्रधावितया प्रतीहार्या प्रसारितबाहुमवलम्ब्य, अनवरतवेत्रलताग्रहणप्रसङ्गातिजरठकिसलयाङ्कुराकारकरतलकरेणाभ्यन्तरसंचारसमुचितेन परिजनेनानुगम्यमानो, धवलांशुकयवनिकापरिगतपर्यन्ततया स्फटिकमणिमयभित्तिवेष्मिवोपलक्ष्यमाणम्, अतिसुरभिणा मृगनाभिपिरिमितेनामोदिना चन्दनवारिणा सिक्तशिशिरमणिभूमिम्, अविरलविप्रकीर्णेन विमलमणिकुट्टिमगगनतलतारागणेनेव कुसुमोपहारेण निरन्तरनिचितमुत्कीर्णशालभञ्जिकाधिरुह्यमाणमिव संनिहितमृददेवतेनेव गन्धसलिलक्षालितेन कलधौतमयेन स्तम्भसंचयेन विराजमानम्, अतिबहलागुरुधूपपरिमलमिलितविगलितजलनिवहधवलजलधरशकलानुकारिणा कुसुमामोदवासितप्रच्छदपटेन पटोपधानाध्यासितशिरोधान्ना मणिमयप्रतिपादुकाप्रतिष्ठितपादेन पार्श्वस्थरत्नपादपीठेन तुहिनगिरिशिलातलसदृशशयनेन सनाथीकृतवेदिकं मुक्त्वास्यानमण्डपमयासीत्।
तत्र च कूर्परतलनषण्णः, क्षितितलोपविष्टया शनैः शनैरुरूसङ्गनिहितसिरालालतया सङ्वाहिन्या नवनलिनकोमलेन करसंपुटेन संवाह्यमानचरणः, तत्कालोचितदर्शनैर्महीपतिभिरासेव्यमानः, सह तास्ताः कथाः कुर्वन्मुहूर्तमिवासांचक्रे। ततो नातिदूरवर्तिनीमन्तःपुरवैशम्पायनमादायागच्छेति समुत्जाततद्वृत्तान्तप्रश्रकुतूहलो राजा प्रतीहारीमादिदेश। सा क्षितितलनिहितजानुकरतला 'यथाज्ञापयति देव' इति शिरसि कृत्वाज्ञां यथादिष्टमकरोत्।
अथ मुहूर्तादिव वैशम्पायनः प्रतीहार्या गृहीतपञ्जरः कनकवेत्रलतावलम्बिना किंचिद्वनतपूर्वकायेन सितकञ्चुकावच्छन्नवपुषा जराधवलितमौलिना गद्गदस्वरेण मन्दमन्दसंचारिणा विहगजातिपरिचितयेव कंचुकिनानुगम्यमानो राजान्तिकमाजगाम।"

हिन्दी अनुवाद

जब राजा भोजन के उपरांत अपने विश्राम कक्ष की ओर बढ़े:
"राजा अपने बिस्तर (शयन) से उठे और पास ही खड़ी दौड़कर आई हुई **प्रतीहारी (द्वारपालिका)** के फैलाए हुए हाथ का सहारा लिया। उनके साथ भीतर के कार्यों में कुशल परिचारक चल रहे थे, जिनके हाथ निरंतर वेत्रलता (बेंत) पकड़ने के कारण कठोर हो गए थे। वह विश्राम स्थल सफ़ेद रेशमी पर्दों से घिरा होने के कारण स्फटिक की दीवारों वाले महल जैसा लग रहा था। वहाँ की मणियों वाली शीतल भूमि को कस्तूरी मिले हुए सुगन्धित चन्दन-जल से सींचा गया था।

फर्श पर बिखरे हुए फूलों के ढेर ऐसे लग रहे थे मानो स्वच्छ मणिकुट्टिम (फर्श) रूपी आकाश में तारों का समूह बिखरा हो। वहाँ सोने के खंभों का समूह था, जिन पर सुंदर पुतलियाँ (शालभञ्जिका) उत्कीर्ण थीं, जिन्हें देखकर लगता था मानो साक्षात् वन-देवता वहाँ उपस्थित हों। अगरू का घना धुआँ सफ़ेद बादलों के टुकड़ों जैसा लग रहा था। राजा ने फूलों की गंध से महकते हुए बिस्तर, जिस पर सुंदर तकिये लगे थे और जो हिमालय की शिला के समान शीतल और भव्य था, उस पर बैठकर थोड़ा विश्राम किया।

वहाँ राजा अपनी कोहनी टिकाकर बैठ गए। फर्श पर बैठी हुई एक परिचारिका ने राजा के चरणों को अपनी गोद में रखकर, अपने नवीन कमल जैसे कोमल हाथों से धीरे-धीरे दबाना (चरण-सेवा) शुरू किया। उस समय वहाँ उपस्थित अन्य राजाओं के साथ राजा शूद्रक विभिन्न विषयों पर वार्तालाप करते रहे। तभी, वैशम्पायन (तोते) के वृत्तान्त को विस्तार से जानने की उत्सुकता में राजा ने प्रतीहारी को आदेश दिया—'अन्तःपुर से वैशम्पायन को यहाँ ले आओ।' प्रतीहारी ने घुटने टेककर और हाथ जोड़कर 'जैसी देव की आज्ञा' कहते हुए आदेश स्वीकार किया।

थोड़ी ही देर में, वैशम्पायन तोते का पिंजरा लिए हुए प्रतीहारी वापस आई। उसके साथ एक वृद्ध कंचुकी (महल का रक्षक) था, जिसने सफेद वस्त्र धारण किए थे, बुढ़ापे के कारण जिसका सिर सफेद हो गया था, जो सोने की लाठी का सहारा लेकर झुककर धीरे-धीरे चल रहा था और जिसकी आवाज़ गदगद थी। वह कंचुकी राजा के समीप आया।"

विशेष टिप्पणी:

 शालभञ्जिका: प्राचीन भारतीय वास्तुकला में खंभों पर बनी स्त्रियों की सुंदर आकृतियाँ।

 कंचुकी: राजमहलों में अन्तःपुर की रक्षा करने वाला वृद्ध और विश्वसनीय कर्मचारी।

 उपमा: बाणभट्ट ने बिस्तर की तुलना 'तुहिनगिरि' (हिमालय की बर्फानी शिला) से की है, जो उसकी शीतलता और राजसी सुख को दर्शाता है।

यह गद्यांश 'कादम्बरी' के उस रोचक प्रसंग का है जहाँ वैशम्पायन (तोता) भोजन के उपरांत राजा शूद्रक के पास लौटता है और राजा उससे उसके जीवन के रहस्यों के बारे में प्रश्न पूछते हैं।

नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...निवेदितकरतलस्तु कञ्चुकी राजानं व्यज्ञापयत्— 'देव! देव्यो विज्ञापयन्ति— देवादेशादेष वैशम्पायनः स्नातः कृतआहारश्च देवतपादं प्रतीहार्यानीतः।' इत्यभिधाय गते च तस्मिन् राजा वैशम्पायनपृच्छत्— 'कच्चिदभिमतमास्वादितमभ्यन्तरे भवता? कच्चित्कुशलमागतमिति?'
स प्रत्युवाच— 'देव! किं वा नास्वादितम्? आमत्तकोकिललोचनच्छविनीलपाटलः कषायमधुरः प्रकाममापीतो जम्बूफलरसः। हरिनखरविभिन्नमत्तमातङ्गकुम्भमुक्तारक्तार्द्रमुक्ताफलत्विषि खण्डितानि दाडिमीबीजानि। नलिनीदलहरन्ति द्राक्षाफलस्वादूनि च दलितानि स्वेच्छया प्राचीनामलकीफलानि। किं वा प्रलपितेन बहुना? सर्वमेव देवीभिः स्वयं करतलोपनीयमानममृतायते।'
इत्येवंवादिनो वचनमाक्षिप्य नरपतिरब्रवीत्— 'आस्तां तावत्सर्वमेवेदम्। अपनयतु नः कुतूहलम्। आवेदयतु भवानादितः प्रभृति कार्त्स्न्येनात्मनो जन्म। कस्मिन्देशे भवान् जातः? केन वा नाम कृतम्? का माता? कस्ते पिता? कथं वेदानामागमः? कथं शास्त्राणां परिचयः? कुतः कलाः समासादिताः? किं जन्मान्तरानुस्मरणमुत वरप्रदानम्? अथवा विहगवेषधारी कश्चिन्मुनिरसि? क्व वा पूर्वमुषितम्? कियद्वा वयः? कथं पञ्जरबन्धः? कथं चाण्डालहस्तगमनम्? इह वा कथमागमनमिति?'
वैशम्पायनस्तु स्वयमुपजातकुतूहलेन सबहुमानमवनिपतिना पृष्टो मुहूर्तमिव ध्यात्वा सादरमब्रवीत्— 'देव! महतीयं कथा। यदि कौतुकमाकर्ण्यताम्'।"

हिन्दी अनुवाद

जब कंचुकी ने राजा के समीप आकर प्रणाम किया, तो उसने निवेदन किया:
"हे देव! रानियों ने कहलाया है कि आपकी आज्ञा से यह वैशम्पायन स्नान कर चुका है और भोजन भी कर लिया है। अब इसे प्रतीहारी (द्वारपालिका) के माध्यम से आपके चरणों में भेज दिया गया है।"

कंचुकी के जाने के बाद राजा ने वैशम्पायन से पूछा— "क्या तुमने अन्तःपुर में अपनी पसंद का भोजन किया? क्या सब कुशल तो है?"

वैशम्पायन ने उत्तर दिया— "हे देव! मैंने क्या नहीं चखा? मदमस्त कोयल की आँखों जैसी आभा वाले, नीले-लाल और कसैले-मीठे **जामुन के रस** का मैंने जी भरकर पान किया। सिंह के नाखूनों से फाड़े गए मतवाले हाथी के मस्तक से निकले हुए रक्त-रंजित मोतियों जैसी कान्ति वाले अनार के दानों को मैंने खाया। कमलिनी के पत्तों जैसे हरे और अंगूर जैसे मीठे ताजे आँवलों को मैंने अपनी इच्छा के अनुसार चखा। अधिक क्या कहूँ? जब रानियाँ स्वयं अपने हाथों से भोजन कराती हैं, तो सब कुछ अमृत के समान हो जाता है।"

उसकी बातें सुनकर राजा ने कहा— "यह सब तो ठीक है, पर अब तुम मेरी जिज्ञासा शांत करो। तुम आरंभ से अपना पूरा वृत्तान्त सुनाओ। तुम्हारा जन्म किस देश में हुआ? तुम्हारा नामकरण किसने किया? तुम्हारी माता कौन है और पिता कौन? तुम्हें वेदों का ज्ञान कैसे हुआ? शास्त्रों का परिचय कैसे मिला? इतनी कलाएँ कहाँ से सीखीं? क्या यह पिछले जन्म की यादें हैं या किसी वरदान का फल है? या फिर तुम पक्षी का वेष धारण किए हुए कोई मुनि (ऋषि) हो? तुम पहले कहाँ रहते थे? तुम्हारी आयु कितनी है? तुम पिंजरे में कैसे फँसे? चांडालों के हाथ कैसे लगे और यहाँ तुम्हारा आना कैसे हुआ?"

राजा द्वारा बड़े सम्मान और उत्सुकता से पूछे जाने पर, वैशम्पायन ने थोड़ी देर ध्यान किया (सोचा) और आदरपूर्वक कहा— "हे देव! यह कथा बहुत बड़ी है। यदि आपमें सुनने की उत्सुकता है, तो सुनिए।"

अनुवाद की मुख्य बातें:

 बिम्ब-विधान: बाणभट्ट ने अनार के दानों की तुलना सिंह द्वारा मारे गए हाथी के मस्तक के रक्त-रंजित मोतियों से की है, जो उनकी अलंकृत शैली का प्रमाण है।

 जिज्ञासा: यहाँ से 'कादम्बरी' की मुख्य कथा (Flashback) शुरू होती है, जहाँ तोता अपने पूर्वजन्म और जीवन की कहानी सुनाना शुरू करता है।

 संवाद शैली: राजा और पक्षी के बीच का संवाद अत्यंत शिष्ट और राजसी मर्यादा के अनुकूल है।

यह अंश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के प्रसिद्ध 'विन्ध्याटवी वर्णन' (विन्ध्य के विशाल जंगल का वर्णन) से है। यहाँ बाणभट्ट ने अपनी श्लेष-प्रधान (एक शब्द के दो अर्थ) शैली में जंगल की तुलना देवताओं, नगरों और पौराणिक पात्रों से की है।

नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...अस्ति पूर्वापरजलनिधिवेलावनलेखाभ्यन्तरमलंकारभूता मेखलेव भुवो, वनकरिकुलमुदजलसेकसंवर्धितैरतिविकचधवलकुसुमनिकरमतया तारागणमिव शिखरदेशेषूद्वहद्भिः पादपैरुपशोभिता, मदकलकुररकुलदृश्यमानमरिचपल्लवा, करिकुम्भकरमृदिततमालकिसलयआमोदिनी, मधुमदोपरक्तकेसरीकपोलकोमलच्छविना संचरदमरदेवताचरणालक्तकरसरञ्जितेनेव पल्लवप्रचयेन संछादिता, शुककुलदष्टदाडिमीफलद्रवार्द्रीकृततलैरतिचपलकपिकम्पिकोटिच्युतपल्लवफलस्तबकैर्अनवरतनिपतितकुसुमरेंणुपांशुलैः पथिकजनरचितखट्वापल्लवसंस्तरैरतिकठोरनारिकेलकेतकीकरीरकेसरपरिगतैः ताम्बूलीलतावनद्धपूगखण्डमण्डलैः लक्ष्मीवासभवनैरिव विराजिता लतामण्डपैः।
उन्मदमातङ्गकपोलस्थल गलितमदसलिलसिक्तैरिव निरन्तरमेलालतावनेन मदगन्धिनान्धकारिता, अलकमखशैलैः (अकलुषजलैः) मुक्ताफलैश्च। शबरसेनापतिभिरभिहन्यमानकेसरिशता प्रेताधिपनगरीव सदासंनिहितयमभीषणा, महिषाधिष्ठिता च। समरोद्यतपताकिनीव बाणासनारोपितशिलीमुखा विमुक्तसिंहनादा च। कात्यायनीव प्रचलितखड्गभीषणा रक्तचन्दनालंकृता च। कर्णीसुतकथेव संनिहितविपुलचला शशोपगता च। कल्पान्तप्रदोषसमयवेव प्रवृत्तनीलकण्ठा पल्लवारुणा च। अमृतमथनवेलेव श्रीद्रुमोपशोभिता वारिणीपरिगता च। प्रावृडिव घनश्यामला अनेकशतह्रदालंकृता च। चन्द्रमूर्तिरिव सततमृक्षसार्थानुगता हरिणाध्यासिता च। राज्यस्थितिरिव चामरमुग्धमृगालव्यजनोपशोभिता समदगजघटापरिपालिता च। गिरितनयेव स्थाणुसंगता मृगपतिसेविता च। जानकीव प्रसूतानुशल्या निशाचरपरिगृहीता च। कामिनीव चन्दनमृगमदपरिमलवाहिनी रुचिराभरणा च..."

हिन्दी अनुवाद

"पृथ्वी के आभूषण के समान, पूर्व और पश्चिम समुद्र के तटों के बीच पृथ्वी की करधनी (मेखला) की तरह विन्ध्याटवी (विन्ध्य का जंगल) स्थित है।

वहाँ के वृक्ष जंगली हाथियों के मद-जल से सींचे जाने के कारण खूब बढ़े हुए हैं और अपनी चोटियों पर खिले हुए सफ़ेद फूलों के समूह को ऐसे धारण करते हैं मानो तारों का समूह हो। मदमस्त 'कुरर' पक्षियों द्वारा जहाँ काली मिर्च के पत्तों को कुतरा जा रहा है। हाथियों द्वारा मसले गए तमाल के पत्तों की महक वहाँ फैली है। वसन्त की मादकता से लाल हुए सिंह के गालों जैसी कान्ति वाले लाल पत्तों के समूह से वह वन ढका हुआ है, जो ऐसा लगता है मानो वन-देवताओं के पैरों के महावर (आलक्तक) से रँग गया हो।

वहाँ तोतों द्वारा कुतरे गए अनार के फलों के रस से धरती गीली है। चंचल बंदरों द्वारा टहनियाँ हिलाने से फूल और पत्तों के गुच्छे निरंतर गिर रहे हैं, जिससे जमीन फूलों के पराग से धूल धूसरित है। पथिकों ने विश्राम के लिए पत्तों की शय्याएँ बनाई हैं। नारियल, केतकी और सुपारी के बागों से घिरा वह जंगल ऐसा लगता है मानो लक्ष्मी का निवास स्थान हो।"

श्लेषमयी तुलनाएँ (Double Meanings):

बाणभट्ट विन्ध्याटवी की तुलना विभिन्न उपमाओं से करते हैं:
        यमराज की नगरी की तरह: जहाँ यमराज (मृत्यु) और महिष (भैंसा) होते हैं, वैसे ही जंगल में 'यम' (सांप) और 'महिष' (जंगली भैंसे) हैं।

        युद्ध के लिए तैयार सेना की तरह: जहाँ धनुष पर 'शिलीमुख' (बाण) चढ़े होते हैं और 'सिंहनाद' (युद्धघोष) होता है, वैसे ही जंगल में 'शिलीमुख' (भौरे) हैं और सिंहों की गर्जना है।

        देवी पार्वती (कात्यायनी) की तरह: जो खड्ग से भीषण लगती हैं और रक्त-चन्दन से सुशोभित हैं, वैसे ही जंगल 'खड्ग' (गेंडा) पशु से डरावना है और लाल चन्दन के वृक्षों से युक्त है।

        प्रलय काल की संध्या की तरह: जहाँ शिव (नीलकण्ठ) ताण्डव करते हैं, वैसे ही जंगल में मोर (नीलकण्ठ) नाच रहे हैं।

        समुद्र मंथन की बेला की तरह: जहाँ 'श्री' (लक्ष्मी) और 'वारुणी' (मदिरा) निकली थी, वैसे ही जंगल में 'श्रीद्रुम' (बिल्व वृक्ष) और 'वारिणी' (जल) है।

        वर्षा ऋतु की तरह: जो बादलों (घन) से श्याम वर्ण की होती है और बिजली (शतह्रदा) से चमकती है, वैसे ही जंगल सघन है और सैकड़ों चम्पक के वृक्षों से सुशोभित है।

        माता सीता (जानकी) की तरह: जो 'कुश-लव' (पुत्रों) को जन्म देने वाली और निशाचरों (रावण) द्वारा घेरी गई थीं, वैसे ही जंगल 'कुश' (घास) और 'निशाचरों' (रात में घूमने वाले जीवों) से भरा है।

 सुन्दर स्त्री की तरह: जो चन्दन और कस्तूरी (मृगमद) की सुगन्ध लगाती है, वैसे ही यह वन चन्दन के पेड़ों और कस्तूरी मृगों की महक से भरा है।"

यह अंश 'कादम्बरी' के 'विन्ध्याटवी' और 'अगस्त्य आश्रम' वर्णन का समापन और परिचय है। इसमें बाणभट्ट ने अपनी प्रसिद्ध श्लेष शैली (एक शब्द के कई अर्थ) का प्रयोग करते हुए विन्ध्य के जंगल की तुलना पौराणिक कथाओं और पात्रों से की है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और पूर्ण हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...विहगभूषिता च। सोत्कण्ठेव विविधपल्लवानिलवीजिता, समदना च। बालग्रीवेव व्याघ्रनखपङ्क्तिमण्डिता, गण्डकाभरणा च। पानभूमिरिव प्रकटितमधुकोशचषकशता, प्रकीर्णविविधकुसुमा च। कल्पितमत्स्यवेलेव महावराहदंष्ट्रासमुत्खातधरणिमण्डला। कपिद्वरामुखनगरीव चटुलवानरवृन्दभज्यमानतुङ्गशाखकुल। क्वचिदचिरनिर्वृत्तविवाहभूमिरिव हरितकुशसमित्कुसुमशमीपलाशशोभिता। सिंहपतिनादभीतेव कण्टकिता। क्वचिन्मत्तकोकिलकुलप्रलापिनी। क्वचिदुन्मत्तवायुवेगकृततालशब्दा। क्वचिद्विधवेवोन्मुक्ततालपत्रा। क्वचित्समरभूमिरिव शरशतनिचिता। क्वचिदमरपतितनुरिव नेत्रसहस्रसंकुला। क्वचिन्नारायणमूर्तिरिव तमालनीला। क्वचित्सार्थरथपताकेव वानराक्रान्ता। क्वचिदवनिपतिद्वारभूमिरिव वेत्रलताशतदुष्प्रवेशा। क्वचिद्विराटनगरीव कीचककुलवृता। क्वचिदम्बरश्रीरिव व्याधानुगम्यमानतरलतारकमृगा। क्वचिद्गृहीतव्रतेव दर्भचीरजटावल्कलधारिण्यपरिमितबहलपर्णसंचयापि सप्तपर्णभूषिता, क्रूरसत्त्वापि मुनिजनसेविता, पृथुतरुरपि पवित्रा विन्ध्याटवी नाम।
तस्यां च दण्डकारण्यान्तःपाति सकलभुवनविख्यातमुत्पत्तिक्षेत्रमिव भगवतो धर्मस्य, सुरपतिप्रार्थनापीतसकलसागरसलिलस्य, मेरुमत्सराद्गगनतलप्रसारितविकटशिरःसहस्रेण दिवसकररथगमनपथमपनेतुमभ्युद्यतेनावगणितसकलसुरसमूहवचसा विन्ध्यगिरिणाप्यनुलङ्घिताज्ञस्य, जठरानलजीर्णवातापिदानवस्य, सुरासुरमुकुटमकरपङ्क्तिकोटीचुम्बितचरणरजसो, दक्षिणाशामुखविशेषकस्य, सुरलोकादेकहंकारनिपापितनहुषप्रकटप्रभावस्य भगवतो महामुनेरगस्तस्य मायया लोपामुद्रया स्वयमुपरचितालवालकैः करपुटसलिलसेकसंवर्धितैः सुत-..."

हिन्दी अनुवाद

वह विन्ध्याटवी (विन्ध्य का जंगल) पक्षियों से सुशोभित है। वह किसी 'उत्कण्ठित नायिका' के समान है, जिसे पल्लवों (पत्तों) की वायु से पंखा झला जा रहा हो और जो 'स-मदना' (कामदेव सहित/मदन वृक्षों सहित) हो। वह किसी 'बालक की गर्दन' जैसी है, जो बाघ के नाखूनों के हार (व्याघ्रनख) से सजी हो और 'गण्डक' (गैंड़े/गले का आभूषण) से युक्त हो।

वह किसी 'मधुशाला' (मदिरालय) की तरह है, जहाँ शहद के कोश और चषक (प्याले) रखे हों और फूल बिखरे हों। वह प्रलय काल के समय की उस बेला जैसी है, जब 'महावराह' (भगवान विष्णु) ने अपनी दाढ़ों से पृथ्वी मण्डल को ऊपर उठाया था। वह सुग्रीव की नगरी (किष्किन्धा) जैसी है, जहाँ चंचल वानरों के झुंड ऊँची शाखाओं को तोड़ रहे हैं।

कहीं वह हाल ही में हुए 'विवाह की वेदी' जैसी है, जो हरे कुश, समिधा, फूल और शमी के पत्तों से सजी हो। सिंह की दहाड़ से डरी हुई के समान वह 'कण्टकिता' (काँटों वाली/रोमांचित) है। कहीं मतवाली कोयलों का कलरव है, तो कहीं हवा के वेग से ताड़ के पत्तों की ताली जैसी आवाज़ हो रही है। वह 'विधवा' के समान है जिसने 'तालपत्र' (कानों के आभूषण/ताड़ के पत्ते) त्याग दिए हैं। युद्धभूमि की तरह वह 'शर' (बाणों/शर नामक घास) से भरी है। इन्द्र के शरीर की तरह वह 'सहस्र नेत्रों' (हजार आँखों/इन्द्रायण के फलों) से व्याप्त है। भगवान नारायण की तरह वह 'तमाल' के समान नीली है।

राजा के द्वार की तरह वह 'वेत्रलता' (बेंत की छड़ी/बेंत की झाड़ी) के कारण दुर्गम है। विराट नगर की तरह वह 'कीचकों' (उपचकों/बाँसों) से घिरी है। आकाश की शोभा की तरह वह 'व्याध' (शिकारी/नक्षत्र) और 'मृग' (हिरण/मृगशिरा नक्षत्र) से युक्त है। वह किसी 'व्रतधारी' की तरह है जिसने कुश, जटा और वल्कल (पेड़ों की छाल) धारण किए हों। यद्यपि वह 'सप्तपर्ण' (सात पत्तों वाला वृक्ष/सात पत्ते) से भूषित है, फिर भी अपरिमित पत्तों वाली है; यद्यपि क्रूर जीवों (हिंसक पशुओं) से भरी है, फिर भी मुनियों द्वारा सेवित है—ऐसी वह विन्ध्याटवी है।

उसी वन में दण्डकारण्य के भीतर, भगवान धर्म के जन्मस्थान के समान प्रसिद्ध, महर्षि अगस्त्य का आश्रम है। ये वही अगस्त्य मुनि हैं जिन्होंने: देवताओं की प्रार्थना पर समुद्र का सारा जल पी लिया था।

         विन्ध्याचल पर्वत, जो मेरु पर्वत से ईर्ष्या के कारण आकाश तक बढ़ गया था और सूर्य का मार्ग रोक रहा था, अगस्त्य की आज्ञा के आगे झुक गया।

         जिन्होंने वातापि नामक दानव को अपने पेट की अग्नि से पचा लिया था।

         जिनके चरणों की धूल को देवता और असुर अपने मुकुटों से स्पर्श करते हैं।

         जिन्होंने केवल एक 'हुंकार' से राजा नहुष को स्वर्ग से नीचे गिरा दिया था।

        उनकी पत्नी लोपामुद्र ने स्वयं अपने हाथों से जिन वृक्षों के थालों (आलवाल) को सींचकर बड़ा किया था, वहाँ..."

विशेष टिप्पणी:

        विरोधाभास अलंकार: बाणभट्ट ने यहाँ 'क्रूरसत्त्वापि मुनिजनसेविता' (हिंसक होते हुए भी मुनियों द्वारा सेवित) कहकर बहुत सुंदर विरोधाभास पैदा किया है।

        अगस्त्य मुनि की महिमा: यहाँ अगस्त्य मुनि के उन पराक्रमों का वर्णन है जो पुराणों में प्रसिद्ध हैं, जैसे समुद्र-पान और विन्ध्य-मर्दन।

        प्राकृतिक चित्रण: जंगल का वर्णन करते हुए उसे एक जीवित पात्र (नायिका, बालक, योद्धा) के रूप में प्रस्तुत करना बाणभट्ट की विशेषता है।

यह अंश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के 'पंचवटी' और 'अगस्त्य आश्रम' के वर्णन से संबंधित है। इसमें भगवान राम के वनवास काल की स्मृतियों और उस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता को पौराणिक संदर्भों के साथ जोड़ा गया है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और पूर्ण हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...निर्विशेषैरुपशोभितं पादपैः, सुतेन च गृहीतव्रतेनाषाढिना पवित्रभस्मविरचितत्रिपुण्ड्रकाभरणेन दृशच्चीवरवाससा मुञ्जमेखलाकलितमध्येन गृहीतहरितपर्णपुटेन प्रत्युटजमटता भिक्षां ददतानुसवनं पवित्रीकृतम्। अतिप्रभूतमिध्ममाहरणाच्च यस्य 'इध्मवाह' इति पिता द्वितीयं नाम चकार। दिशि दिशि डक्त्त् (विस्तृत) हरितैश्च कदलीवनैः श्यामलीकृतपरिसरं, समस्ता च कलशयोनिनिपीतसागरमार्गानुगतयेव बद्धवेणिकया गोदावर्या परिगतमाश्रमपदमसीत्।
यत्र च दशरथवचनमनुपालयन्त्यक्तराज्यः दशवदनलक्ष्मीविभ्रमविरामो रामो महामुनिमगस्त्यमनुचरन्सह सीतया लक्ष्मणोपरचितरुचिरपर्णशालः पञ्चवट्यां कंचित्कालं सुखमुवास। चिरशून्येऽपि यत्र शाखानिलीननिभृतपाण्डुकपोतपङ्क्तयोऽग्नितापसामिहोत्रधूमराजय इव लक्ष्यन्ते तरवः। बलिकर्मकुसुमान्युद्धरन्त्याः सीतायाः करतलादिव संक्रान्तो यत्र रागः स्फुरति लताकिसलयेषु। यत्र च पीतोदरिणी जलनिधिजलमिव स्नातुं निखिलमाश्रमान्तविपु विभक्तं महाह्रदेषु। यत्र दशरथसुतनिशितशरनिकरनिपातनिहतरजनिचरबलबहुलरुधिरसिक्तमूलमद्यापि तद्रोगाविद्धनिगीतपलाशमिवाभाति नवकिसलयमरण्यम्।
अधुनापि यत्र जलसमयगम्भीरमभिनवजलधरनिवहनिनादमाकर्ण्य भगवतो रामस्य त्रिभुवनविवरव्यापिनश्चापघोषस्य स्मरन्तो न गृह्णन्ति शष्पकवलमजस्रमश्रुजललुलितदीनदृष्टयो वीक्ष्य शून्या दश दिशो जराजर्जरितविषाणकोटयो जानकीसवंर्धिता जीर्णमृगाः। यस्मिन्ननवरतमृगयाविहतरुषितवनहरिणपरोत्साहित इव कृतसीताविप्रलम्भः कनकमृगो राघवमतिदूरं जहार। यत्र च मैथिलीवियोगदुःखदुःखितौ दशवदन-"

हिन्दी अनुवाद

वह आश्रम पद (अगस्त्य आश्रम) ऐसे वृक्षों से सुशोभित था जो मुनियों के पुत्रों के समान ही पाले गए थे। मुनि के पुत्र (दृढच्युत/इध्मवाह) ने व्रत धारण कर रखा था, मस्तक पर भस्म का त्रिपुण्ड लगा रखा था, वल्कल वस्त्र और मुञ्ज की मेखला धारण की थी। वे कुटिया-कुटिया घूमकर हरे पत्तों के दोने में भिक्षा ग्रहण करते थे। बहुत अधिक समिधा (यज्ञ की लकड़ी) ढोने के कारण उनके पिता ने उनका दूसरा नाम **'इध्मवाह'** रख दिया था। चारों दिशाओं में फैले हुए हरे केले के वनों से वह स्थान श्यामल (हरा-भरा) दिखता था। वह आश्रम **गोदावरी नदी** से घिरा हुआ था, जो ऐसी लग रही थी मानो अगस्त्य मुनि द्वारा पीये गए समुद्र के मार्ग का अनुसरण कर रही हो।

इसी पंचवटी में, पिता दशरथ के वचनों का पालन करने के लिए राज्य त्यागने वाले और रावण की लक्ष्मी के विलास का अंत करने वाले भगवान राम ने महामुनि अगस्त्य के सान्निध्य में वास किया था। वहाँ लक्ष्मण द्वारा बनाई गई सुंदर पर्णशाला में वे सीता के साथ सुखपूर्वक रहे थे।

यद्यपि वह स्थान अब सूना है, फिर भी वहाँ वृक्षों की शाखाओं पर बैठे हुए सफ़ेद कपोत (कबूतरों) की पंक्तियाँ ऐसी लगती हैं मानो अग्निहोत्र के धुएँ की रेखाएँ आज भी वृक्षों पर छाई हों। लताओं के कोमल लाल पत्तों (किसलय) को देखकर ऐसा लगता है मानो पूजा के लिए फूल चुनती हुई सीता जी के हथेलियों की लाली उन पत्तों में समा गई हो। वहां के विशाल सरोवरों में गोदावरी का जल ऐसे भरा है मानो समुद्र का वह जल जिसे मुनि ने पी लिया था, वह स्नान के लिए यहाँ बँट गया हो।

वहाँ का वन आज भी नए लाल पत्तों से ऐसा सुशोभित है मानो दशरथ-पुत्र (राम) के तीखे बाणों से मारे गए राक्षसों के रक्त से उन वृक्षों की जड़ें आज भी सिंचित हों। आज भी वहाँ के बूढ़े मृग (हिरण), जिन्हें माता जानकी ने पाला था, वर्षा ऋतु में बादलों की गम्भीर गर्जना सुनकर भगवान राम के धनुष की टंकार को याद करने लगते हैं। वे घास चरना छोड़ देते हैं और सूनी आँखों से दसों दिशाओं को निहारते हुए करुण विलाप करते प्रतीत होते हैं।

इसी स्थान पर उस स्वर्ण मृग (मारीच) ने सीता के वियोग का षडयंत्र रचा था और राम को आश्रम से बहुत दूर ले गया था। यहीं सीता के वियोग से दुखी..."

प्रमुख विशेषताएँ:

 इध्मवाह: अगस्त्य के पुत्र का नाम, जो कठिन तपस्या और सेवा का प्रतीक है।

 उत्प्रेक्षा: पत्तों की लाली को सीता जी के हाथों की लाली मानना और कबूतरों को यज्ञ का धुआँ मानना बाणभट्ट की उत्कृष्ट कल्पना है।

 रामायण संदर्भ: बाणभट्ट ने पंचवटी के प्राकृतिक सौंदर्य को राम-कथा के करुण और वीर रस से बहुत सुंदरता से जोड़ा है।

यह अंश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के 'पम्पा सरोवर' वर्णन प्रसंग से है। इसमें अगस्त्य आश्रम के समीप स्थित विशाल सरोवर की सुंदरता और राम-लक्ष्मण के वनवास काल की स्मृतियों का अद्भुत चित्रण है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और पूर्ण हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...नयनाभ्यामश्रुशिखिणौ चन्द्रसूर्याविव कबन्धप्रस्तौ समं रामलक्ष्मणौ त्रिभुवनमभयं महतश्चक्रतुः। अरण्यतश्च यस्मिन्दशरथसुतशरनिपातितो योजनबाहोर्बाहुरस्यप्रसादनागतनहुषाजगरकायशङ्कामकरोदभिजिनस्य। जनकतनया च भर्त्रुविरहविनोदनायामुटजाभ्यन्तरलिखिता यत्र रामनिवासदर्शनोत्सुका पुनरिव धरणीतलादुल्लसन्ती वनचरैरद्याप्यालोक्यते।
तस्य चैवंभूतस्य संप्रत्यपि प्रकटोपलक्ष्यमाणपूर्ववृत्तान्तस्यागस्त्याश्रमस्य नातिदूरे जलनिधिपानप्रकुपितवरुणोत्सादितेनागस्त्यमत्सरात्तदाश्रमसमीपवलय इव वेधसा महाजलनिधिरुत्पादितः, प्रलयकालविघटिताष्टदिग्भागसंधिबन्धं गगनतलमिव भुवि निपतितम्, आदिवराहसमुद्धृतधरामण्डलस्थानमिव सलिलपूरितम्, अनवरतमज्जदुन्मदशबरकामिनीकुचकलशलुलितजलम्, उत्तुङ्गशुकनखकठोरगन्धकुसुमारसितसमदसारसम्, अम्बुरुहमधुपानमत्तकलहंसकामिनीकृतकोलाहलम्, अनेकजलचरपतंगपक्षसंचलनचञ्चलितवाचालवीचिमालम्, अनिलोल्लसितकुम्भेभशिखरसीकरलब्धदुर्दिनमदृष्टस्नानावतीर्णभिरम्भःक्रीडारागिणीभिः स्नानमये वनदेवताभिः केशापाशकुसुमैः सुरभीकृतम्, एकदेशावतीर्णमुनिजनापूर्यमाणकमण्डलुजलध्वनिमनोहरम्, उन्मिषदुत्पलवनमध्यचारिभिः सवर्णतया रसितानुमेयैः कादम्बकदम्बकैरासेवितम्, अभिषेकावतीर्णमुनिराजपुण्डरीकचन्दनपूरिषविततरङ्गम्, उपान्तजातकेतकीरजःपटलपाण्डुरतटम्, आसननाश्रमागततापसक्षालिताार्द्रवल्कलकषायपाटलतटम्, उपतटविटपि-पल्लवानिलवीजितमविरलतमालवीथिकान्धकारितमिव बहिनिर्वासितेन संवरता प्रतिदिनम्..."

हिन्दी अनुवाद

"यहीं पर राम और लक्ष्मण ने, जो आँखों से बहते अश्रुओं के कारण ऐसे लग रहे थे मानो राहु (कबन्ध) द्वारा ग्रसे गए सूर्य और चन्द्रमा हों, सम्पूर्ण त्रिभुवन को अभय दान दिया था। इसी वन में दशरथ-पुत्र (राम) के बाणों से कटकर गिरी हुई कबन्ध की योजन भर लंबी भुजा को देखकर लोगों को नहुष (जो अजगर बन गया था) के शरीर होने की शंका होने लगी थी। वनवासियों का कहना है कि कुटिया के भीतर विरह-विनोद के लिए लिखी गई (चित्रित) माता सीता की आकृति आज भी ऐसी दिखती है मानो वह राम के निवास को देखने के लिए पृथ्वी से फिर से प्रकट हो रही हों।

उस अगस्त्य आश्रम के पास, जहाँ के पूर्व वृत्तांत आज भी साक्षात् दिखाई देते हैं, एक विशाल सरोवर (पम्पा सरोवर) स्थित है। इसे देखकर ऐसा लगता है मानो अगस्त्य मुनि द्वारा समुद्र पी लिए जाने से क्रोधित वरुण देव को प्रसन्न करने के लिए ब्रह्मा जी ने दूसरा समुद्र ही यहाँ रच दिया हो।

यह सरोवर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रलय काल में दिशाओं के जोड़ टूट जाने से आकाश ही धरती पर गिर पड़ा हो, या मानो आदि-वराह भगवान द्वारा पृथ्वी को ऊपर उठाने के बाद बचा हुआ गहरा स्थान जल से भर गया हो।

  इस सरोवर का जल मदमस्त शबर स्त्रियों के स्नान करने से आंदोलित रहता है।

  यहाँ के कमलों का रस पीकर मदमस्त हुए कलहंसों की आवाज़ों से कोलाहल मचता रहता है।

  पक्षियों के पंख फड़फड़ाने से लहरों में चंचलता और मधुर ध्वनि व्याप्त रहती है।

  वन-देवता यहाँ स्नान करते हैं, जिससे उनके केशों से गिरे फूलों की सुगंध जल में बस गई है।

  एक ओर किनारे पर मुनिजन अपने कमण्डलु भर रहे हैं, जिससे जल भरने की मधुर ध्वनि सुनाई देती है।

  नीलकमलों के वनों के बीच 'कादम्ब' (हंस विशेष) पक्षी अपने समान रंग के कारण दिखाई नहीं देते, केवल उनकी आवाज़ से ही उनके होने का अनुमान होता है।

  स्नान करने वाले मुनियों के शरीर से लगे चन्दन के कारण लहरें सुगन्धित और सफ़ेद हो गई हैं। किनारे पर उगे केतकी के फूलों के पराग से तट की भूमि पीली (पाण्डुर) पड़ गई है।

  आश्रम के तपस्वियों द्वारा धोए गए गीले वल्कल वस्त्रों के कारण तट का रंग गेहुआ (कषाय-पाटल) हो गया है। तट पर स्थित सघन तमाल के वृक्षों की छाया ऐसी लगती है मानो दिन के समय अंधकार ने वहाँ शरण ले ली हो।"

प्रमुख टिप्पणियाँ:

 1. उत्प्रेक्षा: पम्पा सरोवर की तुलना आकाश के धरती पर गिरने या दूसरे समुद्र के निर्माण से करना बाणभट्ट की कल्पनाशीलता का चरमोत्कर्ष है।

 2. पौराणिक संकेत: 'कबन्ध' वध और 'आदिवराह' द्वारा पृथ्वी के उद्धार के प्रसंगों का उपयोग वर्णन को भव्यता प्रदान करता है।

 3. प्राकृतिक सौंदर्य: यहाँ गंध (चन्दन, केतकी), ध्वनि (कमण्डलु का जल, हंसों का कलरव) और दृश्य (नीले कमल, गेहुए वस्त्र) का समन्वय अत्यंत प्रभावशाली है।

यह गद्यांश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के 'पम्पा सरोवर' और उसके किनारे स्थित 'जीर्ण शाल्मली वृक्ष' (सेमल का पुराना पेड़) के अद्भुत वर्णन का हिस्सा है। यहाँ कवि की कल्पना प्रकृति के सजीव चित्रण में डूब गई है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...ऋष्यमूकवासिना सुग्रीवेणावलम्बपरिलघुताभिरध्यासितातापसानां देवतार्चनोपयुक्तकुसुमाभिरुत्पतज्जलचरपतगपक्षपुटविगलितजलविन्दुसेकसुकुमारकिसलयाभिर्लतामण्डपतलस्थितशिखण्डिमण्डलरब्धताण्डवाभिरनेककुसुमपरिमलवादिनीभिर्वनदेवताभिः श्वासवासिताभिरिव वनराजिभिरुपारूढतीरमपरसागराशङ्किभिः सलिलमादातुमवतीर्णैरिव जलधरैरिब बहलपङ्कमलिनैरवनकरिभिरनवरतमापीयमानसलिुलमगाधमनन्तमप्रतिममपां निधानं **पम्पाभिधानं सरः**। यत्र च विकचकुवलयप्रभाश्यामायमानवपुष्यद्यापि मूर्तिवद्रामशापपीडितानीव मध्यचारिण्यालोक्यन्ते चक्रनाम्नां मिथुनानि।
तस्यैवंवधस्य पम्पासरसः पश्चिमे तीरे राघवशारप्रहारजर्जरितजीर्णतालतरुखण्डस्य च समीपे, दिग्गजकरदण्डानुकारिणा महदजगरेण सततमावेष्टितमूर्तितया बद्धमहालबाल इव, तुङ्गस्कन्धावलम्बिभिरनिरन्तररोहितैरहिनिर्मोकैरिव कृतोत्तरीय इव, दिक्चक्रवालपरिमाणमिव गृह्णता भुवनान्तरालविप्रकीर्णेन शाखासंचयेन प्रलयकालताण्डवप्रसारितभुजसहस्रमुडुपतिशकलशेखरमिव विडम्बयितुमुद्यतः, पुराणतया पतनभयादिव गगनरन्ध्रलग्नः, निखिलशरीरव्यापिभिरतिदूरगताभिर्जीर्णतया शिराभिरिव परिगतो व्रततिभिः, जरातिलकबिन्दुभिरिव कण्टकैरङ्किततनुः, इतस्ततः पीतसागरसलिलैरिव गगनगतैः पल्लवैरिव शाखान्तरेषु निलीयमानैः क्षणमम्बुभारावलम्बिभिरादर्शितपल्लवैरम्बुधरपटलैरप्यदृष्टशिखरदेशतुङ्गतया नन्दनवनश्रियमिवावलोकयितुमभ्युद्यतः, समीपवर्तिनामुपरि संचरतां गगनतलामलसदायासितानां रविरथतुरङ्गमाणां मुखपरिस्रुतैः फेनपटलैः संदेहितसितकुसुमराशिभिर्धवलितशिखरशाखो वनगजकपोलकण्डूयनलग्नमद..."

हिन्दी अनुवाद

"वहाँ पम्पा नाम का एक सरोवर है, जो अथाह, अनन्त और जल का अनुपम भंडार है। इसके किनारे ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले सुग्रीव की शरण में आए तपस्वी निवास करते हैं। यहाँ के वन-वृक्षों के फूल देवताओं की पूजा के काम आते हैं। उड़ते हुए जल-पक्षियों के पंखों से गिरने वाली जल की बूंदों से यहाँ की नयी कोपलें (किसलय) सदा कोमल बनी रहती हैं। लताओं के मण्डपों के नीचे मोरों के समूह ताण्डव नृत्य करते हैं। फूलों की सुगंध से भरी वन-देवताओं की साँसों के समान यहाँ की वन-पंक्तियाँ महकती हैं। सरोवर के तट पर कीचड़ से मटमैले जंगली हाथी ऐसे खड़े हैं मानो काले बादल दूसरे समुद्र की शंका में जल पीने के लिए धरती पर उतर आए हों। इस सरोवर के खिले हुए नीलकमलों की श्यामल आभा के बीच तैरते हुए चकवा-चकवी (चक्रवाक) के जोड़े ऐसे लगते हैं मानो भगवान राम के शाप से पीड़ित कोई मूर्तिमान दुःख तैर रहा हो।
उसी पम्पा सरोवर के पश्चिमी तट पर, जहाँ श्री राम के बाणों से जर्जर हुए ताड़ के वृक्षों का झुंड है, एक अत्यंत विशाल और पुराना शाल्मली (सेमल) का वृक्ष खड़ा है।

  उस वृक्ष के ऊँचे तने से एक विशाल अजगर लिपटा रहता है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो वृक्ष के चारों ओर सिंचाई के लिए कोई बड़ा थाला (आलवाल) बना दिया गया हो।

  उसकी शाखाओं पर सांपों की केंचुलें लटकी रहती हैं, जो ऐसी लगती हैं मानो वृक्ष ने सफ़ेद उत्तरीय (चादर) ओढ़ रखा हो।

  उसकी चारों दिशाओं में फैली हुई हज़ारों शाखाएँ ऐसी लगती हैं मानो साक्षात् भगवान शिव प्रलय काल के ताण्डव में अपनी हज़ारों भुजाएं फैलाए खड़े हों।

  वह इतना पुराना है कि ऐसा लगता है मानो गिरने के डर से उसने अपनी चोटी आकाश के छेद में फँसा दी हो। उसके शरीर पर लिपटी हुई पुरानी लताएँ ऐसी लगती हैं मानो बुढ़ापे के कारण शरीर की नसें उभर आई हों।

  उसके शरीर पर उभरे हुए काँटे ऐसे लगते हैं मानो बुढ़ापे के सफेद तिलक (बिंदु) हों।

  वह वृक्ष इतना ऊँचा है कि बादलों के समूह उसकी शाखाओं के बीच ऐसे छिप जाते हैं मानो वे उसके नए पत्ते हों। उसकी चोटी इतनी ऊँची है कि वह स्वर्ग के 'नंदन वन' की शोभा को देख रहा हो।

  आकाश में चलते हुए सूर्य के रथ के घोड़े जब थककर हाँफते हैं, तो उनके मुख से जो सफ़ेद झाग गिरता है, वह इस वृक्ष की चोटियों पर अटक जाता है, जिससे ऐसा भ्रम होता है मानो चोटी पर सफ़ेद फूल खिले हों। जंगली हाथियों के रगड़ने से उनके गालों का मद..."

प्रमुख बिंदु:

 1.चक्रवाक मिथक: भारतीय काव्य परंपरा में माना जाता है कि चकवा-चकवी रात में अलग हो जाते हैं। बाणभट्ट ने इसे 'राम के शाप' से जोड़कर एक नई उत्प्रेक्षा दी है।

 2. शाल्मली वृक्ष: यह वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्ता के रूप में चित्रित है—एक बूढ़े, तपस्वी और आकाश को छूने वाले महापुरुष की तरह।

 3. अतिशयोक्ति: सूर्य के घोड़ों के झाग का वृक्ष की चोटी पर गिरना उसकी असीमित ऊँचाई को दर्शाने के लिए बाणभट्ट की प्रिय शैली है।

यह गद्यांश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के 'शाल्मली वृक्ष' और वहाँ रहने वाले 'शुक-कुल' (तोतों के समूह) के वर्णन का अगला भाग है। यहाँ कवि ने तोतों के झुंड के आकाश में उड़ने के दृश्यों को अत्यंत मनोहारी उत्प्रेक्षाओं (इमैजिनेशन) से सजाया है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और पूर्ण हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...निलीनमत्तमधुकरनादेन लोहशृङ्खलापाशबन्धनिश्चलेनेव कल्पस्थायिना मूलेन समुपेतः, कोटरअभ्यन्तरनिषण्णैः शुककुलैः सजीव इव, मधुकरपटलैर्दुरयोधन इवोपलक्षितशकुनिपातः, नन्दननाम इव वनमालोपगूढो, नवजलधरव्यूह इव नभसि दर्शितोन्नतिः, अखिलभुवनतलावलोकनप्रासाद इव वनदेवतानाम्, अधिपतिरिव दण्डकारण्यस्य, नायक इव सर्ववनस्पतीनां, सखेव विन्ध्यस्य, शाखाबाहुभिरुपगूहन्निव विन्ध्याटवीमवस्थितो महान् जीर्णशाल्मलीवृक्षः।
तत्र च शाखाशिखरेषु कोटरोदरेषु पल्लवान्तरेषु स्कन्धसंधिषु जीर्णवल्कलविवरेषु महावकाशतया विश्रब्धविरचितशुककुलसहस्राणि, दुरारोहतया निगलितविनाशभयानि नानादेशसमागतानि शुकशकुनिकुलानि प्रतिवसन्ति स्म। यैः परिणामविरलदलसंहतिरपि स वनस्पतिरविरलदलनिचयश्यामल इवोपलक्ष्यते दिवानिशं निलीनैः।
ते च तस्मिन् वनस्पतावतिवाह्य रजनीमात्मनीडेषु प्रतिदिनमुत्थायोत्थाय आहारान्वेषणाय नभसि विरचितपङ्क्तयो, मदकलहंसकुलमुखोत्क्षिप्यमाणकमलोत्तंसमम्बरतले दिव्यकन्यामिव दर्शयन्तः, सुरगजोन्मूलितविगलदाकाशगङ्गाकमलिनीशङ्कामुपजनयन्तः, दिवसकररथतुरगप्रभामुखमुत्क्षिपन्तमिव गगनतलमुपपादयन्तः, संचारिणीमिव मरकतस्थलीं विडम्बयन्तः, शैवालपल्लवावलिमिव अम्बरसरसि प्रसारयन्तः, गगनविचरितैः पक्षपुटैः कदलीदलैरिव दिनकरखरकरनिकरपरिखेदिता आशासुखानि वीजयन्तः, वियति विसारिणीं शष्पवीथीमिवारचयन्तः, सेन्द्रायुधमिवान्तरिक्षमादधाना विचरन्ति स्म शुककुलानि। कृताहाराश्च पुनः प्रतिनिर्त्यात्मकुलायावस्थितेभ्यः शावकेभ्यो विविधान् फलरसान् कलममञ्जरीविकारांश्च प्रहृतहरिणरुधिराक्त..."

हिन्दी अनुवाद

"वह महान पुराना शाल्मली (सेमल) का वृक्ष अपनी जड़ों से ऐसा स्थिर खड़ा था मानो लोहे की जंजीरों से बँधा हो। उसके कोटरों (खोखलों) में बैठे हुए हज़ारों तोतों के कारण वह वृक्ष साक्षात् 'सजीव' प्रतीत होता था। वह दुर्योधन के समान था, क्योंकि जैसे दुर्योधन के पास 'शकुनि' (मशहूर मामा) का पतन/निवास था, वैसे ही इस वृक्ष पर 'शकुनि' (पक्षियों) का निवास था। वह देवताओं के 'नन्दन वन' जैसा था और अपनी ऊँचाई के कारण ऐसा लगता था मानो वन-देवताओं के लिए संसार देखने का कोई ऊँचा महल (प्रासाद) हो। वह दण्डकारण्य का स्वामी, सभी वनस्पतियों का नायक और विन्ध्याचल पर्वत का मित्र बनकर अपनी शाखा रूपी भुजाओं से मानो विन्ध्याटवी को गले लगा रहा था।

उस वृक्ष की शाखाओं, कोटरों और छालों के छेदों में हज़ारों तोते निर्भय होकर रहते थे। वह वृक्ष इतना ऊँचा और दुर्गम था कि पक्षियों को वहाँ किसी शिकारी या विनाश का भय नहीं था। यद्यपि बुढ़ापे के कारण उस वृक्ष के पत्ते कम हो गए थे, फिर भी वहाँ दिन-रात बैठे रहने वाले हज़ारों हरे तोतों के कारण वह वृक्ष सदा हरा-भरा और सघन पत्तों वाला दिखाई देता था।

वे तोते अपनी रातों को घोंसलों में बिताकर प्रतिदिन सुबह भोजन की खोज में आकाश में कतारें (पङ्क्ति) बनाकर उड़ते थे। जब वे नीले आकाश में उड़ते, तो ऐसा लगता: मानो आकाश रूपी सरोवर में शैवाल (काई/काई के पत्ते) तैर रहे हों।

 उनकी हरियाली से ऐसा भ्रम होता मानो आकाश 'मरकत' (पन्ने) की भूमि बन गया हो और वह चल रही हो।

  उनके पंखों की फड़फड़ाहट सूर्य की गर्मी से तपी हुई दिशाओं को कदली (केले) के पत्तों से पंखा झल रही हो।

  आकाश में फैली हुई उनकी कतारें ऐसी लगतीं मानो आकाश में हरी घास की पगडण्डी बन गई हो।

  उनके अनेक रंगों और उड़ान से ऐसा लगता मानो बिना वर्षा के ही अंतरिक्ष में इन्द्रधनुष चमक रहा हो।

भोजन करने के बाद वे तोते वापस लौटते और घोंसलों में इंतज़ार कर रहे अपने बच्चों के लिए विभिन्न फलों के रस और धान की बालियाँ (कलम-मञ्जरी) लाते..."

प्रमुख अलंकार और टिप्पणियाँ:

 1. श्लेष (दुर्योधन इवोपलक्षितशकुनिपातः): यहाँ 'शकुनि' शब्द के दो अर्थ हैं—महाभारत का पात्र शकुनि और पक्षी। यह बाणभट्ट की प्रिय कला है।

 2. उत्प्रेक्षा: आकाश में उड़ते तोतों को 'हरी घास की वीथी' (पगडण्डी) या 'तैरता हुआ पन्ना' कहना उनकी अद्भुत कल्पना शक्ति को दर्शाता है।

 3. वात्सल्य: अंत में तोतों का अपने बच्चों के लिए भोजन लेकर लौटने का वर्णन उनके पारिवारिक स्नेह को चित्रित करता है।

यह अंश 'कादम्बरी' (कथामुख) के 'शुक-वृत्तान्त' का अत्यंत हृदयस्पर्शी भाग है। यहाँ तोता (वैशम्पायन) राजा शूद्रक को अपने बचपन, अपनी माँ की मृत्यु और अपने वृद्ध पिता के संघर्ष की कहानी सुना रहा है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...निशातनखरकोटिपाटलेन च चञ्चुपुटेन दत्त्वा दत्त्वाधरीकृतमृदुनाऽसाधारणेन गुरुणा पक्ष््मणा (पक्षेण) तस्मिन्नेव क्रोडान्तनिहिततनयाः क्षपाः क्षपयन्ति स्म।
एकस्मिंश्च जीर्णकोटरे जायया सह निवसतः पश्चिमे वयसि वर्तमानस्य कथमपि पितुरहमेवैको विधिवशात्सूनुरभवम्। अतिप्रबलया चाभिभूता ममैव जायमानस्य प्रसववेदनया जननी मे लोकान्तरमगमत्। अभिमतजायाविनाशशोकदुःखितोऽपि खलु तातः सुतस्नेहादन्तर्निगृह्य पटुप्रसरमपि शोकमेकाकी मत्संवर्धनपर एवाभवत्।
अतिपरिणतवयाश्च रुचिरालंकारिणीमल्पावशिष्टजीर्णपिच्छजालजर्जरामवस्रस्तांसदेशशिथिलामपगतोत्पतनसंस्कारां पक्षसंततिमहरहस्तारूढकम्पतया च संतापकारिणीमङ्गानां जरामिव विधुन्वन्, कठोरशेफालिकाकुसुमनालपिञ्जरेण कर्णमञ्जरीदलनमसृणितमृदुशिखोपान्तलेखेन स्फुटिताग्रकोटिना चञ्चुपुटेन परनीडनिपतिताभ्यः शालिमञ्जरीभ्यस्तण्डुलकणानादायादाय, तरुमूलनिपतितानि शुककुलावलूनि (अवलीढानि) फलशकलानि संगृह्य, परिभ्रमितुमशक्तो मह्यमदात्। प्रतिदिवसमात्मना च मदुपयुक्तशेषमकरोदशनम्।
एकदा तु प्रभातसंध्यारागलोहिते गगनतलकमलिनीमधुकरपक्षसंपुटे वृद्धहंस इव मन्दाकिनीपुलिनादपरजलनिधितटमवतरति चन्द्रमसि, परिणतटङ्करोमपाण्डुनि व्रजति विशालतामाशाचक्रवाले, गजरुधिररक्तहरिसटालेमलोहिनीभिरातापलक्तकतन्तुपाटलाभी रायामिनीभिरशिशिरकिरणदीधितिभिः पद्मरागरत्नशलाकासंमार्जनीभिरिव समुत्सार्यमाणे गगनकुट्टिमकुसुमप्रकरे तारागणे, संध्यामुपासितुमुत्थिते सप्तर्षिमण्डले, मानससरस्तीरमिवावतरति..."

हिन्दी अनुवाद

"(वे तोते) अपने तीखे नाखूनों और लाल चोंच से दाने लाकर अपने बच्चों को देते और फिर अपने बड़े पंखों के बीच उन्हें छिपाकर रातें बिताते थे।

उसी पुराने कोटर (पेड़ के छेद) में अपनी पत्नी के साथ रहने वाले, बुढ़ापे की अवस्था को प्राप्त मेरे पिता का, भाग्यवश मैं अकेला ही पुत्र पैदा हुआ। मुझे जन्म देते समय अत्यंत तीव्र प्रसव पीड़ा के कारण मेरी **माता परलोक सिधार गई (मृत्यु हो गई)। अपनी प्रिय पत्नी के विनाश के शोक से दुखी होने पर भी, मेरे पिता ने पुत्र-स्नेह के कारण अपने गहरे दुख को भीतर ही दबा लिया और अकेले ही मेरा पालन-पोषण करने में लग गए।

मेरे पिता बहुत बूढ़े हो चुके थे। उनके शरीर पर अब थोड़े ही पुराने और जर्जर पंख बचे थे, जो कंधों से लटक गए थे। अब उनमें उड़ने की शक्ति नहीं रही थी। बुढ़ापे के कारण उनका शरीर काँपता रहता था, जिसे देखकर ऐसा लगता था मानो वे स्वयं 'जरा' (बुढ़ापे) को ही झाड़ रहे हों। वे अपनी उस चोंच से, जिसकी नोक टूट गई थी, दूसरे घोंसलों से गिरी हुई धान की बालियों के दाने चुन-चुनकर लाते और पेड़ों के नीचे गिरे हुए उन फलों के टुकड़ों को इकट्ठा करते जिन्हें दूसरे तोते खाकर आधा छोड़ देते थे। स्वयं उड़ने में असमर्थ होने के कारण वे वही दाने मुझे देते और प्रतिदिन मेरे खाने के बाद जो बच जाता, उसे स्वयं खाकर अपना पेट भरते थे।

एक बार, जब सुबह की लाली फैल रही थी और आकाश रूपी कमलिनी के भौंरे जैसे पंखों वाले वृद्ध हंस के समान चन्द्रमा मन्दाकिनी (आकाश गंगा) के किनारे से डूबकर पश्चिम समुद्र की ओर जा रहा था; जब दिशाओं का घेरा बूढ़े सफेद चूहे के रोएँ जैसा पांडु (पीला-सफेद) होकर फैल रहा था; जब सूर्य की किरणें—जो सिंह की गर्दन के खून से सने बालों जैसी लाल थीं—पद्मराग मणियों की झाड़ू के समान आकाश रूपी फर्श से तारा रूपी फूलों को बुहार रही थीं (तारे छिप रहे थे); और जब सप्तर्षि मण्डल संध्या वन्दना के लिए उठकर मान सरोवर के तट की ओर उतर रहा था तब..."

प्रमुख बिंदु और संवेदना:

 1. पिता का संघर्ष: इस अंश में बाणभट्ट ने एक 'एकल पिता' (Single Parent) के रूप में एक पक्षी के संघर्ष का जो वर्णन किया है, वह पाठकों को भावुक कर देता है। खुद भूखे रहकर बच्चे को खिलाना सार्वभौमिक माता-पिता का स्वभाव है।

 2. प्रकृति चित्रण: सुबह के समय का वर्णन बाणभट्ट की अलंकृत शैली का नमूना है। तारों को फर्श के फूल और सूर्य की किरणों को मणियों की झाड़ू कहना अत्यंत मौलिक कल्पना है।

 3. करुण रस: माँ की मृत्यु और पिता की असहाय अवस्था यहाँ करुण रस की सृष्टि करती है। यहाँ से कथा में एक बड़ा मोड़ आने वाला है (शबर सेना का आगमन)।

यह अंश 'कादम्बरी' के 'शुक-वृत्तान्त' का समापन और 'प्रभात-वर्णन' (सुबह का चित्रण) है। इसमें बाणभट्ट ने अपनी विशिष्ट अलंकृत शैली में सूर्योदय के समय प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन किया है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...विघटितमुक्तिसंपुटविप्रकीर्णमरुणकसेरुणाधोगच्छति उडुगणामिव मुक्ताफलनिकरमुद्वहति धवलितपुलिनतलमदन्वति, पूर्वतश्च तुषारबिन्दुवर्षिणि विबुद्धशिखिणि विजृम्भमाणकेसरिणि करिणीकदम्बकप्रबोध्यमानसमदकरिणि, क्षपाजलजडकेसरं कुसुमनिकरमुदयगिरिशिखरस्थितं ससितारमिबोद्वहति पल्लवाञ्जलिभिः समुत्सृजति कानने, रासभरोमधूसरासु वनदेवताप्रासादानां तरूणां शिखरेषु पताकामालायमानासु धर्मपताकास्विव समुन्मिषन्तीषु तपोवनाग्निहोत्रधूमराजिषु, अवश्यायसीकरिणि दलत्कमलवने रतिखिन्नशबरसीमन्तिनीस्वेदजलकणिकापहारिणि वनमहिषरोमन्थफेनबिन्दुवाहिनि चलितपल्लवलतालास्योपदेशिनि विघटमानकमलखण्डमधुसीकरासारवर्षिणि कुसुमामोदतर्पितालिजाले निशावसानजातजाड्ये मन्दमन्दसंचारिणि प्रवाति प्राभातिके मातरिश्वनि, कमलवनप्रबोधमङ्गलपाठकानामलिभगणडिण्डिमानां मधुरां कुमुदोदरेषु धनघटमानदलपुटनिवद्धपक्षसंहतीनामुपरि हुंकारेषु, प्रभातशिशिरमारुताहतसुप्तप्रबुद्धतुरगाकृष्टपक्ष्माणमिव सरोषनिद्राजिह्यतारं चक्षुरुन्मीलयति, शनैः शनैर्धूसरशय्याधूसरकटीरोमराजिषु वनमृगेष्वितस्ततः संचरत्सु वनचरेषु विश्रम्भमाणे श्रोत्रहारिणि पम्पासरःकलहंसकोलाहले समुल्लसति, नर्तितशिखण्डिमण्डले मनोहरे वनगजकर्णतालशब्दे, क्रमेण च गगनतलमारुहति दिवसकरवारणस्यावचूलचामरकलाप इवोपलक्ष्यमाणे मञ्जिष्ठारागरोहिते किरणजाले, शनैः शनैरुदिते भगवति सवितरि पम्पासरःपर्यन्ततरुशिखरसंचारिण्यध्यासितगिरिशिखरे दिवसकरजन्मनि हततारे पुनरिव कपीश्वरे वनमभिपरतति बालातपे, स्पष्टे जाते प्रत्यूषसि नाचिरादिव दिव..."

हिन्दी अनुवाद

"जब रात बीत रही थी और सुबह का समय हो रहा था:
आकाश में तारे ऐसे विलीन हो रहे थे मानो समुद्र की लहरों ने मोतियों की सीपों को फोड़ दिया हो और मोती बिखर गए हों। पूर्व दिशा में ओस की बूंदें गिर रही थीं, मोर जाग रहे थे, सिंह जम्हाई ले रहे थे और हथिनी अपने मदमस्त गजराज को जगा रही थी। वन के वृक्ष अपनी अञ्जलि रूपी पत्तों से उन फूलों को बिखेर रहे थे, जिनके केसर रात की ओस से गीले हो गए थे।

तपोवन की कुटियों से निकलता हुआ अग्निहोत्र का धुआँ वृक्षों की चोटियों पर पताकाओं (झंडों) के समान फहरा रहा था। सुबह की शीतल वायु मन्द-मन्द बहने लगी थी, जो खिले हुए कमलों के पराग को छू रही थी, वन-महिषों (भैंसों) के मुँह से गिरते फेन को उड़ा रही थी और लताओं को ऐसे हिला रही थी मानो उन्हें नृत्य सिखा रही हो। भौंरे, जो रात भर कुमुदनी के फूलों में बंद थे, अब गुंजन करते हुए बाहर निकल रहे थे, मानो वे कमलों को जगाने के लिए मंगल-गान कर रहे हों।

सरोवर के किनारे सोए हुए पशु धीरे-धीरे अपनी आँखें खोल रहे थे। पम्पा सरोवर के हंसों का मधुर कोलाहल कानों को प्रिय लग रहा था। मोरों ने नाचना शुरू कर दिया था और जंगली हाथियों के कानों के फड़फड़ाने की ताल जैसी आवाज़ गूँजने लगी थी।

तभी, भगवान सूर्य देव (सविता) उदित हुए। उनकी लाल किरणें ऐसी लग रही थीं मानो आकाश रूपी हाथी के मस्तक पर सजाया गया केसरिया चँवर हो। सूर्य की वह बाल-धूप (बालातप) पर्वतों की चोटियों और पम्पा सरोवर के ऊँचे वृक्षों पर ऐसे फैल गई मानो वह स्वयं 'कपीश्वर' (सुग्रीव) हों, जिन्होंने अपनी कान्ति से नक्षत्रों (तारों/बालि के पक्षपाती) को फीका कर दिया हो। इस प्रकार, जब प्रभात पूरी तरह स्पष्ट हो गया, तब..."

प्रमुख उपमाएँ और प्रतीक:

 अग्निहोत्र धूम: ऋषि मुनियों के आश्रमों में सुबह होने वाले हवन के धुएँ को 'धर्म की पताका' कहा गया है।

 भ्रमर-डिण्डिम: कमलों के खिलने पर भौंरों के गुंजन को नगाड़े (डिण्डिम) की आवाज़ और मंगल-पाठ माना गया है।

 श्लेष (दिवसकरजन्मनि): यहाँ सूर्य (दिवसकर) और सुग्रीव (सूर्यपुत्र) की तुलना की गई है। जैसे सूर्य के आने से तारे (तारा) छिप जाते हैं, वैसे ही सुग्रीव के आने से बालि की पत्नी 'तारा' का प्रभाव क्षीण हुआ और वानर सेना में हर्ष व्याप्त हुआ।

 प्रकृति का मानवीकरण: वायु को नृत्य का गुरु (लास्योपदेशक) और वृक्षों को अञ्जलि देने वाला भक्त बताया गया है।

यह अंश 'कादम्बरी' के उस रोमांचक प्रसंग का है जहाँ शांतिपूर्ण प्रभात के बाद अचानक जंगल में मृगया (शिकार) का कोलाहल शुरू होता है। तोता (वैशम्पायन) उस डरावने दृश्य का वर्णन कर रहा है जब वह अपने पिता के पंखों में दुबक गया था।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...नभस्तलमेकदेशभाजि भास्वति, भूयिष्ठं प्रयातेषु यथाभिमतानि दिगन्तराणि शुककुलेषु, कलायनिलीननिभृतशावकसनाथेऽपि नि:शब्धतया शून्य इव तस्मिन् वनस्पतौ, स्वनीडावस्थित एव ताते, मयि च शैशवादसंजातबलसमुद्ध्यमानपक्षपुटे तातस्य समीपवर्तिनि कोटरगते, सहसैव तस्मिन् महावने संत्रासितसकलवनचरः, सरभसमुत्पतत्पतत्रिणपक्षपुटशब्दसंततो, भीतकरिपोतचीत्कारपीवरः, प्रचलितालाताकुटितमत्तालिकुलकणितमांसलः, परिभ्रमदुन्मदवनवराहरवघरो, गिरिगुहाबद्धसिंहनादोपबृंहितः, कम्पयन्निव तरून् भगीरथावतार्यमाणगङ्गाप्रवाहकलकलकठोरः, भीतवनदेवताकर्णितो मृगयाकोलाहलध्वनिरुदचरत्।
आकर्ण्य च तमहमश्रुतपूर्वमुपजातवेपथुरशक्ततया जर्जरितकर्णविवरो भयविह्वलः समीपवर्तिनः पितुः प्रतीकारलुब्धया जराशिथिलपक्षपुटान्तरमविशम्।
अनन्तरं च सरभसमितो गजयूथपतिलुलितकमलिनीपरिमलः, इतः क्रोडकुलदश्यमानभद्रमुस्तारसामोदः, इतः करिकलभभज्यमानसहकीकषायगन्धः, इतो निपतितशुष्कपर्णमर्मरध्वनिः, इतो वनमहिषविषाणकोटिभिरुन्मिद्यमानवल्मीकभूमिरिति—इतो गजदम्बकम्, इतो वनगजकुलम्, इतो वनवराहयूथम्, इतो वनमहिषवृन्दम्, इतः शिखण्डिमण्डलबिरुतम्, इतः कपिकुलकलकूजितम्, इतः कुररकुलक्वणितम्—इतो मृगपतिनखभिद्यमानकुम्भकुञ्जररसितम्—इयमार्द्रपङ्कमलिना वराहपद्धतिः, इयमभिनवशष्पकवलरसदश्यामाला हरिणरोमन्थफेनसंहतिः, इयमुन्मदगन्धगजगण्डकण्डूयनप्रविमलअलीमुखरमधुकरविरुतिः, एषा निपतितरुधिरबिन्दुसिक्तशुष्कसस्यपाटला रुरुपदव्येति—एतद्विरदचरणमर्दितातिविटपपल्लवपटलम्, एतत्खड्गिकुलक्रीडितम्, एष नखकोटिनिर्मितविकट..."

हिन्दी अनुवाद

"जब सूर्य देव आकाश के मध्य भाग की ओर बढ़ रहे थे और अधिकांश तोतों के झुंड अपनी इच्छा के अनुसार अन्य दिशाओं में उड़ चुके थे; वह शाल्मली वृक्ष, यद्यपि कोटरों में बैठे बच्चों से भरा था, फिर भी नि:शब्द होने के कारण सूना सा लग रहा था। उस समय मेरे पिता अपने घोंसले में ही थे और मैं भी, जिसके पंखों में अभी उड़ने की शक्ति नहीं आई थी, पिता के पास कोटर में ही दुबका हुआ था।

तभी अचानक उस महावन में सभी जीवों को डरा देने वाला मृगया (शिकार) का कोलाहल गूँज उठा। वह शोर पक्षियों के फड़फड़ाने की आवाज़ों से भरा था, डरे हुए हाथी के बच्चों की चिंघाड़ से भारी था, और मतवाले भौंरों की गुंजन से मिला हुआ था। वह आवाज़ ऐसी थी मानो पर्वतों की गुफाओं में सिंह गर्जना कर रहे हों और धरती को कँपाते हुए स्वर्ग से गंगा की धारा उतर रही हो। वन-देवता भी उस भयानक शोर को सुनकर सहम गए।

मैंने वह शोर पहले कभी नहीं सुना था। डर के मारे मेरा शरीर काँपने लगा, कान फटने लगे और मैं भयभीत होकर रक्षा की उम्मीद में अपने वृद्ध पिता के उन ढीले पड़ चुके पंखों के भीतर घुस गया।

उसके तुरंत बाद, जंगल में हर तरफ से अजीब-अजीब गंध और आवाज़ें आने लगीं:

 कहीं से हाथियों द्वारा कुचली गई कमलिनियों की सुगंध आ रही थी, तो कहीं से जंगली सूअरों द्वारा खोदी गई 'मोथा' घास की महक।

 कहीं सूखे पत्तों के कुचलने की 'मर्मर' ध्वनि सुनाई दे रही थी, तो कहीं जंगली भैंसों द्वारा अपने सींगों से मिट्टी खोदने की आवाज़।

  कोई चिल्ला रहा था—'इधर हाथियों का झुंड है!', 'उधर जंगली सूअर हैं!', 'इधर मोरों का शोर है!', 'उधर वानरों का झुंड!'

  कहीं सिंह द्वारा हाथी का मस्तक फाड़े जाने की भयानक गर्जना सुनाई दे रही थी।

  शिकारी आपस में निशान बता रहे थे—'यह कीचड़ से सनी हुई सूअरों के पैरों की लकीर है', 'यह हिरणों के मुँह से गिरा हुआ फेन है', 'यह मदमस्त हाथी के रगड़ने से चन्दन के पेड़ों पर मंडराते भौंरों का शोर है', 'यह खून की बूंदों से रँगा हुआ हिरणों का मार्ग है', 'यह हाथियों द्वारा कुचली गई टहनियाँ हैं' और 'यह गेंडों के नाखूनों के निशान हैं'..."

प्रमुख बिंदु:

 1. ध्वन्यात्मक वर्णन: बाणभट्ट ने यहाँ शिकार की शुरुआत का वर्णन केवल आँखों से नहीं, बल्कि कानों और नाक (गंध) के माध्यम से किया है। पाठक को ऐसा महसूस होता है जैसे वह खुद उस शोर और गंध के बीच खड़ा हो।

 2. शैशव सुलभ भय: छोटे तोते का अपने पिता के पुराने पंखों में छिपना एक बहुत ही स्वाभाविक और मार्मिक दृश्य है।

 3. शिकार का परिदृश्य: 'इतो-इतो' (इधर-इधर) शब्दों का बार-बार प्रयोग जंगल की अफरा-तफरी और शिकारियों की उत्तेजना को दर्शाता है।

यह अंश 'कादम्बरी' के 'मृगया वर्णन' (शिकार के दृश्य) का चरमोत्कर्ष है। इसमें शबरों (भील शिकारियों) द्वारा फैलाए गए आतंक और जंगल के पशुओं की आर्त्तपुकार (दुःख भरी आवाज़) का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण है। नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...प्रहारो रुधिरपाटलः करिमौक्तिकदन्तुरो मृगपतिमार्गः। एषा प्रसवप्रसूतवनमृगीगर्भरुधिररोहिणी भूमिरियमटवीवेणिकानुकारिणी पञ्चनखस्य यूथपतेर्मदजलमलिना संचारवीथी। चमरीपङ्क्तिरियमनुगम्यताम्। शुष्कमुद्गकरीषपांसुला त्वरिततरमध्यास्यतामियं वनस्थली। तरुशिखरमारुह्यताम्। आलोक्यतां दिगियम्। आकर्ण्यतामयं शब्दः। गृह्यन्तां धनूंषि। अवहितैः स्थीयताम्। विमुच्यन्तां श्वानः' इत्यन्योन्यमभिवदताममन्दसक्तस्य महतो जनसमूहस्य तरुगहनान्तरितविग्रहस्य क्षोभितकाननं कोलाहलमश्रणवम्।
अथ नातिचिरादिवातपोपनादसदृशध्वनिधीरेण गिरिविवरविजृम्भितप्रतिनादगम्भीरेण शबरदारताडितानां केसरिणां निनादेन, संत्रस्तयूथमुक्तानामेकाकिनां च संचरतामनवरतकारत्कारमिश्रेण जलधररसितानुकारिणा गजयूथपतीनां कण्ठगर्जितेन, सरभससारमेयविलुप्यमानाङ्गवयवानामालोलकातरतरलतारकाणामेणकानां च करुणकूजितेन, निहतयूथपतीनां वियोगिनीनामनुगतकलभानां च स्थित्वा स्थित्वा समाकर्ण्य कलकलमुत्कर्णपल्लवानामिव इतस्ततः परिभ्रमन्तीनां प्रियतमपतिविनाशशोकदीर्घेण करिणीनां चीत्कृतेन, कतिपयदिवसप्रसूतानां च धेनुकानां त्रासपरिभ्रष्टपोतान्वेषिणीनामुन्मुक्तकण्ठमतिकरुणमारसन्तीनामाक्रन्दितेन, तरुशिखरसमुत्पतितानामाकाशचारिणां च पक्षिरथानां कोलाहलेन, रूपासारप्रधावितानां च मृगयूथ्नां युगपदतिरभसपादपाताभिहताया भुवः कम्पमिव जनयता चरणशब्देन, कर्णान्ताकृष्टज्यानां च मदकलकुररकामिनीकण्ठकूजितकलेन शरनिकरवर्षिणां धनुषां निनादेन, पवनाहतिकणितधाराणामसीनां च कठिनमहिषस्कन्धपीठपातिनां रणितेन..."

हिन्दी अनुवाद

"(शिकारी एक-दूसरे को पुकारते हुए कह रहे थे)— 'यह देखो, खून से लाल और हाथी के मस्तक के मोतियों से भरा हुआ सिंह का मार्ग है! यह भूमि वन-मृगी के प्रसव के समय गिरे रक्त से लाल है। यह कीचड़ जैसी काली पगडंडी वन-राज (बाघ या सिंह) के मद-जल से गीली है। इस चमरी मृगों की पंक्ति का पीछा करो। सूखे गोबर की धूल से भरी इस वन-स्थली पर तेजी से कब्जा करो। पेड़ की चोटी पर चढ़ जाओ! इस दिशा में देखो! इस आहट को सुनो! धनुष उठाओ! सावधान हो जाओ! कुत्तों को छोड़ दो!'

पेड़ों के झुरमुट में छिपे हुए उस विशाल जनसमूह (शबरों) का यह कोलाहल, जिसने पूरे जंगल को विक्षुब्ध कर दिया था, मैंने सुना।

इसके तुरंत बाद, पूरे जंगल में भयानक ध्वनियाँ गूँजने लगीं:

  शबरों के बालकों द्वारा छेड़े गए सिंहों की दहाड़ ऐसी गूँज रही थी मानो बादलों का गर्जन पर्वतों की गुफाओं से टकरा रहा हो।

 अपने झुंड से बिछड़े हुए अकेले हाथियों की 'कारत्कार' ध्वनि मेघों के गरजने जैसी सुनाई दे रही थी।

 शिकार खेलने वाले कुत्तों द्वारा अंग-भंग किए जाने पर, कातर आँखों वाले **हिरणों की करुण पुकार** गूँज रही थी।

  जिनके पति (यूथपति) मारे गए थे, ऐसी हथिनियाँ अपने बच्चों के साथ बीच-बीच में रुककर, कान खड़े कर कोलाहल सुनती हुई अपने प्रियतम के शोक में लंबी चिंघाड़ मार रही थीं।

  कुछ दिन पहले ही बच्चों को जन्म देने वाली हिरणियाँ, जो डर के मारे बिछड़े हुए अपने बच्चों को खोज रही थीं, उनके गले फाड़कर रोने की आवाज़ें आ रही थीं।

  पेड़ों की चोटियों से उड़ने वाले पक्षियों का शोर और तेजी से भागते हुए हिरणों के झुंड के पैरों की धमक से ऐसा लग रहा था मानो पृथ्वी काँप रही हो

  कान तक खींची गई धनुष की डोरियों की आवाज़ ऐसी मधुर और तीखी थी जैसे कुरर पक्षी की कण्ठ-ध्वनि हो, और उन धनुषों से बाणों की वर्षा हो रही थी।

  हवा के झोंके से टकराती हुई और जंगली भैंसों के कठोर कंधों पर प्रहार करती हुई तलवारों की झनझनाहट चारों ओर फैल गई थी।"

प्रमुख बिंदु:

 1. युद्ध जैसा वातावरण: बाणभट्ट ने शिकार को किसी भयानक युद्ध की तरह चित्रित किया है, जहाँ करुणा और क्रूरता साथ-साथ चलती है।

 2. करुण रस का बाहुल्य: माँ से बिछड़े बच्चों और पति के विनाश पर हथिनियों के विलाप का वर्णन पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है।

 3. ध्वन्यात्मकता: 'कारत्कार', 'चीत्कृत', 'रणित' जैसे शब्दों का प्रयोग जंगल के शोर को सजीव कर देता है।

 4. प्राकृतिक न्याय: एक ओर सिंह की गर्जना है, तो दूसरी ओर असहाय हिरणों की पुकार—यह जंगल के क्रूर सत्य का सजीव चित्रण है।

यह अंश'कादम्बरी' के उस भयावह क्षण का वर्णन है जब मृगया (शिकार) का शोर थमने के बाद तोता (वैशम्पायन) कौतूहलवश कोटर से बाहर झाँकता है और उसे पहली बार 'शबर-सेना' (भील शिकारियों की सेना) दिखाई देती है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...विमुक्तशब्देर्ध्वनीनां वनान्तरव्यापिना ध्वानेन सर्वतः प्रचितिमिव तदरण्यमभवत्। अचिरात् प्रशान्ते तस्मिन् मृगयाकलकले, निश्शूकजलधरवृन्दानुकारिणि मथनावसानोपशान्तवारिणि सागर इव स्तिमिततामुपागते कानने, मन्दीभूतभयोऽप्युपजातकुतूहलः पितुरत्सङ्गादीषदिव निष्क्रम्य कोटरस्थ एव शिरोऽग्रं प्रसार्य संत्रासतरलतारकः 'शैशवात्किमिदम्' इति समुपजातदिक्षुस्तामेव दिशं चक्षुः प्राहिणवम्।
अभिमुखमापतच्च तस्मादरण्यन्तरादञ्जनभुजदण्डसदृशविप्रकीर्णमिव नर्मदाप्रवाहमिव, अनिर्वर्त्तितमिव तमालकाननम्, एकीभूतमिव कालरात्रीणां यामसंघातम्, अञ्जनशिलास्तम्भसम्भारमिव, क्षितिकम्पनिघूर्णितमन्धकारपुञ्जमिव, रविकिरणानुपलक्षितमन्तकर्परिवारमिव परिभ्रमन्तम्, अवदारितरसातलोद्गतमिव दानवलोकम्, अधर्मसमूहमिवैकत्र समागतम्, अशेषदण्डकारण्यवासिमुनिजनशापसार्थमिव संचरन्तम्, अनवरतशरनिकरवर्षिणममिहतखरदूषणबलनिवहमिव, तदुपध्यानाय पिशाचतामुपगतं खरदूषणबन्धुवर्गमिवैकत्र संगतम्, अवगाहप्रस्थितमिव वनमहिषयूथम्, अचलशिखरस्थितकेसरिकराकृष्टपल्लविशीर्णमिव कालमेघपटलम्, अखिलपशुविनाशाय धूमकेतुजालमिव समुद्गतम्, अन्धकारितकाननमनेकसहस्रसंख्यमतिभयजननमुत्पातेतरव्रातमिव शबरसैन्यमद्राक्षम्।
मध्ये च तस्यातिमहतः शबरसैन्यस्य प्रथमे वयसि वर्तमानम्, अतिकर्कशलोहाभिसारमिव निर्मितम्, एकलव्यमिव जन्मान्तरागतम्, उद्भिद्यमानश्मश्रुराजितया प्रथममदलेखामण्डयमानगण्डभित्तिमिव गजयूथपतिकुमारकमसितांशुकश्यामेन देहप्रभाप्रवाहेण कालिन्दीज-..."

हिन्दी अनुवाद

"चारों ओर फैलने वाली ध्वनियों से वह वन मानो भर गया था। कुछ ही समय में जब वह शिकार का शोर थम गया और वन वैसा ही शांत हो गया जैसे मन्थन के बाद समुद्र या गड़गड़ाहट के बाद शांत हुए बादल होते हैं; तब मेरा डर कुछ कम हुआ।

बाल-सुलभ कौतूहल के कारण मैं अपने पिता की गोद से थोड़ा बाहर निकला और कोटर (छेद) में बैठे-बैठे ही अपनी गर्दन फैलाकर, डर से कांपती पुतलियों के साथ उस दिशा में देखने लगा जहाँ से शोर आ रहा था।

मैंने देखा कि सामने से एक विशाल शबर-सेना (भील योद्धाओं का समूह) चली आ रही है। वह सेना ऐसी लग रही थी मानो:

  काजल के समान काली भुजाओं वाली नर्मदा नदी की धारा बह रही हो।

  मानो 'तमाल' के काले वृक्षों का पूरा जंगल ही चल पड़ा हो।
  मानो प्रलय की काली रातों के सारे पहर एक साथ इकट्ठे हो गए हों।

  मानो काजल की शिलाओं के खंभों का ढेर लगा हो।

  मानो पृथ्वी कांपने से इकट्ठा हुआ अंधकार का कोई पुंज (ढेर) हो, जिसे सूर्य की किरणें भी नहीं भेद पा रही हों।

  मानो पाताल को फाड़कर दानवों की सेना निकल आई हो।
  मानो संसार का सारा 'अधर्म' एक साथ इकट्ठा होकर चल रहा हो।

  मानो दण्डकारण्य के मुनियों द्वारा दिए गए 'शापों का समूह' शरीर धारण कर घूम रहा हो।

  वे ऐसे लग रहे थे मानो भगवान राम द्वारा मारे गए खर-दूषण के सैनिक पिशाच बनकर बदला लेने आए हों।

  उनकी संख्या हज़ारों में थी, जो वन के भैंसों के झुंड की तरह या प्रलय के काले बादलों की तरह डरावने लग रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो सभी पशुओं के विनाश के लिए धूमकेतुओं का समूह उदय हो गया हो।

उस विशाल शबर-सेना के बीच में मैंने उनके सेनापति को देखा। वह युवावस्था में था और उसका शरीर लोहे के समान अत्यंत कठोर और सुगठित था। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो **एकलव्य** ने फिर से जन्म ले लिया हो। उसके चेहरे पर अभी दाढ़ी-मूंछें निकलनी शुरू ही हुई थीं, जिससे उसके गाल ऐसे लग रहे थे मानो किसी युवा हाथी के मस्तक से मद की पहली रेखा फूट रही हो। उसके शरीर की काली आभा ऐसी लग रही थी मानो यमुना नदी का..."

प्रमुख टिप्पणियाँ:

 1.रंग-चित्रण: बाणभट्ट ने शबरों के काले रंग को चित्रित करने के लिए 'अंजन' (काजल), 'तमाल', 'यमुना', 'काली रात' और 'अंधकार' जैसे उपमानों की झड़ी लगा दी है।

 2. धार्मिक-सांस्कृतिक संकेत: शबरों को 'अधर्म का समूह' या 'मुनियों के शाप' के समान बताना यह दर्शाता है कि उन्हें सभ्य समाज और ऋषियों के नियमों से बाहर (हिंसक) माना जाता था।

 3. उपमा: सेनापति की तुलना एक युवा हाथी (गजयूथपति) से करना उसके शौर्य और बल को प्रदर्शित करता है। यहाँ से कथा में शबर सेनापति का विस्तृत वर्णन शुरू होता है।

यह अंश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' के उस प्रसंग से है, जहाँ शबर सेनापति (भील सेनापति) के भयानक और भव्य रूप का वर्णन किया गया है। बाणभट्ट ने यहाँ उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग कर उसे एक शक्तिशाली, हिंसक किन्तु प्रभावशाली योद्धा के रूप में चित्रित किया है।
नीचे इसका शुद्ध संस्कृत पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...पूतिारण्यमङ्गुलीलाग्रेण स्कन्धावलम्बिना दन्तमयेन कुन्तभारेण, केसरिणमिव गजमदमलिनीकृतेन केसरकलापेनोपेतम्, आयतललाटम्, अतितुङ्गघोरघोणम्, एककर्णाभरणतामुपनीतस्य भुजंगफणामणेरापाटलैरंशुभिरालोहितैः, वनशयनाभ्यासप्ररूढपल्लवरागेणेव वामपार्श्वेन विराजमानम्, अचिरप्रहतगजकपोलगृहीतेन स्रवन्मदपरिमलवाहिना कृष्णागुरुपङ्केनेव सुरभिणा मदेन कृताङ्गरागम्, उपरि तद्परिमलान्धेन भ्रमता मायूरातपत्रालुकारिणा मधुकराङ्गणेन तमालपल्लवेनेव निवारितातपम्, आलोककर्णपल्लवव्याजेन मुजबलनिर्जितया मय्युपयुक्तसेवया विन्ध्याटव्येव करतलेनापमृज्यमानगण्डस्थलस्वेदलेखम्, आपाटलया हरिणत्वक्षयरात्रिसन्ध्यायमानया शोणिताद्रेयेव दृशा रञ्जयन्तमाशाविभागान्, आजानुलम्बेन कुञ्जरकरप्रमाणमिव गृहीत्वा निर्मितेन चण्डिकारुधिरबलिप्रदानार्थमसकृन्निरितदारुदहनशिखाविभ्रमशिखरेण भुजयुगलेनोपशोभितम्, अन्तरान्तराऽलपरायमानहरिणरुधिरबिन्दुना स्वेदजलकणिकाचितेन मुक्ताफलविमिश्रैः करिकुम्भमुक्तफलैरिव रचितभूषणेन विन्ध्यशिखातलविशालेन वक्षःस्थलेनोद्भासमानम्, अविरतश्रमभ्याससुल्लिखितोल्लसत्सिंहाग्रमदरेखमालानस्तम्भयुगलमुपहसन्तमिवोरुदण्डद्वयेन, व्यालोलकोशेयपरिधानम्, अकारणेऽपि भ्रुकुटया बद्धत्रिपाताकोपरचितकुटिलकराले ललाटपट्टे, प्रबलभक्त्याऽराधितया 'मत्परिग्रहोऽयम्' इति कात्यायन्या त्रिशूलेन चिह्नितमिव, अलिकुलैरनुगच्छद्भिः, श्रमवशादास्यविनिर्गताभिः स्वभावपाटलतया शुष्काभिरपि हरिणशोणितमिव क्षरन्तीभिर्जिह्वाभिरावेद्यमानस्वेदविवृतमुखतया स्पष्टदंष्ट्रान्तराललग्नकेसरिसटानिव चक्षुषो मार्गानलम्बिभिः, स्थूलवराटकमालिकापरिगतकण्ठं महावराहदंष्ट्राजर्जरैरङ्गकैरपि महा-..."

हिन्दी अनुवाद

शबर सेनापति के व्यक्तित्व का चित्रण इस प्रकार है:
शस्त्र और वेश: उसने अपने कंधे पर हाथी के दाँतों से बना भारी भाला (कुन्त) रखा था, जिसकी नोक उँगलियों से छू रही थी। वह किसी सिंह के समान लग रहा था जिसके बाल (केसर) हाथियों के मद से मैले हो गए हों। उसका ललाट चौड़ा और नासिका (नाक) ऊँची और भयानक थी।

आभूषण: उसने अपने एक कान में सर्प की फणा की मणि का आभूषण पहन रखा था, जिसकी लाल कान्ति उसके चेहरे पर ऐसी लग रही थी मानो वन में पत्तों की शय्या पर सोने से उसके गाल लाल हो गए हों।

अङ्गराग (लेप): उसने अभी-अभी मारे गए हाथी के कपोलों से निकले सुगन्धित मद (मद-जल) का लेप अपने शरीर पर किया था, जो कृष्ण-अगुरु के समान महक रहा था। उस महक से अंधे होकर भौंरे उसके चारों ओर मंडरा रहे थे, जो उसके सिर पर 'मयूर-पंखों के छत्र' जैसी शोभा दे रहे थे।

पराक्रम: उसे देखकर ऐसा लगता था मानो विन्ध्याटवी (विन्ध्य का जंगल) स्वयं अपनी हथेली से उसके गालों का पसीना पोंछ रही हो। उसकी आँखें हिरणों के वध के कारण क्रोधाग्नि से लाल थीं, जो दसों दिशाओं को रक्ताभ (लाल) कर रही थीं।

 भुजाएं और वक्ष: उसकी भुजाएं घुटनों तक लंबी (आजानुबाहु) थीं, जो ऐसी लगती थीं मानो चण्डिका देवी को बलि चढ़ाने के लिए जलती हुई अग्नि की लपटें हों। उसका विशाल वक्षस्थल विन्ध्य पर्वत के शिखर जैसा चौड़ा था, जिस पर पसीने की बूंदों के साथ हाथियों के मस्तक से निकले मोती ऐसे चिपके थे मानो उसने मोतियों के आभूषण पहने हों।

 भयानक रूप: वह रेशमी वस्त्र (कोशेय) पहने था। उसके ललाट पर बिना कारण भी पड़ने वाली क्रोध की तीन रेखाएँ (त्रिपाताक) ऐसी लगती थीं मानो देवी कात्यायनी ने उसे 'यह मेरा भक्त है' कहकर अपने त्रिशूल से अंकित कर दिया हो।

शिकारी कुत्ते: उसके साथ शिकारी कुत्ते चल रहे थे, जो थकान के कारण अपनी लाल जीभ बाहर निकाले हुए थे।

उनकी जीभों से टपकती लाली ऐसी लग रही थी मानो वे हिरणों का ताज़ा खून पीकर आ रहे हों। सेनापति के गले में बड़ी-बड़ी कौड़ियों (वराटक) की माला थी और उसका शरीर जंगली सूअरों के साथ युद्ध के घावों से भरा होने पर भी अत्यंत शक्तिशाली दिख रहा था।

प्रमुख विशेषताएँ:

 1. वीर और रौद्र रस: इस वर्णन में शबर सेनापति की भयंकरता और उसके शौर्य का अद्भुत मिश्रण है।

 2. धार्मिक संदर्भ: शबरों का देवी चण्डिका (कात्यायनी) का भक्त होना और उन्हें पशुओं की बलि देना यहाँ स्पष्ट रूप से चित्रित है।

 3. प्रकृति और मानव: बाणभट्ट ने प्रकृति (भौंरे, मद-जल, विन्ध्य पर्वत) को सेनापति के व्यक्तित्व का विस्तार बना दिया है। 'मायूरातपत्र' (मयूर पंखों का छत्र) भौंरों के समूह को कहना उनकी मौलिक कल्पना है।

यह गद्यांश बाणभट्ट की 'कादम्बरी' से है, जिसमें शबर सेनापति मातङ्गक के व्यक्तित्व और उसकी सेना का अत्यंत ओजस्वी और श्लेषपूर्ण वर्णन किया गया है।
नीचे इसका शुद्ध पाठ और हिन्दी अनुवाद दिया गया है:

शुद्ध पाठ (संशोधित)

"...अनेकवर्णैः, अभिरतिप्रमाणाभिश्च केसरिणामभयप्रदानयावनार्थमागताभिः सिंहीभिरिव कौलेयककुटुम्बिनीभिरनुगम्यमानम्, कैश्चिद्गृहीतचमरवालगजदन्तभारैः, कैश्चिद्विकचपर्णबद्धमधुपुयैः, कैश्चिन्मृगपतिभिरिव गजकुम्भमुक्ताफलनिकरसनाथपाणिभिः, कैश्चित्पिशिताहारैरिवागृहीतपिशितभारैः, कैश्चिद्यमदूतैरिव केसरिकृतिधारिभिः, कैश्चित्क्षपणकैरिव मयूरपिच्छवाहिभिः, कैश्चिच्छिष्यभिरिव काकपक्षधरैः, कैश्चित्कृष्णचरितमिव दर्शयद्भिः समुत्खातविधृतगजदन्तैः, कैश्चिजलदागमदिवसैरिव जलदच्छायामलिनमम्बरैः, अनेकवृत्तान्तैः शबरवृन्दैः परिवृतम्।
अरण्यमिव ससङ्गधनुष्कम्, अभिनवजलधरमिव मयूरपिच्छचित्रचापधारिणम्, बक राक्षसमिव गृहीतकचक्रम, अरुणाग्रजमिवोद्यतानेकमहानागदशनम्, भीष्ममिव शिखण्ड्याश्रितम्, निदाघदिवसमिव सतताविर्भूतमृगतृष्णम्, विद्याधरमिव मुक्तसवेगम्, पाराशर्यमिव योजनगन्धानुसारिणम्, घटोत्कचमिव भीमरूपधारिणम्, अचलराजकन्यकाकेशपाशमिव नीलकण्ठचन्द्रकाभरणम्, हिरण्याक्षदानवमिव महावराहदंष्ट्राविभिन्नवक्षःस्थलम्, अतिरागिणमिव कृतबहुमृगयापाणिग्रहम्, अपिरितारनमिव रक्तलुब्धकम्, गीतकलांन्यासमिप निषादानुगतम्, अम्बिकात्रिशूलमिव महिषरुधिराार्द्रकायम्, अभिनवयौवनमपि क्षपितबहुवयसम्, कृतसारमेयसंग्रहमपि फलमूलाशनम्, कृष्णमप्यसुदर्शनम्, स्वच्छन्दप्रचारमपि दुर्गैकाश्रयणम्, क्षितिमृत्पादादुदवर्तिनमपि राजसेवानभिज्ञम्, अपत्यमिव विन्ध्यस्य, अवतारमिव कृतान्तस्य, सहोदरमिव पापस्य, सारमिव कलिकालस्य, भीषणमपि महासत्त्वतया गम्भीरमिवोपलक्ष्यमाणमनभिभवनीयाकृतिं मातङ्गक नामानं शबरसेनापतिमद्राक्षम्।"

हिन्दी अनुवाद

"मैंने मातङ्गक नाम के उस शबर सेनापति को देखा, जो हज़ारों शिकारियों और शिकारी कुत्तों (कौलेयक) से घिरा हुआ था। वे कुत्ते इतने भयानक थे मानो सिंहों को अभय दान देने के लिए स्वयं सिंहनियाँ आई हों। उसके साथ चलने वाले शबर विभिन्न वस्तुओं को लिए हुए थे:

 कुछ के पास चँवर, हिरण के बाल और हाथी के दाँतों का भार था।

  कुछ अपने हाथों में हाथियों के मस्तक से निकले हुए मोतियों का समूह लिए थे, मानो वे स्वयं वनराज (सिंह) हों।

 कुछ यमदूतों के समान सिंह की खाल धारण किए हुए थे, तो कुछ जैन भिक्षुओं (क्षपणक) की तरह मोर के पंख लिए थे।

  कुछ श्री कृष्ण के चरित्र जैसा दृश्य दिखा रहे थे, क्योंकि जैसे कृष्ण ने 'कुवलयापीड' हाथी के दाँत उखाड़े थे, वैसे ही इन्होंने हाथियों के दाँत उखाड़कर हाथों में ले रखे थे।

वह सेनापति मातङ्गक अद्भुत उपमाओं का पुंज था:
  वह अरण्य (जंगल) जैसा था, क्योंकि जंगल धनुष (धनु वृक्ष) से युक्त होता है और वह भी धनुष लिए था।

  वह नूतन बादल जैसा था, क्योंकि बादल इन्द्रधनुष धारण करता है और इसने मोरपंखों से विचित्र धनुष ले रखा था।

 वह भीष्म पितामह जैसा था, क्योंकि भीष्म 'शिखण्डी' पर आश्रित (सामने) थे और यह भी 'शिखण्डी' (मोर के पंखों) से सजा था।

  वह घटोत्कच जैसा था, क्योंकि घटोत्कच 'भीम' (पुत्र) का रूप था और इसका रूप भी 'भीम' (भयानक) था।

वह पार्वती (अचलराजकन्यका) के केशपाश जैसा था, जिसे महादेव (नीलकण्ठ) और चन्द्रमा सुशोभित करते हैं, और यह भी मोर (नीलकण्ठ) के पंखों के चन्द्रकों (आँखों) से सजा था।

  वह देवी दुर्गा के त्रिशूल जैसा था, जो महिषासुर के रक्त से भीगा होता है, और इसका शरीर भी जंगली भैंसों (महिष) के रक्त से भीगा था।

वह युवा होने पर भी बहुत से मृगों (आयु/पशुओं) का नाश करने वाला था। वह कुत्तों (सारमेय) को इकट्ठा करने वाला होने पर भी फल-मूल खाने वाला था। वह कृष्ण (काले रंग का) होने पर भी असुदर्शन (सुदर्शन चक्र से रहित/देखने में अरुचिकर) था। वह स्वच्छन्द घूमने वाला होने पर भी दुर्ग (किला/कठिन मार्ग) का आश्रय लेने वाला था।

वह ऐसा लगता था मानो विन्ध्य पर्वत की सन्तान हो, साक्षात् यमराज (कृतान्त) का अवतार हो, पाप का सगा भाई हो और कलिकाल का निचोड़ (सार) हो। वह अत्यंत भयानक होने पर भी अपने महान साहस के कारण गम्भीर और अजेय दिखाई दे रहा था।"

विशेष टिप्पणी:

बाणभट्ट ने यहाँ श्लेष और विरोधाभास का सुंदर प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए:

  'कृष्णमप्यसुदर्शनम्' – यहाँ विरोधाभास है कि जो कृष्ण है उसके पास सुदर्शन चक्र होना चाहिए, लेकिन सेनापति कृष्ण (काला) है और असुदर्शन (भद्दा) है।

  'निषादानुगतम्' – संगीत में निषाद स्वर होता है और सेनापति के पीछे निषाद (शिकारी जाति) के लोग चल रहे थे।

मुख्य सारांश (Quick Summary)

गद्य सम्राट बाणभट्ट की शैली: इन पृष्ठों में बाणभट्ट की 'पाञ्चाली' रीति का दर्शन होता है, जहाँ शब्द और अर्थ का सुंदर समन्वय है। Kadambari Summary

प्रकृति का मानवीकरण: विन्ध्याटवी और पम्पा सरोवर मात्र भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि जीवित पात्रों की तरह चित्रित हैं।

पितृ-प्रेम का आदर्श: वैशम्पायन शुक के माध्यम से एक पक्षी पिता के त्याग और वात्सल्य की हृदयस्पर्शी कथा प्रस्तुत की गई है।

रौद्र और करुण रस का मेल: एक ओर जहाँ पम्पा सरोवर का शांत सौंदर्य है, वहीं दूसरी ओर शबर सेनापति का भयानक और हिंसक वर्णन पाठकों को रोमांचित कर देता है।

ऐतिहासिक और पौराणिक जुड़ाव: अगस्त्य मुनि, राम, और एकलव्य जैसे प्रसंगों को जोड़कर बाणभट्ट ने कथा को अत्यंत गौरवशाली बनाया है।

निष्कर्ष (Conclusion) Banabhatta Sanskrit,

महाकवि बाणभट्ट रचित 'कादम्बरी' का यह अंश न केवल संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि है, बल्कि यह प्रकृति, पशु-पक्षी और मानव संवेदनाओं के अटूट संबंध को भी दर्शाता है। विन्ध्याटवी के सघन वैभव से लेकर शबर सेनापति की क्रूरता तक का यह सफर पाठक को एक ऐसी दुनिया में ले जाता है जहाँ शब्द चित्र बन जाते हैं। बाणभट्ट की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे एक छोटे से शुक (तोते) के माध्यम से जीवन के सबसे गहरे सत्यों और संघर्षों को उजागर करते हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि काल का चक्र अत्यंत प्रबल है—जो वन कभी शांत और ऋषियों की मंत्रध्वनि से गूंजता था, वह पल भर में शिकारियों के कोलाहल से दहल उठता है।

अलंकारों की खान है। 

बाणभट्ट की 'कादम्बरी' अलंकारों की खान है। विशेष रूप से विन्ध्याटवी और शबर सेनापति के वर्णन में बाणभट्ट ने शब्दालंकार (अनुप्रास) और अर्थालंकार (उपमा, उत्प्रेक्षा, श्लेष, विरोधाभास) का इतना सूक्ष्म प्रयोग किया है कि इसे 'गद्य-काव्य' का शिखर माना जाता है।

इन दिए गए अंशों में मुख्य रूप से निम्नलिखित अलंकारों का प्रयोग हुआ है:

1. श्लेष अलंकार (Pun)

जहाँ एक ही शब्द के दो या दो से अधिक अर्थ निकलें। बाणभट्ट का यह सबसे प्रिय अलंकार है।

उदाहरण: "सदासंनिहितयमभीषणा, महिषाधिष्ठिता च (प्रेताधिपनगरीव)"

  वन के पक्ष में: यहाँ 'यम' का अर्थ सांप है और 'महिष' का अर्थ जंगली भैंसा है

  यमपुरी के पक्ष में: यहाँ 'यम' का अर्थ यमराज है और 'महिष' उनकी सवारी (भैंसा) है।

 उदाहरण २: "असितकुसुमक्रीडितम् (कृष्णचरितमिव)"

   वन के पक्ष में: शिकारियों द्वारा हाथियों के दाँत (गजदन्त) उखाड़ना।

   कृष्ण के पक्ष में: भगवान कृष्ण द्वारा 'कुवलयापीड' हाथी के दाँत उखाड़ना।

2. उपमा अलंकार (Simile)

जहाँ किसी वस्तु की तुलना दूसरी प्रसिद्ध वस्तु से की जाए।

 उदाहरण:
 "पूर्वापरजलनिधिवेलावनलेखाभ्यन्तरमलंकारभूता मेखलेव भुवो"

 यहाँ विन्ध्याटवी की तुलना पृथ्वी की करधनी (मेखला) से की गई है।

उदाहरण २: "गगनतलमिव भुवि निपतितं (पम्पासरः)"

पम्पा सरोवर की तुलना पृथ्वी पर गिरे हुए आकाश से की गई है।

3. उत्प्रेक्षा अलंकार (Poetic Fancy)

जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना (मानो, जैसे) व्यक्त की जाए।

 उदाहरण: "पल्लवप्रचयेन संछादिता... संचरदमरदेवताचरणालक्तकरसरञ्जितेनेव"

   लाल पत्तों को देखकर ऐसी संभावना व्यक्त की गई है मानो वन-देवताओं के पैरों का महावर (आलक्तक) वहां लग गया हो।

उदाहरण २: "नन्दनवनश्रियमिवावलोकयितुमभ्युद्यतः (शाल्मलीवृक्षः)"

वृक्ष इतना ऊँचा है मानो वह स्वर्ग के नंदन वन की शोभा देखने के लिए ऊपर उठा हो।

4. विरोधाभास अलंकार (Oxymoron/ Paradox)

जहाँ वास्तविक विरोध न होते हुए भी शब्दों से विरोध प्रतीत हो।

उदाहरण: "अपरिमितबहलपर्णसंचयापि सप्तपर्णभूषिता"

विरोध: 'सप्तपर्ण' का अर्थ होता है सात पत्तों वाला। कवि कहता है कि जिसमें अनगिनत पत्ते हैं, वह सात पत्तों वाला कैसे हो सकता है?

परिहार: यहाँ 'सप्तपर्ण' एक विशेष वृक्ष का नाम है, संख्या का नहीं।

उदाहरण २: "कृष्णमप्यसुदर्शनम्"
विरोध: जो कृष्ण (काले) हैं, उनके पास सुदर्शन चक्र होना चाहिए।

परिहार: शबर सेनापति कृष्ण (काले रंग का) है, लेकिन वह देखने में सुंदर (सुदर्शन) नहीं है।

5. अनुप्रास अलंकार (Alliteration) जहाँ वर्णों की बार-बार आवृत्ति से संगीत पैदा हो।

 उदाहरण: "मदकलकुररकुलदृश्यमानमरिचपल्लवा"
 यहाँ 'क' और 'ल' वर्ण की आवृत्ति से भाषा में प्रवाह और नाद-सौंदर्य पैदा किया गया है।

6. अतिशयोक्ति अलंकार (Hyperbole)

जहाँ किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए।
उदाहरण: सूर्य के रथ के घोड़ों के मुख से गिरा फेन शाल्मली वृक्ष की चोटियों को सफेद कर रहा है। यह वृक्ष की अकल्पनीय ऊँचाई बताने के लिए अतिशयोक्ति का सहारा लिया गया है।

निष्कर्ष (Summary Table

| अलंकार | मुख्य विशेषता | उदाहरण सूत्र |

| श्लेष | एक शब्द, दो अर्थ | यम-महिष (सांप/यमराज) |
| उपमा | तुलना करना | मेखलेव भुवो (पृथ्वी की करधनी सी) |
| उत्प्रेक्षा | संभावना/कल्पना | इव, मानो (देवता के पैरों का रंग) |
| विरोधाभास | उल्टा प्रतीत होना | कृष्णमप्यसुदर्शनम् (कृष्ण पर सुदर्शन नहीं) |
| अनुप्रास| वर्णों की आवृत्ति | कुरर-कुल-कलकल |



कादम्बरी विशेष शब्दावली (Glossary)

कादम्बरी (Kadambari)
बाणभट्ट द्वारा रचित यह ग्रंथ संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ 'गद्य-काव्य' (उपन्यास) है। इसका शाब्दिक अर्थ 'मदिरा' है, जो इसकी रसपूर्ण और नशीली काव्य शैली को दर्शाता है।
पम्पा सरोवर (Pampa Sarovar)
रामायणकालीन प्रसिद्ध जलाशय जो वर्तमान हम्पी (कर्नाटक) के निकट माना जाता है। बाणभट्ट ने इसे एक दिव्य और निर्मल दर्पण की तरह चित्रित किया है।
शाल्मली वृक्ष (Shalmali Tree)
विन्ध्याटवी में स्थित एक विशाल 'सेमल' का पेड़। बाणभट्ट के अनुसार यह वृक्ष पक्षियों के लिए किसी सुरक्षित दुर्ग (किले) की तरह था।
मातङ्गक (Matangak)
शबरों (भील योद्धाओं) का भयंकर सेनापति। इसका शरीर लोहे की तरह कठोर और स्वभाव अत्यंत पराक्रमी व हिंसक था।
विन्ध्याटवी (Vindhyatavi)
विन्ध्याचल पर्वतमाला का सघन और विशाल वन। इसे 'पृथ्वी की मेखला' (करधनी) कहा गया है क्योंकि यह उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ता है।
अगस्त्य आश्रम (Agastya Ashram)
विन्ध्याटवी के मध्य स्थित महर्षि अगस्त्य का पवित्र निवास, जहाँ भगवान राम ने वनवास के दौरान समय बिताया था।
वैशम्पायन (Vaishampayan)
कथा का मुख्य पात्र जो एक शुक (तोता) है। वह पूर्वजन्म के संस्कारों से युक्त है और राजा शूद्रक को अपनी आत्मकथा सुना रहा है।
मृगया (Mrigaya)
शिकार खेलने की क्रिया। इस प्रसंग में बाणभट्ट ने शिकार की क्रूरता और वन्यजीवों के विनाश का अत्यंत सजीव वर्णन किया है।
पंचवटी (Panchvati)
गोदावरी नदी के तट पर स्थित वह स्थान जहाँ सीता माता और लक्ष्मण जी के साथ श्री राम ने कुटिया बनाई थी। कादम्बरी में इसका बार-बार संदर्भ आता है।
अग्निहोत्र धूम (Agnihotra Smoke)
ऋषियों के आश्रम से निकलने वाला पवित्र धुआँ। बाणभट्ट इसे 'आकाश की ओर बढ़ती धर्म की पताका' मानते हैं।
चक्रवाक मिथुन (Chakravaka Pair)
चकवा और चकवी का जोड़ा। भारतीय साहित्य में माना जाता है कि ये रात में एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, जिसे 'राम का शाप' भी कहा गया है।
पाञ्चाली रीति (Panchali Style)
बाणभट्ट की लेखन शैली, जिसमें शब्दों के विन्यास और अर्थ की गहराई का अद्भुत संतुलन होता है।
"बाणभट्ट की यह वर्णन शैली आपको कैसी लगी? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।" कादम्बरी कथासार: राजा की सभा में वैशम्पायन शुक का आगमन और विलक्षण वर्णन-01 आगे-शबर सेनापति मातङ्गक का वर्णन: बाणभट्ट की कादम्बरी (पृष्ठ 31)

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