पांच क्लेश
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः
पाँच क्लेश और “ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः” – दग्धबीज अवस्था का रहस्य
भूमिका
योग दर्शन में मानव दुःख का मूल कारण पाँच क्लेश बताए गए हैं।
में महर्षि पतञ्जलि ने इन क्लेशों की परिभाषा, अवस्थाएँ और उनके नाश का उपाय विस्तार से बताया है।
सूत्र है:
“ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः”
अर्थात् – ये सूक्ष्म क्लेश प्रतिप्रसव (अपने कारण में लय) द्वारा नष्ट किए जाते हैं।
पाँच क्लेश क्या हैं
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः अर्थ
दग्धबीज अवस्था
पतञ्जलि योगसूत्र क्लेश
अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश
में महर्षि पतञ्जलि ने इन क्लेशों की परिभाषा, अवस्थाएँ और उनके नाश का उपाय विस्तार से बताया है।
पाँच क्लेश कौन-कौन से हैं?
महर्षि पतञ्जलि के अनुसार पाँच क्लेश हैं:
- अविद्या
- अस्मिता
- राग
- द्वेष
- अभिनिवेश
इनमें अविद्या मूल कारण है और शेष चार उसी से उत्पन्न होते हैं।
क्लेशों का नाश कैसे करें
प्रतिप्रसव क्या है
योग दर्शन में मोक्ष
क्रियायोग तप स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान
चरिताधिकार मन
क्लेशों की चार अवस्थाएँ
महर्षि ने “अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां…” सूत्र में क्लेशों की चार अवस्थाएँ बतायी हैं:
- प्रसुप्त (सोई हुई)
- तनु (कमजोर)
- विच्छिन्न (दबी हुई)
- उदार (प्रकट / सक्रिय)
इन्हें दो भागों में समझ सकते हैं:
1️⃣ स्थूल रूप
जो व्यवहार में दिखाई देते हैं – क्रोध, मोह, अहंकार आदि।
2️⃣ सूक्ष्म रूप
जो भीतर संस्कार रूप में छिपे रहते हैं।
स्थूल क्लेशों का नाश कैसे?
स्थूल क्लेशों को समाप्त करने के लिए क्रियायोग बताया गया है:
- तप
- स्वाध्याय
- ईश्वरप्रणिधान
इनसे क्लेशों का उग्र रूप शांत होता है।
सूक्ष्म क्लेशों का नाश – “प्रतिप्रसव”
सूक्ष्म क्लेशों को जड़ से नष्ट करने के लिए उन्हें दग्धबीज बनाना पड़ता है।
जिस प्रकार भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, उसी प्रकार दग्धबीज क्लेश पुनः सक्रिय नहीं होते।
महर्षि वेदव्यास कहते हैं:
ते पञ्च क्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनः…
अर्थात् योगी तप और साधना द्वारा क्लेशों को जले हुए बीज समान बना देता है।
ते पञ्च क्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनः…
दग्धबीज अवस्था क्या है?
जब साधक:
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
का दीर्घकाल अभ्यास करता है, तब विवेक उत्पन्न होता है।
विवेक से वैराग्य आता है।
वैराग्य से तृष्णा समाप्त होती है।
तृष्णा के समाप्त होने से क्लेश दग्धबीज बनते हैं।
विवेक से वैराग्य आता है।
वैराग्य से तृष्णा समाप्त होती है।
तृष्णा के समाप्त होने से क्लेश दग्धबीज बनते हैं।
मन का चरिताधिकार
मन के दो प्रयोजन हैं:
- संसार का भोग कराना
- मोक्ष दिलाना
जब ये दोनों पूरे हो जाते हैं, तो मन “चरिताधिकार” हो जाता है — अर्थात् उसका कार्य समाप्त हो जाता है।
ऐसी स्थिति में मन अपने कारण प्रकृति (सत्त्व, रज, तम) में विलीन हो जाता है।
क्लेश और प्रकृति में लय
जब मन विलीन होता है, तब दग्धबीज अवस्था वाले क्लेश भी उसी के साथ अपने कारण में लीन हो जाते हैं।
इसका अर्थ है:
- आत्मा और दृश्य का संयोग समाप्त
- दुःख का अंत
- पुनर्जन्म का अभाव
- यही मोक्ष है
विद्या और अविद्या का निवास
महर्षि वेदव्यास स्पष्ट करते हैं कि:
- उत्पन्न होने वाली विद्या और अविद्या मन में रहती हैं
- आत्मा साक्षी है, पर आश्रय नहीं
- कार्यकाल में मन में, कारणकाल में प्रकृति में
ज्ञान जड़ में रह सकता है, पर अनुभव नहीं कर सकता — अनुभवकर्ता केवल चेतन आत्मा है।
आत्मसाक्षात्कार और क्लेश-नाश
जब साधक:
- विषयों की असारता समझता है
- विवेक उत्पन्न करता है
- वैराग्य धारण करता है
- समाधि में स्थित होता है
तब आत्मसाक्षात्कार होता है।
प्रभुदर्शन का अभ्यास क्लेशों को दग्धबीज बना देता है।
दग्धबीज क्लेश आत्मा को दुःख नहीं दे सकते।
प्रभुदर्शन का अभ्यास क्लेशों को दग्धबीज बना देता है।


0 टिप्पणियाँ