कादम्बरी पृष्ठ 44: महर्षि जाबालि - संसार सागर के संतरण सेतु

सनुभवन्ती निवसति हंसीव मानसे... चतुर्मुखमुखकमलवासिभिश्चतुर्वेदैः सुचिरादिव द्वितीयमिदमपरमुचितमासादितं स्थानम्‌ । एनमासाद्य शरत्कालमिव कलुषिताः प्रसादमुपगताः पुनरपि जगति सरित इव सर्वविद्याः । नियतमभित्र सर्वात्मना कृतावस्थितिना भगवता परिभूतकलिकालविकसितेन धर्मेण न स्मर्यते कृतयुगस्य... एष प्रवाहः करुणारसस्य संतरणसेतुः संसारसिन्धोराधारः क्षमाम्भसां परशुस्तृष्णातृणागहनस्य सागरः सन्तोषांमृतस्योपदेष्टा सिद्धिमार्गस्यास्तगिरिरसद्ग्रहस्य मूलमुपशमतरोर्नाभिः प्रज्ञाचक्रस्य स्थविरवंशो धर्मध्वजस्य तीर्थं सर्वविद्यावताराणां वडवानलो लोभार्णवस्य निकषोपलः शीलरत्नानां दावानलो रागपल्लवस्य महामन्त्रः क्रोधभुजङ्गस्य दिवसकरो मोहान्धकारस्य...।
रूपक एवं उपमा अलंकार का वैभव: १. हंसीव मानसे (उपमा): सरस्वती (विद्या) उनके मन में वैसे ही निवास करती है जैसे मानसर झील में हंसिनी। २. संतरणसेतुः संसारसिन्धोः (रूपक): वे संसार रूपी समुद्र को पार करने के लिए 'सेतु' (पुल) के समान हैं। ३. परशुस्तृष्णातृणागहनस्य (रूपक): वे तृष्णा (लालच) रूपी घास के घने जंगल को काटने के लिए 'परशु' (कुल्हाड़ी) के समान हैं। ४. दिवसकरो मोहान्धकारस्य: वे मोह रूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए 'दिवसकर' (सूर्य) हैं। विशेष शब्द-सिद्धि: 'निकषोपलः शीलरत्नानाम्': वे शील (चरित्र) रूपी रत्नों को परखने के लिए 'निकषोपल' (कसौटी का पत्थर) हैं। 'स्थविरवंशो धर्मध्वजस्य': वे धर्म की ध्वजा को थामने वाले मजबूत 'बांस' (वंश) के समान स्थिर हैं।
वैशम्पायन सोचता है— "विद्याएँ इनके मन में वैसे ही सुखपूर्वक रहती हैं जैसे हंसिनी मानसरोवर में। ब्रह्मा के मुख में रहने वाले चारों वेदों को मानो बहुत समय बाद अपना दूसरा उचित स्थान (जाबालि का मुख) मिल गया है। इनके प्रभाव से कलियुग में भी 'कृतयुग' (सत्ययुग) का आभास होता है।

महर्षि जाबालि क्या हैं? वे करुणा के रस का प्रवाह हैं। वे संसार रूपी समुद्र को पार करने का पुल हैं। वे क्षमा रूपी जल के आधार हैं। लोभ रूपी समुद्र को सुखाने के लिए वे बड़वाग्नि हैं। वे चरित्र के रत्नों को परखने की कसौटी हैं। वे क्रोध रूपी सर्प को वश में करने वाले महामंत्र हैं और मोह के अंधकार को मिटाने वाले सूर्य हैं। उनकी उपस्थिति से ही पृथ्वी स्थिर है और आकाश को भी अब अपने सप्तऋषियों पर गर्व नहीं रहा, क्योंकि पृथ्वी पर जाबालि जैसे महामुनि विद्यमान हैं।"
Vaishampayana muses on the sheer spiritual magnitude of Sage Jabali. He describes the sage as the "Bridge to cross the ocean of existence" (Samsara-Sindhu). Jabali is depicted as the Axe that cuts through the dense forest of desire, and the Sun that dissipates the darkness of delusion (Moha).

His presence is so powerful that even the heavens lose their pride in the Seven Sages (Saptarishi), for the Earth now possesses a greater light in the form of Jabali. He is the Touchstone for the gems of character and the Great Mantra to subdue the serpent of anger. In him, the purity of the Golden Age (Krita Yuga) lives on, even amidst the chaos of the present era.
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