सृष्टि, ईश्वर और प्रकृति: वैदिक दृष्टिकोण से मानव और जगत का रहस्य
सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी मानव है। मानव अपने ज्ञान, बुद्धि और चेतना में अद्वितीय है। परंतु, चाहे वह कितना भी विकसित हो, सृष्टि रचना में वह कभी भी सक्षम नहीं हो सकता। इस प्रश्न का उत्तर वैदिक ऋषियों ने अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जगत का निर्माता कौन है, यह कैसे उत्पन्न हुआ और इसका उद्देश्य क्या है।
सृष्टि का निर्माता – परमात्मा
भारतीय प्राचीन ऋषियों ने कहा कि जगत को बनाने वाली शक्ति परमात्मा है। इसे ईश्वर, परमेश्वर, ब्रह्म आदि नामों से पुकारा गया।
परन्तु जो मूलतत्त्व से यह सृष्टि बनाई जाती है, वह प्रकृति कहलाती है। प्रकृति को त्रिगुणात्मक तत्त्वों से युक्त माना गया है:
- सत्व – शुद्धता और ज्ञान
- रजस् – क्रियाशीलता और गति
- तमस् – स्थिरता और जड़ता
इन तीनों तत्त्वों का आपस में गुणन और संयोग ही जगत को जन्म देता है। सृष्टि का मुख्य उद्देश्य पुण्य-अपुण्य, धर्म-अधर्म, शुभ-अशुभ कर्मों के फल भोग के लिए होता है। ये कर्म जीवात्मा द्वारा किए जाते हैं, जो चेतन तत्त्व है।
तीन अनादि पदार्थ: ईश्वर, प्रकृति और जीवात्मा
वैदिक दृष्टि से, जगत में तीन अनादि पदार्थ विद्यमान हैं:
- ईश्वर (निर्माता)
चेतन तत्त्व; जगत के निर्माण में प्रेरक और अधिष्ठाता।
- प्रकृति (उपादान कारण)
जड़ पदार्थ; सृष्टि का निर्माण इसके माध्यम से होता है।
- जीवात्मा (कर्म करने वाला)
चेतन तत्त्व; कर्म करता है और फल भोगता है।
उदाहरण: जैसे मकड़ी अपने शरीर से जाला बनाती है, पर जाला मकड़ी का शरीर है, मकड़ी नहीं। इसी तरह, जगत का निर्माण चेतन ब्रह्म के माध्यम से प्रकृति रूप उपादान से होता है।
क्या जगत अनादि और अविकारिणी है?
कुछ विचारक मानते हैं कि जगत अनादि-अनन्त है, अतः इसे बनाने वाले की आवश्यकता नहीं।
परंतु:
- जगत विकारी है, निरंतर परिवर्तनशील है।
- प्रतिदिन नए परिणाम और घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।
- जड़ पदार्थ में चेतन के बिना कोई क्रिया नहीं होती।
इसलिए ईश्वर को जगत का निमित्त कारण मानना अनिवार्य है।
प्रकृति की आवश्यकता
ईश्वर सर्वशक्तिमान है, परन्तु स्वयं जगत के रूप में परिणत नहीं होता। चेतन तत्त्व जड़ में परिवर्तित नहीं हो सकता। जड़ पदार्थ चेतन से उत्पन्न नहीं हो सकता। अतः जगत के लिए ईश्वर के अतिरिक्त एक उपादान तत्त्व की आवश्यकता होती है, जिसे प्रकृति कहते हैं।
निष्कर्ष: ईश्वर सृष्टि का प्रेरक है, प्रकृति उसका उपादान कारण और जीवात्मा कर्म करने वाला।
ब्रह्म और उपादान के दृष्टांत
कुछ विद्वान मानते हैं कि केवल ब्रह्म से जगत उत्पन्न होता है। परंतु चेतन ब्रह्म जड़ जगत का कारण नहीं बन सकता।
उदाहरण: मकड़ी जाला बनाती है, पर जाला उसका शरीर है। जड़ पदार्थ चेतन के बिना परिणामी नहीं हो सकता। इसलिए ब्राह्मणवाद में कहा गया कि ब्रह्म से जगत उत्पन्न होता है, परंतु प्रकृति माध्यम के बिना यह संभव नहीं।
जगत का उद्देश्य
जगत का निर्माण खाली नहीं हुआ। इसका उद्देश्य है:
- जीवात्मा के कर्मों का अनुभव
- पुण्य और अपुण्य कर्मों का फल भोगना
- धर्म का पालन और अधर्म से सीखना
- जीवन में उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति
सृष्टि जीवात्माओं को चेतना, अनुभव और ज्ञान प्रदान करती है।
वैदिक दृष्टिकोण में विज्ञान और आध्यात्मिकता
वैदिक ग्रंथों में:
- ग्रहों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का विवरण
- सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की गति
- चिकित्सा विज्ञान (अथर्ववेद)
- प्रकृति और ऊर्जा के प्रयोग
सभी का उद्देश्य जीव और जगत के मध्य संतुलन और ज्ञान स्थापित करना है।
निष्कर्ष
वैदिक दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि:
- ईश्वर – जगत का निमित्त कारण, चेतन तत्त्व
- प्रकृति – जगत का उपादान कारण, जड़ तत्त्व
- जीवात्मा – कर्म करने वाला चेतन तत्त्व
जगत का निर्माण तीनों के सहयोग से संभव है। सृष्टि का लक्ष्य केवल मनोरंजन या निर्माण नहीं, बल्कि जीवात्मा के अनुभव और मोक्ष की प्राप्ति है।
यह शोधपूर्ण विवेचना हमें यह समझाती है कि वैदिक ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि विज्ञान और जीवन दर्शन का भी आधार है।
सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट प्राणी मानव है। मानव को अपनी इस स्थिति के विषय में कदाचित् अभिमान हो सकता है, पर अधिकाधिक उन्नति कर लेने पराी यह सृष्टि रचना में सर्वथा असमर्थ रहता है। इसका कारण है, मानव जब अपने रूप में प्रकट होता है, उससे बहुत पूर्व सृष्टि की रचना हो चुकी होती है, इसलिये यह प्रश्न ही नहीं उठता कि मानव सृष्टि रचना कर सकता है। तब यह समस्या सामने आती है कि इस दुनिया को किसने बनाया होगा?
भारतीय प्राचीन ऋषियों ने इस समस्या का समाधान किया है। जगत को बनाने वाली शक्ति का नाम ‘परमात्मा’ है, इसको ईश्वर, परमेश्वर, ब्रह्म आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। यह ठीक है कि परमात्मा इस पृथिवी, चाँद, सूरज आदि समस्त लोक-लोकान्तर रूप जगत् को बनाने वाला है, परन्तु जिस मूलतत्त्व से इस जगत् को बनाया जाता है, वह अलग है। उसका नाम प्रकृति है। प्रकृति त्रिगुणात्मक कही जाती है। वे तीन गुण हैं- सत्व, रजस् और तमस्। इन तीन प्रकार के मूल तत्त्वों के लिये ‘गुण’ पद का प्रयोग इसीलिये किया जाता है कि ये तत्त्व आपस में गुणित होकर, एक-दूसरे में मिथुनीभूत होकर, परस्पर गुँथकर ही जगद्रूप में परिणत होते हैं। जगत् की रचना पुण्यापुण्य, धर्माधर्म रूप शुभ-अशुभ कार्मों के करने और उनके फलों को भोगने के लिये की जाती है। इन कर्मों को करने और भोगने वाला एक और चेतन तत्त्व है, जिसको जीवात्मा कहा जाता है। ये तीनों पदार्थ अनादि हैं-ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति।
जगत उत्पन्न होता है या नहीं?
प्रश्न-यह जगत् कभी उत्पन्न नहीं होता, अनादि काल से ऐसा ही चला आता है और अनन्त काल तक ऐसा ही चला जायगा, ऐसा मान लेने पर इसके बनने-बनाने का प्रश्न ही नहीं उठता, तब इसको बनाने के लिए ईश्वर की कल्पना करना व्यर्थ है। यह चाहे प्रकृति का रूप हो या कोई रूप हो, अनादि होने से ईश्वर की कल्पना अनावश्यक है।
उत्तर-जगत् को जिस रूप में देखा जाता है, उससे इसका विकारी होना स्पष्ट होता है। यदि जगत् अनादि-अनन्त एक रूप हो, तो यह नित्य माना जाना चाहिये, नित्य पदार्थ अपने रूप में कभी परिणामी या विकारी नहीं होता, परन्तु जागतिक पदार्थों में प्रतिदिन परिणाम होते देखे जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों की दृश्यमान स्थिति अपरिणामिनी अथवा अविकारिणी नहीं है। इसमें परिणाम का निश्चय होने पर यह मानना पड़ेगा कि यह बना हुआ पदार्थ है, तब इसके बनाने वाले को भी मानना होगा।
प्रश्न-पृथिव्यादि को विकारी मानने पर भी बनाने वाले की आवश्यकता न होगी। जिन मूलतत्त्वों से इनका परिणाम होना है, वे स्वतः इस रूप में परिणत होते रहते हैं। संसार में अनेक पदार्थ स्वतः होते देखे जाते हैं। अनेक स्वचालित यन्त्रों का आज निर्माण हो चुका है।
उत्तर-पृथिव्यादि समस्त जगत् जड़ पदार्थ है, चेतना-हीन। इसका मूल उपादान तत्त्व भी जड़ है। किसीाी जड़ पदार्थ में चेतन की प्रेरणा के बिना कोई क्रिया होना संभव नहीं। चेतना के सहयोग के बिना किसी जड़ पदार्थ में स्वतः प्रवृत्ति होती नहीं देखी जाती। इसके लिये न कोई युक्ति है, न दृष्टान्त। स्वचालित यन्त्रों के विषय में जो कहा गया, उन यन्त्रों का निर्माण तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। उनको बनाने वाला शिल्पी उसमें ऐसी व्यवस्था रखता है, जिसे स्वचालित कहा जाता है। यन्त्र अपने-आप नहीं बन गया है, उसको बनाने वाला एक चेतन शिल्पी है और उस यन्त्र की निगरानी व साज-सँवार बराबर करनी पड़ती है, यह सब चेतन- सहयोग-सापेक्ष है, इसलिये यह समझना कि पृथिव्यादि जगत् अपने मूल उपादान तत्त्वों से चेतन निरपेक्ष रहता हुआ स्वतः परिणत हो जाता है, विचार सही नहीं है। फलतः जगत् के बनाने वाले ईश्वर को मानना होगा।
प्रकृति की आवश्यकता?
प्रश्न – आपने यह स्पष्ट किया कि ईश्वर को मानना आवश्यक है। यदि ऐसा है, तो केवल ईश्वर को मानने से कार्य चल सकेगा। ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् माना जाता है, वह अपनी शक्ति से जगत् को बना देगा, उसके अन्य कारण प्रकृ ति की क्या आवश्यकता है? कतिपय आचायरें ने इस विचार को मान्यता दी है।
उत्तर- ईश्वर जगत् को बनाने वाला अवश्य है, पर वह स्वयं जगत् के रू प में परिणत नहीं होता। ईश्वर चेतन तत्त्व है, जगत् जड़ पदार्थ है। चेतना का परिणाम जड़ अथवा जड़ का परिणाम चेतन होना संभव नहीं। चेतन स्वरूप से सर्वथा अपरिणामी तत्त्व है। यदि चेतन ईश्वर को ही जड़ जगत् के रूप में परिणत हुआ माना जाय तो यह उस अनात्मवादी की कोटि में आजाता है, जो चेतन की उत्पत्ति जड़ से मानता है। कारण यह है कि यदि चेतन जड़ बन सकता है, तो जड़ को भी चेतन बनने से कौन रोक सकता है? इसलिये चेतन से जड़ की उत्पत्ति अथवा जड़ से चेतन की उत्पत्ति मानने वाले दोनों वादी एक ही स्तर पर आ खड़े होते हैं। फलतः यह सिद्धान्त बुद्धिगय है कि न चेतन जड़ बनता है और न जड़ चेतन बनता है। चेतन सदा चेतन है, जड़ सदा जड़ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जड़ जगत् जिस मूल तत्त्व का परिणाम है, वह जड़ होना चाहिये, इसलिये चेतन ईश्वर से अतिरिक्त मूल उपादान तत्त्व मानना होगा, उसी का नाम प्रकृति है।
जब यह कहा जाता है कि सर्वशक्तिमान् ईश्वर अपनी शक्ति से जगत् को उत्पन्न कर देगा, उस समय प्रकृति को ही उसकी शक्ति के रूप में कथन कर दिया जाता है। वैसे सर्वशक्तिमान् पद के अर्थ में यही भाव अन्तर्निहित है कि जगत् की रचना करने में ईश्वर को अन्य किसी कर्त्ता के सहयोग की अपेक्षा नहीं रहती। वह इस कार्य के लिये पूर्ण शक्त है, अप्रतिम समर्थ है। फलतः यह जगत् परिणाम प्रकृ ति का ही होता है, ईश्वर केवल इसका निमित्त, प्रेरयिता,नियन्ता व अधिष्ठाता है। यही सत्य स्वरूप प्रकृति सब जगत् का मूल घर और स्थिति का स्थान है।
इस प्रसंग में सत्यार्थप्रकाश [स्थूलाक्षर, वेदानन्द संस्करण, पृ. 191, पंक्ति 10-12] के अन्दर एक वाक्य है, जिसे अस्पष्टार्थ कहा जाता है। वह वाक्य है – ‘यह सब जगत् सृष्टि के पूर्व असत् के सदृश और जीवात्मा, ब्रह्म और प्रकृति में लीन होकर वर्त्तमान था, अभाव न था- इस वाक्य के अभिमत अर्थ को स्पष्ट करने व समझने के लिये इसमें से दो अवान्तर वाक्यांशों का विभाजन करना होगा। इस वाक्य में से ‘और जीवात्मा ब्रह्म’ इन पदों को अलग करके रख लीजिये फिर शेष वाक्य को पढ़िये, वह इस प्रकार होगा- ‘यह सब जगत् सृष्टि के पूर्व असत् के सदृश और प्रकृति में लीन होकर वर्त्तमान था, आाव न था।’ इतना वाक्य एक पूरे अर्थ को व्यक्त करता है। जगत् जो अब हमारे सामने विद्यमान है, यह सृष्टि के पूर्व अर्थात् प्रलय अवस्था में असत् के सदृश था, सर्वथा असत् या तुच्छ न था, कारण यह है कि यह प्रकृति में लीन होकर वर्तमान था, तात्पर्य यह कि कारण-रूप से विद्यमान था, इससे प्रतीत होता है कि ऋषि ने कार्य-कारणभाव में सत्कार्य सिद्धान्त को स्वीकार किया है। प्रलय अवस्था में जगद्रूप कार्य कारण रूप से विद्यमान रहता है, उसका सर्वथा अभाव नहीं हो जाता।
जो पद हमने उक्त वाक्य में से अलग करके रक्खे हैं, वे दो अवान्तर वाक्यों को बनाते हैं -1-‘और जीवात्मा वर्त्तमान था’। 2- ‘ब्रह्म वर्त्तमान था’ तात्पर्य यह कि प्रलय अवस्था में प्रकृति के साथ जीवात्मा और ब्रह्म भी वर्तमान थे। इस प्रकार उक्त पंक्ति से ऋषि ने उस अवस्था में तीन अनादि पदार्थों की सत्ता को स्पष्ट किया है तथा इस मन्तव्य का एक प्रकार से प्रत्यायान किया है, जो उस अवस्था में एक मात्र ब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करते हैं, जीव तथा प्रकृति की स्थिति को नहीं मानते, इनका उद्भव ब्रह्म से ही मान लेते हैं।
तीन अनादि पदार्थों के मानने पर जगद्रचना की व्याया सर्वाधिक निर्दोष की जा सकती है। कारण यह है कि लोक में किसी रचना के हेतु तीन प्रकार के देखे जाते हैं। प्रत्येक कार्य का कोई बनाने वाला होता है, कुछ पदार्थ होते हैं, जिनसे वह कार्य बनाया जाता है, कुछ सहयोगी साधन होते हैं। पहला कारण निमित्त कहलाता है, दूसरा उपादान और तीसरा साधारण। संसार में कोई ऐसा कार्य संभव नहीं, जिसके ये तीन कारण नहीं है। जब दृश्यादृश्य जगत् को कार्य माना जाता है तो उसके तीनों कारणों का होना आवश्यक है। इसमें जगत् की रचना का निमित्त कारण ईश्वर, उपादान कारण प्रकृति तथा जीवों के कृत शुभाशुभ कर्म अथवा धर्माधर्म आदि साधारण कारण होते हैं, इसलिये इन तीनों पदार्थों को अनादि माने बिना सृष्टि की निर्दोष व्याया नहीं की जा सकती।
ब्रह्म से ही जगत्-उत्पत्ति नहीं?
प्रश्न-वेदान्त दर्शन पर विचार करने वाले तथाकथित नवीन आचार्यों की यह मान्यता है कि एक मात्र ब्रह्म को वास्तविक तत्त्व मानने पर सृष्टि की व्याया की जा सकती है। उनका कहना है कि जगत् के निमित्त और उपादान कारण को अलग मानना आनावश्यक है। एक मात्र ब्रह्म स्वयं अपने से जगत् को उत्पन्न कर देता है, उसे अन्य उपादान की अपेक्षा नहीं। लोक में ऐसे दृष्टान्त देखे जाते हैं। मकड़ी अपने आप से ही जाला बुन देती है, बाहर से उसे कोई साधन-सहयोग लेने की अपेक्षा नहीं होती, ऐसे ही जीवित पुरुष से केश-नख स्वतः उत्पन्न होते रहते हैं। इसी प्रकार ब्रह्म अपने से ही जगत् को उत्पन्न कर देता है।
उत्तर – यह बात पहले कही जा चुकी है कि यदि ब्रह्म अपने से जगत् को बनावे तो वह विकारी या परिणामी होना चाहिये। ब्रह्म चेतन तत्त्व है, चेतन कभी विकारी नहीं होता। इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि चेतन ब्रह्म का परिणाम जगत् जड़ कैसे हो जाता? क्योंकि कारण के विशेष गुण कार्य में अवश्य आते हैं। या तो जगत् भी चेतन होता, या फिर कार्य जड़-जगत् के अनुसार उपादान कारण ईश्वर या ब्रह्म को भी जड़ मानना पड़ता, पर न जगत् चेतन है, और न ईश्वर जड़, इसलिये ईश्वर को जगत् का उपादान कारण नहीं माना जा सकता।
ब्रह्म उपादान से जगत् की उत्पत्ति में मकड़ी आदि के जो दृष्टान्त दिये जाते हैं, उनकी वास्तविकता की ओर किसी ब्रह्मोपादानवादी ने क्यों ध्यान नहीं दिया, यह आश्चर्य की बात है। ये दृष्टान्त उक्त मत के साधक न होकर केवल बाधक हैं। मकड़ी एक प्राणी है, जिसका शरीर भौतिक या प्राकृतिक है और उसमें एक चेतन जीवात्मा का निवास है। उस प्राणी द्वारा जो जाला बनाया जाता है, वह उस भौतिक शरीर का विकार या परिणाम है, चेतन जीवात्मा का नहीं। यहाी ध्यान देने की बात है कि शरीर से जाला उसी अवस्था में बन सकता है, जब शरीर का अधिष्ठाता चेतन जीवात्मा वहाँ विद्यमान रहता है। वह स्थिति इस बात को स्पष्ट करती है कि केवल जड़ तत्त्व चेतन के सहयोग के बिना स्वतः विकृत या परिणत नहीं होता। दृष्टान्त से स्पष्ट है कि जाला रूप जड़ विकार जड़ शरीर का है, चेतन जीवात्मा का नहीं। इस दृष्टान्त का उद्भावन करने वाले उपनिषद् (यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च) वाक्य में यही स्पष्ट किया है कि जैसे मकड़ी जाला बनाती और उसका संहार करती है, उसी प्रकार अविनाशी ब्रह्म से यह विश्व प्रादुर्भूत होता है।
उपनिषद् के उस वाक्य में ‘यथा’ और ‘तथा’ शद ध्यान देने योग्य हैं। जैसे मकड़ी जाला बनाती और उपसंहार करती है- ‘तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम्’, वैसे अविनाशी ब्रह्म से यहाँ विश्व प्रादुर्भूत होता है। अब देखना यह है कि जाला मकड़ी के भौतिक शरीर से परिणत होता है और बनाने वाला अधिष्ठाता चेतन आत्मा वहाँ इस प्रवृति का प्रेरक है, चेतन स्वयं जाला नहीं बनता, ऐसे ही ब्रह्म अपने प्रकृति रूप देह से विश्व का प्रादुर्भव करता है। समस्त विश्व परिणाम प्रकृति का ही है, प्रकृति से होने वाली समस्त प्रवृत्तियों का प्रेरक व अधिष्ठाता परमात्मा रहता है। वह स्वयं विश्व के रूप में परिणत नहीं होता, इसलिए वह विश्व का केवल निमित्त कारण है, उपादान कारण नहीं हो सकता।
जगत् का निर्माण क्यों?
प्रश्न- यह ठीक है कि सृष्टिकर्त्ता ईश्वर है और वह प्रकृति मूल उपादान से जगत् की रचना करता है, परन्तु प्रश्न है, जगत् की रचना में उसका क्या प्रयोजन है? जगत् की रचना किस लक्ष्य को लेकर की जाती है? यदि इसका कोई प्रयोजन ही नहीं, तो रचना व्यर्थ है, उसने क्यों ऐसा किया? वह तो सर्वज्ञ है, फिर ऐसी निष्प्रयोजन रचना क्यों?
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