खुशी की वजह कहानी, खरगोश की कहानी, हिंदी नैतिक कहानी



🌿 गलती स्वयं सुधारें (स्वयमेव दोषं परिहरन्तु) 🌿

कदाचित् गुरुरात्मानन्दः चत्वारः शिष्यान् पाठं अध्यापयत्।  

पाठानन्तरं सः अवदत् —  

“यूयं चत्वारः स्वाध्यायं कुर्वन्तु, मौनं धारयन्तु।  

अहं एकघण्टायाः अनन्तरं आगत्य प्रश्नं करिष्यामि।”  

गुरौ गत्वा, शिष्याः पाठं पठितुं आरब्धवन्तः।  

अचानक मेघाः आकाशे समागच्छन्, वर्षायाः सम्भावना आसीत्।  

एकः शिष्यः अवदत् — “वर्षा भविष्यति।”  

द्वितीयः अवदत् — “त्वं वक्तुं न अर्हसि, गुरुणा निषिद्धम्।”  

तृतीयः अपि अवदत् — “त्वं अपि वक्तुम् आरब्धवान्।”  

एवं त्रयः शिष्याः वदितवन्तः, चतुर्थः मौनं धारयन् पठितवान्।  

एकघण्टायाः अनन्तरं गुरुः आगतः।  

शिष्याः पुनः वदितवन्तः —  

“गुरो, एषः मौनं न धारयति।”  

“त्वं अपि वदितवान्।”  

“एते द्वौ अपि आज्ञां भङ्क्तवन्तौ।”  

“त्वं अपि वदितवान्।”  

गुरुः अवदत् —  

“त्रयः वदितवन्तः, केवलं चतुर्थः मौनं धारयति।  

एषः एव मम शिक्षां ग्राहयति।  

यूयं त्रयः दोषं परस्परं आरोपयन्तः स्वदोषं न अवलोकितवन्तः।  

एवं लोके सर्वे परदोषं दर्शयन्ति, स्वदोषं न पश्यन्ति।”  

एतत् श्रुत्वा त्रयः शिष्याः लज्जिताः,  

ते स्वदोषं स्वीकृतवन्तः, गुरुम् क्षमां याचितवन्तः,  

स्वयं परिष्कर्तुं प्रतिज्ञां कृतवन्तः।  

💎 सबसे कीमती गहने (मूल्यतमं रत्नम्) 💎

कदाचित् व्यापारी एकं उत्तमजातीयं ऊष्ट्रं दृष्टवान्।  

सः विक्रेतृणा सह सौदे कृतवान्।  

व्यापारी ऊष्ट्रं स्वगृहं आनयत्।  

गृहे नौकरः ऊष्ट्रस्य काठीं अपाकरोति।  

तत्र एकं मृदुमेखलायुक्तं थैलिकं प्राप्तम्।  

तस्यां रत्नानि आसीत्।  

नौकरः अवदत् — “मालिक, ऊष्ट्रं क्रीतम्, किन्तु रत्नानि अपि प्राप्तानि।”  

व्यापारी अवदत् — “अहं ऊष्ट्रं क्रीतम्, न रत्नानि।  

एतानि विक्रेतृणः एव। अहं प्रत्यर्पयामि।”  

व्यापारी विक्रेतृणं प्रति थैलिकां प्रत्यर्पितवान्।  

विक्रेता हृष्टः, अवदत् —  

“त्वं पुरस्काररूपेण रत्नं गृहाण।”  

व्यापारी अवदत् — “मम सौदः ऊष्ट्रस्य आसीत्, न रत्नानाम्।  

मम ईमान्दार्यता एव मम रत्नम्।”  

अन्ते व्यापारी अवदत् —  

“अहं द्वौ मूल्यतमौ रत्नौ पूर्वमेव गृहितवान्।”  

विक्रेता विस्मितः, अवदत् — “कौ रत्नौ?”  

व्यापारी अवदत् —  

“मम सत्यनिष्ठा च मम स्वाभिमानः।”  

📜 सन्देशः :-  

- स्वयं सुधार एव श्रेष्ठः।  

- ईमान्दार्यता च स्वाभिमान एव जीवनस्य मूल्यतमं रत्नम्।  

गलती स्वयं सुधारें

एक बार गुरू आत्मानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढाया। पाठ पढाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले - “अब तुम चारों इस पाठ का स्वाध्याय कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुममें से कोई बोले नहीं। एक घंटे बाद मैं तुमसे इस पाठ के बारे में बात करूँगा।“

यह कह कर गुरू आत्मानंद वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद चारों शिष्य बैठ कर पाठ का अध्ययन करने लगे। अचानक बादल घिर आए और वर्षा की संभावना दिखने लगी।

यह देख कर एक शिष्य बोला- “लगता है तेज बारिश होगी।“

ये सुन कर दूसरा शिष्य बोला - “तुम्हें बोलना नहीं चाहिये था। गुरू जी ने मना किया था। तुमने गुरू जी की आज्ञा भंग कर दी।“

तभी तीसरा शिष्य भी बोल पड़ा- “तुम भी तो बोल रहे हो।“

इस तरह तीन शिष्य बोल पड़े, अब सिर्फ चौथा शिष्य बचा वो कुछ भी न बोला। चुपचाप पढ़ता रहा।

एक घंटे बाद गुरू जी लौट आए। उन्हें देखते ही एक शिष्य बोला- “गुरूजी ! यह मौन नहीं रहा, बोल दिया।“

दुसरा बोला - “तो तुम कहाँ मौन थे, तुम भी तो बोले थे।“

तीसरा बोला - “इन दोनों ने बोलकर आपकी आज्ञा भंग कर दी।“

ये सुन पहले वाले दोनों फिर बोले - “तो तुम कौन सा मौन थे, तुम भी तो हमारे साथ बोले थे।“

चौथा शिष्य अब भी चुप था।

यह देख गुरू जी बोले - “मतलब तो ये हुआ कि तुम तीनों ही बोल पड़े । बस ये चौथा शिष्य ही चुप रहा। अर्थात सिर्फ इसी ने मेरी शिक्षा ग्रहण की और मेरी बात का अनुसरण किया। यह निश्चय ही आगे योग्य आदमी बनेगा। परंतु तुम तीनों पर मुझे संदेह है। एक तो तुम तीनों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया; और वह भी एक-दूसरे की गलती बताने के लिये। और ऐसा करने में तुम सब ने स्वयं की गलती पर ध्यान न दिया।

आमतौर पर सभी लोग ऐसा ही करते हैं। दूसरों को गलत बताने और साबित करने की कोशिश में स्वयं कब गलती कर बैठते हैं। उन्हें इसका एहसास भी नहीं होता। यह सुनकर तीनो शिष्य लज्जित हो गये। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की, गुरू जी से क्षमा माँगी और स्वयं को सुधारने का वचन दिया।

सबसे कीमती गहने

एक बार बाजार में चहलकदमी करते एक व्यापारी को व्यापार के लिए एक अच्छी नस्ल का ऊँट नज़र आया।

व्यापारी और ऊँट बेचने वाले ने वार्ता कर, एक कठिन सौदेबाजी की। ऊँट विक्रेता ने अपने ऊँट को बहुत अच्छी कीमत में बेचने के लिए, अपने कौशल का प्रयोग कर के व्यापारी को सौदे के लिए राजी कर लिया। वहीं दूसरी ओर व्यापारी भी अपने नए ऊँट के अच्छे सौदे से खुश था। व्यापारी अपने पशुधन के बेड़े में एक नए सदस्य को शामिल करने के लिए उस ऊँट के साथ गर्व से अपने घर चला गया।

घर पहुँचने पर, व्यापारी ने अपने नौकर को ऊँट की काठी निकालने में मदद करने के लिए बुलाया। भारी गद्देदार काठी को नौकर के लिए अपने बलबूते पर ठीक करना बहुत मुश्किल हो रहा था।

काठी के नीचे नौकर को एक छोटी मखमली थैली मिली, जिसे खोलने पर पता चला कि वह कीमती गहनों से भरी हुई है।

नौकर अति उत्साहित होकर बोला, "मालिक आपने तो केवल एक ऊँट ख़रीदा। लेकिन देखिए इसके साथ क्या मुफ़्त आया है?"

अपने नौकर के हाथों में रखे गहनों को देखकर व्यापारी चकित रह गया। वे गहने असाधारण गुणवत्ता के थे, जो धूप में जगमगा और टिमटिमा रहे थे।

व्यापारी ने कहा, "मैंने ऊँट खरीदा है," गहने नहीं! मुझे इन जेवर को ऊँट बेचने वाले को तुरंत लौटा देना चाहिए।"

नौकर हतप्रभ सा सोच रहा था कि उसका स्वामी सचमुच मूर्ख है! वो बोला, "मालिक! इन गहनों के बारे में किसी को पता नहीं चलेगा।"

फिर भी, व्यापारी वापस बाजार में गया और वो मखमली थैली ऊँट बेचने वाले को वापस लौटा दी।

ऊँट बेचने वाला बहुत खुश हुआ और बोला, "मैं भूल गया था कि मैंने इन गहनों को सुरक्षित रखने के लिए ऊँट की काठी में छिपा दिया था। आप, पुरस्कार के रूप में अपने लिए कोई भी रत्न चुन सकते हैं।"

व्यापारी ने कहा "मैंने केवल ऊँट का सौदा किया है, इन गहनों का नहीं। धन्यवाद, मुझे किसी पुरस्कार की आवश्यकता नहीं है।"

व्यापारी ने बार बार इनाम के लिए मना किया, लेकिन ऊँट बेचने वाला बार बार इनाम लेने पर जोर डालता रहा।

अंत में व्यापारी ने झिझकते और मुस्कुराते हुए कहा, "असल में जब मैंने थैली वापस आपके पास लाने का फैसला किया था, तो मैंने पहले ही दो सबसे कीमती गहने लेकर, उन्हें अपने पास रख लिया।"

इस स्वीकारोक्ति पर ऊँट विक्रेता थोड़ा स्तब्ध था और उसने झट से गहने गिनने के लिए थैली खाली कर दी।

वह बहुत आश्चर्यचकित होकर बोला "मेरे सारे गहने तो इस थैली में हैं! तो फिर आपने कौन से गहने रखे?

"दो सबसे कीमती वाले" व्यापारी ने जवाब दिया।

"मेरी ईमानदारी और मेरा स्वाभिमान"

सुखस्य कारणम् !! 🌿  

वनस्थे सर्वे शशकाः कदाचित् सभां आह्वयन्।  

सभायां सर्वे स्वस्वदुःखानि निवेदयितुं प्रवृत्ताः।  

सर्वे शशकाः दुःखिताः आसन्।  

प्रथमं सोनुशशकः अवदत् —  

“सिंहः, व्याघ्रः, चित्रकः, वृकः, गजः च सर्वे अस्मात् अधिकबलवन्तः।  

सर्वेभ्यः कश्चित् भयभीतः भवति, किन्तु अस्मात् कोऽपि न भयभीतः।”  

एतत् श्रुत्वा चीकुशशकः रुदितुम् आरब्धवान्।  

सः अवदत् — “एवं दुःखदशां दृष्ट्वा जीवितुं मनो न भवति।”  

तत् सत्यं आसीत्।  

शशकात् कोऽपि न भयभीतः।  

ते मन्यन्ते स्म — “लोके अस्मात् दुर्बलः कोऽपि नास्ति।”  

तस्मात् निर्णयः जातः —  

“श्वः प्रातः सर्वे शशकाः एकत्र नदीतीरं गत्वा  

नद्यां निमग्नाः स्युः।”  

प्रातः सर्वे शशकाः संगृहीताः नदीतीरं गतवन्तः।  

ते यदा नदीतीरं प्राप्तवन्तः,  

तदा ददृशुः —  

यत्र उपविष्टाः भेकाः शशकान् दृष्ट्वा भयात् शीघ्रं नद्यां पतितवन्तः।  

एतद् दृष्ट्वा शशकाः तत्रैव स्थिताः।  

ते अवगच्छन् — “भेकाः अस्मात् भयभीताः।”  

ततः मृत्युः निरस्तः।  

सोनुशशकः तत्रैव सभां कृत्वा अवदत् —  

“भ्रातृभ्यः, धैर्येण कार्यं कर्तव्यम्।  

लोके कश्चित् अस्ति, यः अस्मात् अपि दुर्बलः।  

यदि दुःखस्य कारणानि बहूनि सन्ति,  

तर्हि सुखस्यापि कारणं किमपि अवश्यं विद्यते।”  

चीकुशशकः अपि अवदत् —  

“आम्, धैर्यं न त्यक्तव्यम्।  

यदि वयं दुर्बलाः, तर्हि अपि वयं सुन्दरतमाः।  

वयं वनस्थेषु सर्वेषु प्राणिषु शीघ्रतरं धावितुं शक्नुमः।”  

ततः सर्वे शशकाः हृष्टाः वनं प्रत्यागच्छन्।  

📜 शिक्षा/सन्देशः :-  

“जीवने सहस्रशः क्लेशाः आगच्छेयुः,  

किन्तु जगत् प्रति प्रदर्शय —  

त्वयि हर्षस्य द्विसहस्रं कारणानि सन्ति।”  

🌿 सुखस्य कारणम् — संवादरूपेण 🌿  

👨‍🦳 शिष्यः: गुरो, शशकानां कथा श्रुतुम् इच्छामि।  

👨‍🦰 ऋषिः: श्रुणु वत्स।  

ऋषिः: कदाचित् वनस्थे सर्वे शशकाः सभां आह्वयन्।

शिष्यः: किं कारणम्?  

ऋषिः: दुःखानि निवेदयितुं ते संगृहीताः।  

प्रथमं सोनुशशकः अवदत् —  

“सिंहः, व्याघ्रः, चित्रकः, वृकः, गजः च सर्वे अस्मात् अधिकबलवन्तः।  

सर्वेभ्यः कश्चित् भयभीतः, किन्तु अस्मात् कोऽपि न भयभीतः।”  

शिष्यः: ततः किं जातम्?  

ऋषिः: एतत् श्रुत्वा चीकुशशकः रुदितुम् आरब्धवान्।  

सः अवदत् — “एवं दुःखदशां दृष्ट्वा जीवितुं मनो न भवति।”  

शिष्यः: अहो, दुःखिताः शशकाः। 

ऋषिः: तस्मात् निर्णयः जातः —  

“श्वः प्रातः सर्वे शशकाः नदीतीरं गत्वा नद्यां निमग्नाः स्युः।”  

शिष्यः: कथं तदा?  

ऋषिः: प्रातः सर्वे शशकाः नदीतीरं गतवन्तः।  

ते यदा तत्र प्राप्तवन्तः, तदा ददृशुः —  

भेकाः शशकान् दृष्ट्वा भयात् शीघ्रं नद्यां पतितवन्तः। 

शिष्यः: अहो! भेकाः अपि शशकात् भयभीताः।  

ऋषिः: एवम्।  

शशकाः अवगच्छन् — “लोके कश्चित् अस्ति, यः अस्मात् अपि दुर्बलः।”  

ततः मृत्युः निरस्तः।  

शिष्यः: तदा सोनुशशकः किं अवदत्?  

ऋषिः: सः सभां कृत्वा अवदत् —  

“भ्रातृभ्यः, धैर्येण कार्यं कर्तव्यम्।  

यदि दुःखस्य कारणानि बहूनि सन्ति,  

तर्हि सुखस्यापि कारणं किमपि अवश्यं विद्यते।”  

शिष्यः: चीकुशशकः अपि किम् अवदत्?  

ऋषिः: सः अवदत् —  

“आम्, धैर्यं न त्यक्तव्यम्।  

वयं दुर्बलाः, किन्तु सुन्दरतमाः।  

वयं शीघ्रतरं धावितुं शक्नुमः।”  

शिष्यः: तदा सर्वे शशकाः?  

ऋषिः: हृष्टाः वनं प्रत्यागच्छन्।  

📜 शिक्षा/सन्देशः :-  

ऋषिः: “वत्स, जीवने सहस्रशः क्लेशाः आगच्छेयुः।

किन्तु जगत् प्रति प्रदर्शय —  

त्वयि हर्षस्य द्विसहस्रं कारणानि सन्ति।”  

!! खुशी की वजह !!

जंगल के सभी खरगोशों ने एक दिन सभा बुलाई। बैठक में सभी को अपनी समस्याएं बतानी थीं। सभी खरगोश बहुत दुखी थे। सबसे पहले सोनू खरगोश ने बोलना शुरू किया कि जंगल में जितने भी जानवर रहते हैं, उनमें खरगोश सबसे कमज़ोर हैं।

सोनू बोल रहा था, “शेर, बाघ, चीता, भेड़िया, हाथी सब हमसे अधिक शक्तिशाली हैं। सबसे कोई न कोई डरता है, लेकिन हमसे कोई नहीं डरता।” सोनू की बात सुन कर चीकू खरगोश तो रोने ही लगा। उसने रोते हुए कहा कि खरगोशों की ऐसी दुर्दशा देख कर तो अब जीने का मन ही नहीं करता।

बात सही थी। खरगोश से कोई नहीं डरता था। उन्हें लगने लगा था कि संसार में उनसे कमज़ोर कोई और नहीं। ऐसे में तय हुआ कि कल सुबह सारे खरगोश एक साथ नदी के किनारे तक जाएंगे और सारे के सारे नदी में डूब कर जान दे देंगे। ऐसी ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है।

सुबह सारे खरगोश इकट्ठा हुए और पहुंच गए नदी के किनारे। जैसे ही वो नदी के किनारे पहुंचे, उन्होंने देखा कि वहां बैठे मेंढ़क खरगोशों को देख कर डर के मारे फटाफट नदी में कूदने लगे।

उन्हें ऐसा करते देख खरगोश वहीं रुक गए। वो समझ गए कि मेंढ़क उनसे डर रहे हैं। बस फिर क्या था, मरना कैंसिल हो गया।

सोनू खरगोश ने वहीं एक सभा की और सभी खरगोशों को बताया कि भाइयों हमें हिम्मत से काम लेना चाहिए। इस संसार में कोई ऐसा भी है, जो हमसे भी कमज़ोर है। ऐसे में अगर हमारे पास दुखी होने की कई वज़हें हैं तो खुश होने की भी एक वज़ह तो है ही।

चीकू खरगोश ने भी कहा कि हां, हमें हिम्मत नहीं छोड़नी चाहिए। हम कमज़ोर हैं, ये सोच कर हमें दुखी होने की जगह ये सोच कर हमें खुश होना चाहिए कि हम सबसे अधिक खूबसूरत हैं और हम जंगल में किसी भी जानवर की तुलना में अधिक तेज़ गति से दौड़ सकते हैं। फिर सारे खरगोश खुशी-खुशी जंगल में लौट आए।

शिक्षा/संदेश :-

“ज़िंदगी में बेशक आपके सामने हज़ार-पांच सौ मुश्किलें होंगी लेकिन आप दुनिया को दिखा दीजिए कि अब आपके पास मुस्कुराने की दो हज़ार वज़हें हैं।”

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