ईश्वर-पूजा (मनोनिग्रहस्य रहस्यम्)

ईश्वर-आराधना एवं कर्मफल-विवेकः

।। आध्यात्मिक-सन्देशः ।।

१. ईश्वर-पूजा (मनोनिग्रहस्य रहस्यम्)

चञ्चलं मनः निगृह्य भगवतः चरणेषु नियोजनं अतीव दुष्करं कार्यम्। प्रारम्भे मनः ईश्वर-साधनाय सज्जं न भवति। कश्चित् शिष्यः गुरुम् उपगत्य अवदत् - "भगवन्! मम मनः साधनायां न रमति, किन्तु साधना-इच्छा तु वर्तते। कृपया तादृशं मार्गं दर्शयतु येन मनः एकाग्रं भवेत्।"
"अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।"
गुरुः आज्ञापितवान् - "त्वं मार्गात् द्वौ श्वशावकौ (पिल्ले) आनीय सप्ताहावधिं यावत् तयोः परिचर्यां कुरु।" शिष्यः तौ आनीतवान्। प्रारम्भे तौ धावितवन्तौ, किन्तु यदा शिष्यः स्नेहपूर्वकं दुग्धं भोजनं च दत्तवान्, तदा तौ शिष्येण सह अतीव संलग्नाः अभवन्।
गुरुः अवदत् - "पश्य वत्स! यथा सङ्गेन समयदानेन च एते पशवः त्वां त्यक्तुं न इच्छन्ति, तथैव यथा यथा त्वं ईश्वरेण सह समयं यापयिष्यसि, तथा तथा तव मनः तस्य आनन्दे रमिष्यति। यः ईश्वर-रसं पिबति, सः अन्यत्र न गच्छति।"

२. कर्मफल-विवेकः (यादृशं बीजं तादृशं फलम्)

"यादृशं वपते बीजं क्षेत्रमासाद्य कर्षकः।
सुकृते दुष्कृते वापि तादृशं लभते फलम्॥"
पुरा कश्चित् राजा स्वमन्त्रिणां परीक्षां कर्तुं तान् आदिष्टवान् - "यूयं पृथक् पृथक् उद्यानं गत्वा फलैः स्यूतं (थैला) पूरयित्वा आनयन्तु।"
प्रथमः मन्त्री श्रेष्ठानि फलानि चितवान्। द्वितीयः मन्त्री शीघ्रतायां शोभन-अशोभन-मिश्रितैः फलैः स्यूतं पूरितवान्। तृतीयः तु अलसः आसीत्, सः केवलं शुष्क-तृणैः (घास-फूस) स्यूतं पूरयित्वा आगतवान्। राजा तान् स्यूतान् अदृष्ट्वैव मन्त्रिणः मासपर्यन्तं कारागारे बद्धवान्। राजा आदिष्टवान् - "एते स्व-स्यूतस्थ-फलैः एव जीवनं करिष्यन्ति।"
प्रथमः मन्त्री सुखेन जीवितवान्। द्वितीयः रुग्णः जातः। तृतीयः तु क्षुधया मृतः। एतदेव कर्मफलस्य विधानम्। अस्मिन् जन्मनि परजन्मनि वा कर्मफलं निश्चितम् अस्ति।
"यत् कृतं हि शुभं कर्म तस्य भुङ्क्ते शुभं फलम्।
दुष्कृतं यदि कृतं स्यात् दुःखं तस्य फलं भवेत्॥"
"यत् प्राप्तं तत् पर्याप्तम्। सदैव प्रसन्नो भव।"

 

 ईश्वर की पूजा

मन को वश करके प्रभु चरणों में लगाना बड़ा ही कठिन है। शुरुआत में तो यह इसके लिये तैयार  ही नहीं होता है। लेकिन इसे मनाए कैसे? एक शिष्य थे किन्तु उनका मन किसी भी भगवान की साधना में नहीं लगता था और साधना करने की इच्छा भी मन में थी।

वे गुरु के पास गये और कहा कि गुरुदेव साधना में मन लगता नहीं और साधना करने का मन होता है। कोई ऐसी साधना बताए जो मन भी लगे और साधना भी हो जाये। गुरु ने कहा तुम कल आना। दूसरे दिन वह गुरु के पास पहुँचा तो गुरु ने कहा सामने रास्ते में कुत्ते के छोटे बच्चे हैं उसमें से दो बच्चे उठा ले आओ और उनकी हफ्ताभर देखभाल करो।

गुरु के इस अजीब आदेश सुनकर वह भक्त चकरा गया लेकिन क्या करें, गुरु का आदेश जो था। उसने 2 पिल्लों को पकड़ कर लाया लेकिन जैसे ही छोड़ा वे भाग गये। उसने फिर से पकड़ लाया लेकिन वे फिर भागे।

अब उसने उन्हें पकड़ लिया और दूध रोटी खिलायी। अब वे पिल्ले उसके पास रमने लगे। हफ़्ता भर उन पिल्लों की ऐसी सेवा यत्न पूर्वक की कि अब वे उसका साथ छोड़ नहीं रहे थे। वह जहां भी जाता पिल्ले उसके पीछे-पीछे भागते, यह देख  गुरु ने दुसरा आदेश दिया कि इन पिल्लों को भगा दो।

भक्त के लाख प्रयास के बाद भी वह पिल्ले नहीं भागे तब गुरु ने कहा देखो बेटा शुरुआत में यह बच्चे तुम्हारे पास रुकते नहीं थे लेकिन जैसे ही तुमने उनके पास ज्यादा समय बिताया ये तुम्हारे बिना रहने को तैयार नहीं है।

ठीक इसी प्रकार खुद जितना ज्यादा वक्त भगवान के पास बैठोगे, मन धीरे-धीरे भगवान की सुगन्ध, आनन्द से उनमें रमता जायेगा। हम अकसर चलती-फिरती पूजा करते है तो भगवान में मन कैसे लगेगा?

जितनी ज्यादा देर ईश्वर के पास बैठोगे उतना ही मन ईश्वर रस का मधुपान करेगा और एक दिन ऐसा आएगा कि उनके बिना आप रह नहीं पाओगे। शिष्य को अपने मन को वश में करने का मर्म समझ में आ गया और वह गुरु आज्ञा से भजन सुमिरन करने चल दिया।

बिन गुरु ज्ञान कहां से पाऊं।।।

सदैव प्रसन्न रहिये।

जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

कर्म फल

पुराने समय में एक राजा था। वह अकसर अपने दरबारियों और मंत्रियों की परीक्षा लेता रहता था। एक दिन राजा ने अपने तीन मंत्रियों को दरबार में बुलाया और तीनों को आदेश दिया कि एक - एक थैला लेकर बगीचे में जायें और वहाँ से अच्छे - अच्छे फल तोड़ कर लायें। तीनों मंत्री एक - एक थैला लेकर अलग - अलग बाग़ में गए। बाग़ में जाकर एक मंत्री ने सोचा कि राजा के लिए अच्छे - अच्छे फल तोड़ कर ले जाता हूँ ताकि राजा को पसंद आये। उसने चुन - चुन कर अच्छे - अच्छे फलों को अपने थैले में भर लिया। दूसरे मंत्री ने सोचा “कि राजा को कौन सा फल खाने है?” वो तो फलों को देखेगा भी नहीं। ऐसा सोचकर उसने अच्छे बुरे जो भी फल थे, जल्दी - जल्दी इकठ्ठा करके अपना थैला भर लिया। तीसरे मंत्री ने सोचा कि समय क्यों बर्बाद किया जाये, राजा तो मेरा भरा हुआ थैला ही देखेंगें। ऐसा सोचकर उसने घास फूस से अपने थैले को भर लिया। अपना - अपना थैला लेकर तीनों मंत्री राजा के पास लौटे। राजा ने बिना देखे ही अपने सैनिकों को उन तीनों मंत्रियों को एक महीने के लिए जेल में बंद करने का आदेश दे दिया और कहा कि इन्हें खाने के लिए कुछ नहीं दिया जाये। ये अपने फल खाकर ही अपना गुजारा करेंगे।

अब जेल में तीनों मंत्रियों के पास अपने - अपने थैलो के अलावा और कुछ नहीं था। जिस मंत्री ने अच्छे - अच्छे फल चुने थे, वो बड़े आराम से फल खाता रहा और उसने बड़ी आसानी से एक महीना फलों के सहारे गुजार दिया। जिस मंत्री ने अच्छे बुरे गले सड़े फल चुने थे वो कुछ दिन तो आराम से अच्छे फल खाता रहा लेकिन उसके बाद सड़े गले फल खाने की वजह से वो बीमार हो गया। उसे बहुत परेशानी उठानी पड़ी और बड़ी मुश्किल से उसका एक महीना गुजरा। लेकिन जिस मंत्री ने घास फूस से अपना थैला भरा था वो कुछ दिनों में ही भूख से मर गया।

दोस्तों ये तो एक कहानी है। लेकिन इस कहानी से हमें बहुत अच्छी सीख मिलती है कि हम जैसा करते हैं, हमें उसका वैसा ही फल मिलता है। ये भी सच है कि हमें अपने कर्मों का फल ज़रूर मिलता है। इस जन्म में नहीं, तो अगले जन्म में हमें अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। एक बहुत अच्छी कहावत हैं कि जो जैसा बोता हैं वो वैसा ही काटता है। अगर हमने बबूल का पेड़ बोया है तो हम आम नहीं खा सकते। हमें सिर्फ कांटे ही मिलेंगे।

मतलब कि अगर हमने कोई गलत काम किया है या किसी को दुःख पहुँचाया है या किसी को धोखा दिया है या किसी के साथ बुरा किया है, तो हम कभी भी खुश नहीं रह सकते। कभी भी सुख से, चैन से नहीं रह सकते। हमेशा किसी ना किसी मुश्किल परेशानी से घिरे रहेंगे।

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