देवता: वायु: ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
ती॒व्राः सोमा॑स॒ आ ग॑ह्या॒शीर्व॑न्तः सु॒ता इ॒मे।
वायो॒ तान्प्रस्थि॑तान्पिब॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
tīvrāḥ somāsa ā gahy āśīrvantaḥ sutā ime | vāyo tān prasthitān piba ||
पद पाठ
ती॒व्राः। सोमा॑सः। आ। ग॒हि॒। आ॒शीःऽव॑न्तः। सु॒ताः। इ॒मे। वायो॒ इति॑। तान्। प्रऽस्थि॑तान्। पि॒ब॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:1
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब तेईसवें सूक्त का आरम्भ है, इसके पहिले मन्त्र में वायु के गुण प्रकाशित किये हैं-
पदार्थान्वयभाषाः -जो (इमे) (तीव्राः) तीक्ष्णवेगयुक्त (आशीर्वन्तः) जिनकी कामना प्रशंसनीय होती है (सुताः) उत्पन्न हो चुके वा (सोमासः) प्रत्यक्ष में होते हैं (तान्) उन सबों को (वायो) पवन (आगहि) सर्वथा प्राप्त होता है तथा यही उन (प्रस्थितान्) इधर-उधर अति सूक्ष्मरूप से चलायमानों को (पिब) अपने भीतर कर लेता है, जो इस मन्त्र में आशीर्वन्तः इस पद को सायणाचार्य ने श्रीञ् पाके इस धातु का सिद्ध किया है, सो भाष्यकार की व्याख्या से विरुद्ध होने से अशुद्ध ही है।
भावार्थभाषाः -प्राणी जिनको प्राप्त होने की इच्छा करते और जिनके मिलने में श्रद्धालु होते हैं, उन सबों को पवन ही प्राप्त करके यथावत् स्थिर करता है, इससे जिन पदार्थों के तीक्ष्ण वा कोमल गुण हैं, उन को यथावत् जानके मनुष्य लोग उन से उपकार लेवें॥१॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वायु का सोमपान
पदार्थान्वयभाषाः -१. यहाँ जीव को "वायो" कहकर सम्बोधित किया गया है । [वा गतिगन्धनयोः] हे गति व क्रियाशीलता के द्वारा सब बुराइयों का संहार करनेवाले जीव ! (सोमासः) - ये शरीर में उत्पन्न होनेवाले सोम - [वीर्य] - कण (तीव्राः) - बड़े तीव्र और तेजस्विता को देनेवाले हैं । (आगहि) - तू इन्हें सर्वथा ग्रहण करनेवाला बन । २. (सुताः) - शरीर में उत्पन्न हुए - हुए (इमे) - ये सोमकण (आशीर्वन्तः) - इच्छाओंवाले हैं [आशीः - इच्छा] । ये सोमकण हमारी सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं । ३. प्राणादि की साधना के द्वारा (प्रस्थितान्) - प्रकृष्ट मार्ग की ओर चलते हुए [उत्तरवेदिं प्रति आनीतात् - सा०] शरीर में मस्तिष्क ही उत्तरवेदी है । मस्तिष्क की ओर लाये हुए (तान्) - उन सोमकणों को हे (वायो) - जीव ! तू (पिब) - पीनेवाला बन । प्राणसाधना से इन रेतः कणों की ऊर्ध्वगति होती है । यही सोम का प्रस्थान है । इन सोमकणों को जब हम शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करते हैं तब ये हमारी सब ऐहिक और आमुष्मिक कामनाओं को पूर्ण करनेवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - सोमकण तेजस्विता को देनेवाले हैं , सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं । इनका पान वही कर पाता है जो 'वायु' बनता है - गति के द्वारा सब बुराइयों का संहार करता है ।
देवता: इन्द्रवायू ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
उ॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशे॑न्द्रवा॒यू ह॑वामहे।
अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ubhā devā divispṛśendravāyū havāmahe | asya somasya pītaye ||
पद पाठ
उ॒भा। दे॒वा। दि॒वि॒ऽस्पृशा॑। इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑। ह॒वा॒म॒हे॒। अ॒स्य। सोम॑स्य। पी॒तये॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:2 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:2
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में परस्पर संयोग करनेवाले पदार्थों का प्रकाश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हम लोग (अस्य) इस प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष (सोमस्य) उत्पन्न करनेवाले संसार के सुख के (पीतये) भोगने के लिये (दिविस्पृशा) जो प्रकाशयुक्त आकाश में विमान आदि यानों को पहुँचाने और (देवा) दिव्यगुणवाले (उभा) दोनों (इन्द्रवायू) अग्नि और पवन हैं, उनको (हवामहे) साधने की इच्छा करते हैं॥२॥
भावार्थभाषाः -जो अग्नि पवन और जो वायु अग्नि से प्रकाशित होता है, जो ये दोनों परस्पर आकाङ्क्षायुक्त अर्थात् सहायकारी हैं, जिनसे सूर्य्य प्रकाशित होता है, मनुष्य लोग जिनको साध और युक्ति के साथ नित्य क्रियाकुशलता में सम्प्रयोग करते हैं, जिनके सिद्ध करने से मनुष्य बहुत से सुखों को प्राप्त होते हैं, उनके जानने की इच्छा क्यों न करनी चाहिये॥२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्द्र और वायु का सोमपान [जितेन्द्रियता व क्रियाशीलता]
पदार्थान्वयभाषाः -१. (उभा देवा) - दोनों देवों (दिविस्पृशा) - प्रकाश में स्पर्श करनेवाले (इन्द्रवायू) - इन्द्र और वायु को (हवामहे) - हम पुकारते हैं , (अस्य सोमस्य पीतये) - इस सोम के पान के लिए । २. इन्द्र देवता बल का प्रतीक है । उसका बल इस कारण है कि वह सब देवों का राजा है , सब इन्द्रियों पर शासन करनेवाला है । इन्द्र की मौलिक भावना जितेन्द्रियता की ही है । जितेन्द्रियता सोमपान के लिए अत्यन्त आवश्यक है । अजितेन्द्रियता का सोमरक्षण से क्या सम्बन्ध? ३. 'वायु' - [वा गतिगन्धनयोः] गतिशीलता का प्रतीक है । निरन्तर गति से वह बुराई का गन्धन व संहार करता है । जो मनुष्य सदा क्रियामय जीवनवाला होता है उसमें ही वासनाओं के उत्पन्न होने की आशंका नहीं होती , परिणामतः वह अपने सोम की रक्षा कर पाता है । ४. इस प्रकार इन्द्र और वायु मनुष्य को सोमपान के योग्य बनाते हैं । इस सोम के रक्षण से मनोवृत्तियाँ दिव्य बनती हैं , अतः ये 'इन्द्र और वायु देव' कहलाते हैं । सोम शरीर की अन्तर्वेदि - मस्तिष्क की ओर प्रस्थित हुआ - हुआ ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और परिणामतः मनुष्य ज्ञान को स्पर्श करनेवाला होता है , अतः इन्द्र और वायु "दिवस्पृश्' है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम जितेन्द्रिय व क्रियाशील बनकर शरीर में सोम का रक्षण करें ताकि हमारी वृत्तियाँ दिव्य हों और हम ज्ञानदीप्त बनें ।
देवता: इन्द्रवायू ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
इ॒न्द्र॒वा॒यू म॑नो॒जुवा॒ विप्रा॑ हवन्त ऊ॒तये॑।
स॒ह॒स्रा॒क्षा धि॒यस्पती॑॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
indravāyū manojuvā viprā havanta ūtaye | sahasrākṣā dhiyas patī ||
पद पाठ
इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑। म॒नः॒ऽजुवा॑। विप्राः॑। ह॒व॒न्ते॒। ऊ॒तये॑। स॒ह॒स्र॒ऽअ॒क्षा। धि॒यः। पती॒ इति॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:3 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:3
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(विप्राः) विद्वान् लोग (ऊतये) क्रियासिद्धि की इच्छा के लिये जो (सहस्राक्षा) जिन से असंख्यात अक्ष अर्थात् इन्द्रियवत् साधन सिद्ध होते (धियः) शिल्प कर्म के (पती) पालने और (मनोजुवा) मन के समान वेगवाले हैं, उन (इन्द्रवायू) विद्युत् और पवन को (हवन्ते) ग्रहण करते हैं, उनके जानने की इच्छा अन्य लोग भी क्यों न करें॥३॥
भावार्थभाषाः -विद्वानों को उचित है कि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये असंख्यात व्यवहारों को सिद्ध करानेवाले वेग आदि गुणयुक्त बिजुली और वायु के गुणों की क्रियासिद्धि के लिये अच्छे प्रकार सिद्धि करनी चाहिये॥३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ज्ञान व ज्ञानपूर्वक कार्य
पदार्थान्वयभाषाः -१. (विप्रा) - विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले मेधावी लोग (मनोजुवा) - मन के समान वेगवाले अथवा मन को सदा उत्तम प्रेरणा देनेवाले (इन्द्रवायू) - इन्द्र और वायुदेव को (ऊतये) - रक्षा के लिए (हवन्ते) - पुकारते हैं । इन्द्र और वायु के पुकारने का अभिप्राय है - 'जितेन्द्रिय व क्रियाशील' बनने का निश्चय व दृढ़ संकल्प । ये दोनों भावनाएँ मनुष्य को सदा उत्तम मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं । इनके कारण मनुष्य आलस्य से शून्य तथा अत्यन्त वेगसम्पन्न बना रहता है । २. ये इन्द्र और वायु (सहस्त्राक्षा) - अनन्त आँखोंवाले , अर्थात् अत्यधिक ज्ञानवाले तथा (धियस्पती) - ज्ञानपूर्वक किये जानेवाले कर्मों के पति हैं । जितेन्द्रियता ज्ञानवृद्धि का कारण बनती है और वायु की आराधना मनुष्य को सदा कर्मों में व्याप्त रहने का उपदेश करती है । 'इन्द्र' का उपासक मूर्ख नहीं होता तथा वायु का आराधक अकर्मण्य नहीं हो सकता । ये ज्ञान और कर्म हमारा पूरण करते हैं , हमें विप्र बनाते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम इन्द्र और वायु के उपासक बनकर अत्यधिक ज्ञानवाले व ज्ञानपूर्वक कर्मों को करनेवाले बनें ।
देवता: मित्रावरुणौ ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
मि॒त्रं व॒यं ह॑वामहे॒ वरु॑णं॒ सोम॑पीतये।
ज॒ज्ञा॒ना पू॒तद॑क्षसा॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
mitraṁ vayaṁ havāmahe varuṇaṁ somapītaye | jajñānā pūtadakṣasā ||
पद पाठ
मि॒त्रम्। व॒यम्। ह॒वा॒म॒हे॒। वरु॑णम्। सोम॑ऽपीतये। ज॒ज्ञा॒ना। पू॒तऽद॑क्षसा॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:4 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:4
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
इस विद्या के प्राप्त करानेवाले प्राण और उदान हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(वयम्) हम पुरुषार्थी लोग जो (सोमपीतये) जिसमें सोम अर्थात् अपने अनुकूल सुखों को देनेवाले रसयुक्त पदार्थों का पान होता है, उस व्यवहार के लिये (पूतदक्षसा) पवित्र बल करनेवाले (जज्ञाना) विज्ञान के हेतु (मित्रम्) जीवन के निमित्त बाहर वा भीतर रहनेवाले प्राण और (वरुणम्) जो श्वासरूप ऊपर को आता है, उस बल को करनेवाले उदान वायु को (हवामहे) ग्रहण करते हैं, उनको तुम लोगों को भी क्यों न जानना चाहिये॥२॥
भावार्थभाषाः -मनुष्यों को प्राण और उदान वायु के विना सुखों का भोग और बल का सम्भव कभी नहीं हो सकता, इस हेतु से इनके सेवन की विद्या को ठीक-ठीक जानना चाहिये॥४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मित्र और वरुण का सोमपान [स्नेह व अद्वेष]
पदार्थान्वयभाषाः -१. (वयम्) - हम (मित्रम्) - स्नेह के देवता को तथा (वरुणम्) - द्वेषनिवारण के देवता को (सोमपीतये) - सोम के पान के लिए (हवामहे) - पुकारते हैं । वस्तुतः स्नेह व अद्वेष - ये सोम की रक्षा के लिए आवश्यक हैं । 'स्नेह' विकृत होकर काम हो जाता है , द्वेष विकृत होकर 'क्रोध' हो जाता है । काम और क्रोध सोम का सर्वाधिक विनाश करनेवाले हैं । काम और क्रोध की अग्नि में सोम भस्म हो जाता है । सोम को नष्ट करके काम - क्रोध हमें भी नष्ट कर देते हैं । २. यदि मित्र और वरुण की आराधना से हम काम व क्रोध को जीत लेते हैं तो ये स्नेह व अद्वेष (जज्ञाना) - हमारी शक्तियों का प्रादुर्भाव करनेवाले होते हैं और (पूतदक्षसा) - हमें शुद्ध बलवाला बनाते हैं । ३. इस प्रकार यह बात स्पष्ट है कि जैसे सोम के रक्षण के लिए जितेन्द्रियता व क्रियाशीलता आवश्यक थी [मन्त्र संख्या २] उसी प्रकार प्रस्तुत मन्त्र के अनुसार सोम के रक्षण के लिए 'स्नेह व अद्वेष' भी आवश्यक हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम स्नेह व अद्वेष के उपासक बनकर काम - क्रोध से ऊपर उठे और अपनी शक्ति की रक्षा करनेवाले बनें ।
देवता: मित्रावरुणौ ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
ऋ॒तेन॒ यावृ॑ता॒वृधा॑वृ॒तस्य॒ ज्योति॑ष॒स्पती॑।
ता मि॒त्रावरु॑णा हुवे॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ṛtena yāv ṛtāvṛdhāv ṛtasya jyotiṣas patī | tā mitrāvaruṇā huve ||
पद पाठ
ऋ॒तेन॑। यौ। ऋ॒त॒ऽवृधौ॑। ऋ॒तस्य॑। ज्योति॑षः। पती॒ इति॑। ता। मि॒त्रावरु॑णा। हु॒वे॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:5 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:5
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -मैं (यौ) जो (ऋतेन) परमेश्वर ने उत्पन्न करके धारण किये हुए (ऋतावृधौ) जल को बढ़ाने और (ऋतस्य) यथार्थ स्वरूप (ज्योतिषः) प्रकाश के (पती) पालन करनेवाले (मित्रावरुणौ) सूर्य और वायु हैं, उनको (हुवे) ग्रहण करता हूँ॥५॥
भावार्थभाषाः -न सूर्य और वायु के विना जल और ज्योति अर्थात् प्रकाश की योग्यता, न ईश्वर के उत्पादन किये विना सूर्य्य और वायु की उत्पत्ति का सम्भव और न इनके विना मनुष्यों के व्यवहारों की सिद्धि हो सकती है॥५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ऋत+ज्योतिः
पदार्थान्वयभाषाः -१. मैं (ता) - उन (मित्रावरुणा) - मित्र और वरुण को , स्नेह व अद्वेष को (हुवे) - पुकारता हैं , (यौ) - जो (ऋतेन) - ठीक समय व ठीक स्थान पर कार्य करने से (ऋतावृधौ) - मुझमें ऋत का वर्धन करनेवाले हैं - मेरे जीवन में सत्य के पनपाने का कारण बनते हैं और (ऋतस्य) - सत्य के तथा (ज्योतिषः) - ज्ञान के (पती) - रक्षक हैं । २. जिस समय मनुष्य अपने व्यवहारों को स्नेह व अद्वेषपूर्वक करता है उस समय उसके जीवन में [क] ऋत होता है - उसके सब कार्य समय व स्थान की दृष्टि से ठीक होते हैं , उसके जीवन में व्यवस्था होती है । [ख] इस व्यवस्था के कारण उसमें ऋत का , सत्य का व यज्ञ का वर्धन होता है । उसके कार्य सत्य होते है , सत्य कार्य वे होते हैं जो यज्ञात्मक हैं - अधिक - से - अधिक भूतों - प्राणियों का हित करनेवाले हैं । यद् भूतहितमत्यन्तं तत्सत्यमिति धारणा [महाभारत] । [ग] व्यवस्था व सत्य को धारण करनेवाला यह पुरुष सत्य व ज्ञान का पति बनता है । उसके मन में 'सत्य' की स्थिति होती है और मस्तिष्क में 'ज्ञान' की ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम मित्र व वरुण की आराधना करें - स्नेह व अद्वेष को जीवन का सूत्र बनाएँ । ऐसा करने पर हमारे जीवनों में [क] व्यवस्था [ख] यज्ञात्मक कर्म [ग] सत्य व [घ] ज्ञान का परितोषण होगा । हम अनृत को छोड़ सत्य को अपना रहे होंगे ।
देवता: मित्रावरुणौ ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
वरु॑णः प्रावि॒ता भु॑वन्मि॒त्रो विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑।
कर॑तां नः सु॒राध॑सः॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
varuṇaḥ prāvitā bhuvan mitro viśvābhir ūtibhiḥ | karatāṁ naḥ surādhasaḥ ||
पद पाठ
वरु॑णः। प्र॒ऽअ॒वि॒ता। भु॒व॒त्। मि॒त्रः। विश्वा॑भिः। ऊ॒तिऽभिः॑। कर॑ताम्। नः॒। सु॒ऽराध॑सः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:6 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:9» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:6
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे यह अच्छे प्रकार सेवन किया हुआ (वरुणः) बाहर वा भीतर रहनेवाला वायु (विश्वाभिः) सब (ऊतिभिः) रक्षा आदि निमित्तों से सब प्राणि या पदार्थों को करके (प्राविता) सुख प्राप्त करनेवाला (भुवत्) होता है (मित्रश्च) और सूर्य्य भी जो (नः) हम लोगों को (सुराधसः) सुन्दर विद्या और चक्रवर्त्ति राज्यसम्बन्धी धनयुक्त (करताम्) करते हैं, जैसे विद्वान् लोग इन से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे हम लोग भी इसी प्रकार इन का सेवन क्यों न करें॥६॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसलिये इन उक्त वायु और सूर्य के आश्रय करके सब पदार्थों के रक्षा आदि व्यवहार सिद्ध होते हैं, इसलिये विद्वान् लोग भी इनसे बहुत कार्य्यों को सिद्ध करके उत्तम-उत्तम धनों को प्राप्त होते हैं॥६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अद्वेष व स्नेह
पदार्थान्वयभाषाः -१. (वरुणः) - द्वेष - निवारण का देवता , अद्वेष की भावना (प्राविता) - प्रकर्षण रक्षक (भुवत्) - हो , अर्थात् इस जीवन - यज्ञ में द्वेष से ऊपर उठकर हम अपनी शक्तियों का रक्षण करनेवाले बने , द्वेषाग्नि में हम जलते न रहें । २. (मित्रः) - स्नेह का देवता , सबके प्रति स्नेह की भावना (विश्वाभिः ऊतिभिः) - सब प्रकार के रक्षणों के द्वारा हमें सुरक्षित करे । स्नेह के कारण शक्ति का वर्धन होता है । अद्वेष से शक्ति नष्ट नहीं होती , स्नेह से वह शक्ति बढ़ती है । इस प्रकार से वरुण व मित्र अद्वेष व स्नेह (नः) - हमें (सुराधसः) उत्तम सम्पत्तियोंवाले अथवा उत्तम सफलताओंवाले (करताम्) - करें । इस संसार में द्वेष से ऊपर उठकर स्नेह से बरतते हुए ही हम उत्तम साफल्य को प्राप्त कर सकते हैं । मनुजी ने 'शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्सह' - 'सुखे वैर और विवाद को किसी के साथ न करें इन शब्दों में ऐहिक व आमुष्मिक उन्नति के सुन्दर सूत्र का संकेत किया है । 'अद्वेषे द्यावापृथिवी हुवेम' इस वैदिक सूक्ति में भी यही कहा है कि 'संसार में किसी से द्वेष न करो' । हीन स्थितिवाले पर भी करुणा ही करनी है , क्रूरदृष्टि नहीं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम अद्वेष व स्नेह को अपनाकर अपनी शक्तियों का रक्षण करें और उत्तम साफल्य को सिद्ध करें ।
देवता: इन्द्रोमरुत्वान् ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
म॒रुत्व॑न्तं हवामह॒ इन्द्र॒मा सोम॑पीतये।
स॒जूर्ग॒णेन॑ तृम्पतु॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
marutvantaṁ havāmaha indram ā somapītaye | sajūr gaṇena tṛmpatu ||
पद पाठ
म॒रुत्व॑न्तम्। ह॒वा॒म॒हे॒। इन्द्र॒म्। आ। सोम॑ऽपीतये। स॒ऽजूः। ग॒णेन॑। तृ॒म्प॒तु॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:7 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:9» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:7
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में वायु के सहचारी इन्द्र के गुण उपदेश किये हैं-
पदार्थान्वयभाषाः -हे मनुष्य लोगो ! जैसे इस संसार में हम लोग (सोमपीतये) पदार्थों के भोगने के लिये जिस (मरुत्वन्तम्) पवनों के सम्बन्ध से प्रसिद्ध होनेवाली (इन्द्रम्) बिजुली को (हवामहे) ग्रहण करते हैं (सजूः) जो सब पदार्थों में एकसी वर्तनेवाली (गणेन) पवनों के समूह के साथ (नः) हम लोगों को (आतृम्पतु) अच्छे प्रकार तृप्त करती है, वैसे उसको तुम लोग भी सेवन करो॥७॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जिस सहायकारी पवन के विना अग्नि कभी प्रज्वलित होने को समर्थ और उक्त प्रकार बिजुली रूप अग्नि के विना किसी पदार्थ की बढ़ती का सम्भव नहीं हो सकता, ऐसा जानें॥७॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मरुत्वान् इन्द्र
पदार्थान्वयभाषाः -१. आध्यात्मिक प्रकरण में 'इन्द्र' जीवात्मा है और 'मरुत्' प्राण हैं । आधिदैविक जगत् में 'इन्द्र' सूर्य था और 'मरुतः' वायुएँ थीं । आधिभौतिक क्षेत्र में 'इन्द्र' राजा है और 'मरुत्' उसके सैनिक । जैसे राजा सैनिकों के द्वारा ही विजय प्राप्त करता है और जैसे सूर्य विविध वायुओं के प्रकारों से ही शोधन व प्राणसंचार का कार्य करता है उसी प्रकार जीवात्मा भी प्राणसाधना से ही वासनाओं पर विजय पाता है । २. इसलिए मन्त्र में कहते हैं कि (मरुत्वन्तम् इन्द्रम्) - प्राणापानोंवाले इन्द्र को - जितेन्द्रिय पुरुष को (सोमपीतये) - सोम के पान के लिए , शरीर में ही शक्ति के संरक्षण के लिए (आ , हवामहे) - सब प्रकार से पुकारते हैं , अर्थात् हमारी एक ही कामना है कि हम जितेन्द्रिय बनकर प्राणसाधना द्वारा वासनाओं पर विजय पाएँ और सोम का नाश न होने दें । यह 'इन्द्र' (गणेन) - मरुतों के गण के (सजूः) - साथ प्रीतिपूर्वक उत्तम कर्मों का सेवन करता हुआ (तृम्पतु) - सोम के पान से तृप्ति का अनुभव करे - जीवन में आनन्द प्राप्त करे । वस्तुतः इन प्राणों की साधना के बिना सोमपान सम्भव भी तो नहीं । सोमपान तो जब भी होगा , इनके साथ ही होगा ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम प्रशस्त प्राणोंवाले बनें । इस प्राणगण के साथ शरीर में सोम का रक्षण करते हुए तृप्ति का अनुभव करें ।
देवता: इन्द्रोमरुत्वान् ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
इन्द्र॑ज्येष्ठा॒ मरु॑द्गणा॒ देवा॑सः॒ पूष॑रातयः।
विश्वे॒ मम॑ श्रुता॒ हव॑म्॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
indrajyeṣṭhā marudgaṇā devāsaḥ pūṣarātayaḥ | viśve mama śrutā havam ||
पद पाठ
इन्द्र॑ऽज्येष्ठाः। मरु॑त्ऽगणाः। देवा॑सः। पूष॑ऽरातयः। विश्वे॑। मम॑। श्रु॒त॒। हव॑म्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:8 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:8
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब वे पवनों के समूह किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -जो (पूषरातयः) सूर्य्य के सम्बन्ध से पदार्थों को देने (इन्द्रज्येष्ठाः) जिनके बीच में सूर्य्य बड़ा प्रशंसनीय हो रहा है और (देवासः) दिव्य गुणवाले (विश्वे) सब (मरुद्गणाः) पवनों के समूह (मम) मेरे (हवम्) कार्य्य करने योग्य शब्द व्यवहार को (श्रुत) सुनाते हैं, वे ही आप लोगों को भी॥८॥
भावार्थभाषाः -कोई भी मनुष्य जिन पवनों के विना कहना, सुनना और पुष्ट होनादि व्यवहारों को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता। जिन के मध्य में सूर्य्य लोक सब से बड़ा विद्यमान, जो इसके प्रदीपन करानेवाले हैं, जो यह सूर्य्य लोक अग्निरूप ही है, जिन और जिस बिजुली के विना कोई भी प्राणी अपनी वाणी के व्यवहार करने को भी समर्थ नहीं हो सकता, इत्यादि इन सब पदार्थों की विद्या को जान के मनुष्यों को सदा सुखी होना चाहिये॥८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'देवासः पूषरातयः'
पदार्थान्वयभाषाः -१. प्रभु कहते हैं कि हे (इन्द्रज्येष्ठाः) - इन्द्र जिनमें श्रेष्ठ है ऐसे (मरुद्गणाः) - प्राणसमूहो ! (विश्वे) - तुम सब (मम) - मेरी (हवम्) - इस पुकार को - आवाज को (श्रुत) - सुनो । (देवासः) - तुम्हें देव बनना है , (पूषरातयः) - दान को पोषण करनेवाला बनना है 'पूषा रातिर्येषाम्' - जिनका दान निरन्तर बढ़ रहा है , ऐसा बनना है और दानवृत्ति को बढ़ाते हुए 'पूषराति' होना है । 'अरातित्व' न देने की वृत्ति हमारी सब दिव्यताओं को समाप्त कर देती है । लोभ सब व्यसनों को पनपानेवाला होता है । 'असुर अपने ही मुख में आहुति देते हैं - वे कभी किसी दूसरे को नहीं खिलाते । यह अदान ही उनके असुरत्व का कारण है । वे देते तो देव बन जाते । देव क्या बन जाते , देव तो वे थे ही , 'पूर्वदेवाः ' उनका नाम ही है - देते रहते तो असुर न बनते । 'देवासः पूषरातयः' देव निरन्तर दान व पोषण करते हैं । देव यही प्रार्थना करते हैं कि - 'यथा नः सर्व इज्जनः संगत्यां सुमना असद् दानकामश्च नो भुवत्' - हे प्रभो ! ऐसी कृपा कीजिए कि हमारे परिवार के सभी व्यक्ति सत्संग से उत्तम मनवाले हों और हमारे ये पुरुष सदा दानवृत्तिवाले हों ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्राणसाधक जितेन्द्रिय पुरुष को प्रभु का आदेश है कि दानवृत्ति का पोषण करते हुए देव बने रहो ।
देवता: इन्द्रोमरुत्वान् ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
ह॒त वृ॒त्रं सु॑दानव॒ इन्द्रे॑ण॒ सह॑सा यु॒जा।
मा नो॑ दुः॒शंस॑ ईशत॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
hata vṛtraṁ sudānava indreṇa sahasā yujā | mā no duḥśaṁsa īśata ||
पद पाठ
ह॒त। वृ॒त्रम्। सु॒ऽदा॒न॒व॒। इन्द्रे॑ण। सह॑सा। यु॒जा। मा। नः॒। दुः॒ऽशंसः॑। ई॒श॒त॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:9 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:9
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे विद्वान् लोगो ! आप जो (सुदानवः) उत्तम पदार्थों को प्राप्त कराने (सहसा) बल और (युजा) अपने आनुषङ्गी (इन्द्रेण) सूर्य्य वा बिजुली के साथी होकर (वृत्रम्) मेघ को (हत) छिन्न-भिन्न करते हैं, उनसे (नः) हम लोगों के (दुःशंसः) दुःख करानेवाले (मा) (ईशत) कभी मत हूजिये॥९॥
भावार्थभाषाः -हम लोग ठीक पुरुषार्थ और ईश्वर की उपासना करके विद्वानों की प्रार्थना करते हैं कि जिससे हम लोगों को जो पवन, सूर्य्य की किरण वा बिजुली के साथ मेघमण्डल में रहनेवाले जल को छिन्न-भिन्न और वर्षा करके और फिर पृथिवी से जलसमूह को उठाकर ऊपर को प्राप्त करते हैं, उनकी विद्या मनुष्यों को प्रयत्न से अवश्य जाननी चाहिये॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सुदानु
पदार्थान्वयभाषाः -१. प्रभु कहते हैं कि हे (सुदानवः) - दान के उत्तम गुण से युक्त मरुद्गणो ! (सहसा) - सहनशक्ति के पुञ्ज तुम (इन्द्रेण युजा) - जितेन्द्रिय पुरुष के साथ मिलकर (वृत्रम्) - ज्ञान पर आवरण बने हुए इस काम को (हत) - नष्ट कर दो । जितेन्द्रिय पुरुष शक्ति का पुञ्ज तो बनता ही है , अतः उसे 'सहस्' कहा है । यह प्राणसाधना करके सब वासनाओं को दग्ध करता है । इसके जीवन में वासनाओं के शिरोमणि वृत्र का संहार हो जाता है , परन्तु यह होता तभी है जब मनुष्य 'सुदानु' बना रहता है । शोभन दान के गुण से युक्त होकर ही यह वृत्र का विनाश करता है । 'सुदानु' के दोनों ही अर्थ हैं - [क] उत्तम देनेवाला , [ख] उत्तमता से शत्रुओं को काटनेवाला [दाप् लवने] । २. सुदानु कहता है कि इस वृत्र के विनाश होने पर (दुःशंस) - कोई भी दुःशंस पुरुष , बुराई को अच्छाई के रूप में चित्रित करनेवाला व्यक्ति (नः) - हमारा (मा ईशत) - शासन करनेवाला न हो । हम उसकी बातों में आकर बुराई को स्वीकार न कर लें ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्रभु का आदेश है कि हम 'काम' का विध्वंस करें , जिससे कोई दुः शंस व्यक्ति हमें बहकाकर धर्मविचलित न कर दे ।
देवता: विश्वेदेवा: ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
विश्वा॑न्दे॒वान्ह॑वामहे म॒रुतः॒ सोम॑पीतये।
उ॒ग्रा हि पृश्नि॑मातरः॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
viśvān devān havāmahe marutaḥ somapītaye | ugrā hi pṛśnimātaraḥ ||
पद पाठ
विश्वा॑न्। दे॒वान्। ह॒वा॒म॒हे॒। म॒रुतः॑। सोम॑ऽपीतये। उ॒ग्राः। हि। पृश्नि॑ऽमातरः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:10 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:10
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -विद्या की इच्छा करनेवाले हम लोग (हि) जिस कारण से जो ज्ञान क्रिया के निमित्त से शिल्प व्यवहारों को प्राप्त करानेवाले (उग्राः) तीक्ष्णता वा श्रेष्ठ वेग के सहित और (पृश्निमातरः) जिनकी उत्पत्ति का निमित्त आकाश वा अन्तरिक्ष है, इससे उन (विश्वान्) सब (देवान्) दिव्यगुणों के सहित उत्तम गुणों के प्रकाश करानेवाले वायुओं को (हवामहे) उत्तम विद्या की सिद्धि के लिये जानना चाहते हैं॥१०॥
भावार्थभाषाः -जिससे यह वायु आकाश ही से उत्पन्न आकाश में आने-जाने और तेज स्वभाववाले हैं, इसी से विद्वान् लोग कार्य्य के अर्थ इनका स्वीकार करते हैं॥१०॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
तेजस्विता व ज्ञानदीप्ति
पदार्थान्वयभाषाः -१. हम अपने जीवनों में (सोमपीतये) - सोम के पान के लिए , अर्थात् शरीर में वीर्य की रक्षा के लिए (विश्वान् देवान्) - सब दिव्यगुणों को (हवामहे) - पुकारते हैं । राक्षसीभाव ही सोम के विनाशक होते हैं । २. इन देवों में हम विशेषकर (मरुतः) - मरुतों को (हवामहे) - पुकारते हैं । शरीर में प्राण ही मरुत हैं । इन प्राणों को पुकारने का अभिप्राय "प्राणों की साधना" से है । मैं नियमपूर्वक प्राणसाधना व प्राणायाम करता हूँ । यह प्राणसाधना मुझे ऊध्वरेतस् बनाती है । ३. इस ऊर्ध्वरेतस् बनने से मेरी शक्ति भी बढ़ती है और ज्ञान का प्रकाश भी , अतः मन्त्र में कहते हैं कि ये मरुत् (उग्राः) - तेजस्वी हैं तथा (हि) - निश्चय से (पृश्निमातरः) - उस हृदयान्तरिक्ष के निर्माण करनेवाले हैं जोकि 'संस्रष्टाभासं ज्योतिषाम्' [निरु० २/१५] विविध ज्ञानों की दीप्ति से युक्त है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम दिव्यगुणों को धारण करें । विशेषतः प्राणसाधना अवश्य करें । इन प्राणों के सहाय्य से ही हम ऊर्ध्वरेतस् बनते हैं और इस प्रकार ये प्राण हमें तेजस्वी व विज्ञान - दीप्तिमय हृदय - अन्तरिक्षवाला बनाते हैं ।
देवता: विश्वेदेवा: ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
जय॑तामिव तन्य॒तुर्म॒रुता॑मेति धृष्णु॒या।
यच्छुभं॑ या॒थना॑ नरः॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
jayatām iva tanyatur marutām eti dhṛṣṇuyā | yac chubhaṁ yāthanā naraḥ ||
पद पाठ
जय॑ताम्ऽइव। त॒न्य॒तुः। म॒रुता॑म्। ए॒ति॒। धृ॒ष्णु॒ऽया। यत्न। शुभ॑म्। या॒थन॑। न॒रः॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:11 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:10» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:11
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में पवन और बिजुली के गुण उपदेश किये हैं-
पदार्थान्वयभाषाः -हे (नरः) धर्मयुक्त शिल्पविद्या के व्यवहारों को प्राप्त करनेवाले मनुष्यो ! आप लोग भी (जयतामिव) जैसे विजय करनेवाले योद्धाओं के सहाय से राजा विजय को प्राप्त होता और जैसे (मरुताम्) पवनों के संग से (धृष्णुया) दृढ़ता आदि गुणयुक्त (तन्यतुः) अपने वेग को अति शीघ्र विस्तार करनेवाली बिजुली मेघ को जीतती है, वैसे (यत्) जितना (शुभम्) कल्याणयुक्त सुख है, उस सबको प्राप्त हूजिये॥११॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् लोग शूरवीरों को सेना से शत्रुओं के विजय वा जैसे पवनों के घिसने से बिजुली के यन्त्र को चलाकर दूरस्थ देशों को जा वा आग्नेयादि अस्त्रों की सिद्धि को करके सुखों को प्राप्त होते हैं, वैसे ही तुमको भी विज्ञान वा पुरुषार्थ करके इनसे व्यावहारिक और पारमार्थिक सुखों को निरन्तर बढ़ाना चाहिये॥११॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मरुतों की गर्जना
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में प्राणायाम के महत्व का कुछ उल्लेख था । जिस समय प्राणायाम करते हैं उस समय (मरुताम्) - प्राणों की (तन्यतुः) - ध्वनि इस प्रकार होती है (इव) - जैसे (जयताम्) - विजयी सैनिकों की ध्वनि हो । जैसे विजेता शत्रुओं पर विजय पाते हैं , उसी प्रकार ये मरुत् भी वासनाओं पर विजय पाते हैं । २. इनकी यह ध्वनि भी (धृष्णुया) - धार्ष्ट्ययुक्त होती हुई (एति) - प्राप्त होती है । इनकी ध्वनि से भी शत्रुओं का धर्षण होता है । रेचक प्राणायाम में जोर से श्वास को बाहर फेंकते समय जो ध्वनि होती है उस समय श्वास के बाहर होने के साथ वासनाएँ भी बाहर फेंक दी जाती हैं । श्वास - प्रश्वास की ध्वनि से ही ये काम - क्रोधादि शत्रु भयभीत हो भाग उठते हैं । ३. यह वह समय होता है (यत्) - जब (नरः) - हे मनुष्यो । आप लोग (शुभं याथन) - शुभ मार्ग पर ही चलते हो । प्राणसाधना से इन्द्रियों के दोष दग्ध होकर उनकी वृत्ति शान्त बन जाती है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्राणसाधना में श्वास - प्रश्वास का शब्द भी कामादि शत्रुओं का धर्षण कर उन्हें दूर भगा देता है और हम शुभ मार्ग से जीवन - यात्रा में आगे बढ़ते हैं ।
देवता: विश्वेदेवा: ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
ह॒स्का॒राद्वि॒द्युत॒स्पर्यतो॑ जा॒ता अ॑वन्तु नः।
म॒रुतो॑ मृळयन्तु नः॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
haskārād vidyutas pary ato jātā avantu naḥ | maruto mṛḻayantu naḥ ||
पद पाठ
ह॒स्का॒रात्। वि॒ऽद्युतः॑। परि॑। अतः॑। जा॒ताः। अ॒व॒न्तु॒। नः॒। म॒रुतः॑। मृ॒ळ॒य॒न्तु॒। नः॒॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:12 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:10» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:12
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे पवन किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हम लोग जिस कारण (हस्कारात्) अति प्रकाश से (जाताः) प्रकट हुई (विद्युतः) जो कि चपलता के साथ प्रकाशित होती हैं, वे बिजली (नः) हम लोगों के सुखों को (अवन्तु) प्राप्त करती हैं। जिससे उन को (परि) सब प्रकार से साधते और जिससे (मरुतः) पवन (नः) हम लोगों को (मृळयन्तु) सुखयुक्त करते हैं (अतः) इससे उनको भी शिल्प आदि कार्यों में (परि) अच्छे प्रकार से साधें॥१२॥
भावार्थभाषाः -मनुष्य लोग जब पहिले वायु फिर बिजुली के अनन्तर जल पृथिवी और ओषधी की विद्या को जानते हैं, तब अच्छे प्रकार सुखों को प्राप्त होते हैं॥१२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
देदीप्यमान प्रकाश
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में शुभमार्ग पर चलने का उल्लेख है । अतः उस शुभ मार्ग पर चलने से (हस्कारात्) - दीप्ति को करनेवाले (विद्युतः) - विशेषेण दीप्यमान ज्ञानज्योति के (परि) - लक्ष्य से (जाताः) - प्रादुर्भूत हुए - हुए ये मरुत् (नः) - हमें (अवन्तु) - रक्षित करें । जब हम शुभ मार्ग पर चलते हैं तो हमारी प्राणशक्ति का विकास होता है । प्राणसाधना से हममें शुभ मार्ग पर चलने की वृत्ति उत्पन्न होती है और शुभमार्ग पर चलने से प्राणशक्ति का पोषण होता है । ये प्राण विकसित शक्तिवाले होकर सोमरक्षण के द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हैं । ज्ञानाग्नि की दीप्ति के द्वारा ये प्राण हमारा रक्षण करते हैं । २. ये रक्षण करनेवाले (मरुतः) - प्राण (नः) - हमें (मृळयन्तु) - सुखी करें । प्राणों के स्वास्थ्य पर ही सारा सुख निर्भर करता है । प्राणशक्ति की क्षीणता में ऐहिक व आमुष्मिक सब सुख समाप्त हो जाते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - प्राणशक्ति के विकास से ज्ञानदीप्ति की वृद्धि होती है और हमारा जीवन सुखमय होता है ।
देवता: पूषा ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
आ पू॑षञ्चि॒त्रब॑र्हिष॒माघृ॑णे ध॒रुणं॑ दि॒वः।
आजा॑ न॒ष्टं यथा॑ प॒शुम्॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ā pūṣañ citrabarhiṣam āghṛṇe dharuṇaṁ divaḥ | ājā naṣṭaṁ yathā paśum ||
पद पाठ
आ। पू॒ष॒न्। चि॒त्रऽब॑र्हिष॒म्। आघृ॑णे। ध॒रुण॑म्। दि॒वः। आ। अ॒ज॒। न॒ष्टम्। यथा॑। प॒शुम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:13 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:10» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:13
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में सूर्य्यलोक के गुण प्रकाशित किये हैं-
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे कोई पशुओं का पालनेवाला मनुष्य (नष्टम्) खो गये (पशुम्) गौ आदि पशुओं को प्राप्त होकर प्रकाशित करता है, वैसे यह (आघृणे) परिपूर्ण किरणों (पूषन्) पदार्थों को पुष्ट करनेवाला सूर्यलोक (दिवः) अपने प्रकाश से (चित्रबर्हिषम्) जिससे विचित्र आश्चर्य्यरूप अन्तरिक्ष विदित होता है (धरुणम्) धारण करनेहारे भूगोलों को (आज) अच्छे प्रकार प्रकाश करता है॥१३॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पशुओं को पालनेवाले अनेक काम करके, गो आदि पशुओं को पुष्ट करके, उनके दुग्ध आदि पदार्थों से मनुष्यों को सुखी करते हैं, वैसे ही यह सूर्य्यलोक चित्र-विचित्र लोकों से युक्त आकाश वा आकाश में रहनेवाले पदार्थों को, अपनी किरण वा आकर्षण शक्ति से पुष्ट करके प्रकाशित करता है॥१३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पूषा - आघृणि [शरीर में पुष्टि , मस्तिष्क में दीप्ति]
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्रों में प्राणसाधना के द्वारा शरीर में सोम के संयम से एक व्यक्ति शरीर से पुष्ट बनता है , अतः 'पूषा' होता है । यही मस्तिष्क में देदीप्यमान ज्ञानवाला होता है , अतः यह 'आघृणि' रश्मियुक्त बनता है । इसका अन्तिम उद्देश्य प्रभु को पाना ही होना चाहिए , अतः मन्त्र में कहते हैं - हे (पूषन्) - एक - एक अंग के पोषण को प्राप्त करनेवाले जीव ! (आघृणे) - सर्वतः देदीप्यमान ज्ञान की किरणोंवाले साधक ! तू (चित्रबर्हिषम्) - हृदयान्तरिक्ष को उत्तम संज्ञायुक्त करनेवाले [चित्रं बहिः यस्मात्] , (दिवः धरुणम्) - सम्पूर्ण प्रकाश के धारक , सर्वज्ञ प्रभु को (आ अज) - सर्वथा प्राप्त हो [अज - गतौ] । तेरे सम्पूर्ण प्रयत्न प्रभु - प्राप्ति के लिए हैं , यही तेरा ध्येय है । २. (यथा( - जैसे एक माता (नष्टं पशुम्) - अदृष्ट हुए - हुए पशु को तन , मन , धन से पूर्ण प्रयास से ढूंढने में लग जाती है उसी प्रकार तू भी उस सर्वद्रष्टा [पश्यतीति पशुः , अभिचाकशीति] प्रभु को जो तेरे हृदयक्षेत्र में ही कहीं विलुप्त हो गया है , दूँढने का प्रयत्न कर और उसे सर्वथा प्राप्त कर ही । तुझे उसे प्राप्त किये बिना शान्ति न मिले । तू उसकी प्राप्ति के लिए अविरतश्रमवाला बन [आ अज] । ३. वस्तुतः 'पूषन्' व 'आघृणे' - इन सम्बोधनों में प्रभु - प्राप्ति के उपायों का संकेत हो गया है । प्रभु को प्राप्त वही कर सकता है जो शरीर को सबल और मस्तिष्क को दीप्त बनाता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम 'पूषा व आघृणि' बनकर 'चित्रबर्हिष् व दिवो धरुण' प्रभु को प्राप्त करें ।
देवता: पूषा ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
पू॒षा राजा॑न॒माघृ॑णि॒रप॑गूळ्हं॒ गुहा॑ हि॒तम्।
अवि॑न्दच्चि॒त्रब॑र्हिषम्॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
pūṣā rājānam āghṛṇir apagūḻhaṁ guhā hitam | avindac citrabarhiṣam ||
पद पाठ
पू॒षा। राजा॑नम्। आघृ॑णिः। अप॑ऽगूळ्हम्। गुहा॑। हि॒तम्। अवि॑न्दत्। चि॒त्रऽब॑र्हिषम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:14 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:10» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:14
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में पूषन् शब्द से ईश्वर की सर्वज्ञता का प्रकाश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -जिससे यह (आघृणिः) पूर्ण प्रकाश वा (पूषा) जो अपनी व्याप्ति से सब पदार्थों को पुष्ट करता है, वह जगदीश्वर (गुहा) (हितम्) आकाश वा बुद्धि में यथायोग्य स्थापन किये हुए वा स्थित (चित्रबर्हिषम्) जो अनेक प्रकार के कार्य्य को करता (अपगूढम्) अत्यन्त गुप्त (राजानम्) प्रकाशमान प्राणवायु और जीव को (अविन्दत्) जानता है, इससे वह सर्वशक्तिमान् है॥१४॥
भावार्थभाषाः -जिस कारण जगत् का रचनेवाला ईश्वर सबको पुष्ट करने हारे हृदस्यस्थ प्राण और जीव को जानता है, इससे सबका जाननेवाला है॥१४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु - प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः -१. (पूषा) - अपनी शक्तियों का पोषण करनेवाला (आघृणि) - देदीप्यमान ज्ञान - रश्मियोंवाला साधक ही (अविन्दत्) - उस प्रभु को पाता है जोकि २. (राजानम्) - ज्ञान से देदीप्यमान हैं अथवा सारे ब्रह्माण्ड को शासित कर रहे हैं , (अपगूळ्हम्) - देदीप्यमान होते हुए भी जो हम सांसारिक विषयों में आसक्त पुरुषों से दूर छिपे हुए हैं , परन्तु 'गुहाहितम्' हैं , हमारी ही हृदयरूपी गुफा में छिपे हुए और वहाँ स्थित हुए (चित्रबर्हिषम्) - हमारे हृदयों को [चित्र] ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण व वासनाशून्य [उद्बर्हण - उत्पाटन] कर रहे हैं । ३. जब शक्ति व ज्ञान की साधना करते हुए हम 'पूषा व आघृणि' बनेंगे तब उस (गुहा हितम्) - हमारे ही अन्दर छिपकर बैठे हुए प्रभु को हम अवश्य पा सकेंगे और उस दिन हमारा हृदय संज्ञानवाला व वासनाओं से शून्य हो जाएगा ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - 'पूषा व आणि' बनकर हम उस प्रभु को प्राप्त करें जो 'राजा , अपगूढ , गुहाहितं और चित्रबर्हिष्' हैं ।
देवता: पूषा ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
उ॒तो स मह्य॒मिन्दु॑भिः॒ षड्यु॒क्ताँ अ॑नु॒सेषि॑धत्।
गोभि॒र्यवं॒ न च॑र्कृषत्॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
uto sa mahyam indubhiḥ ṣaḍ yuktām̐ anuseṣidhat | gobhir yavaṁ na carkṛṣat ||
पद पाठ
उ॒तो इति॑। सः। मह्य॑म्। इन्दु॑ऽभिः। षट्। यु॒क्तान्। अ॒नु॒ऽसेसि॑धत्। गोभिः॑। यव॑म्। न। च॒र्कृ॒ष॒त्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:15 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:10» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:15
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर अगले मन्त्र में उस ईश्वर ही के गुणों का उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे खेती करनेवाला मनुष्य हर एक अन्न की सिद्धि के लिये भूमि को (चर्कृषत्) वारंवार जोतता है (न) वैसे (सः) वह ईश्वर (मह्यम्) जो मैं धर्मात्मा पुरुषार्थी हूँ, उसके लिये (इन्दुभिः) स्निग्ध मनोहर पदार्थों और वसन्त आदि (षट्) छः (ऋतून्) ऋतुओं को (युक्तान्) (गोभिः) गौ, हाथी और घोड़े आदि पशुओं के साथ सुखसंयुक्त और (यवम्) यव आदि अन्न को (अनुसेषिधत्) वारंवार हमारे अनुकूल प्राप्त करे, इससे मैं उसी को इष्टदेव मानता हूँ॥१५॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य वा खेती करनेवाला किरण वा हल आदि से वारंवार भूमि को आकर्षित वा खन, बो और धान्य आदि की प्राप्ति कर सचिक्कनकर पदार्थों के सेवन के साथ वसन्त आदि छः ऋतुओं को सुखों से संयुक्त करता है, वैसे ईश्वर भी समय के अनुकूल सब जीवों को कर्मों के अनुसार रस को उत्पन्न वा ऋतुओं के विभाग से उक्त ऋतुओं को सुख देनेवाली करता है॥१५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
भक्त के जीवन की तीन बातें
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में पूषा व आघृणि बनकर प्रभु - प्राप्ति का संकेत हुआ था । जब मैं प्रभु को प्राप्त करूं तो (उत+उ) - और निश्चय से (सः) - वे प्रभु (मह्यम्) - मेरे लिए (इन्दुभिः) - ['सोमा वा इन्दुः' शत० २/२/३/२३] इन सोमकणों के द्वारा (षट्) - [यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह] मन से युक्त पाँच ज्ञानेन्द्रियों को जोकि (युक्तान्) - योगयुक्त व एकाग्र और स्थिर हो गई हैं , उनको (अनुसेषिधत्) - प्राप्त कराता है । प्रभु को प्राप्त करके ही मन व इन्द्रियाँ स्थिर होती हैं , उससे पूर्व तो वे भटकती ही रहती हैं । सान्त विषयों में इनके स्थिर होने का सम्भव ही नहीं । उन विषयों के आगे - पीछे को उन्होंने देखा , उन विषयों की नवीनता समाप्त हुई और ये उनसे हटकर अन्यत्र चली । प्रभु अनन्त हैं , वहाँ पहुँचकर न ये अन्त ही पाती हैं और न अन्यत्र जाने का प्रसंग आता है । यह इन्द्रियों की स्थिरता और पवित्रता सोम की रक्षा के द्वारा होती है । २. [न इति अर्थे । (न) - और वे प्रभु (गोभिः) - बैलों के द्वारा (यवम्) - यवादि धान्यों की (चर्कृषत्) - कृषि मुझसे कराते हैं , अर्थात् वे प्रभु मुझे ऐसी प्रेरणा देते हैं कि मैं कृषि को अपनाता हूँ और द्यूत से दूर भागता हूँ । 'अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व' - "पाशों से मत खेलो , खेती ही करो" - इस वेदोपदेश को मैं जीवन में अनुदित करता - घटाता हूँ । ३. यहाँ मन्त्रार्थ के उत्तरार्द्ध से यह बात स्पष्ट है कि [क] खेती बैलों से होनी ही ठीक है , ट्रैक्टर्स से नहीं । ऊबड़ - खाबड़ भूमि को ट्रैक्टर्स से एक बार ठीक बेशक कर लिया जाए , परन्तु उनके द्वारा सदा खेती करना उपयोगी नहीं । बैलों से खेती होने पर खेत छोटे - छोटे होते हैं , क्यारियों की मुंडेरों पर लगी झाड़ियों पर चिड़ियाँ आदि बसेरा करती हैं । ये खेती के विध्वंसक कीटों को समाप्त करके कृषि की रक्षा करती हैं । ट्रैक्टर्स से जुतनेवाले खेत मीलों - मील चले जाने से इन पक्षियों के लिए सुविधाजनक आश्रय प्राप्त नहीं होता , परिणामतः विध्वंसक कीटों से खेतियाँ नष्ट कर दी जाती हैं । बैलों से खेतों के जोते जाने पर स्वाभाविक खाद भी भूमि को मिलता रहता है । ट्रैक्टर्स से जोतने पर खेतों में कृत्रिम खादों की आवश्यकता होती है । [ख] दूसरी बात यह भी संकेतित हो रही है कि खेती जो इत्यादि उपयोगी धान्यों की ही होनी ठीक है , तम्बाकू आदि की नहीं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - उपासक का जीवन तीन बातों से युक्त होता है - [क] वह सोम की रक्षा करता है , [ख] इन्द्रियों व मन को प्रभु में स्थिर करता है , [ग] यवादि की कृषि करता हुआ जीविका का उपार्जन करता है । ये कर्षणि - चर्षणि ही प्रभु को प्यारे होते हैं ।
देवता: आपः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
अ॒म्बयो॑ य॒न्त्यध्व॑भिर्जा॒मयो॑ अध्वरीय॒ताम्।
पृ॒ञ्च॒तीर्मधु॑ना॒ पयः॑॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ambayo yanty adhvabhir jāmayo adhvarīyatām | pṛñcatīr madhunā payaḥ ||
पद पाठ
अ॒म्बयः॑। य॒न्ति॒। अध्व॑ऽभिः। जा॒मयः॑। अ॒ध्व॒रि॒ऽय॒ताम्। पृ॒ञ्च॒तीः। मधु॑ना। पयः॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:16 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:16
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अगले मन्त्र में जल के गुण प्रकाशित किये हैं-
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे भाइयों को (जामयः) भाई लोग अनुकूल आचरण सुख सम्पादन करते हैं, वैसे ये (अम्बयः) रक्षा करनेवाले जल (अध्वरीयताम्) जो कि हम लोग अपने आप को यज्ञ करने की इच्छा करते हैं, उनको (मधुना) मधुरगुण के साथ (पयः) सुखकारक रस को (अध्वभिः) मार्गों से (पृञ्चतीः) पहुँचानेवाले (यन्ति) प्राप्त होते हैं ॥१६॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बन्धुजन अपने भाई को अच्छी प्रकार पुष्ट करके सुख करते हैं, वैसे ये जल ऊपर-नीचे जाते-आते हुए मित्र के समान प्राणियों के सुखों का सम्पादन करते हैं और इनके विना किसी प्राणी वा अप्राणी की उन्नति नहीं हो सकती। इससे ये रस की उत्पत्ति के द्वारा सब प्राणियों को माता पिता के तुल्य पालन करते हैं॥१६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उन्नति+माधुर्य
पदार्थान्वयभाषाः -१. उल्लिखित मन्त्र के अनुसार जब मनुष्य कृषि आदि सात्त्विक कमों को अपनाता है तो इन (अध्वरीयताम्) - [अध्वर] हिंसाशून्य कर्मों को अपनानेवाले लोगों की (अम्बयः) - माताएँ तथा (जामयः) - बहिनें (अध्वभिः यन्ति) - मार्गों से चलती हैं , अर्थात् इनके घरों में सदाचरण बना रहता है , सबकी वृत्ति सुन्दर बनी रहती है । गीता [१/४१] में 'अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः' - इन शब्दों में कहा गया है कि 'अधर्म का प्राबल्य होने पर कुलीन स्त्रियाँ भी दूषित हो जाती हैं । परन्तु इन अध्वरों के अपनानेवाले लोगों के घरों में ऐसी आशंका नहीं रहती । इन अध्वरों के अपनानेवालों की माताएँ व बहिनें सदा मार्ग पर चलती हैं , मार्ग से विचलित नहीं होती । २. ये अपने जीवनों में (मधुना) - मधु के साथ (पयः) - दूध का (पृञ्चतीः) - सम्पर्क करती हुई होती हैं । इनका भोजन यवों के साथ दूध व शहद होता है । अथवा ये (पयः) - आप्यायन को - अपने वर्धन को , अपनी उन्नतियों को (मधुना पृञ्चतीः) - मधु से सम्पृक्त करती हुई होती हैं । उन्त्रत होकर ये मधुर बनी रहती हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - यज्ञशील पुरुषों की माताएँ व बहिनें सदा सुमार्ग से चलती हैं और अपनी उन्नति को माधुर्य से जोड़े रखती हैं । इनका भोजन यव , मधु व दूध आदि सात्त्विक पदार्थ होते हैं ।
देवता: आपः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
अ॒मूर्या उप॒ सूर्ये॒ याभि॑र्वा॒ सूर्यः॑ स॒ह।
ता नो॑ हिन्वन्त्वध्व॒रम्॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
amūr yā upa sūrye yābhir vā sūryaḥ saha | tā no hinvantv adhvaram ||
पद पाठ
अ॒मूः। याः। उप॑। सूर्ये॑। याभिः॑। वा॒। सूर्यः॑। स॒ह। ताः। नः॒। हि॒न्व॒न्तु॒। अ॒ध्व॒रम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:17 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:11» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:17
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे जल कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(याः) जो (अमूः) जल दृष्टिगोचर नहीं होते (सूर्य्ये) सूर्य वा इसके प्रकाश के मध्य में वर्त्तमान हैं (वा) अथवा (याभिः) जिन जलों के (सह) साथ (सूर्यः) सूर्यलोक वर्त्तमान है (ताः) वे (नः) हमारे (अध्वरम्) हिंसारहित सुखरूप यज्ञ को (उपहिन्वन्तु) प्रत्यक्ष सिद्ध करते हैं॥१७॥
भावार्थभाषाः -जो जल पृथिवी आदि मूर्त्तिमान् पदार्थों से सूर्य्य की किरणों करके छिन्न-भिन्न अर्थात् कण-कण होता हुआ सूर्य के सामने ऊपर को जाता है, वही ऊपर से वृष्टि के द्वारा गिरा हुआ पान आदि व्यवहार वा विमान आदि यानों में अच्छे प्रकार संयुक्त किया हुआ सुख बढ़ाता है॥१७॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सूर्यकिरणोंवाले जल
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र में खाने के पदार्थों में जौ , शहद व दूध का उल्लेख हुआ है । अब पेयरूप में जलों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि (ताः) - वे जल (नः) - हमारे (अध्वरम्) - इस हिंसाशून्य जीवन - यज्ञ को (हिन्वन्तु) - बढ़ानेवाले हों । (याः अमूः) - जो वे जल (उपसूर्य) - हमारे सूर्य के समीप हैं (वा) - या (याभिः सह) - जिनके साथ (सूर्यः) - सूर्य है , अर्थात् वे जल हमें प्राप्त हों जो सूर्य - किरणों के सम्पर्क में रहते हैं । ऐसे जलों में प्राणदायी तत्त्वों की अधिकता का होना स्वाभाविक है । २. 'उपसूर्य' शब्द मेघ के जलों की ओर भी निर्देश करता है । सूर्य - किरणों द्वारा अन्तरिक्ष में पहुँचकर जो जल बरसते हैं वे मेघजल 'अमृत' कहलाते हैं । ये हमारे जीवनों को एकदम नीरोग बनानेवाले हैं , अतएव 'अमृत' हैं । ये जल हमें प्राप्त होंगे तो इन सात्त्विक जलों के सेवन से हमारी वृत्ति भी सात्त्विक बनेगी और हमारा जीवन सचमुच 'अध्वर' होगा ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम सूर्यकिरणों के सम्पर्कवाले सात्त्विक जलों के प्रयोग से हिंसाशून्य जीवन - यज्ञवाले बनें ।
देवता: आपः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
अ॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये॒ यत्र॒ गावः॒ पिब॑न्ति नः।
सिन्धु॑भ्यः॒ कर्त्वं॑ ह॒विः॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
apo devīr upa hvaye yatra gāvaḥ pibanti naḥ | sindhubhyaḥ kartvaṁ haviḥ ||
पद पाठ
अ॒पः। दे॒वीः। उप॑। ह्व॒ये॒। यत्र॑। गावः॑। पिब॑न्ति। नः॒। सिन्धु॑ऽभ्यः। कर्त्व॑म्। ह॒विः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:18 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:11» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:18
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी वे जल किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -(यत्र) जिस व्यवहार में (गावः) सूर्य की किरणें (सिन्धुभ्यः) समुद्र और नदियों से (देवीः) दिव्यगुणों को प्राप्त करनेवाले (अपः) जलों को (पिबन्ति) पीती हैं, उन जलों को (नः) हम लोगों के (हविः) हवन करने योग्य पदार्थों के (कर्त्वम्) उत्पन्न करने के लिये मैं (उपह्वये) अच्छे प्रकार स्वीकार करता हूँ॥१८॥
भावार्थभाषाः -सूर्य की किरणें जितना जल छिन्न-भिन्न अर्थात् कण-कण कर वायु के संयोग से खैंचती हैं, उतना ही वहाँ से निवृत्त होकर भूमि और ओषधियों को प्राप्त होता है। विद्वान् लोगों को वह जल, पान, स्नान और शिल्पकार्य आदि में संयुक्त कर नाना प्रकार के सुख सम्पादन करने चाहिये॥१८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
गौवों के पान के लिए जल
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के (देवीः अपः) - दिव्य गुणोंवाले जलों को उस स्थान पर (उपह्वये) - पुकारते हैं (यत्र) - जहाँ (नः) - हमारी (गावः) - गौएँ (पिबन्ति) - इन जलों का पान करती हैं । स्थान - स्थान पर गौ आदि पशुओं के लिए शुद्ध जल पी सकने की व्यवस्था होनी ही चाहिए । वेद कहता है कि 'शुद्धा आपः सुप्रपाणो पिबन्ति' - हमारी गौएँ उत्तम पानस्थलों में शुद्ध जलों को पीनेवाली हों । जल का प्रभाव दूध पर निश्चित रूप से होना ही है , अतः उनके लिए शुद्ध जल का अत्यधिक महत्त्व है । २. 'गावः' शब्द का अर्थ 'भूमियाँ' भी है । हम जलों को (सिन्धुभ्यः) - नदियों व नहरों के द्वारा वहाँ पुकारते हैं (यत्र) - जहाँ कि (नः गावः) - हमारी भूमियाँ (हविः कर्त्वम्) - यज्ञिय अन्नों को उत्पन्न करने के लिए इनको (पिबन्ति) - पीती हैं । इन नहरों द्वारा भूमि की सिंचाई करके हम यज्ञिय अन्नों को उत्पन्न करते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - जलों को नहरों के द्वारा हम उन स्थलों में पहुँचाएँ जहाँ कि हमारी भूमियाँ इन जलों से सिक्त होकर हविरूप अन्नों को उत्पन्न करें तथा हम ऐसी व्यवस्था करें कि गौओं को शुद्धजल सुप्राप्य हो ।
देवता: आपः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: पुरउष्णिक् स्वर: ऋषभः
अ॒प्स्व१न्तर॒मृत॑म॒प्सु भे॑ष॒जम॒पामु॒त प्रश॑स्तये।
देवा॒ भव॑त वा॒जिनः॑॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
apsv antar amṛtam apsu bheṣajam apām uta praśastaye | devā bhavata vājinaḥ ||
पद पाठ
अ॒प्ऽसु। अ॒न्तः। अ॒मृत॑म्। अ॒प्ऽसु। भे॒ष॒जम्। अ॒पाम्। उ॒त। प्रऽश॑स्तये। देवाः॑। भव॑त। वा॒जिनः॑॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:19 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:11» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:19
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हे (देवाः) विद्वानो ! तुम (प्रशस्तये) अपनी उत्तमता के लिये (अप्सु) जलों के (अन्तः) भीतर जो (अमृतम्) मार डालनेवाले रोग का निवारण करनेवाला अमृतरूप रस (उत) तथा (अप्सु) जलों में (भेषजम्) औषध हैं, उनको जानकर (अपाम्) उन जलों की क्रियाकुशलता से (वाजिनः) उत्तम श्रेष्ठ ज्ञानवाले (भवत) हो जाओ॥१९॥
भावार्थभाषाः -हे मनुष्यो तुम अमृतरूपी रस वा ओषधिवाले जलों से शिल्प और वैद्यकशास्त्र की विद्या से उनके गुणों को जानकर कार्य्य की सिद्धि वा सब रोगों की निवृत्ति नित्य करो॥१९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
जलों में अमृतत्व
पदार्थान्वयभाषाः -१. (अप्सु अन्तः) - जलों में (अमृतम्) - अमृतत्व है , (अप्सु) - जलों में (भेषजम्) - औषध है अर्थात् जलों के ठीक प्रयोग से मनुष्य दीर्घजीवी - सौ वर्ष तक जीनेवाला बनता है और इन जलों के द्वारा सब रोगों का निवारण हो सकता है । इनका तो नाम ही वारि [रोगानिवारयति] है - ये रोगों को दूर करते हैं । वेद में इनका नाम 'भेषज' भी है - ये औषध हैं । २. (उत) - और (अपाम्) - इन जलों के (प्रशस्तये) - [प्रशस्तिभिः - अथर्व०] प्रशंसनीय गुण - धर्मों से (देवाः) - देव (वाजिनः) - शक्तिशाली (भवत) - होते हैं । देव इन जलों का ठीक रूप से प्रयोग करते हैं । उनके लिए मेघजल ही मद्य होता है । संस्कृत में इसे 'अमर वारुणी' नाम ही दे दिया गया है । ये देव जलों का ठीक प्रयोग करते हुए शक्ति का सम्पादन करते हैं । आसुरी वृत्तिवाले लोग जल के प्रयोग से दूर होकर उनके लाभों से वंचित रह जाते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - जल अमृत हैं , भेषज है । ये हमें शक्तिशाली बनाते हैं ।
देवता: आपः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: गान्धारः
अ॒प्सु मे॒ सोमो॑ अब्रवीद॒न्तर्विश्वा॑नि भेष॒जा।
अ॒ग्निं च॑ वि॒श्वश॑म्भुव॒माप॑श्च वि॒श्वभे॑षजीः॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
apsu me somo abravīd antar viśvāni bheṣajā | agniṁ ca viśvaśambhuvam āpaś ca viśvabheṣajīḥ ||
पद पाठ
अ॒प्ऽसु। मे॒। सोमः॑। अ॒ब्र॒वी॒त्। अ॒न्तः। विश्वा॑नि। भे॒ष॒जा। अ॒ग्निम्। च॒। वि॒श्वऽश॑म्भुवम्। आपः॑। च॒। वि॒श्वऽभे॑षजीः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:20 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:11» मन्त्र:5 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:20
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे जल किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थान्वयभाषाः -जैसे यह (सोमः) ओषधियों का राजा चन्द्रमा वा सोमलता (मे) मेरे लिये (अप्सु) जलों के (अन्तः) बीच में (विश्वानि) सब (भेषजा) ओषधि (च) तथा (विश्वशंभुवम्) सब जगत् के लिये सुख करनेवाले (अग्निम्) बिजुली को (अब्रवीत्) प्रसिद्ध करता है, इसी प्रकार (विश्वभेषजीः) जिनके निमित्त से सब ओषधियाँ होती हैं, वे (आपः) जल भी अपने में उक्त सब ओषधियों और उक्त गुणवाले अग्नि को जानते हैं॥२०॥
भावार्थभाषाः -इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब पदार्थ अपने गुणों से अपने-अपने स्वभावों और उनमें ओषधियों की पुष्टि करानेवाला चन्द्रमा और जो ओषधियों में मुख्य सोमलता है, ये दोनों जल के निमित्त और ग्रहण करने योग्य सब ओषधियों का प्रकाश करते हैं, वैसे सब ओषधियों के हेतु जल अपने अन्तर्गत समस्त सुखों का हेतु मेघ का प्रकाश और जो जलों में ओषधियों का निमित्त और जो जल में अग्नि का निमित्त है, ऐसा जानना चाहिये॥२०॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
गर्म पानी [जल+अग्नि]
पदार्थान्वयभाषाः -१. (सोमः) - सोमादि ओषधियों के गुणों के पूर्णतया ज्ञाता उस सर्वमहान् वैद्य प्रभु ने (मे) - मुझे (अब्रवीत्) - कहा कि (अप्सु - अन्तः) - जलों में (विश्वानि भेषजा) - सब औषध विद्यमान हैं , अर्थात् ये जल रोगमात्र के औषध हैं । "जल घातने" धातु से बनकर इसी भाव को कह रहा है कि जल सब रोगों को नष्ट करनेवाले हैं । २. (च) - और सोम ने मुझे यह भी कहा कि (अग्निं विश्व - शं - भुवम्) - अग्नि सब शक्तियों को देनेवाली है । जब यह जल में प्रविष्ट होती है और जल को गर्म कर देती है तब यह गर्मजल रोगमात्र को शमन करनेवाला होता है और मनुष्य को शान्ति प्राप्त कराता है । ३. (च) - और अग्नि से मिलने पर (आपः) - जल (विश्वभेषजीः) - सभी रोगों के भेषज हैं । इस प्रकार ये जल 'ज' जन्म से 'ल' लयपर्यन्त उपयोगी हैं । ये 'आपः ' हैं , हमारे जीवन में व्याप्त रहकर कार्य करनेवाले हैं । यहाँ मन्त्र के तृतीय चरण का सायणकृत अर्थ यह है कि सोम ने इन सब शक्तियों को देनेवाली अग्नि को भी जलों में कहा है , अर्थात् जलों में उस अग्नि का निवास है जो विविध कल्याणों को करनेवाली है । वस्तुतः यहाँ सूर्य - रश्मियों के द्वारा भावित जलों में विद्यमान विविध प्रभावयुक्त जीवनदायी विद्युतों की ओर संकेत है । यह हमारे नाना यन्त्रों का संचालन करनेवाली है और इस प्रकार कितने ही कष्टों का प्रतिकार कर देती है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - जलों में सब औषध हैं और जब अग्नि जलों के साथ मिल जाती है तब यह सब कल्याण - ही - कल्याण करनेवाली होती है , तब जल रोगमात्र को दूर करनेवाले होते हैं ।
देवता: आपः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: प्रतिष्ठागायत्री स्वर: षड्जः
आपः॑ पृणी॒त भे॑ष॒जं वरू॑थं त॒न्वे॒३॒॑ मम॑।
ज्योक् च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
āpaḥ pṛṇīta bheṣajaṁ varūthaṁ tanve mama | jyok ca sūryaṁ dṛśe ||
पद पाठ
आपः॑। पृ॒णी॒त। भे॒ष॒जम्। वरू॑थम्। त॒न्वे॑। मम॑। ज्योक्। च॒। सूर्य॑म्। दृ॒शे॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:21 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:21
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे जल कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -मनुष्यों को योग्य है कि सब पदार्थों को व्याप्त होनेवाले प्राण (सूर्य्यम्) सूर्यलोक के (दृशे) दिखलाने वा (ज्योक्) बहुत काल जिवाने के लिये (मम) मेरे (तन्वे) शरीर के लिये (वरूथम्) श्रेष्ठ (भेषजम्) रोगनाश करनेवाले व्यवहार को (पृणीत) परिपूर्णता से प्रकट कर देते हैं, उनका सेवन युक्ति ही से करना चाहिये॥२१॥
भावार्थभाषाः -प्राणों के विना कोई प्राणी वा वृक्ष आदि पदार्थ बहुत काल शरीर धारण करने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे क्षुधा और प्यास आदि रोगों के निवारण के लिये परम अर्थात् उत्तम से उत्तम औषधों को सेवने से योगयुक्ति से प्राणों का सेवन ही परम उत्तम है, ऐसा जानना चाहिये।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
रोगनिवारण व दीर्घजीवन
पदार्थान्वयभाषाः -१. (आपः) - हे जलो ! (मम तन्वे) - मेरे शरीर के लिए (वरूथम्) - रोगों के निवारक (भेषजम्) - औषध को (पृणीत) - [पूरयत] पूरित करो , अर्थात् जलों के समुचित प्रयोग से हम रोगमात्र को शरीर पर आक्रमण करने से रोक सकते हैं । २. इस प्रकार रोगों को दूर करके ये जल हमारे (ज्योक्) - दीर्घकाल तक (सूर्यम् दशे) - सूर्य के दर्शन के लिए होते हैं । जलों का 'उषः पान' [प्रातः काल उठने पर दाँत व जीभ साफ करने के बाद जल पीना] , धीमे - धीमे पीना , भोजन के प्रारम्भ व अन्त में न पीकर बीच - बीच में थोड़ा - थोड़ा बार - बार पीना , सामान्यतः गर्म जल का पीने के लिए प्रयोग करना , स्नान के लिए ठण्डे जल का spunging के रूप में प्रयोग करना' - इन नियमों का पालन करने पर जल रोगों को नहीं आने देते ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - जल रोगनिवारक औषध को प्राप्त कराते हैं और हमारे दीर्घजीवन के लिए होते हैं ।
देवता: आपः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: गान्धारः
इ॒दमा॑पः॒ प्र व॑हत॒ यत्किं च॑ दुरि॒तं मयि॑।
यद्वा॒हम॑भिदु॒द्रोह॒ यद्वा॑ शे॒प उ॒तानृ॑तम्॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
idam āpaḥ pra vahata yat kiṁ ca duritam mayi | yad vāham abhidudroha yad vā śepa utānṛtam ||
पद पाठ
इ॒दम्। आ॒पः॒। प्र। व॒ह॒त॒। यत्। किम्। च॒। दु॒रि॒तम्। मयि॑। यत्। वा॒। अ॒हम्। अ॒भि॒ऽदु॒द्रोह॑। यत्। वा॒। शे॒पे। उ॒त। अनृ॑तम्॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:22 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:2 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:22
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे जल किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -मैं (यत्) जैसा (किम्) कुछ (मयि) कर्म का अनुष्ठान करनेवाले मुझमें (दुरितम्) दुष्ट स्वभाव के अनुष्ठान से उत्पन्न हुआ पाप (च) वा श्रेष्ठता से उत्पन्न हुआ पुण्य (वा) अथवा (यत्) अत्यन्त क्रोध से (अभिदुद्रोह) प्रत्यक्ष किसी से द्रोह करता वा मित्रता करता (वा) अथवा (यत्) जो कुछ अत्यन्त ईर्ष्या से किसी सज्जन को (शेपे) शाप देता वा किसी को कृपादृष्टि से चाहता हुआ जो (अनृतम्) झूँठ (उत) वा सत्य काम करता हूँ (इदम्) सो यह सब आचरण किये हुए को (आपः) मेरे प्राण मेरे साथ होके (प्रवहत) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं॥२२॥
भावार्थभाषाः -मनुष्य लोग जैसा कुछ पाप वा पुण्य करते हैं, सो सो ईश्वर अपनी न्याय व्यवस्था से उनको प्राप्त कराता ही है॥२२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मानस रोगनिवारण
पदार्थान्वयभाषाः -१. (आपः) हे जलो ! (यत् किञ्च) - जो कुछ भी (दुरितम्) - अशुभ आचरण (मयि) - मेरे जीवन में है (इदम्) - इसको (प्रवहत( - बहाकर दूर ले - जाओ । जल शरीर के रोगों को ही दूर करते हों , सो नहीं , इनका मानस रोगों पर भी प्रभाव पड़ता है । क्रोध में आये हुए मनुष्य को अब तक ठण्डा पानी पीने के लिए देने की प्रथा है । पानी रोगों को ही नहीं , क्रोध को भी दूर कर देता है । वस्तुतः स्वास्थ्य को प्राप्त कराके जल मन को भी स्वस्थ बनाते हैं । मन के स्वस्थ होने पर सब दुरित दूर ही रहते हैं । २. हे जलो । (यद् वा) - और जो (अहम्) - मैं (अभिदुद्रोह)) - किसी के प्रति द्रोह करता हूँ , ये जल उस द्रोह भाव को भी दूर करें । हमारे मनों में किसी की जिघांसा की भावना न हो । ३. (यद् वा) - और जो मैं (शेपे) - क्रोध में आक्रोश कर बैठता हूँ , किसी को शाप देने लगता है , उस वृत्ति को भी दूर करो (उत) - और (अनृतम्) - मेरे जीवन में न चाहते हुए भी आ जानेवाले असत्य को भी मुझसे दूर करो ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - जल शारीरिक रोगों की औषध तो है ही , ये मानस रोगों को भी दूर करनेवाले हैं ।
देवता: अग्निः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: गान्धारः
आपो॑ अ॒द्यान्व॑चारिषं॒ रसे॑न॒ सम॑गस्महि।
पय॑स्वानग्न॒ आ ग॑हि॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
āpo adyānv acāriṣaṁ rasena sam agasmahi | payasvān agna ā gahi tam mā saṁ sṛja varcasā ||
पद पाठ
आपः॑। अ॒द्य। अनु॑। अ॒चा॒रि॒ष॒म्। रसे॑न। सम्। अ॒ग॒स्म॒हि॒। पय॑स्वान्। अ॒ग्ने॒। आ। ग॒हि॒। तम्। मा॒। सम्। सृ॒ज॒। वर्च॑सा॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:23 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:3 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:23
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वे जल किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -हम लोग जो (रसेन) स्वाभाविक रसगुण संयुक्त (आपः) जल हैं, उनको (समगस्महि) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं, जिनसे मैं (पयस्वान्) रसयुक्त शरीरवाला होकर जो कुछ (अन्वचारिषम्) विद्वानों के अनुचरण अर्थात् अनुकूल उत्तम काम करके उसको प्राप्त होता और जो यह (अग्ने) भौतिक अग्नि (मा) तुझको इस जन्म और जन्मान्तर अर्थात एक जन्म से दूसरे जन्म में (आगहि) प्राप्त होता है अर्थात् वही पिछले जन्म में (तम्) उसी कर्मों के नियम से पालनेवाले (मा) मुझे (अद्य) आज वर्त्तमान भी (वर्चसा) दीप्ति (संसृज) सम्बन्ध कराता है, उन और उसको युक्ति से सेवन करना चाहिये॥२३॥
भावार्थभाषाः -सब प्राणियों को पिछले जन्म में किये हुए पुण्य वा पाप का फल वायु जल और अग्नि आदि पदार्थों के द्वारा इस जन्म वा अगले जन्म में प्राप्त होता ही है॥२३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पयस्वान् अग्नि
पदार्थान्वयभाषाः -१. (अद्य) - आज (आपः अन अचारिषम्) - जलों को शास्त्रविधि के अनुसार - प्रभु के निर्देश के अनुसार सेवित करता हूँ और (रसेन) - रस से (समगस्महि) - हम सङ्गत होते हैं । जलों को रस लेकर पीना ही उनका सर्वोत्तम पीने का प्रकार है । गटागट पानी को अन्दर डाल देना ठीक नहीं है । २. हे (पयस्वान्) - प्रशस्त जलों से युक्त (अग्ने) - अग्निदेव (आगहि) - तुम मुझे प्राप्त होओ । यहाँ स्पष्ट ही सूर्य - रश्मियों से भावित जल का संकेत है , अर्थात् रश्मियों के रंगों से सभी प्रकार के रोग कट जाते हैं , क्योंकि कुछ रंग ठण्डे , कुछ गर्म और कुछ समप्रभावी होते हैं । यहाँ जल को अग्निवाला नहीं कहा , अपितु अग्नि को जलवाला कहा गया है । यह अग्नि अन्दर के मलों को भस्म करेगा , जल उनको बहा ले जाएगा । हे जलयुक्त अग्ने ! (तम् मा) - शास्त्रविधि के अनुसार तेरा सेवन करनेवाले मुझको (वर्चसा) - वर्चस् से (संसृज) - संसृष्ट कर , मुझे वर्चस्वी बना । वर्चस् वह शक्ति है जोकि रोगों से मुकाबला करती है और रोगकृमियों के नाश से रोगों को समूल नष्ट करके हमें तेजोयुक्त करती है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - 'पयस्वान् अग्नि' के ठीक प्रयोग से हम वर्चस्वी बनें ।
देवता: अग्निः ऋषि: मेधातिथिः काण्वः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: गान्धारः
सं मा॑ग्ने॒ वर्च॑सा सृज॒ सं प्र॒जया॒ समायु॑षा।
वि॒द्युर्मे॑ अस्य दे॒वा इन्द्रो॑ विद्यात्स॒ह ऋषि॑भिः॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
sam māgne varcasā sṛja sam prajayā sam āyuṣā | vidyur me asya devā indro vidyāt saha ṛṣibhiḥ ||
पद पाठ
सम्। मा॒। अ॒ग्ने॒। वर्च॑सा। सृ॒ज॒। सम्। प्र॒ऽजया॑। सम्। आयु॑षा। वि॒द्युः। मे॒। अ॒स्य॒। दे॒वाः। इन्द्रः॑। वि॒द्या॒त्। स॒ह। ऋषि॑ऽभिः॥
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:23» मन्त्र:24 | अष्टक:1» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:4 | मण्डल:1» अनुवाक:5» मन्त्र:24
उपलब्ध भाष्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती
वह अग्नि किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषाः -मनुष्यों को योग्य है कि जो (ऋषिभिः) वेदार्थ जाननेवालों के (सह) साथ (देवाः) विद्वान् लोग और (इन्द्रः) परमात्मा (अग्ने) भौतिक अग्नि (वर्चसा) दीप्ति (प्रजया) सन्तान आदि पदार्थ और (आयुषा) जीवन से (मा) मुझे (संसृज) संयुक्त करता है, उस और (मे) मेरे (अस्य) इस जन्म के कारण को जानते और (विद्यात्) जानता है, इससे उनका संग और उसकी उपासना नित्य करें॥२४॥
भावार्थभाषाः -जब जीव पिछले शरीर को छोड़कर अगले शरीर को प्राप्त होता है, तब उसके साथ जो स्वाभाविक मानस अग्नि जाता है, वही फिर शरीर आदि पदार्थों को प्रकाशित करता है, जो जीवों के पाप-पुण्य और जन्म का कारण है, उसको वे (ऋषि और विद्वान्) ही परमेश्वर के सिवाय जानते हैं, किन्तु परमेश्वर तो निश्चय के साथ यथायोग्य जीवों के पाप वा पुण्य को जानकर, उनके कर्म के अनुसार शरीर देकर, सुख दुःख का भोग कराता ही है॥२४॥पूर्व सूक्त से कहे हुए अश्वि आदि पदार्थों के अनुषङ्गी जो वायु आदि पदार्थ हैं, उनके वर्णन से पिछले बाईसवें सूक्त के अर्थ के साथ इस तेईसवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वर्चस् - प्रजा व आयुष्य
पदार्थान्वयभाषाः - १. हे (अग्ने) - अग्निदेव ! गतमन्त्र में वर्णित पयस्वान् अग्ने ! (मा) - मुझे (वर्चसा) - वर्चस् से (संसृज) - संसृष्ट कीजिए , (प्रजया संसृज) - उत्तम प्रजा से संसृष्ट कीजिए , (आयुषा संसृज) उत्तम आयु व दीर्घजीवन से संसृष्ट कीजिए । सूर्य - रश्मि - भावित जल के ठीक प्रयोग से 'वर्चस् , प्रजा व आयुष्य' की प्राप्ति होती है । २. सूक्त की समाप्ति पर केवल 'अग्ने' शब्द के प्रयोग से यहाँ 'परमात्मा का ग्रहण भी उचित हो सकता है कि हे प्रभो ! मुझे वर्चस , प्रजा व आयुष्य से संसृष्ट कीजिए । यह प्रार्थना सुनकर प्रभु कहते हैं कि (मे) - मेरे (अस्य) - इस 'वर्चस , प्रजा व आयुष्य' को (देवाः) - देव लोग ही (विद्युः) - जान , अर्थात् देव - जलाग्नि - गुण - ज्ञाता बनकर ही कोई व्यक्ति इस प्रकार वर्चस्वी , प्रजावान् व दीर्घायु बन सकता है । ऐसा बनने के लिए मन में दिव्य भावनाओं का होना आवश्यक है । विपरीताग्नियों मनुष्य को अन्दर - ही - अन्दर जला देती हैं । ३. (इन्द्रः) - जितेन्द्रिय पुरुष (ऋषिभिः सह), - [सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे - यजुः । कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम् - अथर्व ०] श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों के साथ विद्यात् - इन वर्चस् , प्रजा व आयुष्य वर्द्धक जलाग्नि - विज्ञान को जानें । इनकी प्राप्ति के लिए जितेन्द्रिय और ज्ञानप्रधान बनना आवश्यक है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - देव बनकर मैं वर्चस्वी बनूं । इन्द्र बनकर मैं प्रजावान् बनें और ऋषि बनकर मैं दीर्घायु को प्राप्त करूं ।
टिप्पणी:विशेष - सूक्त का प्रारम्भ प्राणसाधना द्वारा तथा क्रियाशील बने रहकर सोमपान करने से हुआ है [१] । इस सोमपान के लिए जितेन्द्रिय बनना आवश्यक है [२] । स्नेह व अद्वेष इस सोमपान में सहायक हैं [४] । इन्द्र [जीवात्मा] मरुतों [प्राणों के साथ सोमपान द्वारा आनन्दित होता है [६] । इन प्राणों ने ही सब आसुरी भावनाओं को पराजित करना है [११] । हम इस सात्त्विक वृत्ति के लिए जौ - शहद - दूधादि का प्रयोग करें [१५ - १६] । और जलों के ठीक प्रयोग से नीरोगता व निर्मलता को प्राप्त करते हुए [२१ - २३] वर्चस , प्रजा व आयुष्य से संयुक्त हों [२४] । इस प्रकार जीवन को उत्तम बनाकर प्रजापति के नाम का मनन करें ।
ऋग्वेद सूक्त 1.23: वैज्ञानिक व्याख्या
ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 23
ऋषि: मेधातिथि काण्व | देवता: वायु, इंद्र, विश्वेदेवा, आप: (जल)
1. वायु और ऊर्जा का संयोग
इस सूक्त के शुरुआती मंत्रों में वायु और इंद्र का आह्वान है। यहाँ इंद्र 'विद्युत' (Electricity/Energy) का प्रतीक है और वायु 'गैसीय माध्यम' का।
वैज्ञानिक दृष्टि: जब वायुमण्डल में विद्युत विसर्जन (Lightning) होता है, तो ओजोन (O3) का निर्माण होता है जो वातावरण को शुद्ध करता है। ऋग्वेद का यह संयोग इसी शुद्धि प्रक्रिया की ओर संकेत करता है।
2. जल चिकित्सा (Hydrotherapy)
"अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वाणि भेषजा | अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्व विश्वभेषजी: ||" (ऋग्वेद 1.23.20)
भावार्थ: जल के भीतर सभी औषधियाँ विद्यमान हैं और जल ही सबका कल्याण करने वाला है।
वैज्ञानिक व्याख्या: जल की उच्च विशिष्ट ऊष्मा (High Specific Heat) और विलायक क्षमता इसे चिकित्सा के लिए उत्तम बनाती है। आधुनिक विज्ञान भी 'Hydration' को कोशिका पुनर्जनन (Cell Regeneration) के लिए अनिवार्य मानता है।
3. सौर ऊर्जा और जल चक्र
सूक्त के अंत में सूर्य के प्रकाश और जल के अंतर्संबंधों का वर्णन है। यह प्राकृतिक जल चक्र (Water Cycle) और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की मूलभूत समझ को दर्शाता है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का यह सूक्त हमें सिखाता है कि प्रकृति के तत्व—वायु, जल और अग्नि—केवल पूजनीय नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के आधारभूत 'इंजीनियरिंग ब्लॉक्स' हैं। उनकी शुद्धता ही मानव स्वास्थ्य की कुंजी है।
0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know