अभिनिवेश क्लेश क्या है? मृत्यु के भय का गूढ़ रहस्य
योगदर्शन में पाँच क्लेश बताए गए हैं – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। इनमें पाँचवाँ क्लेश अभिनिवेश है, जिसे सामान्य रूप से मृत्यु का भय कहा जाता है। इसका मूल सूत्र में मिलता है।
महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि यह मृत्युभय केवल सामान्य मनुष्यों में ही नहीं, बल्कि विद्वानों में भी बना रहता है। यही सार्वभौमिक भय अभिनिवेश कहलाता है।
स्वरसवाही शब्द का अर्थ
सूत्र में “स्वरसवाही” शब्द आया है।
- स्वरस = स्वभाव
- वाही = साथ लेकर चलने वाला
अर्थात् जो स्वभाव से ही निरंतर प्रवाहित हो रहा हो।
यहाँ स्वभाव दो प्रकार का होता है –
- नित्य स्वभाव
- अनित्य स्वभाव
अभिनिवेश अनित्य स्वभाव से सम्बद्ध है, जो जन्म-जन्मान्तर से प्रवाह के रूप में चला आ रहा है। इसलिए इसे अनादि भी कहा गया है।
मृत्युभय क्यों होता है?
प्रश्न उठता है — मृत्यु का भय सभी प्राणियों को क्यों होता है?
इसका उत्तर अपने भाष्य में देते हैं:
“प्रत्येक प्राणी की यह अभिलाषा होती है कि मैं सदा बना रहूँ, मेरा अस्तित्व समाप्त न हो।”
यही आत्मा की स्वाभाविक इच्छा है — “मा न भूवं भूयासम्” (मैं नष्ट न हो जाऊँ)।
यही इच्छा मृत्युभय का मूल कारण है।
क्या यह पूर्वजन्म का प्रमाण है?
महर्षि वेदव्यास एक अत्यंत महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत करते हैं।
वे कहते हैं — यदि किसी ने मृत्यु का अनुभव कभी किया ही न हो, तो वह उससे क्यों डरेगा?
एक नवजात कृमि (कीट) को देखिए —
- उसे मृत्यु का ज्ञान नहीं
- न उसने किसी को मरते देखा
- न उसे शास्त्रों का ज्ञान है
- न प्रत्यक्ष, न अनुमान, न शब्द प्रमाण
फिर भी जब कोई उसे मारने का प्रयास करता है, तो वह भयभीत होता है।
यह भय किस आधार पर है?
यह पूर्वजन्म में अनुभव किए गए मृत्यु-दुःख का संस्कार है।
इससे स्पष्ट होता है कि पूर्व जन्म और अगला जन्म – दोनों का सिद्धान्त तर्कसंगत है।
विद्वान भी क्यों डरते हैं?
एक रोचक प्रश्न है —
जो विद्वान शास्त्रों को जानते हैं, आत्मा की नित्यता समझते हैं, वे भी मृत्यु से क्यों डरते हैं?
वेदव्यास कहते हैं —
पूर्व जन्म में विद्वान और अज्ञानी दोनों ने समान रूप से मृत्यु का दुःख भोगा है। उस दुःख की वासना (संस्कार) दोनों में विद्यमान रहती है। इसलिए वर्तमान जन्म में भी दोनों को मृत्युभय होता है।
अतः अभिनिवेश केवल अज्ञानी का दोष नहीं, बल्कि सर्वसाधारण क्लेश है।
अभिनिवेश और आत्मा का नित्यत्व
अभिनिवेश से अनेक सिद्धांत स्पष्ट होते हैं:
- पूर्व जन्म की सिद्धि
- अगला जन्म
- आत्मा का नित्यत्व
- संस्कारों का अस्तित्व
इसी संदर्भ में लिखते हैं कि जब जीव, परमेश्वर और प्रकृति के नित्य-अनित्य स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब क्लेशों की निवृत्ति होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
क्या अभिनिवेश से मुक्ति संभव है?
हाँ।
जब साधक —
- आत्मा के नित्यत्व को समझ ले
- शरीर की अनित्यता को स्वीकार करे
- तत्वज्ञान प्राप्त करे
- क्रियायोग को दृढ़ करे
तब अभिनिवेश का क्षय होता है।
क्लेशों की शान्ति से ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
निष्कर्ष
अभिनिवेश केवल मृत्यु का सामान्य भय नहीं है।
यह जन्म-जन्मान्तर से चले आ रहे संस्कारों का परिणाम है।
यह क्लेश —
- मनुष्य में भी है
- पशु-पक्षियों में भी है
- विद्वानों में भी है
- अज्ञानी में भी है
इसका समाधान केवल तत्वज्ञान और योगाभ्यास से संभव है।
जब साधक आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब जन्म-मरण की श्रृंखला से मुक्त हो सकता है।
अभिनिवेश क्लेश का गूढ़ अर्थ
स्वरसवाही शब्द की व्याख्या
मृत्युभय और पूर्वजन्म का प्रमाण
कृमि उदाहरण का दार्शनिक महत्व
विद्वान और मूढ़ दोनों में मृत्युभय
स्वामी दयानन्द का समाधान
क्लेश निवृत्ति और मोक्ष मार्ग
क्लेशों के पाँच विभागों में से चार विभागों (अविद्या, अस्मिता, राग और द्वेष) की परिभाषाएँ बताकर महर्षि पतञ्जलि अन्तिम पाँचवें विभाग की चर्चा प्रस्तुत सूत्र में कर रहे हैं। महर्षि कहते हैं- प्रवाह (परम्परा) से चला आ रहा, यह मृत्यु का डर सर्वसाधारण मनुष्यों में तो रहता ही है, परन्तु विद्वानों में भी निरन्तर बना रहता है। इस मृत्युभय को ही अभिनिवेश नाम से कहा जाता है। यहाँ महर्षि ने ‘स्वरसवाही’ शब्द का प्रयोग किया है। स्वरस का अभिप्राय है- स्वभाव और वाही का अभिप्राय बनाये रखना, इस प्रकार स्वभाव को बनाया रखना अर्थ प्रकट होता है। स्वभाव दो प्रकार का होता है- एक नित्य स्वभाव और दूसरा अनित्य स्वभाव। यहाँ अनित्य स्वभाव को लिया गया है और यह अनित्य स्वभाव परम्परा से निरन्तर चला आ रहा है। इस कारण इसे प्रवाह से अनादि कहते हैं। यह मृत्युभय प्रवाह से-अनादि काल से निरन्तर चला आ रहा है और यह भय प्राणिमात्र को होता है। चाहे वह भय पशु, पक्षी, कीट-पतंगादि को होता हो, चाहे साधारण-से-साधारण मनुष्य को होता हो। मनुष्येतर प्राणियों को मृत्यु का भय होना और साधारण मनुष्यों को भी होना कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु जो पण्डित-विद्वान् हैं, शास्त्रों को आदि से अन्त तक जानने वाले हैं, उन्हें बोध रहता है कि जो जन्म लेता है, वह मरता (शरीर त्याग करता) भी है। इतना सब कुछ जानने के पश्चात् भी अज्ञानियों के समान मृत्यु से घबराते-डरते हैं। इसी डर-भय को महर्षि नेअभिनिवेश नाम से कथन किया है।
पाँच क्लेश सम्पूर्ण श्रृंखला
अविद्या का विस्तृत विवेचन
दग्धबीज अवस्था
प्रतिप्रसव सिद्धान्त
प्रस्तुत सूत्र की व्याख्या करते हुए महर्षि वेदव्यास लिखते हैं-
सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति,
मा न भूवं भूयासमिति।
अर्थात् प्रत्येक प्राणि को अपनी आत्मा के विषय में अभिलाषा होती है कि ‘मैं सदा ऐसा ही बना रहूँ, ऐसा कभी न हो कि मैं न रहूँ।’ ऐसी अभिलाषा नित्य होती है अर्थात् जब-जब आत्मा शरीर धारण करता है तब-तब आत्मा को ऐसा ही अनुभव होता है, इसलिए इसे सदा रहने वाली अभिलाषा कहा जाता है। इस कारण मनुष्य मृत्युभय को लेकर सदा सतर्क और सावधान रहता है। मनुष्य में एक स्वभाव है कि वह किसी भी व्यक्ति या वस्तु के प्रति आकर्षण रखता है या विकर्षण (अलगाव) रखता है। यह तब होता है, जब उसने, उस व्यक्ति या वस्तु का पहले अनुभव किया हो। यदि ऐसा नहीं है, अर्थात् पहले अनुभव नहीं किया, परन्तु आकर्षण या विकर्षण हो रहा है, ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता, इसलिए महर्षि ने कहा है-
क्यों विद्वान भी मृत्यु से डरते हैं
कृमि उदाहरण से पूर्वजन्म सिद्धि
प्रत्यक्ष अनुमान आगम से असम्भावित मृत्युभय
स्वरसवाही अभिनिवेश का अर्थ
आत्मा अमर है इसका प्रमाण
न चाननुभूतमरणधर्मकस्यैषा भवत्यात्माशीः।
अर्थात् जिस मनुष्य ने पूर्व जन्म में मृत्यु क्रिया का अनुभव न किया हो, उसकी यह आत्मा-सम्बन्धी अभिलाषा नहीं हो सकती। किसी भी आत्मा ने मरने के कष्ट का अनुभव कभी किया ही न हो, तो भला वह मरने से निरन्तर क्यों डरेगा? इससे यह स्पष्ट होता है कि-
एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते।
अर्थात् इसी अभिलाषा के कारण से पूर्व जन्म में अनुभव किये मरण दुःख का अनुभव इस वर्तमान जन्म में भी हो रहा है, ऐसी स्पष्ट प्रतीति होती है। वही यह मृत्युभय अपने संस्कारों के रूप में मन में विद्यमान होकर सदा मनुष्य को भयभीत करता रहता है। इस भयभीत करने वाले मृत्युभय को महर्षि ने अभिनिवेश नाम से पाँचवें क्लेश के रूप में प्रस्तुत किया है।
पाँच क्लेश योगदर्शन
अविद्या अस्मिता राग द्वेष
आत्मा का नित्यत्व
मृत्यु का दार्शनिक विश्लेषण
मोक्ष और क्लेश निवृत्ति
स्वामी दयानन्द सरस्वती मुक्तिविषय
यद्यपि मनुष्य को इस संसार में नाना प्रकार के भय प्राप्त होते रहते हैं, जैसे अन्न न मिलने का भय, वस्त्र न मिलने का भय, घर न मिलने का भय अर्थात् रोटी, कपड़ा और मकान के प्रति सदा भय बना रहता है। यह भय सामान्य रूप से प्रत्येक मनुष्य को होता है, परन्तु कुछ विशेष साधनों के अभाव में विशेष मनुष्यों को ही भय सताता रहता है, ऐसा भय सबको नहीं होता। चाहे जड़ वस्तुओं से सम्बन्धित भय हो या चेतन वस्तुओं से सम्बन्धित भय हो, यह अलग-अलग व्यक्तियों की अलग-अलग योग्यताओं के कारण हो सकता है, परन्तु अभिनिवेश नामक भय, ऐसा भय है जिससे कोई भी मनुष्य अछूता नहीं रह सकता। न केवल मनुष्य, मनुष्येतर समस्त प्राणियों को भी यह भय आतंकित करता है, इसलिए महर्षि वेदव्यास कहते हैं-
स चायमभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षनुमानागमैरसम्भावितो मरणत्रास उच्छेददृष्ट्यात्मकः पूर्वजन्मानुभूतं मरणदुःखमनुमापयति।
अर्थात् और वह यह अपने संस्कारों के रूप में वर्तमान मरणभय रूप अभिनिवेश नामक क्लेश अभी-अभी उत्पन्नमात्र कृमि रूप क्षुद्रजन्तुओं को भी, जिनको इस वर्तमान जन्म में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द प्रमाण से जानकारी नहीं मिली है, ऐसा उच्छेद-विनाश रूप मृत्यु का भय पूर्व जन्मों में अनुभव किये मरण दुःख का अनुमान कराता है।
अभिनिवेश क्या है
स्वरसवाही अर्थ
मृत्युभय योगसूत्र
पूर्वजन्म का प्रमाण
वेदव्यास भाष्य अभिनिवेश
यहाँ पर महर्षि वेदव्यास ने क्षुद्रजन्तु-कृमि का उदाहरण रूप में ग्रहण किया है, जिसने अभी-अभी जन्म लिया है, जिसे मृत्यु के विषय में किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं है और न ही उसने किसी और को मरते हुए प्रत्यक्ष किया है, जिसको मृत्यु क्या होती है? इसका कोई पता तक नहीं है। ऐसी स्थिति में उसे अनुमान भी नहीं हो सकता, अर्थात् मृत्यु का प्रत्यक्ष न तो स्वयं को हुआ है और न ही अन्यों को मरते हुए प्रत्यक्ष किया है। बिना प्रत्यक्ष के उसे अनुमान भी नहीं होगा। जब कोई मनुष्य या अन्य प्राणि उस कृमि को मारने की चेष्टा करते हैं, तब वह कृमि पूर्व प्रत्यक्ष के अनुसार अनुमान नहीं कर सकता, क्योंकि उसे इस जन्म में कभी मृत्यु का प्रत्यक्ष ही नहीं हुआ है। न प्रत्यक्ष हुआ है और न ही अनुमान हो सकता है। कोई यह न समझे कि श द प्रमाण से पता लग जायेगा? ऐसा भी नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द प्रमाण का प्रयोग जिस प्रकार से मनुष्यों में होता है, उस प्रकार अन्यों (कृमि आदि योनियों) में नहीं होता है। मनुष्यों को उपदेशादि के द्वारा जानकारी दी जाती है, इसलिए मनुष्य श द प्रमाण का प्रयोग करते हैं, परन्तु कृमि आदि ऐसा नहीं कर पाते हैं। मनुष्यों जैसी विकसित बुद्धि अन्य योनियों में नहीं होती है। इस कारण महर्षि वेदव्यास ने तीनों (प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द ) प्रमाणों से असम्भावित बताया है, फिर भी कृमि को मृत्यु का भय हो रहा होता है और वह भय अनायास पूर्व जन्म को सिद्ध करता है।
महर्षि वेदव्यास के इस उपरोक्त मन्तव्य से यह बात सिद्ध होती है कि पूर्व जन्म होता है और अगला जन्म भी होता है। जो कोई यह कहता है कि पूर्व जन्म को किसने देखा या अगले जन्म को किसने देखा? ये बातें निराधार हैं अर्थात् बिना प्रमाण के ऐसी-ऐसी बातें किया करते हैं, जिनके पीछे किसी भी प्रकार का आधार नहीं होता। यह अभिनिवेश नामक क्लेश निराधार वाली बातों को पूर्ण विराम दे देता है। अभिनिवेश नामक क्लेश से पूर्व जन्म, अगला जन्म, आत्म-नित्यत्व आदि अनेक सिद्धान्त खुलते हैं- स्पष्ट होते हैं और इनके माध्यम से आत्मा को यथार्थ रूप से समझने का यत्न किया जाता है। ऐसा जो करता है, वह तत्व ज्ञानी बन जाता है। तत्व ज्ञानी बन कर वह जन्म-मरण रूपी शृंखला को तोड़ देता है। इस सम्बन्ध में महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती लिखते हैं- ‘………इस क्लेश की निवृत्ति उस समय होगी कि जब जीव, परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को वह नित्य और कार्यद्रव्य के संयोग को अनित्य जान लेगा। इन क्लेशों की शान्ति से जीव को मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है।’ (ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका मुक्तिविषय) यहाँ पर महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अभिनिवेश नामक क्लेश की व्याख्या करते हुए पूर्व जन्म और अगले जन्म की सिद्धि से आत्म-नित्यत्व की सिद्धि की है, जिससे योगाभ्यासी अपने आप (आत्मा) को जाने व समझे और अपने प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए क्रियायोग को दृढ़ करे, जिससे तत्व ज्ञान हो सके और प्रयोजन को पूर्ण कर सके।
महर्षि वेदव्यास अभिनिवेश की व्यापकता को बताते हुए कहते हैं-
यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा
विदुषोऽपि विज्ञातपूर्वपरान्तस्य रूढः।
अर्थात् यह अभिनिवेश नामक क्लेश अत्यन्त मूढ़ यानि सब प्रकार के विज्ञान से रहित महामूर्ख, जिसे सामान्य जानकारी भी नहीं है, जो घनघोर जंगलों में रह रहा हो, ऐसे व्यक्ति को सताता रहता है- इसमें कोई विशेष बात नहीं है, परन्तु जो विद्वान् है, जिसने सब शास्त्रों का अध्ययन किया है, जिसे जन्म और मृत्यु का बोध है, जिसे बन्धन का कारण और मोक्ष का भी कारण पता है, इतना ही नहीं उसे यह भी पता है कि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होगी और जिसकी मृत्यु होगी, उसका पुनः जन्म भी होगा, इससे आत्मा का नाश नहीं होता, आत्मा तो नित्य है- इत्यादि सभी विषयों का यथावत् बोध रखता है, फिर भी मृत्यु से डरता रहता है। इस प्रकार साधारण से साधारण मनुष्य, पशु-पक्षी आदि और विद्वान् सभी मृत्यु से डरते हैं। मृत्यु का आतंक प्राणिमात्र को है, इसका निराकरण नहीं हो सकता। इस सम्बन्ध में महर्षि वेदव्यास कहते हैं-
‘कस्मात्? समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोर्मरणदुःखानुभवादियं वासनेति।’
अर्थात् प्राणिमात्र को एक समान मृत्यु का भय क्यों होता है? इसका समाधान यह है कि पूर्व जन्म में कुशल=विद्वान् और अकुशल=साधारण अनपढ़ मनुष्य, दोनों ने एक समान मृत्यु का दुःख भोगा है। उस दुःखानुभव की वासना (संस्कार) दोनों में एक समान है, इसलिए वर्तमान जन्म में भी दोनों को पुनः मृत्यु का भय हो रहा है। इससे पूर्व जन्म की सिद्धि होती है।
संसार में कोई भी व्यक्ति इस बात का खण्डन नहीं कर सकता कि पूर्व जन्म नहीं होता या अगला जन्म नहीं होता। इतना ही नहीं, आत्मा नहीं मरता है-आत्मा का नाश नहीं होता है, यह जीवन ही अन्तिम जीवन नहीं है- इत्यादि अनेक विषय तर्क और प्रमाणों से सही सिद्ध होते हैं।
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