🕉 असमप्रज्ञात समाधि और एकत्व दर्शन
(यजुर्वेद 40.7 मंत्र की सरल व्याख्या और साधना मार्ग)
📖 मूल मंत्र
“यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूत् विजानतः।
तत्र कः मोह कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः।। ”
– 40.7
असमप्रज्ञात समाधि क्या है
यजुर्वेद 40.7 मंत्र का अर्थ
एकत्व दर्शन की व्याख्या
समाधि के कितने प्रकार हैं
समप्रज्ञात और असमप्रज्ञात अंतर
ॐ जप के लाभ
चित्तवृत्ति निरोध का अर्थ
योग से मोक्ष कैसे मिले
आत्मा और परमात्मा का एकत्व
जीवन मुक्ति क्या होती है
ध्यान से शोक कैसे मिटे
वेदों में समाधि वर्णन
ब्रह्म दर्शन का मार्ग
योग साधना की क्रमबद्ध विधि
प्राणायाम से एकाग्रता
राग-द्वेष से मुक्ति कैसे
रंग ध्यान का महत्व
सुषुम्ना ध्यान क्या है
सहस्रार चक्र जागरण
श्रद्धा और सिद्धि संबंध
मोक्ष की अंतिम अवस्था
वेदांत में एकत्व सिद्धांत
ध्यान के वैज्ञानिक लाभ
आत्मदर्शन का मार्ग
ब्रह्मानुभूति कैसे करें
🌿 सरल अर्थ
जिस ज्ञानी पुरुष के ज्ञान में समस्त प्राणी एक परमात्मा स्वरूप ही दिखाई देते हैं,
जो सर्वत्र एकत्व का दर्शन करता है —
उसके लिए न कोई मोह रहता है और न कोई शोक।
जहाँ केवल एक ब्रह्म का अनुभव हो, वहाँ द्वैत नहीं रहता —
और जहाँ द्वैत नहीं, वहाँ दुःख भी नहीं।
🧘 असमप्रज्ञात समाधि का चित्रण
यह मंत्र उस उच्चतम अवस्था का वर्णन करता है जिसे योगशास्त्र में असमप्रज्ञात समाधि कहा गया है।
- इस अवस्था में आत्मा अपने पृथक अस्तित्व को भी भूल जाती है।
- सर्वत्र एक ही विभु परमात्मा का अनुभव होता है।
- द्रष्टा और दृश्य का भेद समाप्त हो जाता है।
यह अवस्था योग की चरम उपलब्धि है।
📘 योग की परिभाषा
के अनुसार:
“योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।”
अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
योग ही समाधि है, और समाधि ही आत्म साक्षात्कार का द्वार है।
✨ समाधि प्राप्ति के फल
समाधि से साधक को निम्न लाभ प्राप्त होते हैं:
- मन पूर्णतया निर्मल और स्थितप्रज्ञ हो जाता है।
- राग-द्वेष और कषायों का क्षय होता है।
- व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है।
- अपार आनंद की अनुभूति होती है।
- मन और इन्द्रियों पर संयम स्थापित होता है।
- स्वास्थ्य और बुद्धि का विकास होता है।
- प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं।
- आत्म साक्षात्कार और प्रभु दर्शन होता है।
- मृत्यु भय समाप्त हो जाता है।
🛤 समाधि प्राप्ति की क्रमबद्ध प्रक्रिया
1️⃣ वर्तमान में जीना सीखें
अतीत और भविष्य में न उलझें।
2️⃣ कर्म में पूर्ण मनोयोग
धर्मानुसार कर्म करें।
3️⃣ सत्य ग्रहण, असत्य त्याग
प्रमाद न करें।
4️⃣ सात्विक आहार और मित भाषण
5️⃣ सज्जनों से मैत्री, दुर्जनों से उपेक्षा
6️⃣ यम-नियमों का पालन
7️⃣ नियमित योगासन अभ्यास
8️⃣ प्राणायाम
गहरे, लंबे श्वास-प्रश्वास से मन एकाग्र होता है।
🕉 प्रणव (ॐ) ध्वनि साधना
गहरा श्वास लेकर ऊँचे स्वर से “ॐ” का उच्चारण 9–11 बार करें।
प्रणव ध्वनि के लाभ:
- आस्तिक भावना दृढ़ होती है
- तनाव से मुक्ति
- मन की एकाग्रता
- बुद्धि की शुद्धि
- स्मरण शक्ति वृद्धि
- प्राणशक्ति जागरण
- आंतरिक अंगों में स्वास्थ्य लाभ
ध्यान के समय शुक्ल (सफेद) प्रकाश का ध्यान करें।
🧠 मन की एकाग्रता के उपाय
🔹 शरीर स्थिर रखें
शरीर से मन को पृथक अनुभव करें।
🔹 नाड़ी तंत्र पर ध्यान
सुषुम्ना से सहस्रार तक ध्यान करें।
🔹 प्राणायाम का नियमित अभ्यास
🔹 शरीर के स्पंदनों का अनुभव
🔹 अंतःस्रावी ग्रंथियों पर ध्यान
🔹 रंग ध्यान
शुभ विचारों के शुक्ल रंग का ध्यान करें।
🔹 राग-द्वेष से मुक्ति
आत्मा-परमात्मा ध्यान से क्लेश समाप्त होते हैं।
🔹 श्रद्धा
श्रद्धा से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
🌟 आत्म-दर्शन
आत्मा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और साक्षी है।
जब आत्मा भावों से अलग होकर स्वयं को देखती है — तब आत्मस्वरूप में स्थित हो जाती है।
🕊 असमप्रज्ञात समाधि
- समप्रज्ञात में आत्मा स्वयं को पृथक देखती है।
- असमप्रज्ञात में सर्वत्र केवल परमात्मा ही दिखाई देता है।
- द्रष्टा-दृश्य का भेद समाप्त हो जाता है।
यही अवस्था यजुर्वेद 40.7 मंत्र में वर्णित है।
जहाँ केवल ब्रह्म है — वहाँ न मोह है, न शोक।
🌺 मुक्तावस्था
जब मन में कोई कामना शेष नहीं रहती —
- राग-द्वेष समाप्त
- ज्ञान का प्रकाश
- पूर्ण वैराग्य
योगी जीवनमुक्त होकर संसार में रहते हुए भी मुक्त रहता है।
प्रारब्ध पूर्ण होने पर आत्मा पूर्ण मुक्ति का आनंद प्राप्त करती है।
यही योग मार्ग की अंतिम मंज़िल है।
- योग परिभाषा- ‘योगश्चित्त वृत्ति निरोधः। योगः समाधि।’अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध कहें या समाधि कहें, वह योग ही है।
- समाधि प्राप्ति का फल- (क) इससे साधक का मन पूर्णतया निर्मल और स्थितप्रज्ञता को प्राप्त होता है। (ख) सब कषायों का क्षय हो जाता है। (ग)व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है। (घ) व्यक्ति को अपार आनंद की अनुभूति होती है। (ङ) मन और इन्द्रियों पर पूर्ण संयम हो जाता है। (च) सुन्दर स्वास्थ्य और कुशाग्र बुद्धि प्राप्त होती है। (छ) प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। (ज)आत्म साक्षात्कार और प्रभु दर्शन होता है। (झ) मृत्यु विजय की उपलबधि होती है।
- 1. वर्तमान में जीना सीखें। अतीत की स्मृतियों में और भविष्य की कल्पनाओं में समय न खोवें।
- 2. जो भी कर्म करें, पूरे मनोयोग से करें। सब काम धर्मानुसार ही करें।
- 3. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने के लिये सदैव तैयार रहें। प्रमादी न बनें।
- 4. शुद्ध सात्विक आहार और मित भाषण करें।
- 5. सज्जनों से मैत्री और दुर्जनों से उपेक्षा का भाव रखें।
- 6. यम-नियमों का नियमित पालन करें। उससे मन स्वच्छ और स्वस्थ होगा।
- 7. योगासनों का नित्य अभयास करें। इससे शरीर स्वस्थ निरोग बनेगा। ध्यान के समय किसी स्थिर आसन पर बैठें जिस आसन पर दो घंटे तक स्थिरता पूर्वक बैठ सकें।
- प्राणायाम- स्थिर आसन पर बैठ कर प्राणायाम का अभयास करें। लमबे और गहरे श्वास-प्रश्वास का अभयास करें। प्राणायाम से मन को एकाग्रता मिलती है। शरीर को आरोग्यता प्राप्त होती है।
- प्रणव ध्वनि- लमबा गहराश्वास अन्दर लेकर ऊँचे स्वर से ओङ्कार का नाद करें। इस क्रिया को 9 से 11 बार दोहराएँ।
- 10. मन की एकाग्रता को पाने के उपाय-
- 1. मन की स्थिरता या एकाग्रता के लिये शरीर की स्थिरता अनिवार्य है। शरीर से जैसे वस्त्र को निकाल अलग कर देते हैं, वैसे ही मन से शरीर को पृथक्देखें। शरीर के थकान रहित, शान्त, स्वस्थ होने की भावना करें।
- 2. फिर शरीर के नाड़ीतन्त्र पर ध्यान लगायें। सुषुम्ना के निचले छोर से लेकर ऊर्ध्वगमन करते हुए सहस्रसारचक्र तक ध्यान करें। इससे शरीर की प्राण ऊर्जा ऊर्ध्वगमन करने लगती है, जिसे कुछ लोग कुण्डलिनी जागरण का नाम देते हैं।
- 3. प्राणायाम मन की एकाग्रता का एक प्रधान साधन है। विधिवत् रूप से नियमित प्राणायाम का अभयास करें। इस विषय पर विस्तार से जानने के लिये हमारी ‘संध्या से समाधि’ पुस्तक पढ़ें।
- 4. शरीर की कोशिकाओं में होने वाले सूक्ष्म प्रकमपनों की भी अनुभूति करें। पैर से लेकर सिर तक ध्यानपूर्वकदेखेंगे तो यह प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। फिर ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगाने पर सारे शरीर का स्पंदन एक साथ देखा जा सकता है। इस प्रकार के अभयास से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
- 5. इससे अगले क्रम में शरीर के अन्दर अन्तःस्रावी और बहिस्रावी ग्रंथियों का भी अवलोकन करें। इन ग्रंथियों में रसायनों का निर्माण होता है। नाड़ीतन्त्र में उन रसायनों का प्रभाव देखा जाता है। इन रसायनों के बदलने से व्यक्ति का स्वभावभी बदल जाता है। हृदयदेश में तथा आज्ञाचक्र में ध्यान केन्द्रित करने से रसायनों के स्राव बदल जाते हैं।
- 6. रंगों का ध्यान-मानसिक विचारों के भी अपने रंग होते हैं। जैसे सूरज की रष्मियों के सात रंग इन्द्रधनुष में देखे जाते हैं, वैसे ही मानसिक भावों के कृष्ण, नील, जामुनी, लाल, गुलाबी, शुक्ल और हरा रंग भेद होते हैं। शुभ भावों के रंग पृथक् होते हैं। अशुभ भावों के रंग पृथक्होते हैं। अपने-अपने रंगों के साथ मन के भाव व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। उज्जवल व्यक्तित्व के निर्माण के अभिलाषी व्यक्ति को शुभ विचारों के शुक्ल रंग का ध्यान करना चाहिए। ओङ्कार के जाप के साथ भी शुक्ल रंग का ध्यान करें।
- 7. क्लेशों से मुक्ति-मानसिक भावों के साथ जब राग-द्वेष पैदा हो जाते हैं तो वे ही क्लेशों को जन्म देते हैं। राग-द्वेष पैदा ही न हो इसके लिये आत्मा-परमात्मा का ध्यान करें। चेतन की भावना से राग-द्वेष पैदा नहीं होते।
- 8. श्रद्धा- व्यक्ति को अपनी श्रद्धा के अनुसार ही फल मिलता है। ईश्वर की भक्ति श्रद्धापूर्वक ही करें। वेद शास्त्रों, ऋषिमुनियों और गुरुजनों के प्रति की गयी श्रद्धा व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती है।
- आत्म-संयम- आत्मा में परमेश्वर ने अद्भुत शक्तियाँ रखी हैं, किन्तु जनसामान्य उनसे अनभिज्ञ बना रहता है। शक्तियों का जागरण योगाङ्गों के अनुष्ठान से हो जाता है। शक्ति प्राप्त करके भी साधक व्यक्ति मन की धाराओं में नहीं बहता। आत्म-संयम के द्वारा शक्तियों का सदुपयोग ही करता है। शक्तियों का सदुपयोग लक्ष्य-प्राप्ति के लिये ही होना चाहिए।
- आत्म-दर्शन- आत्मा ही द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, मन्ता और सभी भावों का साक्षी होता है। जब आत्मा स्वयं को भावों से अलग देखने लगता है तो वह उस अभयास से अपने आत्म-स्वरूप में अवस्थित हो जाता है। ‘द्रष्टा शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।’आत्मा अपने स्वरूप में शुद्ध होते हुए भी बुद्धि के ज्ञान का साक्षी मात्र होता है।
- असमप्रज्ञात समाधि- योगाङ्गों के अनुष्ठान से जब बुद्धि में सत्त्व गुण की प्रबलता हो जाती है तो वह राग-द्वेष से ऊपर उठ कर आनन्द की अनुभूति करने लगती है। उसमें स्थैर्य उत्पन्न होता है, जो आत्मा की कैवल्य प्राप्ति में सहायक बनता है। समप्रज्ञात समाधि की अवस्था में आत्मा अपने को मन, बुद्धि, आदि से पृथक् देखने लगता है, किन्तु असमप्रज्ञात् समाधि में अपने स्वरूप को पृथक् नहीं देखता, उसे सर्वत्र एक विभु परमपिता परमेश्वर के ही दर्शन होते हैं। उस अवस्था में द्रष्टा और दृश्य का भेद भी समाप्त हो जाता है। इसी अवस्था का उल्लेख यजु. 40.7 मन्त्र कर रहा है। उस अवस्था में द्वैत कुछ देखने या सुनने के लिये शेष नहीं रह जाता। जिस स्थिति में एकमात्र ब्रह्म रह जाये वहाँ भय, शोक, मोह कैसा?
- मुक्तावस्था- जब मन में कोई कामना शेष नहीं रहती, तब सभी राग-द्वेष, मोह, आदि क्लेश समाप्त हो जाते हैं। अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। सभी विषयों से पूर्णतया वैराग्य हो जाता है, उस अवस्था में योगी पुरुष जीवन मुक्त होकर जीने लगता है। प्रारबध अभी शेष हैं, उसके अनुसार जीवन की गाड़ी चल रही होती है, किन्तु अपने जीवन से दूसरों को कोई कष्ट न हो तथा दूसरे भी अपनी साधना में बाधक न बन सकें, इसलिये योगी पुरुष घर परिवार से दूर एकान्त स्थान में जाकर रहने लगता है। प्रारबध समाप्ति पर वह आत्मा मुक्त अवस्था को प्राप्त होकर मुक्ति का आनन्द लेती है। यही योग मार्ग की अंतिम मंजिल है।


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