कादम्बरी पृष्ठ 43: तपस्या का प्रभाव और महर्षि जाबालि का दिव्य तेज

प्रशमेन तुषाररश्मिमिव... वैनतेयमिव स्वप्रभावोपात्तद्विजाधिपत्यं कमलासनमिवाश्रमगुरुं जरन्नन्दनतरुमिव भुजङ्गनिर्मोकधवलजटांशुं प्रवरवारणमिव प्रलम्बकर्णवालं बृहस्पतिमिवाजन्मसंवर्धितकचं दिवसमिवोदर्कबिम्बभास्वरमुखं शरत्कालमिव क्षीणवर्षं... भगवन्तं जाबालिमपश्यम्‌ । अवलोक्य चाहमचिन्तयम्‌ । अहो प्रभावस्तपसाम्‌ । इयमस्य शान्तापि मूर्तिरुत्तप्तकनकावदाता परिस्फुरन्ती सौदामिनीव चक्षुः प्रतिहन्ति तेजांसि । सततमुदासीनापि महाप्रभावतया भयमिवोपजनयति प्रथमोपगतस्य... धन्यानि हि नामग्रहणान्यपि महामुनीनाम्‌ । किं पुनदर्शनम्‌ । धन्यमिदमाश्रमपदमयमधिपतिर्यत्र । अथ वा भुवनतलमेव धन्यमखिलमनेनाधिष्ठितमवनितलकमलयोनिना ।
व्याकरण एवं श्लेष (Double Meaning) विश्लेषण: १. वैनतेयमिव (गरुड़ के समान): गरुड़ 'द्विजाधिप' (पक्षियों का राजा) है। महर्षि जाबालि 'द्विजाधिप' (ब्राह्मणों के अधिपति) हैं। २. शरत्कालमिव क्षीणवर्षम्: शरद् ऋतु में 'वर्ष' (वर्षा) समाप्त हो जाती है। महर्षि 'क्षीण-वर्ष' (क्षीण-पाप या आयु के मोह से रहित) हैं। ३. बडवानलमिव सततपयोभक्षम्: बडवाग्नि केवल 'पय' (जल) का भक्षण करती है। महर्षि 'पय' (दूध/केवल जल) के आहार पर जीवित रहने वाले संयमी हैं। ४. उत्तप्तकनकावदाता: महर्षि की मूर्ति तपे हुए सोने (उत्तप्त कनक) के समान कान्तिमान है। यहाँ 'उपमा' अलंकार है। विशेष पद: 'अघक्षयकारिणाम्': पापों का नाश करने वाले। 'कमलयोनिना': ब्रह्मा जी के समान (यहाँ महर्षि को पृथ्वी का ब्रह्मा कहा गया है)।
महर्षि जाबालि की शांति चंद्रमा के समान शीतल थी। वे गरुड़ के समान ब्राह्मणों (द्विजों) के अधिपति थे और ब्रह्मा जी के समान आश्रम के पितामह थे। उनकी सफेद जटाएँ ऐसी लगती थीं मानो कल्पवृक्ष से सांप की केंचुली लटक रही हो। उनका मुख सूर्य के समान तेजस्वी था और वे शरद् ऋतु के समान निर्मल थे।

उन्हें देखकर वैशम्पायन सोचने लगा— "अहो! तपस्या का प्रभाव कितना महान है। यद्यपि महर्षि की यह मूर्ति अत्यंत शांत है, फिर भी तपे हुए सोने के समान इनकी चमक बिजली की तरह आँखों को चौंधिया देती है। जो महामुनि अपनी दिव्य दृष्टि से सम्पूर्ण संसार को हाथ में रखे आँवले के समान (करतलामलकवत्) स्पष्ट देखते हैं, उनके तो केवल नाम लेने से ही पापों का क्षय हो जाता है, फिर दर्शन का तो कहना ही क्या! यह आश्रम और यह सम्पूर्ण पृथ्वी धन्य है, जिसे इन 'पृथ्वी के ब्रह्मा' (अवनितल-कमलयोनि) ने अपने चरणों से पवित्र किया है।"
Sage Jabali was a reservoir of tranquility, as cool as the moonbeams. Like the divine eagle Garuda, he held sovereignty over the 'twice-born' (Brahmins). His presence was like that of Lord Brahma himself. Vaishampayana, observing the sage, thought to himself— "How extraordinary is the power of penance! Though his form is peaceful, his radiance, glowing like molten gold, strikes the eyes like a flash of lightning."

The bird realized that for a sage who perceives the entire universe as clearly as a fruit in his palm (Karatal-Amalak), even mentioning his name is enough to purify one's sins. This hermitage and indeed the entire earth are blessed to be presided over by such a 'Brahma of the mortal realm.' His serene aura, though detached, commanded an instinctive reverence and awe from all who approached him.
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