🕉 प्राण तत्त्व और मोक्ष का वैदिक विज्ञान
(महर्षि दयानन्द के विचारों पर आधारित विस्तृत अध्ययन)
महर्षि दयानन्द के अनुसार प्राण
प्राण और श्वास में अंतर
प्राण के पाँच भेद
उदान प्राण क्या है
हृदयाकाश में परमात्मा
योग द्वारा मोक्ष
वैदिक प्राण विज्ञान
प्राणमय कोश अर्थ
उपनिषदों में प्राण
✨ प्रस्तावना
ने स्पष्ट कहा है कि मनुष्य प्राण के माध्यम से परमात्मा से जुड़ सकता है। योगाभ्यास द्वारा प्राण को नियंत्रित कर, हृदयाकाश में स्थित परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है।
महर्षि के अनुसार – हृदय देश ही परमात्मा की अनुभूति का सर्वोत्तम स्थान है।
यह हृदय स्थूल मांसपेशीय अंग नहीं, बल्कि चेतना का आध्यात्मिक केंद्र है।
प्राण स्वयं चेतन नहीं है, बल्कि शुद्ध ऊर्जा (भौतिक तत्त्व) है।
जीवात्मा प्राणों में प्रतिष्ठित है और परमात्मा हृदयाकाश में जीव के मध्य स्थित है।
1️⃣ श्वास-प्रश्वास और प्राण का अंतर
सामान्यतः लोग श्वास को ही प्राण समझ लेते हैं, परंतु यह भ्रांति है।
- जो वायु बाहर से भीतर जाती है — वह श्वास है।
- जो भीतर से बाहर आती है — वह प्रश्वास है।
परंतु यह ऑक्सीजन आदि गैसों का मिश्रण है, प्राण नहीं।
में महर्षि ने स्पष्ट किया है कि प्राण और अपान वायु की भौतिक गति नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा की क्रियाएँ हैं।
योगशास्त्र में कहा गया है कि श्वास-प्रश्वास के नियंत्रण (प्राणायाम) से प्राण उपासक के वश में होता है।
प्राण और श्वास में क्या अंतर है
प्राण के पाँच भेद क्या हैं
उदान प्राण का कार्य
प्राणमय कोश की व्याख्या
उपनिषदों में प्राण का वर्णन
महर्षि दयानन्द का प्राण सिद्धांत
योग से प्राण नियंत्रण कैसे करें
हृदयाकाश में परमात्मा
मृत्यु समय उदान प्राण की भूमिका
वैदिक प्राण विज्ञान क्या है
प्राण की उत्पत्ति कैसे हुई
आधिदैविक और आध्यात्मिक प्राण
प्राणायाम का वास्तविक अर्थ
मोक्ष का वैदिक मार्ग
प्राण और आत्मा का संबंध
सत्यार्थ प्रकाश में प्राण
उपनिषदों के अनुसार मोक्ष
प्राण ऊर्जा क्या है
प्राण और पंचकोश सिद्धांत
योग और आत्म साक्षात्कार
2️⃣ प्राण के पाँच भेद
(3.1.9) में कहा गया है कि प्राण पाँच प्रकार से शरीर में प्रविष्ट होता है:
- प्राण
- अपान
- व्यान
- उदान
- समान
में भी कहा गया है कि ये पाँचों वास्तव में एक ही प्राणतत्त्व के भेद हैं।
कार्य के आधार पर नाम भिन्न हैं:
- प्राण – ऊपर की ओर गति
- अपान – नीचे की ओर गति
- समान – पाचन एवं सम वितरण
- उदान – उर्ध्वगामी शक्ति, मृत्यु समय आत्मा को ले जाने वाला
- व्यान – समस्त शरीर में संचरण करने वाला
3️⃣ प्राणों की स्थिति एवं कार्य
के अनुसार:
- अपान — पायु और उपस्थ में स्थित
- प्राण — मुख, नासिका, नेत्र, कान क्षेत्र में
- समान — नाभि क्षेत्र में
- व्यान — समस्त नाड़ियों में
- उदान — सुषुम्ना मार्ग से ऊपर जाने वाला
उदान प्राण विशेष महत्व रखता है।
मृत्यु के समय यही जीवात्मा को कर्मानुसार विभिन्न लोकों में ले जाता है।
उदान की शुद्ध अवस्था में आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर सकती है।
4️⃣ प्राण की उत्पत्ति
(2.1.3) में कहा गया है कि प्राण, मन, इन्द्रियाँ आदि सब परमात्मा से उत्पन्न होते हैं।
(2.2.3) में कहा गया है:
परमात्मा ही प्राण को ऊपर उठाता है और अपान को नीचे ले जाता है।
(3.7.16) में स्पष्ट है कि
परमात्मा प्राण में स्थित होकर भी उससे भिन्न है और उसी का नियमन करता है।
अतः —
प्राण चेतन सत्ता नहीं है।
वह परमात्मा से उत्पन्न भौतिक ऊर्जा है।
5️⃣ आधिदैविक और आध्यात्मिक प्राण
- सूर्य किरणों द्वारा जो बाह्य प्राण प्राप्त होता है — उसे आधिदैविक प्राण कहते हैं।
- शरीर के भीतर वैश्वानर अग्नि द्वारा पचा हुआ सूक्ष्म अंश — आध्यात्मिक प्राण है।
में कहा गया है:
अन्न से मन, जल से प्राण, और तेज से वाणी उत्पन्न होती है।
🌿 योग और मोक्ष
योगाभ्यास द्वारा जब:
- प्राण शुद्ध होता है
- उदान उर्ध्वगामी होता है
- मन शांत होता है
तब हृदयाकाश में परमात्मा का साक्षात्कार संभव होता है।
मृत्यु के समय:
- मोहयुक्त त्याग = पुनर्जन्म
- जागरूक त्याग = मोक्ष
🕊 निष्कर्ष
- प्राण श्वास नहीं है, बल्कि शुद्ध ऊर्जा है।
- प्राण एक ही है, पाँच रूपों में कार्य करता है।
- परमात्मा ही प्राण का नियामक है।
- योगाभ्यास से प्राण नियंत्रण द्वारा मोक्ष संभव है।
हृदय देश ही परमात्मा प्राप्ति का श्रेष्ठ स्थान है।
अतः प्राण विज्ञान केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि आत्मोद्धार का मार्ग है।
- श्वास-प्रश्वास एवं प्राण- जो वायु बाहर से भीतर को जाता है, उसको श्वास और जो भीतर से बाहर आता है, उसको प्रश्वास कहते हैं। परन्तु श्वास के द्वारा जो वायु शरीर में जाती है तथा जो वायु बाहर आती है, वह प्राण नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास प्राणाऽपान-निमेषजीवन………चात्मनो लिङ्गानि। (वैशेषिक) की व्याखया करते हुए महर्षि लिखते हैं, ‘‘(प्राण) जो भीतर से वायु को बाहर निकालना, (अपान) बाहर से वायु को भीतर लेना…….।’’ सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में प्राणमय कोश के समबन्ध में लिखा है, ‘‘दूसरा’’ ‘प्राणमय’ जिसमें ‘प्राण’ अर्थात् जो भीतर से बाहर आता, ‘अपान’ जो बाहर से भीतर आता……प्रच्छर्दनविधारणायां वा प्राणस्य। योग के भाषार्थ में भी भीतर के वायु को बहार निकालकर सुखपूर्वक रोकने का अभयास बार-बार करने से प्राण उपासक के वश में होने जाने का उल्लेख महर्षि ने किया है। स्वामी सत्यबोध सरस्वती जी के अनुसार ये (श्वास-प्रश्वास की) क्रियाएँ शरीर में प्राणों का कथित ऊपर व नीचे की गति कराने का एक मात्र साधन है। जब प्राणी श्वास लेता है तो वायु शरीर में जाती है तथा शरीर की प्राण नाड़ियों में प्राण की गति नीचे की ओर हो जाती है- यह अपानन क्रिया है। जब प्राणी प्रश्वास लेता है, अर्थात् दूषित वायु बाहर निकालता है तो शरीर की प्राण नाड़ियों में प्राण की गति उर्ध्व गति होती है-यह प्राणन क्रिया है। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास प्राण क्रियाओं का साधन है। श्वास-प्रश्वास में शरीर के भीतर जाने वाली वायु तथा बहार आने वाली वायु प्राण नहीं है, वह आक्सीजन आदि गैसों का मिश्रण है। प्राण किन्हीं गैसों आदि का मिश्रण नहीं है बल्कि शुद्ध ऊर्जा है।
- प्राण के पाँच भेद-एषोऽणुरात्मा चेतसा विदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश। मुण्डकोपनिषद् 3.1.9 के भाषार्थ में पण्डित भीमसेन शर्मा लिखते हैं, ‘‘(यस्मिन्) जिस शरीर में (प्राणः) प्राण (पञ्चधा) प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नाम पाँच प्रकार के भेदों से (संविवेश) अच्छे प्रकार प्रविष्ट हो रहा है…..।’’
- प्राणों की स्थिति एवं कार्य- प्रश्नोपनिषद् त्रितीय प्रश्न में ‘‘पायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रेमुखनासिकायां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते मध्ये तु समानः। …….अत्रैतदेकशातं नाडीनां…… भवन्त्यासु व्यानश्चरति। अथैकयोर्ध्वम् उदानः पुण्येन पुण्यंलोकं नयति पापेन पापयुभायामेव मनुष्यलोकम्।।शांकरभाष्यार्थ में उक्त की व्याखया इस प्रकार है- यह प्राण अपने भेद अपान को पायूपस्थ में – पायु (गुदा) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय) में मूत्र और पुरीष (मल) आदि को निकालते हुए स्थित यानी नियुक्त करता है तथा मुख नासिका इन दोनों से निकलता हुआ सम्राट् स्थानीय प्राणचक्षुः श्रोत्रे – चक्षु और श्रोत्र में स्थित रहता है। प्राण और अपान के स्थानों के मध्य नाभि देश में समान रहता है। ……..इस हृदय देश में एक शत यानी एक ऊपर सौ (एक सौ एक) प्रधान नाड़ियाँ हैं। उनमें से प्रत्येक प्रधान नाड़ी के उन सौ-सौ भेदों में से प्रत्येक से बहत्तर बहत्तर सहस्र अर्थात् दो ऊपर सत्तर सहस्र प्रतिशाखा नाड़ियाँ हैं। …..इन सब नाड़ियों में व्यान वायु संचार करता है तथा उन एक सौ एक नाड़ियों में से जो सुषुमणा नाम्नी एक उर्ध्वगामिनी नाड़ी है, उस एक के द्वारा ही ऊपर की ओर जाने वाला तथा चरण से मस्तक पर्यन्त सञ्चार करनेवाला उदान वायु (जीवात्मा को) पुण्य कर्म यानी शास्त्रोक्त कर्म से देवादि-स्थान रूप पुण्य लोक को प्राप्त करा देता है……।’’
- प्राण की उत्पत्ति –


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