देवता: अश्विनौ ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
या वां॒ कशा॒ मधु॑म॒त्यश्वि॑ना सू॒नृता॑वती।
तया॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम्॥ ऋग्वेद १.२२.३
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
yā vāṁ kaśā madhumaty aśvinā sūnṛtāvatī | tayā yajñam mimikṣatam ||
पद पाठ
या। वा॒म्। कशा॑। मधु॑ऽमती। अश्वि॑ना। सू॒नृता॑ऽवती। तया॑। य॒ज्ञम्। मि॒मि॒क्ष॒त॒म्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:4» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:3
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
वे क्रिया में किनसे संयुक्त हो सकते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे उपदेश करने वा सुनने तथा पढ़ने-पढ़ानेवाले मनुष्यो ! (वाम्) तुम्हारे (अश्विना) गुणप्रकाश करनेवालों की (या) जो (सूनृतावती) प्रशंसनीय बुद्धि से सहित (मधुमती) मधुरगुणयुक्त (कशा) वाणी है, (तया) उससे तुम (यज्ञम्) श्रेष्ठ शिक्षारूप यज्ञ को (मिमिक्षतम्) प्रकाश करने की इच्छा नित्य किया करो॥३॥
भावार्थभाषाः -उपदेश के विना किसी मनुष्य को ज्ञान की वृद्धि कुछ भी नहीं हो सकती, इससे सब मनुष्यों को उत्तम विद्या का उपदेश तथा श्रवण निरन्तर करना चाहिये॥३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मधुमती कशा
पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (अश्विना) - प्राणापानो ! (या) - जो (वाम्) - आप दोनों की (मधुमती) - अत्यन्त माधुर्यवाली तथा (सुनृतावती) - उत्तम , दुःखों का परिहाण करनेवाली तथा सत्य (कशा) - वाणी है , (तया) - उस वाणी से (यजम्) - हमारे इस जीवन - यज्ञ को (मिमिक्षतम्) - सिक्त कर दो , अर्थात् हम सदा मधुर , सूनृत वाणी ही बोलनेवाले हों २. प्राणसाधना से सभी इन्द्रियों के दोष दूर हो जाते हैं । वाणी के मौलिक दोष कटुता व अनृतता ही हैं । ये दोनों दोष दूर होकर वाणी मधुर व सत्य बन जाती है । प्राणशक्ति के क्षीण होने पर ही चिड़चिड़ापन व स्वभाव में कटुता आती है , तभी मनुष्य कुछ अपशब्द बोलने लगता है । प्राणशक्ति के ठीक होने पर वाणी की मिठास ठीक बनी रहती है । प्राणशक्ति - सम्पन्न पुरुष सदा उत्तम , सुखद सत्यवाणी ही बोलता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम प्राणशक्ति - सम्पन्न बनकर सदा मधुमती , सूनृत वाणी ही बोलें ।
देवता: अश्विनौ ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
न॒हि वा॒मस्ति॑ दूर॒के यत्रा॒ रथे॑न॒ गच्छ॑थः।
अश्वि॑ना सो॒मिनो॑ गृ॒हम्॥ ऋग्वेद १.२२.४
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
nahi vām asti dūrake yatrā rathena gacchathaḥ | aśvinā somino gṛham ||
पद पाठ
न॒हि। वा॒म्। अस्ति॑। दू॒र॒के। यत्र॑। रथे॑न। गच्छ॑थः। अश्वि॑ना। सो॒मिनः॑। गृ॒हम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:4
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
इसको करके अश्वियों के योग से क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे रथों के रचने वा चलानेहारे सज्जन लोगो ! तुम (यत्र) जहाँ उक्त (अश्विना) अश्वियों से संयुक्त (रथेन) विमान आदि यान से (सोमिनः) जिसके प्रशंसनीय पदार्थ विद्यमान हैं, उस पदार्थविद्या वाले के (गृहम्) घर को (गच्छथः) जाते हो, वह दूरस्थान भी (वाम्) तुमको (दूरके) दूर (नहि) नहीं है ॥४॥
भावार्थभाषाः -हे मनुष्यो ! जिस कारण अग्नि और जल के वेग से युक्त किया हुआ रथ अति दूर भी स्थानों को शीघ्र पहुँचाता है, इससे तुम लोगों को भी यह शिल्पविद्या का अनुष्ठान निरन्तर करना चाहिये॥४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु के घर में
पदार्थान्वयभाषाः -१. हम प्राणसाधना करते हुए मन्त्रों के अनुसार [क] सोम - रक्षा में समर्थ होते हैं । [ख] शरीर को नीरोग बनाते हैं । [ग] इन्द्रियों को निर्दोष , [घ] मन को दिव्य , [ङ] तथा मस्तिष्क को ज्ञानोज्ज्वल बनाते हैं । [च] इसके साथ हमारी वाणी मधुर व सूनुत हो जाती है । इन सब साधनाओं का यह परिणाम होना ही चाहिए कि हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें । इसी बात को प्रस्तुत मन्त्र में इस प्रकार कहते हैं कि हे (अश्विना) - प्राणापानो ! (यत्रा) - जहाँ (सोमिनः) - इस सोम का उत्पादन करनेवाले प्रभु के (गृहम्) - घर को (रथेन) - इस शरीररूप रथ से (गच्छथः) - जाते हो तो वह (वाम्) - आपके लिए (दूरके नहि अस्ति) - दूर नहीं है । २.मन्त्रार्थ में प्रभु को ' सोमी' शब्द से स्मरण करना भी बड़ा भावपूर्ण है । प्रभु सोमी हैं , सोम को हममें उत्पादित करते हैं । इस सोम को यदि हम शरीर में सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते हैं , तो इस प्रयत्न से हम प्रभु का आदर कर रहे होते हैं । प्रभु की प्राप्ति इस सोम - रक्षण के बिना सम्भव नहीं है । इस सोम का रक्षण प्राणसाधना से होता है , अतः कहा गया कि ये प्राणापान ही सोमी प्रभु के घर में हमें ले - जानेवाले होते हैं , उनके लिए यह कार्य कठिन नहीं है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्राणसाधना से सोम की रक्षा करके हम उस सोमी प्रभु के घर में पहुँचनेवाले होंगे ।
देवता: सविता ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
हिर॑ण्यपाणिमू॒तये॑ सवि॒तार॒मुप॑ ह्वये।
स चेत्ता॑ दे॒वता॑ प॒दम्॥ ऋग्वेद १.२२.५
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
hiraṇyapāṇim ūtaye savitāram upa hvaye | sa cettā devatā padam ||
पद पाठ
हिर॑ण्यऽपाणिम्। ऊ॒तये॑। स॒वि॒तार॑म्। उप॑। ह्व॒ये॒। सः। चेत्ता॑। दे॒वता॑। प॒दम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:4» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:5
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अगले मन्त्र में परम ऐश्वर्य्य करानेवाले परमेश्वर का प्रकाश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -मैं (ऊतये) प्रीति के लिये जो (पदम्) सब चराचर जगत् को प्राप्त और (हिरण्यपाणिम्) जिससे व्यवहार में सुवर्ण आदि रत्न मिलते हैं, उस (सवितारम्) सब जगत् के अन्तर्यामी ईश्वर को (उपह्वये) अच्छी प्रकार स्वीकार करता हूँ (सः) वह परमेश्वर (चेत्ता) ज्ञानस्वरूप और (देवता) पूज्यतम देव हैं॥५॥
भावार्थभाषाः -मनुष्यों को जो चेतनमय सब जगह प्राप्त होने और निरन्तर पूजन करने योग्य प्रीति का एक पुञ्ज और ऐश्वर्य्यों का देनेवाला परमेश्वर है, वही निरन्तर उपासना के योग्य है। इस विषय में इसके विना कोई दूसरा पदार्थ उपासना के योग्य नहीं है॥५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सविता का आह्वान
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र का प्राणसाधना करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मलोक [सोमिगृह] में पहुँचकर प्रभु का स्तवन करता है कि (हिरण्यपाणिम्) - हितरमणीय रक्षणवाले (सवितारम्) - सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के उत्पादक व सबके प्रेरक उस प्रभु को (ऊतये) - रक्षण के लिए (उपह्वये) - पुकारता है । यह आकाश में उदित होनेवाला सुर्य भी ' हिरण्यपाणि' है , हाथ में स्वर्ण को लिये हुए है । यह अपने किरणरूप हाथों से हममें स्वर्ण को प्रक्षिप्त [Inject] करने का प्रयत्न करता है । इसकी किरणों को हम छाती पर लेते हैं तो ये रोगकृमियों को नष्ट करनेवाली होती हैं । सूर्य भी (सविता) - सबको जगाकर कर्म में लगने की प्रेरणा देता है । यह सविता उस सविता की ही विभूति है । २. (सः) - वे प्रभु (चेत्ता) - संज्ञानवाले हैं । प्रभु के ज्ञान में किसी प्रकार की कमी नहीं । (देवता) - वे प्रभु सब - कुछ देनेवाले हैं , ज्ञान से दीप्त हैं । और पवित्र हृदयवालों को ज्ञान से द्योतित करनेवाले हैं । "पदम् - पद्यते योगिभिर्यस्मात्तस्मात्पद उदाहृतः" शान्त चित्तवाले मुनियों से जानने योग्य हैं , अथवा सबका अन्तिम लक्ष्यस्थान हैं । प्रभु तक पहुँचकर ही जीवन यात्रा का अन्त होगा ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु ' हिरण्यपाणि , सविता , चेत्ता , देवता व पद' हैं , उन्हें मैं अपनी रक्षा के लिए पुकारता हूँ । [सूचना - पद का अर्थ ' गतिशील' भी है - प्रभु सदा क्रियाशील हैं ।]
देवता: सविता ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
अ॒पां नपा॑त॒मव॑से सवि॒तार॒मुप॑ स्तुहि।
तस्य॑ व्र॒तान्यु॑श्मसि॥ ऋग्वेद १.२२.६
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
apāṁ napātam avase savitāram upa stuhi | tasya vratāny uśmasi ||
पद पाठ
अ॒पाम्। नपा॑तम्। अव॑से। स॒वि॒तार॑म्। उप॑। स्तु॒हि॒। तस्य॑। व्र॒तानि॑। उ॒श्म॒सि॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:5» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:6
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर उस परमेश्वर की स्तुति करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे धार्मिक विद्वान् मनुष्य ! जैसे मैं (अवसे) रक्षा आदि के लिये (अपाम्) जो सब पदार्थों को व्याप्त होने अन्त आदि पदार्थों के वर्त्ताने तथा (नपातम्) अविनाशी और (सवितारम्) सकल ऐश्वर्य्य के देनेवाले परमेश्वर की स्तुति करता हूँ, वैसे तू भी उसकी (उपस्तुहि) निरन्तर प्रशंसा कर। हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग जिसके (व्रतानि) निरन्तर धर्मयुक्त कर्मों को (उश्मसि) प्राप्त होने की कामना करते हैं, वैसे (तस्य) उसके गुण कर्म्म और स्वभाव को प्राप्त होने की कामना तुम भी करो॥३॥
भावार्थभाषाः -जैसे विद्वान् मनुष्य परमेश्वर की स्तुति करके उसकी आज्ञा का आचरण करता है, वैसे तुम लोगों को भी उचित है कि उस परमेश्वर के रचे हुए संसार में अनेक प्रकार के उपकार ग्रहण करो॥६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
कर्म व अपतन
पदार्थान्वयभाषाः -१. (अपाम्) - प्रजाओं के अथवा कर्मों के (न पातम्) - न गिरने देनेवाले (सवितारम्) - उत्पादक व प्रेरक प्रभु की (अवसे) - रक्षण के लिए (उपस्तुहि) - समीपता से स्तुति करनेवाला बन । वे प्रभु अपने रक्षण के कार्य में कभी ढील तो करते ही नहीं , क्रिया उनके लिए स्वाभाविक ही है । ' अपाम्' शब्द के दोनों ही अर्थ हैं ' प्रजा व कर्म' । प्रभु इन दोनों को गिरने नहीं देते । यदि इन्हें समन्वित करके कहा जाए तो अर्थ इस प्रकार होगा कि ' कर्मों के द्वारा प्रजाओं को न गिरने देनेवाले' अर्थात् कर्म ही अपतन का साधन है । २. (तस्य) - उस प्रभु के (व्रतानि) - पुण्यकर्मों को (उश्मसि) - हम भी चाहते हैं , अर्थात् हमारी भी यही कामना है कि हम भी प्रभु की भाँति ही ज्ञानी , दिव्य व गतिशील बनें ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम भी प्रभु की भाँति क्रियाशील और सब प्रजाओं के रक्षक बनें ।
देवता: सविता ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
वि॒भ॒क्तारं॑ हवामहे॒ वसो॑श्चि॒त्रस्य॒ राध॑सः।
स॒वि॒तारं॑ नृ॒चक्ष॑सम्॥ ऋग्वेद १.२२.७
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
vibhaktāraṁ havāmahe vasoś citrasya rādhasaḥ | savitāraṁ nṛcakṣasam ||
पद पाठ
वि॒ऽभ॒क्तार॑म्। ह॒वा॒म॒हे॒। वसोः॑। चि॒त्रस्य॑। राध॑सः। स॒वि॒तार॑म्। नृ॒ऽचक्ष॑सम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:5» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:7
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अगले मन्त्र में सविता शब्द से ईश्वर और सूर्य्य के गुणों का उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्य लोगो ! जैसे हम लोग (नृचक्षसम्) मनुष्यों में अन्तर्यामिरूप से विज्ञान प्रकाश करने (वसोः) पदार्थों से उत्पन्न हुए (चित्रस्य) अद्भुत (राधसः) विद्या सुवर्ण वा चक्रवर्ति राज्य आदि धन के यथायोग्य (विभक्तारम्) जीवों के कर्म के अनुकूल विभाग से फल देने वा (सवितारम्) जगत् के उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर और (नृचक्षसम्) जो मूर्त्तिमान् द्रव्यों का प्रकाश करने (वसोः) (चित्रस्य) (राधसः) उक्त धनसम्बन्धी पदार्थों को (विभक्तारम्) अलग-अलग व्यवहारों में वर्त्ताने और (सवितारम्) ऐश्वर्य्य हेतु सूर्य्यलोक को (हवामहे) स्वीकार करें, वैसे तुम भी उनका ग्रहण करो॥३॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को उचित है कि जिससे परमेश्वर सर्वशक्तिपन वा सर्वज्ञता से सब जगत् की रचना करके सब जीवों को उसके कर्मों के अनुसार सुख दुःखरूप फल को देता और जैसे सूर्य्यलोक अपने ताप वा छेदनशक्ति से मूर्त्तिमान् द्रव्यों का विभाग और प्रकाश करता है, इससे तुम भी सबको न्यायपूर्वक दण्ड वा सुख और यथायोग्य व्यवहार में चला के विद्यादि शुभ गुणों को प्राप्त कराया करो॥७॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
धन का विभाग
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में कहा था कि प्रभु प्रजाओं का पतन नहीं होने देते । उसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि वे प्रभु धन का उचित विभाग करते हैं और वस्तुतः यह धन का विभाग ही प्रजा की रक्षा करनेवाला होता है । जिस प्रकार शरीर में रुधिर के किसी एक स्थान में एकत्र होने से शरीर विकृत हो जाता है , उसी प्रकार समाज के शरीर में भी धन के कुछ स्थानों पर केन्द्रित होने पर विकार आ जाता है । इसलिए कहते हैं कि (विभक्तारम्) - धन का उचित विभाग करनेवाले उस प्रभु को (हवामहे) - हम पुकारते हैं जो प्रभु (वसोः) - निवास के लिए आवश्यक धन को देनेवाले हैं । कैसे धन को? (चित्रस्य) - [चित्+र] जो धन हमें ज्ञान का देनेवाला है , न कि हमारे ज्ञान को नष्ट करनेवाला है ; तथा (राधसः) - जो धन हमारे कर्मों को सिद्ध करनेवाला है? (सवितारम्) - उस प्रभु को जो सम्पूर्ण धनों को उत्पन्न करनेवाले हैं और उन्हें सर्वत्र प्रेरित करनेवाले हैं तथा (नृचक्षसम्) - [नॄन् चष्टे - look after] सभी लोकों का पालन करनेवाले हैं । जैसे एक माता सभी बच्चों का ध्यान करती है , वे प्रभु भी सभी की माता हैं और सबके पालन - पोषण का ध्यान करते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - सबके पालक उस प्रभु की हम प्रार्थना करें । वे प्रभु ही सब धनों के उत्पादक व विभाजक हैं । प्रभु से दिया गया धन हमारे निवास को उत्तम बनाता है , हमारे ज्ञान के अनुकूल होता है तथा कार्यों का साधक है ।
देवता: सविता ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
सखा॑य॒ आ निषी॑दत सवि॒ता स्तोम्यो॒ नु नः॑।
दाता॒ राधां॑सि शुम्भति॥ ऋग्वेद १.२२.८
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
sakhāya ā ni ṣīdata savitā stomyo nu naḥ | dātā rādhāṁsi śumbhati ||
पद पाठ
सखा॑यः। आ। नि। सी॒द॒त॒। स॒वि॒ता। स्तोम्यः॑। नु। नः॒। दाता॑। राधां॑सि। शु॒म्भ॒ति॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:8
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
कैसे मनुष्य इस उपकार को ग्रहण कर सकें, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्यो ! तुम लोग सदा (सखायः) आपस में मित्र सुख वा उपकार करनेवाले होकर (आनिषीदत) सब प्रकार स्थित रहो और जो (स्तोम्यः) प्रशंसनीय (नः) हमारे लिये (राधांसि) अनेक प्रकार के उत्तम धनों को (दाता) देनेवाला (सविता) सकल ऐश्वर्य्ययुक्त जगदीश्वर (शुम्भति) सबको सुशोभित करता है, उसकी (नु) शीघ्रता के साथ नित्य प्रशंसा करो। तथा हे मनुष्यो ! जो (स्तोम्यः) प्रशंसनीय (नः) हमारे लिये (राधांसि) उक्त धनों को (शुम्भति) सुशोभित कराता वा उनके (दाता) देने का हेतु (सविता) ऐश्वर्य्य देने का निमित्त सूर्य्य है, उसकी (नु) नित्य शीघ्रता के साथ प्रशंसा करो॥८॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को परस्पर मित्रभाव के विना कभी सुख नहीं हो सकता। इससे सब मनुष्यों को योग्य है कि एक-दूसरे के साथ होकर जगदीश्वर वा अग्निमय सूर्य्यादि का उपदेश कर वा सुनकर उनसे सुखों के लिये सदा उपकार ग्रहण करें॥८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
जीवन की शोभा
पदार्थान्वयभाषाः -१. (सखायः) - मित्रो ! (आनिषीदत) - सब ओर से आकर नम्रता से बैठो । (सविता) - सारे ब्रह्माण्ड का उत्पादक , सर्वप्रेरक प्रभु (नु) - अब (नः) - हम सबका (स्तोम्यः) - स्तुति करने योग्य है । उस प्रभु का स्तवन ही हमारे लिए इस संसार में वह आश्रय है जो हमें विषयों में फंसने से बचाता है । २. वह स्तुत्य प्रभु (राधांसि दाता) - सब धनों के देनेवाले हैं । प्रभु ही उन धनों को प्राप्त कराते हैं जो हमें इस जीवन में सब आवश्यक पदार्थों को प्राप्त कराके जीवन - यात्रा में सफलता प्राप्त कराने में सहायक होते हैं । ३. वे प्रभु इस प्रकार इन धनों के द्वारा सफल बनाकर (शुम्भति) - हमारे जीवनों को शोभायुक्त करते हैं । जीवन की शोभा सफलता में ही है । सफलता के लिए सब आवश्यक उपकरणों को जुटाने के लिए धन की आवश्यकता है । इस धन के देनेवाले वे प्रभु ही हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम प्रभु का स्तवन करें , क्योंकि प्रभु ही आवश्यक धन देकर हमें सफलता प्राप्त कराते हैं और हमारे जीवनों को शोभायुक्त करते हैं ।
देवता: अग्निः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
अग्ने॒ पत्नी॑रि॒हाव॑ह दे॒वाना॑मुश॒तीरुप॑।
त्वष्टा॑रं॒ सोम॑पीतये॥ ऋग्वेद १.२२.९
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
agne patnīr ihā vaha devānām uśatīr upa | tvaṣṭāraṁ somapītaye ||
पद पाठ
अग्ने॑। पत्नीः॑। इ॒ह। आ। व॒ह॒। दे॒वाना॑म्। उ॒श॒तीः। उप॑। त्वष्टा॑रम्। सोम॑ऽपीतये॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:5» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:9
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर अगले मन्त्र में अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(अग्ने) जो यह भौतिक अग्नि (सोमपीतये) जिस व्यवहार में सोम आदि पदार्थों का ग्रहण होता है, उसके लिये (देवानाम्) इकत्तीस जो कि पृथिवी आदि लोक हैं, उनकी (उशतीः) अपने-अपने आधार के गुणों का प्रकाश करनेवाला (पत्नीः) स्त्रीवत् वर्त्तमान अदिति आदि पत्नी और (त्वष्टारम्) छेदन करनेवाले सूर्य्य वा कारीगर को (उपावह) अपने सामने प्राप्त करता है, उसका प्रयोग ठीक-ठीक करें॥९॥
भावार्थभाषाः -विद्वानों को उचित है कि जो बिजुली प्रसिद्ध और सूर्य्यरूप से तीन प्रकार का भौतिक अग्नि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये पृथिवी आदि पदार्थों के सामर्थ्य प्रकाश करने में मुख्य हेतु है, उसी का स्वीकार करें और यह इस शिल्पविद्यारूपी यज्ञ में पृथिवी आदि पदार्थों के सामर्थ्य का पत्नी नाम विधान किया है, उसको जानें॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
देवपत्नी आवहन
पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (अग्ने) - प्रगतिशील व्यक्ति ! तू (इह) - इस मानव - जीवन में (उशतीः) - भले को चाहनेवाली (देवानां पत्नीः) - देवपत्नियों को (उपावह) - समीप प्राप्त करनेवाला हो । शरीर में सब देवों का निवास है - "सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठइवासते" [अ० ११/८/३२] इसमें सब देव इस प्रकार रहते हैं जैसे गोशाला में गौवें । इन सब देवों की शक्तियाँ ही उनकी पत्नियाँ कहलाती हैं । इनके होने पर मनुष्य - जीवन सुखी हो पाता है , अतः उन सब अङ्ग - प्रत्यङ्गों व इन्द्रियों की शक्ति की प्रार्थना की गई है । २. इन शक्तियों की प्राप्ति के लिए ही तू (त्वष्टरम्) - उस सबके निर्माता व दीप्ति के पुञ्ज प्रभु को पुकार , ताकि (सोमपीतये) - सोम की तू रक्षा कर सके । त्वष्टा की पुकार हमें भी त्वष्टा बनाएगी और जब हम निर्माण के कार्यों में लगे होंगे अथवा ज्ञानप्राप्ति में लगकर दीप्ति का पुञ्ज बनने का प्रयत्न करेंगे तो सब प्रकार के विलासों से बचकर सोम का रक्षण कर पाएंगे । इस सोम के रक्षण से हमारे सब अङ्ग सबल होंगे । यह अङ्ग - प्रत्यङ्ग की शक्ति ही देवपत्नी है । इन देवपत्नियों का यहाँ जीवन - यज्ञ में प्राप्त कराने का यही साधन है कि हम प्रभु - उपासन के द्वारा सोम का रक्षण करें ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हे प्रगतिशील जीव ! तू त्वष्टा का उपासक बनकर निर्माण के कार्यों और ज्ञान - प्राप्ति में लग । इससे तू सोम का रक्षण कर पाएगा और सोम - रक्षण से सब इन्द्रियों की शक्ति को प्राप्त करनेवाला होगा ।
देवता: अग्निः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
आ ग्ना अ॑ग्न इ॒हाव॑से॒ होत्रां॑ यविष्ठ॒ भार॑तीम्।
वरू॑त्रीं धि॒षणां॑ वह॥ ऋग्वेद १.२२.१०
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ā gnā agna ihāvase hotrāṁ yaviṣṭha bhāratīm | varūtrīṁ dhiṣaṇāṁ vaha ||
पद पाठ
आ। ग्नाः। अ॒ग्ने॒। इ॒ह। अव॑से। होत्रा॑म्। य॒वि॒ष्ठ॒। भार॑तीम्। वरू॑त्रीम्। धि॒षणा॑म्। व॒ह॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:5» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:10
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
वे कौन-कौन देवपत्नी हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे (यविष्ठ) पदार्थों को मिलाने वा उनमें मिलनेवाले (अग्ने) क्रियाकुशल विद्वान् ! तू (इह) शिल्पकार्य्यों में (अवसे) प्रवेश करने के लिये (ग्नाः) पृथिवी आदि पदार्थ (होत्राम्) होम किये हुए पदार्थों को बहाने (भारतीम्) सूर्य्य की प्रभा (वरूत्रीम्) स्वीकार करने योग्य दिन रात्रि और (धिषणाम्) जिससे पदार्थों को ग्रहण करते हैं, उस वाणी को (आवह) प्राप्त हो॥१०॥
भावार्थभाषाः -विद्वानों को इस संसार में मनुष्य जन्म पाकर वेद द्वारा सब विद्या प्रत्यक्ष करनी चाहिये, क्योंकि कोई भी विद्या पदार्थों के गुण और स्वभाव को प्रत्यक्ष किये विना सफल नहीं हो सकती॥१०॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
होत्रा - भारती - वरूत्री' व ' धिषणा'
पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (अग्ने) - प्रगतिशील जीव ! (इह) - इस जीवन में (अवसे) - अपने रक्षण के लिए (ग्नाः) - देवपत्नियों को (आवह) - प्राप्त करा । सब इन्द्रियाँ यहाँ देव हैं , मन व बुद्धि देव हैं । इनकी शक्तियाँ ही इनकी पत्नियाँ हैं । इन्हें इस जीवन - यज्ञ में प्राप्त करना आवश्यक है । इनके होने पर ही यहाँ सुख है । इनके अभाव में यह जीवन नरक - सा बन जाता है । २. हे (यविष्ठ) - युवतम ! अपने साथ अच्छाइयों को अधिक - से - अधिक जोड़नेवाले व बुराइयों को दूर करनेवाले जीव ! तू (होत्राम्) - होत्रा को , (भारतीम्) - भारती को (वरूत्रीम्) - वरुत्री को तथा (धिषणाम्) - धिष्णा को (वह) - धारण कर । [क] ' होत्रा' अग्निपत्नी है । यही यहाँ शरीर में जठराग्नि है , जिसमें हव्य पदार्थों को ही भोजन के रूप में डाला जाता है । इन सब पदार्थों को भी यह दानपूर्वक यज्ञशेष के रूप में ही सेवन करती है । परिणामतः शरीर नीरोग बना रहता है । [ख] ' भारती' [भरतस्यादित्यस्य पत्नी] । यह भरत अर्थात् भरण - पोषण करनेवाले आदित्य की पत्नी है । "प्राणाः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः" के अनुसार सूर्य अपने किरणरूप हाथों में प्राणशक्ति लेकर हमें प्राप्त होता है और सब इन्द्रियों को प्राणशक्ति से परिपूर्ण करता है और इस प्रकार इन्द्रियों को कार्यक्षम बनाता है । [ग] ' वरुत्री' यह द्वेष के निवारण की देवता मनोमय कोष को मलिन नहीं होने देती और [घ] ' धिषणा' तो है ही बुद्धि का नाम । यह विज्ञानमय कोष को धारण करती है । इस प्रकार ये देवपत्नियाँ हमारे सब कोषों को सुन्दर बनानेवाली हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - ' होत्रा - भारती - वरुत्री व धिषणा' का आवहन हमारा रक्षण करनेवाला हो ।
देवता: देव्यः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
अ॒भि नो॑ दे॒वीरव॑सा म॒हः शर्म॑णा नृ॒पत्नीः॑।
अच्छि॑न्नपत्राः सचन्ताम्॥ ऋग्वेद १.२२.११
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
abhi no devīr avasā mahaḥ śarmaṇā nṛpatnīḥ | acchinnapatrāḥ sacantām ||
पद पाठ
अ॒भि। नः॒। दे॒वीः। अव॑सा। म॒हः। शर्म॑णा। नृ॒ऽपत्नीः॑। अच्छि॑न्नऽपत्राः। स॒च॒न्ता॒म्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:11
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स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब विद्वानों की स्त्रियाँ भी उक्त कार्य्यों को करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है-
पदार्थान्वयभाषाः -(अच्छिन्नपत्राः) जिन के अविनष्ट कर्मसाधन और (देवीः) (नृपत्नीः) जो क्रियाकुशलता में चतुर विद्वान् पुरुषों की स्त्रियाँ हैं, वे (महः) बड़े (शर्मणा) सुखसम्बन्धी घर (अवसा) रक्षा विद्या में प्रवेश आदि कर्मों के साथ (नः) हम लोगों को (अभिसचन्ताम्) अच्छी प्रकार मिले। ॥११॥
भावार्थभाषाः -जैसी विद्या, गुण, कर्म और स्वभाववाले पुरुष हों, उनकी स्त्री भी वैसे ही होनी ठीक हैं, क्योंकि जैसा तुल्य रूप विद्या गुण कर्म स्वभाववालों को सुख का सम्भव होता है, वैसा अन्य को कभी नहीं हो सकता। इससे स्त्री अपने समान पुरुष वा पुरुष अपने समान स्त्रियों के साथ आपस में प्रसन्न होकर स्वयंवर विधान से विवाह करके सब कर्मों को सिद्ध करें॥११॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अच्छिन्नपत्रा देवपत्नियाँ
पदार्थान्वयभाषाः -१. (नः) - हमें (अवसा) - रक्षण के हेतु से तथा (महः शर्मणा) - [महस् - तेज] तेजस्वितायुक्त सुख के हेतु से (देवीः) - देवपत्नियाँ (अभिसचन्ताम्) - आभिमुख्येन प्राप्त हों , सेवन करनेवाली हों । सब अङ्गों की शक्तियाँ ही देवपत्नियाँ हैं । इनके होने पर ही हमारा रोगों से रक्षण होता है और इनके होने पर ही हम तेजस्वी व सुखी होते हैं । २.ये देवपत्नियाँ (नृपत्नीः) - मनुष्यों का पालन व रक्षण करनेवाली हैं । (अच्छिन्नपत्राः) - इनका गमन अच्छिन्न होता है , इनकी क्रियाशीलता विच्छिन्न नहीं होती , अर्थात् ये देवपत्नियाँ अपना कार्य अश्रान्तभाव से करती जाती हैं । इनका कार्य मनुष्यों का रक्षण व इन्हें तेजस्वितायुक्त सुख प्राप्त कराना ही है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हमारा निरन्तर पालन करनेवाली व हमें तेजस्वी व सुखी बनानेवाली देवपत्नियाँ - इन्द्रियशक्तियाँ हमें प्राप्त हों ।
देवता: इन्द्राणीवरुणान्यग्नाय्यः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
इ॒हेन्द्रा॒णीमुप॑ ह्वये वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑।
अ॒ग्नायीं॒ सोम॑पीतये॥ ऋग्वेद १. २२.१२
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ihendrāṇīm upa hvaye varuṇānīṁ svastaye | agnāyīṁ somapītaye ||
पद पाठ
इ॒ह। इ॒न्द्रा॒णीम्। उप॑। ह्व॒ये॒। व॒रु॒णा॒नीम्। स्व॒स्तये॑। अ॒ग्नायी॑म्। सोम॑ऽपीतये॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:12
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे कैसी देवपत्नी हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्य लोगो ! जैसे हम लोग (इह) इस व्यवहार में (स्वस्तये) अविनाशी प्रशंसनीय सुख वा (सोमपीतये) ऐश्वर्य्यों का जिसमें भोग होता है, उस कर्म के लिये जैसा (इन्द्राणीम्) सूर्य्य (वरुणानीम्) वायु वा जल और (अग्नायीम्) अग्नि की शक्ति हैं, वैसी स्त्रियों को पुरुष और पुरुषों को स्त्री लोग (उपह्वये) उपयोग के लिये स्वीकार करें, वैसे तुम भी ग्रहण करो॥१२॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को उचित है कि ईश्वर के बनाये हुए पदार्थों के आश्रय से अविनाशी निरन्तर सुख की प्राप्ति के लिये उद्योग करके परस्पर प्रसन्नतायुक्त स्त्री और पुरुष का विवाह करें, क्योंकि तुल्य स्त्री पुरुष और पुरुषार्थ के विना किसी मनुष्य को कुछ भी ठीक-ठीक सुख का सम्भव नहीं हो सकता॥१२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्द्राणी - वरुणानी - अग्नायी
पदार्थान्वयभाषाः -१. (इह) - इस जीवन - यज्ञ में (स्वस्तये) - उत्तम स्थिति व कल्याण के लिए तथा (सोमपीतये) - सोम के पान , अर्थात् शक्ति की रक्षा के लिए (इन्द्राणीम्) - इन्द्राणी को , (वरुणानीम्) - वरुणपत्नी वरुणानी को तथा (अग्नायीम्) - अग्निपत्नी को (उपह्वये) - पुकारता हूँ । २. ' इन्द्राणी' इन्द्र की पत्नी है । इन्द्र सब असुरों का संहार करनेवाला है । इस असुर - संहारिणी शक्ति को ही यहाँ ' इन्द्राणी' कहा गया है । असुरों का अग्रणी ' वृत्र' है । यह ज्ञान पर आवरण डालनेवाला काम ही है । ' आवृतं ज्ञानमेतेन' । इस काम को प्रचण्ड ज्ञानाग्नि ही दग्ध करती है एवं ज्ञानाग्नि की कोशभूत यह बुद्धि ही इन्द्राणी है । ३. मन में किसी प्रकार के द्वेषादि मलिन भावों को न आने देनेवाली वरुणानी है । यह अपने को व्रतों के बन्धन में बाँधकर द्वेषादि से अपने को शून्य बनाती है । [४] ' अग्नायी' अग्निपत्नी है । यही जठराग्नि है । यह दीप्त रहकर शरीरों के स्वास्थ्य का कारण होती है । इस प्रकार इन देवपत्नियों से हमारी स्थिति उत्तम तो होती ही है , साथ ही इनकी कृपा से शरीर में सोम का रक्षण भी होता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - इन्द्राणी , वरुणानी व अग्नायी को हम स्वस्ति व सोमपीति के लिए पुकारते हैं ।
देवता: द्यावापृथिव्यौ ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
म॒ही द्यौः पृ॑थि॒वी च॑ न इ॒मं य॒ज्ञं मि॑मिक्षताम्।
पि॒पृ॒तां नो॒ भरी॑मभिः॥ ऋग्वेद १.२२.१३
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
mahī dyauḥ pṛthivī ca na imaṁ yajñam mimikṣatām | pipṛtāṁ no bharīmabhiḥ ||
पद पाठ
म॒ही। द्यौः। पृ॒थि॒वी। च॒। नः॒। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। मि॒मि॒क्ष॒ता॒म्। पि॒पृ॒ताम्। नः॒। भरी॑मऽभिः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:13
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स्वामी दयानन्द सरस्वती
शिल्पविद्या में भूमि और अग्नि मुख्य साधन हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे उपदेश के करने और सुननेवाले मनुष्यो ! तुम दोनों जो (मही) बड़े-बड़े गुणवाले (द्यौः) प्रकाशमय बिजुली, सूर्य्य आदि और (पृथिवी) अप्रकाशवाले पृथिवी आदि लोकों का समूह (भरीमभिः) धारण और पुष्टि करनेवाले गुणों से (नः) हमारे (इमम्) इस (यज्ञम्) शिल्पविद्यामय यज्ञ (च) और (नः) हम लोगों को (पिपृताम्) सुख के साथ अङ्गों से अच्छी प्रकार पूर्ण करते हैं, वे (इमम्) इस (यज्ञम्) शिल्पविद्यामय यज्ञ को (मिमिक्षताम्) सिद्ध करने की इच्छा करो तथा (पिपृताम्) उन्हीं से अच्छी प्रकार सुखों को परिपूर्ण करो॥१३॥
भावार्थभाषाः -द्यौः यह नाम प्रकाशमान लोकों का उपलक्षण अर्थात् जो जिसका नाम उच्चारण किया हो, वह उसके समतुल्य सब पदार्थों के ग्रहण करने में होता है तथा पृथिवी यह विना प्रकाशवाले लोकों का है। मनुष्यों को इन से प्रयत्न के साथ सब उपकारों को ग्रहण करके उत्तम-उत्तम सुखों को सिद्ध करना चाहिये॥१३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
द्यौः , पृथिवी
पदार्थान्वयभाषाः -१. शरीर में मस्तिष्क ही द्युलोक है और यह अन्नमयकोश ही पृथिवी है । (मही द्यौः) - ज्ञान से परिपूर्ण यह महत्त्वपूर्ण मस्तिष्क (च) - तथा (मही) - महनीय (पृथिवी) - शरीर स्वास्थ्य व बल के कारण उचित प्रभाव को डालनेवाला शरीर - ये दोनों (नः) - हमारे (इमम्) - इस जीवन - यज्ञ को (मिमिक्षताम्) - सुख से सिक्त कर दें । जीवन को सुखी बनाने के लिए आवश्यक है कि मस्तिष्क भी ठीक हो तथा शरीर भी पूर्ण स्वस्थ हो । २. ये महनीय मस्तिष्क व शरीर (नः) - हमें (भरीमभिः) - सब प्रकार की शक्तियों के भरण - पोषण से (पिपृताम्) - पालित व पूरित करें । इनके द्वारा हम अपना भरण - पोषण ठीक से कर सकें ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - सब प्रकार की शक्तियों के ठीक विकास के लिए शरीर व मस्तिष्क दोनों का स्वस्थ होना आवश्यक है ।
देवता: द्यावापृथिव्यौ ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
तयो॒रिद्घृ॒तव॒त्पयो॒ विप्रा॑ रिहन्ति धी॒तिभिः॑।
ग॒न्ध॒र्वस्य॑ ध्रु॒वे प॒दे॥ ऋग्वेद १.२२.१४
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
tayor id ghṛtavat payo viprā rihanti dhītibhiḥ | gandharvasya dhruve pade ||
पद पाठ
तयोः॑। इत्। घृ॒तऽव॑त्। पयः॑। विप्राः॑। रि॒ह॒न्ति॒। धी॒तिऽभिः॑। ग॒न्ध॒र्वस्य॑। ध्रु॒वे। प॒दे॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:14 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:14
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स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त दो प्रकार के लोकों से क्या-क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -जो (विप्राः) बुद्धिमान् पुरुष जिनसे प्रशंसनीय होते हैं (तयोः) उन प्रकाशमय और अप्रकाशमय लोकों के (धीतिभिः) धारण और आकर्षण आदि गुणों से (गन्धर्वस्य) पृथिवी को धारण करनेवाले वायु का (ध्रुवे) जो सब जगह भरा निश्चल (पदे) अन्तरिक्ष स्थान है, उसमें विमान आदि यानों को (रिहन्ति) गमनागमन करते हैं, वे प्रशंसित होके, उक्त लोकों ही के आश्रय से (घृतवत्) प्रशंसनीय जलवाले (पयः) रस आदि पदार्थों को ग्रहण करते हैं॥१४॥
भावार्थभाषाः -विद्वानों को पृथिवी आदि पदार्थों से विमान आदि यान बनाकर उनकी कलाओं में जल और अग्नि के प्रयोग से भूमि, समुद्र और आकाश में जाना आना चाहिये॥१४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
गन्धर्व का ध्रुवपद
पदार्थान्वयभाषाः -१. शरीर में हृदय को ' गन्धर्व का ध्रुवपद' कहते हैं । [गां वेदवाचं धरति] वेदवाणी को धारण करनेवाले प्रभु को गन्धर्व कहते हैं । हृदय उस गन्धर्व का ' ध्रुवपद' है , स्थिर - स्थान है । प्रभु का जब भी दर्शन होगा , इस हृदय में ही होगा । संसार में - संसार के पदार्थों में प्रभु की महिमा दिखती है , हृदय में प्रभु का दर्शन होता है , अतः इस (गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे) - हृदयान्तरिक्ष के प्रभु का निवासस्थान होने पर (विप्राः) - विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले समझदार लोग (धीतिभिः) - [धेट् पाने] सोम के पान के द्वारा - शरीर में शक्ति के संयम के द्वारा (तयोः) - उन द्युलोक व पृथिवीलोक के - मस्तिष्क व शरीर के (घृतवत्) - [घृ क्षरणदीप्त्योः] मलों के क्षरण व ज्ञान - दीप्तिवाले (पयः) - आप्यायन - वर्धन को (इत्) - निश्चय से (रिहन्ति) - आस्वादित करते हैं [They enjoy it] । मलों के क्षरण से शरीर का आप्यायन होता है और दीप्ति से मस्तिष्क का । इसलिए इस (पयः) - आप्यायन को ' घृतवत्' कहा है । हमारा हृदय प्रभु का ध्रुवपद बनता है तो वहाँ कामवासना भस्मीभूत हो जाती है । इस वासना के भस्मीभूत होने से शरीर में सोम का रक्षण [पान - धीति] होता है । इस रक्षण से शरीर निर्मल व नीरोग होता है व मस्तिष्क दीप्त ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हृदय में प्रभु का नियतवास होने पर सोमपान के द्वारा शरीर व मस्तिष्क क्रमशः मलरहित व दीप्त होते हैं ।
देवता: पृथिवी ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: विराड्गायत्री स्वर: षड्जः
स्यो॒ना पृ॑थिवि भवानृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी।
यच्छा॑ नः॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑॥ ऋग्वेद १.२२.१५
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
syonā pṛthivi bhavānṛkṣarā niveśanī | yacchā naḥ śarma saprathaḥ ||
पद पाठ
स्यो॒ना। पृ॒थि॒वि॒। भ॒व॒। अ॒नृ॒क्ष॒रा। नि॒ऽवेश॑नी। यच्छ॑। नः॒। शर्म॑। स॒ऽप्रथः॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:15 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:15
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स्वामी दयानन्द सरस्वती
यह भूमि किसलिये और कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -जो यह (पृथिवी) अति विस्तारयुक्त (स्योना) अत्यन्त सुख देने तथा (अनृक्षरा) जिसमें दुःख देनेवाले कण्टक आदि न हों (निवेशनी) और जिसमें सुख से प्रवेश कर सकें, वैसी (भव) होती है, सो (नः) हमारे लिये (सप्रथः) विस्तारयुक्त सुखकारक पदार्थवालों के साथ (शर्म्म) उत्तम सुख को (यच्छ) देती है॥१५॥
भावार्थभाषाः -मनुष्यों को योग्य है, कि यह भूमि ही सब मूर्त्तिमान् पदार्थों के रहने की जगह और अनेक प्रकार के सुखों की करानेवाली और बहुत रत्नों को प्राप्त करानेवाली होती है, ऐसा ज्ञान करें॥१५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुखद शरीर [स्योना पृथिवी]
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार हृदय के प्रभु का निवास बनने पर (पृथिवि) - हे शरीर ! तू (स्योना) - सुखद (भव) - हो । एक बालक के कष्ट तभी से आरम्भ होते हैं जब वह माता से वियुक्त होता है , इसी प्रकार हमारे भी कष्ट तभी आरम्भ होते हैं जब हम प्रभु से दूर होते हैं । मेरा हृदय प्रभु का ध्रुवपद है तो उस अमृतप्रभु के रक्षण में मुझे कष्ट कैसे हो सकता है? २.मेरा यह पृथिवीरूप शरीर (अनृक्षरा) - कण्टकों से रहित हो [अक्षरः - कण्टक] । इसमें सुख के विनाशक तत्त्वों का अभाव हो । इन कण्टकों के अभाव में मैं निरन्तर उन्नतिशील बनूं । ३. (निवेशनी) - यह शरीररूपी पृथिवी सब दिव्य शक्तियों [देवपत्नियों] की निवासस्थानभूत हो । ४. इस प्रकार यह शरीर हमें (सप्रथः) - सब शक्तियों के विस्तार से युक्त (शर्म) - शरण [गृह] को (यच्छ) - दें , अर्थात् यह शरीर मेरा ऐसा घर हो जिसमें सब शक्तियों का उचित विस्तार हो ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - यह शरीररूपी पृथिवी ' सुखद - कण्टकरहित - उत्तम निवासवाली व विस्तृत शक्तियों की शरणभूत' हो ।
देवता: विष्णुर्देवो वा ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
अतो॑ दे॒वा अ॑वन्तु नो॒ यतो॒ विष्णु॑र्विचक्र॒मे।
पृ॒थि॒व्याः स॒प्त धाम॑भिः॥ ऋग्वेद १.२२.१६
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ato devā avantu no yato viṣṇur vicakrame | pṛthivyāḥ sapta dhāmabhiḥ ||
पद पाठ
अतः॑। दे॒वाः। अ॒व॒न्तु॒। नः॒। यतः॑। विष्णुः॑। वि॒ऽच॒क्र॒मे। पृ॒थि॒व्याः। स॒प्त। धाम॑ऽभिः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:16 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:16
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स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पृथिवी आदि पदार्थों का रचने और धारण करनेवाला कौन है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(यतः) जिस सदा वर्त्तमान नित्य कारण से (विष्णुः) चराचर संसार में व्यापक जगदीश्वर (पृथिव्याः) पृथिवी को लेकर (सप्त) सात अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, विराट्, परमाणु और प्रकृति पर्य्यन्त लोकों को (धामभिः) जो सब पदार्थों को धारण करते हैं, उनके साथ (विचक्रमे) रचता है (अतः) उसी से (देवाः) विद्वान् लोग (नः) हम लोगों को (अवन्तु) उक्त लोकों की विद्या को समझते वा प्राप्त कराते हुए हमारी रक्षा करते रहें॥१६॥
भावार्थभाषाः -विद्वानों के उपदेश के विना किसी मनुष्य को यथावत् सृष्टिविद्या का बोध कभी नहीं हो सकता। ईश्वर के उत्पादन करने के विना किसी पदार्थ का साकार होना नहीं बन सकता और इन दोनों कारणों के जाने विना कोई मनुष्य पदार्थों से उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकता। और जो यूरोपदेशवाले विलसन साहिब ने पृथिवी उस खण्ड के अवयव से तथा विष्णु की सहायता से देवता हमारी रक्षा करें यह इस मन्त्र का अर्थ अपनी झूँठी कल्पना से वर्णन किया है, सो समझना चाहिये॥१६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पृथिवी के सप्तधाम
पदार्थान्वयभाषाः -१. जब जीव शरीर , मन व मस्तिष्क - तीनों की उन्नतियों को करनेवाला होता है , तब वह इस व्यापक उन्नति के कारण - तीन कदमों को रखने के कारण ' विष्णु' कहलाता है । (यतः) - क्योंकि (विष्णुः) - इस व्यापक उन्नति करनेवाले ने (पृथिव्याः) - इस शरीररूप पृथिवी के (सप्त) - सात (धामभिः) - तेजों के हेतु से (विचक्रमे) - विशेष पुरुषार्थ किया है , अतः इसलिए (देवाः) - संसार के सूर्यादि सब देव (नः) - हमें (अवन्त) - रक्षित करें । २. स्वास्थ्य का अभिप्राय यही होता है कि बाह्य देवों की शरीर के अन्तः स्थित देवांशों से अनुकूलता हो । जब तक यह अनुकूलता रहती है , रोग नहीं आते । इस अनुकूलता के समाप्त होते ही रोग शरीर को घेरने लगते हैं । ३. इन ' जल - वायु' आदि देवों के अनुकूल न होने पर शरीर में ' रस , रुधिर , मांस , अस्थि , मज्जा , मेदस् व वीर्य' आदि सप्त धातुओं का ठीक निर्माण नहीं होता । ये सात धातुएँ ही यहाँ मन्त्र में ' पृथिवी के सात धाम - तेज' कहे गये हैं । सारी उन्नति इन रसादि के ठीक निर्माण पर ही निर्भर करती है , इसलिए व्यापक उन्नति करनेवाला इस पृथिवी - इन सातों तेजों को ठीक करने का प्रयत्न करता है । ४. जो भी ऐसा प्रयत्न करते हैं वे देवों के रक्षण के पात्र होते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम पृथिवी - शरीर के सातों धामों के द्वारा ' शरीर , मन व मस्तिष्क' की व्यापक उन्नति करें और देवों के रक्षण के पात्र हों ।
देवता: विष्णुः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
इ॒दं विष्णु॒र्वि च॑क्रमे त्रे॒धा निद॑धे प॒दम्।
समू॑ळ्हमस्य पां॒सु॒रे॥ ऋग्वेद १.२२.१७
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
idaṁ viṣṇur vi cakrame tredhā ni dadhe padam | samūḻham asya pāṁsure ||
पद पाठ
इ॒दम्। विष्णुः॑। वि। च॒क्र॒मे॒। त्रे॒धा। नि। द॒धे॒। प॒दम्। सम्ऽऊ॑ळ्हम्। अ॒स्य॒। पां॒सु॒रे॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:17 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:17
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स्वामी दयानन्द सरस्वती
ईश्वर ने इस संसार को कितने प्रकार का रचा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -मनुष्य लोग जो (विष्णुः) व्यापक ईश्वर (त्रेधा) तीन प्रकार का (इदम्) यह प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष (पदम्) प्राप्त होनेवाला जगत् है, उसको (विचक्रमे) यथायोग्य प्रकृति और परमाणु आदि के पद वा अंशों को ग्रहण कर सावयव अर्थात् शरीरवाला करता और जिसने (अस्य) इस तीन प्रकार के जगत् का (समूढम्) अच्छी प्रकार तर्क से जानने योग्य और आकाश के बीच में रहनेवाला परमाणुमय जगत् है, उसको (पांसुरे) जिसमें उत्तम-उत्तम मिट्टी आदि पदार्थों के अति सूक्ष्म कण रहते हैं, उनको आकाश में (विदधे) धारण किया है। जो प्रजा का शिर अर्थात् उत्तम भाग कारणरूप और जो विद्या आदि धनों का शिर अर्थात् उत्तम फल आनन्दरूप तथा जो प्राणों का शिर अर्थात् प्रीति उत्पादन करनेवाला सुख है, ये सब विष्णुपद कहाते हैं, यह और्णवाभ आचार्य्य का मत है। पादैः सूयन्त इति वा इसके कहने से कारणों से कार्य्य की उत्पत्ति की है, ऐसा जानना चाहिये। पदं न दृश्यते जो इन्द्रियों से ग्रहण नहीं होते, वे परमाणु आदि पदार्थ अन्तरिक्ष में रहते भी हैं, परन्तु आँखों से नहीं दीखते। इदं त्रेधाभावाय इस तीन प्रकार के जगत् को जानना चाहिये अर्थात् एक प्रकाशरहित पृथिवीरूप, दूसरा कारणरूप जो कि देखने में नहीं आता, और तीसरा प्रकाशमय सूर्य्य आदि लोक हैं। इस मन्त्र में विष्णु शब्द से व्यापक ईश्वर का ग्रहण है॥१७॥
भावार्थभाषाः -परमेश्वर ने इस संसार में तीन प्रकार का जगत् रचा है अर्थात् एक पृथिवीरूप, दूसरा अन्तरिक्ष आकाश में रहनेवाला प्रकृति परमाणुरूप और तीसरा प्रकाशमय सूर्य्य आदि लोक तीन आधाररूप हैं, इनमें से आकाश में वायु के आधार से रहनेवाला जो कारणरूप है, वही पृथिवी और सूर्य्य आदि लोकों का बढ़ानेवाला है और इस जगत् को ईश्वर के विना कोई बनाने को समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि किसी का ऐसा सामर्थ्य ही नहीं॥१७॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
तीन कदम
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार (विष्णुः) - व्यापक उन्नति करनेवाले जीव ने (इदम्) - यह (विचक्रमे) - विशेष पुरुषार्थ किया है कि (त्रेधा) - तीन प्रकार से (पदम्) - कदम को (निदधे) - रक्खा है । केवल शरीर , केवल मन व केवल मस्तिष्क की उन्नति न करके उसने तीनों की ही उन्नति की है - शरीर को नीरोग बनाया है , मन को निर्मल और मस्तिष्क को निशित - तीन बुद्धिवाला । इस प्रकार त्रिविध उन्नति करते हुए (अस्य) - इस जीव ने (पांसुरे) - इस धूलि से बने शरीर में इस पार्थिव देह में (सम् ऊढम्) - कर्त्तव्य का सम्यक् वहन किया है । जैसे ब्रह्माण्ड की त्रिलोकी में पृथिवी में अग्नि का निवास है , इसी प्रकार इस विष्णु ने भी इस शरीर में शक्ति की रक्षा के द्वारा ' प्राणाग्नि' को स्थापित किया है । बाह्य अन्तरिक्ष में जैसे चन्द्रमा की स्थिति है , उसी प्रकार इसने अपने हदयान्तरिक्ष में [चदि आह्लादे] आह्लाद - मनः प्रसाद को स्थापित किया है । द्युलोक सूर्य से उज्ज्वल है । इसका मस्तिष्करूप द्युलोक भी ज्ञानसूर्य से उज्ज्वल हुआ है । इस प्रकार इस विष्णु ने स्वकर्तव्य को सम्यक् निबाहा है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - इस पार्थिव शरीर में कर्तव्य का निर्वहण यही है कि हम नीरोगता , निर्मलता व निशिततारूप तीन कदमों को रखनेवाले हों ।
देवता: विष्णुः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
त्रीणि॑ प॒दा वि च॑क्रमे॒ विष्णु॑र्गो॒पा अदा॑भ्यः।
अतो॒ धर्मा॑णि धा॒रय॑न्॥ ऋग्वेद १.२२.१८
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
trīṇi padā vi cakrame viṣṇur gopā adābhyaḥ | ato dharmāṇi dhārayan ||
पद पाठ
त्रीणि॑। प॒दा। वि। च॒क्र॒मे॒। विष्णुः॑। गो॒पाः। अदा॑भ्यः। अतः॑। धर्मा॑णि। धा॒रय॑न्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:18 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:18
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह सर्वव्यापक जगदीश्वर क्या-क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -जिस कारण यह (अदाभ्यः) अपने अविनाशीपन से किसी की हिंसा में नहीं आ सकता (गोपाः) और सब संसार की रक्षा करनेवाला, सब जगत् को (धारयन्) धारण करनेवाला (विष्णुः) संसार का अन्तर्यामी परमेश्वर (त्रीणि) तीन प्रकार के (पदानि) जाने, जानने और प्राप्त होने योग्य पदार्थों और व्यवहारों को (विचक्रमे) विधान करता है, इसी कारण से सब पदार्थ उत्पन्न होकर अपने-अपने (धर्माणि) धर्मों को धारण कर सकते हैं॥१८॥
भावार्थभाषाः -ईश्वर के धारण के विना किसी पदार्थ की स्थिति होने का सम्भव नहीं हो सकता। उसकी रक्षा के विना किसी के व्यवहार की सिद्धि भी नहीं हो सकती॥१८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
धर्मों का धारण
पदार्थान्वयभाषाः -१. इस जीव ने (त्रीणि पदा विचक्रमे) - तीन कदमों को विशेष रूप से रखा है [क] यह (विष्णुः) [विष्लृ व्याप्तौ] - हृदय में व्यापकतावाला बना है - इसने अपने मन को विशाल बनाया है । सारी अपवित्रता ' संकोच' के साथ ही तो रहती है । [ख] (गोपाः) - यह इन्द्रियरूप गौवों की रक्षा करनेवाला ग्वाला बना है । [ग] (अदाभ्यः) - यह रोगों व रोगकृमियों से हिंसित नहीं होता । यह अपने शरीर को नीरोग रखने का प्रयत्न करता है । अस्वस्थ शरीर में किसी भी धर्म का पालन सम्भव नहीं होता । २. इस प्रकार जब जीव तीन कदम रखता है तो अतः इन तीन कदमों को रखने के कारण (धर्माणि) - धर्मों को (धारयन्) - धारण करता हुआ होता है । वेद में यज्ञ ही प्रथम धर्म माना गया है । यज्ञ में तीन भावनाएँ हैं - ' देवपूजा - संगतीकरण - दान' , अर्थात् ' बड़ों का आदर , बराबरवालों से प्रेम तथा छोटों को दयापूर्वक कुछ देना' ही महान् धर्म है । जो व्यक्ति विष्णु , गोपा व अदाभ्य' बनता है वह इन धर्मों का सम्यक् पालन कर पाता है । मन की व्यापकता - इन्द्रियों की आत्मवश्यता व शरीर की नीरोगता के बिना किसी भी धर्म का पालन सम्भव नहीं , अतः आवश्यक है कि हम ' विष्णु , गोपा व अदाभ्य' बनें ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - विशालहृदय , वशेन्द्रिय व नीरोग बनकर हम धर्मों का पालन करनेवाले हों । बड़ों का आदर करें , बराबरवालों से प्रेम से वर्तें , छोटों के प्रति दया की वृत्ति रखें ।
देवता: विष्णुः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
विष्णोः॒ कर्मा॑णि पश्यत॒ यतो॑ व्र॒तानि॑ पस्प॒शे।
इन्द्र॑स्य॒ युज्यः॒ सखा॑॥ ऋग्वेद १.२२.१९
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
viṣṇoḥ karmāṇi paśyata yato vratāni paspaśe | indrasya yujyaḥ sakhā ||
पद पाठ
विष्णोः॑। कर्मा॑णि। प॒श्य॒त॒। यतः॑। व्र॒तानि॑। प॒स्प॒शे। इन्द्र॑स्य। युज्यः॑। सखा॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:19 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:19
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर व्यापक परमेश्वर के किये हुए कर्म मनुष्य नित्य देखें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्य लोगो ! तुम जो (इन्द्रस्य) जीव का (युज्यः) अर्थात् जो अपनी व्याप्ति से पदार्थों में संयोग करनेवाले दिशा, काल और आकाश हैं, उनमें व्यापक होके रमने वा (सखा) सर्व सुखों के सम्पादन करने से मित्र है (यतः) जिससे जीव (व्रतानि) सत्य बोलने और न्याय करने आदि उत्तम कर्मों को (पस्पशे) प्राप्त होता है उस (विष्णोः) सर्वत्र व्यापक शुद्ध और स्वभावसिद्ध अनन्त सामर्थ्यवाले परमेश्वर के (कर्माणि) जो कि जगत् की रचना पालना न्याय और प्रयत्न करना आदि कर्म हैं, उनको तुम लोग (पश्यत) अच्छे प्रकार विदित करो॥१९॥
भावार्थभाषाः -जिस कारण सब के मित्र जगदीश्वर ने पृथिवी आदि लोक तथा जीवों के साधनसहित शरीर रचे हैं, इसी से सब प्राणी अपने-अपने कार्यों के करने को समर्थ होते हैं॥१९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सायुज्य मुक्ति
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार जो व्यापक उन्नति करनेवाला विष्णु है उस (विष्णोः) - विष्णु के (कर्माणि) - कर्मों को (पश्यत) - देखो । प्रभु कहते हैं कि अपने सामने तुम विष्णु के कर्मों को ही आदर्श के रूप में रक्खो । २. उसके कर्मों की उत्कृष्टता का कारण यही है कि (यतः) - क्योंकि वह (व्रतानि) - अपने कर्तव्य - कर्मों को (पस्पशे) - बारीकी से देखता है - अपने कर्मों की आलोचना करता हुआ वह उनके दोषों को दूर कर देता है । ३. वस्तुतः अपने इन पार्थिव कर्मों के द्वारा ही वह (इन्द्रस्य) - उस परमैश्वर्यशाली प्रभु का (युज्यः) - सदा साथ रहनेवाला (सखा) - मित्र बनता है । जो व्यक्ति आत्मालोचन करता हुआ अपने जीवन व अपने कर्मों को पवित्र बनाएगा , वही प्रभु को पानेवाला होगा और इसी के कर्म लोगों के सामने आदर्श के रूप में होते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - व्यापक उन्नति करनेवाला पुरुष अपने कार्यों की सूक्ष्म आलोचना करता रहता है - उन कर्मों में आनेवाली अपवित्रता को दूर करके वह प्रभु का सयुज मित्र बनता है ।
देवता: विष्णुः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दं सदा॑ पश्यन्ति सू॒रयः॑।
दि॒वी॑व॒ चक्षु॒रात॑तम्॥ ऋग्वेद १.२२.२०
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
tad viṣṇoḥ paramam padaṁ sadā paśyanti sūrayaḥ | divīva cakṣur ātatam ||
पद पाठ
तत्। विष्णोः॑। प॒र॒मम्। प॒दम्। सदा॑। प॒श्य॒न्ति॒। सू॒रयः॑। दि॒विऽइ॑व। चक्षुः॑। आऽत॑तम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:20 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:20
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
वह ब्रह्म कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(सूरयः) धार्मिक बुद्धिमान् पुरुषार्थी विद्वान् लोग (दिवि) सूर्य आदि के प्रकाश में (आततम्) फैले हुए (चक्षुरिव) नेत्रों के समान जो (विष्णोः) व्यापक आनन्दस्वरूप परमेश्वर का विस्तृत (परमम्) उत्तम से उत्तम (पदम्) चाहने जानने और प्राप्त होने योग्य उक्त वा वक्ष्यमाण पद हैं (तत्) उस को (सदा) सब काल में विमल शुद्ध ज्ञान के द्वारा अपने आत्मा में (पश्यन्ति) देखते हैं॥२०॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्राणी सूर्य्य के प्रकाश में शुद्ध नेत्रों से मूर्त्तिमान् पदार्थों को देखते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग निर्मल विज्ञान से विद्या वा श्रेष्ठ विचारयुक्त शुद्ध अपने आत्मा में जगदीश्वर को सब आनन्दों से युक्त और प्राप्त होने योग्य मोक्ष पद को देखकर प्राप्त होते हैं। इस की प्राप्ति के विना कोई मनुष्य सब सुखों को प्राप्त होने में समर्थ नहीं हो सकता। इस से इसकी प्राप्ति के निमित्त सब मनुष्यों को निरन्तर यत्न करना चाहिये। इस मन्त्र में परमम् पदम् इन पदों के अर्थ में यूरोपियन विलसन साहब ने कहा है कि इन का अर्थ स्वर्ग नहीं हो सकता, यह उनकी भ्रान्ति है, क्योंकि परमपद का अर्थ स्वर्ग ही है॥२०॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विष्णु का परमपद
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के अनुसार आत्मनिरीक्षण करते हुए और अपने कर्मों को पवित्र बनाते हुए (सूरयः) - ज्ञानी लोग - प्रभु की प्रेरणा के अनुसार चलनेवाले लोग (तत् विष्णोः) - उस सर्वव्यापक प्रभु के (परमं पदम्) - सर्वोत्कृष्ट स्थान को सदा - सदा वैसे (पश्यति) - देखते हैं (इव) - जैसे (दिवि) - द्युलोक में (आततं चक्षुः) - उस समन्तात् विस्तृत चक्षु - सूर्य को देखते हैं । २. आदित्यश्चक्षर्भूत्वा अक्षिणी प्राविशत् [ऐत०१४] सूर्य ही चक्षु का रूप धारण करके आँख में रहता है आँख सूर्य का छोटा रूप है । इसके विपरीत सूर्य का चक्षु विस्तृत रूप है - सूर्य ' आतत - चक्षु' है । यह सूर्य जितना स्पष्ट दिखता है , इतना ही स्पष्ट ज्ञानी लोग प्रभु के पद को देखते हैं । ३. पूर्वमन्त्र में व्यापक उन्नति करनेवाले जीव को भी विष्णु कहा है । परमात्मा को उससे भिन्न करने के लिए "तद् विष्णुः" वह सर्वत्र विस्तृत [तनु विस्तारे] विष्णु कहा गया है । इस विष्णु - जीव ने उस विष्णु - प्रभु को देखना है । उसे देखने के लिए ' सूरि' बनना आवश्यक है । ' विष्णुर्भूत्वा यजेद् विष्णुम्' विष्णु बनकर ही विष्णु का उपासन होता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम विष्णु बनेंगे तो उस विष्णु - सर्वव्यापक प्रभु के दर्शन इस प्रकार स्पष्ट कर पाएँगे जैसे सूर्य के ।
देवता: विष्णुः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
तद्विप्रा॑सो विप॒न्यवो॑ जागृ॒वांसः॒ समि॑न्धते।
विष्णो॒र्यत्प॑र॒मं प॒दम्॥ ऋग्वेद १.२२.२१
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
tad viprāso vipanyavo jāgṛvāṁsaḥ sam indhate | viṣṇor yat paramam padam ||
पद पाठ
तत्। विप्रा॑सः। वि॒प॒न्यवः॑। जा॒गृ॒ऽवांसः॑। सम्। इ॒न्ध॒ते॒। विष्णोः॑। यत्। प॒र॒मम्। प॒दम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:22» मन्त्र:21 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:6 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:21
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
कैसे मनुष्य उक्त पद को प्राप्त होने योग्य हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(विष्णोः) व्यापक जगदीश्वर का (यत्) जो उक्त (परमम्) सब उत्तम गुणों से प्रकाशित (पदम्) प्राप्त होने योग्य पद है (तत्) उसको (विपन्यवः) अनेक प्रकार के जगदीश्वर के गुणों की प्रशंसा करनेवाले (जागृवांसः) सत्कर्म में जागृत (विप्रासः) बुद्धिमान् सज्जन पुरुष हैं, वे ही (समिन्धते) अच्छे प्रकार प्रकाशित करके प्राप्त होते हैं॥२१॥
भावार्थभाषाः -जो मनुष्य अविद्या और अधर्माचरणरूप नींद को छोड़कर विद्या धर्माचरण में जाग रहे हैं, वे ही सच्चिदानन्दस्वरूप सब प्रकार से उत्तम सबको प्राप्त होने योग्य निरन्तर सर्वव्यापी विष्णु अर्थात् जगदीश्वर को प्राप्त होते हैं॥२१॥पहिले सूक्त में जो दो पदों के अर्थ कहे थे, उनके सहचारि अश्वि, सविता, अग्नि, देवी, इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नायी, द्यावापृथिवी, भूमि, विष्णु और इनके अर्थों का प्रकाश इस सूक्त में किया है, इससे पहिले सूक्त के साथ इस सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये। इसके आगे सायण और विलसन आदि विषय में जो यह सूक्त के अन्त में खण्डन द्योतक पङ्क्ति लिखते हैं, सो न लिखी जायेगी, क्योंकि जो सर्वथा अशुद्ध है, उसको बारंबार लिखना पुनरुक्त और निरर्थक है, जहाँ कहीं लिखने योग्य होगा, वहाँ तो लिखा ही जायेगा, परन्तु इतने लेख से यह अवश्य जानना कि ये टीका वेदों की व्याख्या तो नहीं हैं, किन्तु इनको व्यर्थ दूषित करनेहारी हैं॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विप्र - विपन्यु - जागृवान्
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के भाव को ही और बढ़ाकर कहते हैं कि (तद् विष्णोः) - उस सर्वव्यापक प्रभु का (यत् परमं पदम्) - जो सर्वोत्कृष्ट रूप है उसे वे ही (समिन्धते) - सम्यक्तया दीप्त करते हैं , अर्थात् जान व प्राप्त कर पाते हैं जोकि [क] (विप्रासः) - विशेष रूप से अपना पूरण करने का प्रयत्न करते हैं जो आत्मालोचन करते हुए अपनी न्यूनताओं को ढूंढ निकालते हैं और उन्हें उसी प्रकार नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं जैसे एक मृगयु मृग को ढूँढकर इनका संहार करने के लिए यत्नशील होता है । इन ' कामः पशुः क्रोधः पशुः' काम - क्रोधादि पशुओं को ढूँढकर इनका संहार करना ही सच्चा मृगयु बनना है । इसी प्रकार तो हमारा पूरण होगा । [ख] (विपन्यवः) - प्रभु को वे पाते हैं जो कि विशिष्ट स्तुति करनेवाले होते हैं [पन - स्तुतौ] । विशिष्ट स्तुति यह है कि ये सब प्राणियों के हित में प्रवृत्त होते हैं । यह प्रभु की दृश्य भक्ति होती है - यही विशिष्ट स्तुति है । [ग] (जागृवांसः) - प्रभु को वे पाते हैं जो कि सदा जागनेवाले है , कभी असावधान प प्रमत्त नहीं होते , क्योंकि प्रमाद ही सब न्यूनताओं व पतनों का कारण होता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु का दर्शन ' विप्र - विपन्यु - जागृवान् ' ही कर पाते हैं ।
टिप्पणी:विशेष - सूक्त का प्रारम्भ प्राणसाधना द्वारा सोमपान करके [१] सोमौ प्रभु के घर में पहुँचने से होता है [४] । ये प्रभु ही सविता है - सदा उत्तम कर्मों की प्रेरणा देनेवाले हैं [५] । वे प्रभु ही सब धनों को देनेवाले हैं [८] । हम अपने जीवनों को सब इन्द्रियों की शक्ति के वर्धन से सुन्दर बनाएँ [१] । मस्तिष्क व शरीर को ठीक बनाकर जीवन को सुखमय करें [१२] । शरीर , मन व मस्तिष्क की त्रिविध उन्नति करते हुए त्रिविक्रम विष्णु बनें [१७] । विष्णु बनकर ही उस महान् विष्णु के सच्चे उपासक होंगे [२१] । ऐसा बन सकें' , इसके लिए उपाय यही है कि हम शरीर में उत्पन्न सोमकणों की रक्षा करनेवाले बनें ।