ऋग्वेद-अध्याय(01) सूक्त 02: मंत्र 1
देवता: वायु: ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
वाय॒वा या॑हि दर्शते॒मे सोमा॒ अरं॑कृताः।
तेषां॑ पाहि श्रु॒धी हव॑म्॥
vāyav ā yāhi darśateme somā araṁkṛtāḥ | teṣām pāhi śrudhī havam ||
पद पाठ
वायो॒ इति॑। आ। या॒हि॒। द॒र्श॒त॒। इ॒मे। सोमाः॑। अरं॑ऽकृताः। तेषा॑म्। पा॒हि॒। श्रु॒धि। हव॑म्॥
अब द्वितीय सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में उन पदार्थों का वर्णन किया है कि जिन्होंने सब पदार्थ शोभित कर रक्खे हैं।
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
(दर्शत) हे ज्ञान से देखने योग्य (वायो) अनन्त बलयुक्त, सब के प्राणरूप अन्तर्यामी परमेश्वर ! आप हमारे हृदय में (आयाहि) प्रकाशित हो जाये। कैसे आप हैं कि जिन्होंने (इमे) इन प्रत्यक्ष (सोमाः) संसारी पदार्थों को (अरंकृताः) अलंकृत अर्थात् सुशोभित कर रक्खा है। (तेषाम्) आप ही उन पदार्थों के रक्षक हैं, इससे उनकी (पाहि) रक्षा भी कीजिये, और (हवम्) हमारी स्तुति को (श्रुधि) सुनिये। तथा (दर्शत) स्पर्शादि गुणों से देखने योग्य (वायो) सब मूर्तिमान् पदार्थों का आधार और प्राणियों के जीवन का हेतु भौतिक वायु (आयाहि) सब को प्राप्त होता है, फिर जिस भौतिक वायु ने (इमे) प्रत्यक्ष (सोमाः) संसार के पदार्थों को (अरंकृताः) शोभायमान किया है, वही (तेषाम्) उन पदार्थों की (पाहि) रक्षा का हेतु है और (हवम्) जिससे सब प्राणी लोग कहने और सुनने रूप व्यवहार को (श्रुधि) कहते सुनते हैं।
आगे ईश्वर और भौतिक वायु के पक्ष में प्रमाण दिखलाते हैं-
इस प्रमाण में वायु शब्द से परमेश्वर और भौतिक वायु पुष्टिकारी और जीवों को यथायोग्य कामों में पहुँचानेवाले गुणों से ग्रहण किये गये हैं। (अथातो०) जो-जो पदार्थ अन्तरिक्ष में हैं, उनमें प्रथमागामी वायु अर्थात् उन पदार्थों में रमण करनेवाला कहाता है, तथा सब जगत् को जानने से वायु शब्द करके परमेश्वर का ग्रहण होता है। तथा मनुष्य लोग वायु से प्राणायाम करके और उनके गुणों के ज्ञान द्वारा परमेश्वर और शिल्पविद्यामय यज्ञ को जान सकता है। इस अर्थ से वायु शब्द करके ईश्वर और भौतिक का ग्रहण होता है। अथवा जो चराचर जगत् में व्याप्त हो रहा है, इस अर्थ से वायु शब्द करके परमेश्वर का तथा जो सब लोकों को परिधिरूप से घेर रहा है, इस अर्थ से भौतिक का ग्रहण होता है, क्योंकि परमेश्वर अन्तर्यामिरूप और भौतिक प्राणरूप से संसार में रहनेवाले हैं। इन्हीं दो अर्थों की कहनेवाली वेद की (वायवायाहि०) यह ऋचा जाननी चाहिये। इसी प्रकार से इस ऋचा का (वायवा याहि दर्शनीये०) इत्यादि व्याख्यान निरुक्तकार ने भी किया है
सो संस्कृत में देख लेना। वहां भी वायु शब्द से परमेश्वर और भौतिक इन दोनों का ग्रहण है। तथा (वायुः सोमस्य०) वायु अर्थात् परमेश्वर उत्पन्न हुए जगत् की रक्षा करनेवाला और उसमें व्याप्त होकर उसके अंश-अंश के साथ भर रहा है। इस अर्थ से ईश्वर का तथा सोमवल्ली आदि ओषधियों के रस हरने और समुद्रादिकों के जल को ग्रहण करने से भौतिक वायु का ग्रहण जानना चाहिये। (वायुर्वा अ०) इत्यादि वाक्यों में वायु को अग्नि के अर्थ में भी लिया है। परमेश्वर का उपदेश है कि मैं वायुरूप होकर इस जगत् को आप ही प्रकाश करता हूँ, तथा मैं ही अन्तरिक्ष लोक में भौतिक वायु को अग्नि के तुल्य परिपूर्ण और यज्ञादिकों को वायुमण्डल में पहुँचाने वाला हूँ॥१॥
भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सौम्यता व सद्गुण अथवा इस सोम से उस सोम की प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः -१. पिछले सूक्त में प्रभु का नाम 'अग्नि' था । वह शब्द 'अगि गतौ' से बना था । यहाँ 'वायु' शब्द 'वा गतौ' से बनकर प्रभु का प्रतिपादन कर रहा है । प्रभु गति के द्वारा (वा गतिगन्धनयोः) सब बुराइयों का गन्धन - हिंसन कर रहे हैं । वस्तुतः गति ही बुराई को समाप्त करनेवाली है । हे (वायो) - गति द्वारा दुरितों का विध्वंस करनेवाले प्रभो ! (आयाहि) - आप आइए , हमारे हृदय - आसन पर बैठिए । २. (दर्शत) - आप सचमुच दर्शनीय हैं । हे (दर्शत) - दर्शनीय प्रभो ! मैं तो यही चाहता हूँ कि मेरा हृदय आपका प्रतिभान हो और वहाँ मैं आपके दर्शन करता रहूँ । आपकी दृष्टि से मैं कभी ओझल न हो जाऊँ , सदा आपकी कृपादृष्टि का पात्र बना हुआ मैं पवित्र बना रहूँ । ३. आपके दर्शन के लिए ही (इमे सोमाः) ये सोमकण (अरंकताः) - (अरं वारण - रोकना) रोके गये हैं - शरीर में ही इनका निरोध किया गया है । शरीर में निरुद्ध हुए - हुए ये सोमकण ज्ञानाग्नि का इंधन बनते हैं । दीप्त ज्ञानाग्नि हमें प्रभु - दर्शन के योग्य बनाती है (दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः । - कठ० १/३/१२) ४. वस्तुतः उन सोमकणों की रक्षा भी तो आपके स्मरण से ही होती है । अतः (तेषां पाहि) - उन सोमकणों की आप रक्षा कीजिए । हदय में आप होंगे तो 'काम' न होगा । जहाँ महादेव वहाँ कामदेव भस्म हो ही जाते हैं । यह काम ही तो सोम के संयम में बाधक था । यह गया और सोमकण शरीर में निरुद्ध हुए । ५. हे (वायो) - आप (हवम् श्रुधि) - हमारी इस प्रार्थना व पुकार को अवश्य सुनिए । (इमे सोमा अरंकृताः) इस वाक्य का यह अर्थ भी है कि ये सौम्यता से सम्पन्न आपके भक्त विद्यादि गुणों से अलंकृत हुए हैं । (तेषां पाहि) - इनकी आपने ही तो रक्षा करनी है । हम सौम्य बनें , सद्गुणों से अलंकृत हों और उस प्रभु से प्राप्त होनेवाली रक्षा के पात्र बनें ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम शरीर में सोमकणों की रक्षा करें , ये ही हमारे जीवनों को सद्गुणों से अलंकृत करेंगे और हमें प्रभु - दर्शन के योग्य बनाएँगे ।
सूक्त 02 : मंत्र 2
देवता: वायु: ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
वाय॑ उ॒क्थेभि॑र्जरन्ते॒ त्वामच्छा॑ जरि॒तारः॑।
सु॒तसो॑मा अह॒र्विदः॑॥
vāya ukthebhir jarante tvām acchā jaritāraḥ | sutasomā aharvidaḥ ||
पद पाठ
वायो॒ इति॑। उ॒क्थेभिः॑। ज॒र॒न्ते॒। त्वाम्। अच्छ॑। ज॒रि॒तारः॑। सु॒तऽसो॑माः। अ॒हः॒ऽविदः॑॥
उक्त परमेश्वर और भौतिक वायु किस प्रकार स्तुति करने योग्य हैं, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
(वायो) हे अनन्त बलवान् ईश्वर ! जो-जो (अहर्विदः) विज्ञानरूप प्रकाश को प्राप्त होने (सुतसोमाः) ओषधि आदि पदार्थों के रस को उत्पन्न करने (जरितारः) स्तुति और सत्कार के करनेवाले विद्वान् लोग हैं, वे (उक्थेभिः) वेदोक्त स्तोत्रों से (त्वाम्) आपको (अच्छ) साक्षात् करने के लिये (जरन्ते) स्तुति करते हैं॥२॥
भावार्थ भाषाः( Deep-spirit Language):
यहाँ श्लेषालङ्कार है। इस मन्त्र से जो वेदादि शास्त्रों में कहे हुए स्तुतियों के निमित्त स्तोत्र हैं, उनसे व्यवहार और परमार्थ विद्या की सिद्धि के लिये परमेश्वर और भौतिक वायु के गुणों का प्रकाश किया गया है। इस मन्त्र में वायु शब्द से परमेश्वर और भौतिक वायु के ग्रहण करने के लिये पहिले मन्त्र में कहे हुए प्रमाण ग्रहण करने चाहियें॥२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अहविद्
पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (वायो) गति के द्वारा सब दुरितों को दूर करनेवाले प्रभो ! पिछले मन्त्र के वर्णन के अनुसार सोमकणों का शरीर में ही संयम करनेवाले व्यक्ति (उक्थेभिः) - स्तोत्रों के द्वारा (जरन्ते) आपका स्तवन करते हैं । जहाँ प्रभु का स्तवन होता है , वहाँ ही तो आसुर वृत्तियाँ नहीं पनप पातीं । प्रभु - स्तवन की भूमि वासनाओं के लिए ऊसर होती है । २. (जरितारः) ये स्तोता लोग (त्वाम् अच्छा) आपकी ओर बढ़ते हैं । इनकी भौतिक पदार्थों के प्रति आसक्ति कम और कम होती जाती है , परिणामतः ये आपके समीप होते जाते हैं । ३. इस आपके सानिध्य के कारण ही ये (सुतसोमाः) सोम का सवन और उत्पादन करनेवाले बनते हैं । अपने शरीर में इन सोमकणों को ये सुरक्षित कर पाते हैं । ४. सोमकणों का उत्पादन करते हुए ये (अहर्विदः) (अहन् – दिन) समय को समझनेवाले हैं । यौवन में जैसी इन सोमकणों की उत्पति होती है , वैसी वार्द्धक्य में न होगी - इस बात को समझते हुए ये यौवन में ही सोम की रक्षा करनेवाले बनते हैं । ‘अहर्विदः शब्द का अर्थ एक दिन में ही पूर्ण हो जानेवाले यज्ञों का अहः’ नाम मानकर यह भी किया जा सकता है कि सुतसोम व्यक्ति यज्ञों के अभिज्ञ होते हैं और यज्ञमय जीवन बिताने का प्रयत्न करते हैं । अयज्ञिय , अपवित्र भावनाओं से बचे रहने का यही तो सर्वोत्तम साधन है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम वायु नाम से प्रभु का स्मरण करें , प्रभु की ओर चलें , सोमकणों का सवन व उत्पादन करें और उनकी रक्षा के समय को समझें । हमारा जीवन यज्ञों से परिचयवाला हो ताकि अयज्ञिय भावनाओं से हम बचे रहें ।
सूक्त 02 : मंत्र 3
देवता: वायु: ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
वायो॒ तव॑ प्रपृञ्च॒ती धेना॑ जिगाति दा॒शुषे॑।
उ॒रू॒ची सोम॑पीतये॥
vāyo tava prapṛñcatī dhenā jigāti dāśuṣe | urūcī somapītaye ||
पद पाठ
वायो॒ इति॑। तव॑। प्र॒ऽपृ॒ञ्च॒ती। धेना॑। जि॒गा॒ति॒। दा॒शुषे॑। उ॒रू॒ची। सोम॑ऽपीतये॥
पूर्वोक्त स्तोत्रों का जो श्रवण और उच्चारण का निमित्त है, उसका प्रकाश अगले मन्त्र में किया है।
पदार्थान्वयभाषा (Material language):
(वायो) हे वेदविद्या के प्रकाश करनेवाले परमेश्वर ! (तव) आपकी (प्रपृञ्चती) सब विद्याओं के सम्बन्ध से विज्ञान का प्रकाश कराने, और (उरूची) अनेक विद्याओं के प्रयोजनों को प्राप्त करानेहारी (धेना) चार वेदों की वाणी है, सो (सोमपीतये) जानने योग्य संसारी पदार्थों के निरन्तर विचार करने, तथा (दाशुषे) निष्कपट से प्रीत के साथ विद्या देनेवाले पुरुषार्थी विद्वान् को (जिगाति) प्राप्त होती है। दूसरा अर्थ-(वायो तव) इस भौतिक वायु के योग से जो (प्रपृञ्चती) शब्दोच्चारण श्रवण कराने और (उरूची) अनेक पदार्थों की जाननेवाली (धेना) वाणी है, सो (सोमपीतये) संसारी पदार्थों के पान करने योग्य रस को पीने वा (दाशुषे) शब्दोच्चारण श्रवण करनेवाले पुरुषार्थी विद्वान् को (जिगाति) प्राप्त होती है॥३॥
भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-
यहाँ भी श्लेषालङ्कार है। दूसरे मन्त्र में जिस वेदवाणी से परमेश्वर और भौतिक वायु के गुण प्रकाश किये हैं, उसका फल और प्राप्ति इस मन्त्र में प्रकाशित की है अर्थात् प्रथम अर्थ से वेदविद्या और दूसरे से जीवों की वाणी का फल और उसकी प्राप्ति का निमित्त प्रकाश किया है॥३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वायु की धेना
पदार्थान्वयभाषाः -१. हे (वायो) – (गति , ज्ञान) सम्पूर्ण ज्ञानों के भण्डार व सम्पूर्ण ज्ञानों को देनेवाले प्रभो ! (तव) आपकी (धेना) वेदवाणी (दाशुषे) समर्पण करनेवाले के लिए (जिगाति) प्राप्त होती है । वस्तुतः अध्यापक से दिया जाता हुआ ज्ञान उसी विद्यार्थी को प्राप्त होता है जो कि अध्यापक के प्रति अपना अर्पण करता है , जिसका सारा कार्यक्रम अध्यापक के निर्देश के अनुसार चलता है । हमारा जीवन प्रभु के निर्देश के अनुसार चलेगा तो हमें भी प्रभु से दिया जाता हुआ ज्ञान प्राप्त होगा । २. वह वेदज्ञान कैसा है , इसका प्रतिपादन धेना के दो विशेषणों के द्वारा यहाँ किया जा रहा है - [क] (प्रपृञ्चती) प्रकृष्ट सम्पर्क को उत्पन्न करनेवाली यह वेदवाणी है , अर्थात् इसके अध्ययन से हमें वह ज्ञान प्राप्त होता है जो हमें प्रकृति की ओर झुकाववाला न बनाकर प्रभु के सम्पर्कवाला बनाता है । [ख] (उरूची) (उरु अञ्च) विशाल प्रदेशों में यह गतिवाली है । ऋग्वेद यदि प्राकृतिक विज्ञानों (Natural Sciences) का मुख्यतः प्रतिपादन करता है तो यजुर्वेद कर्मवेद है । यह मनोविज्ञान व सामाजिक विज्ञानों का प्रतिपादक है । साम अध्यात्मशास्त्र (Metaphysics) को लेता है और अथर्व युद्ध - विद्या व आयुर्वेद (Science of War तथा Science of Medicine) को अपना विषय बनाता है । इस प्रकार यह वेदवाणी सचमुच उरूची है । ३. इस वेदवाणी के पठन से जहाँ हमारा ज्ञान बढ़ता है वहाँ यह (सोमपीतये) सोम की पीति के लिए होती है , इसके स्वाध्याय से शरीर में सोम का रक्षण होता है । यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और इस प्रकार उचित व्यय होकर यह हमारे विकास में सहायक होता है । एवं , स्वाध्याय सोमपान में सहायक होता है । सुरक्षित सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और तीव्रबुद्धि बनकर हम अधिक ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं । एवं , हमारे शरीर में सोमपान व स्वाध्याय का परस्पर भावन चलता है । स्वाध्याय से सोम की रक्षा होती है , सोमरक्षण से स्वाध्याय की योग्यता बढ़ती है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - वेदवाणी प्रभु के प्रति समर्पण करनेवाले को प्राप्त होती है । यह प्रभु - सम्पर्क को बढ़ाती है , व्यापक ज्ञान को देती है । सोमपान के लिए - शरीर में शक्ति को सुरक्षित करने के लिए यह स्वाध्याय सहायक है ।
सूक्त 02 : मंत्र 4
देवता: इन्द्रवायू ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
इन्द्र॑वायू इ॒मे सु॒ता उप॒ प्रयो॑भि॒रा ग॑तम्।
इन्द॑वो वामु॒शन्ति॒ हि॥
indravāyū ime sutā upa prayobhir ā gatam | indavo vām uśanti hi ||
पद पाठ
इन्द्र॑वायू॒ इति॑। इ॒मे। सु॒ताः। उप॑। प्रयः॑ऽभिः॒। आ। ग॒त॒म्। इन्द॑वः। वाम्। उ॒शन्ति॑। हि॥
अब जो स्तोत्रों से प्रकाशित पदार्थ हैं, उनकी वृद्धि और रक्षा के निमित्त का अगले मन्त्र में उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
(इमे) ये प्रत्यक्ष (सुताः) उत्पन्न हुए पदार्थ (इन्दवः) जो जल, क्रियामय यज्ञ और प्राप्त होने योग्य भोग पदार्थ हैं, वे (हि) जिस कारण (वाम्) उन दोनों (इन्द्रवायू) सूर्य्य और पवन को (उशन्ति) प्रकाशित करते हैं, और वे सूर्य तथा पवन (उपागतम्) समीप प्राप्त होते हैं, इसी कारण (प्रयोभिः) तृप्ति करानेवाले अन्नादि पदार्थों के साथ सब प्राणी सुख की कामना करते हैं। यहाँ इन्द्र शब्द के भौतिक अर्थ के लिये ऋग्वेद के मन्त्र का प्रमाण दिखलाते हैं-(इन्द्रेण०) सूर्य्यलोक ने अपनी प्रकाशमान किरण तथा पृथिवी आदि लोक अपने आकर्षण अर्थात् पदार्थ खैंचने के सामर्थ्य से पुष्टता के साथ स्थिर करके धारण किये हैं कि जिससे वे न पराणुदे अपने-अपने भ्रमणचक्र अर्थात् घूमने के मार्ग को छोड़कर इधर-उधर हटके नहीं जा सकते हैं।
(इमे चिदिन्द्र०) सूर्य्य लोक भूमि आदि लोकों को प्रकाश के धारण करने के हेतु से उनका रोकनेवाला है अर्थात् वह अपनी खैंचने की शक्ति से पृथिवी के किनारे और मेघ के जल के स्रोत को रोक रहा है। जैसे आकाश के बीच में फेंका हुआ मिट्टी का डेला पृथिवी की आकर्षण शक्ति से पृथिवी पर ही लौटकर आ पड़ता है, इसी प्रकार दूर भी ठहरे हुए पृथिवी आदि लोकों को सूर्य्य ही ने आकर्षण शक्ति की खैंच से धारण कर रखा है। इससे यही सूर्य्य बड़ा भारी आकर्षण प्रकाश और वर्षा का निमित्त है। (इन्द्रः०) यही सूर्य्य भूमि आदि लोकों में ठहरे हुए रस और मेघ को भेदन करनेवाला है। भौतिक वायु के विषय में वायवा याहि० इस मन्त्र की व्याख्या में जो प्रमाण कहे हैं, वे यहाँ भी जानना चाहिये॥४॥
भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-
इस मन्त्र में परमेश्वर ने प्राप्त होने योग्य और प्राप्त करानेवाले इन दो पदार्थों का प्रकाश किया है॥४॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ज्ञानेश्वर्य व गतिशीलता
पदार्थान्वयभाषाः -१. (इन्द्रवायू) - (इन्द्रश्च वायुश्च) इन्द्र 'जितेन्द्रिय' पुरुष है , इन्द्रियों का अधिष्ठाता है । ऐसा बनने के लिए ही यह (वायु) - सतत क्रियाशील हुआ है । जितेन्द्रिय बनकर यह क्रियाशीलता से सब बुराइयों का संहार करता है । प्रभु इनसे कहते हैं कि (इन्द्र-वायू) - हे जितेन्द्रिय व क्रियाशील पुरुषो ! (इमे सुताः) - ये सोम तुम्हारे लिए उत्पन्न किये गये हैं , इनके रक्षण से ही तुम्हें इस जीवन में उन्नति को सिद्ध करना है । २. इनका रक्षण करते हुए (प्रयोभिः) - पयस् food सात्त्विक भोजन , Pleasure , delight मनः प्रसाद , Sacrifice त्याग - सात्विक अन्नों के सेवन से , मनः प्रसादरूप तप के साधन से तथा त्याग की वृत्ति से (उप आगतम्) - आप मेरे समीप आओ । प्रभु प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम भोजन को सात्त्विक करें , मन को सदा प्रसन्न रक्खें , मन में राग - द्वेष न हो तथा लोभ के विपरीत त्याग की वृत्तिवाले बनें । ३. प्रभु कहते हैं कि (इन्दवः) - सुरक्षित हुए-हुए ये सोमकण (वाम्) - आप दोनों की-इन्द्र व वायु की (हि) - निश्चय से (उशन्ति) कामना करते हैं , अर्थात् सुरक्षित हुए-हुए ये सोमकण मनुष्य को 'इन्द्र व वायु' बनाते हैं , इन्हीं के कारण ज्ञानाग्नि प्रदीप्त होती है , बुद्धि सूक्ष्म बनती है और हम ज्ञानरूप परमैश्वर्य से दीप्त होनेवाले 'इन्द्र' बनते हैं और इन्हीं की सुरक्षा से हमारे जीवन में रोग नहीं आ पाते और हम क्रियाशील बने रहते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - गतमन्त्र के अनुसार हम स्वाध्याय के द्वारा सोम का रक्षण कर पाते हैं । यह सुरक्षित सोम हमें ज्ञानरूप परमैश्वर्य की प्राप्ति कराता है तथा सदा गतिशील बनाये रखता है ।
सूक्त 02 : मंत्र 5
देवता: इन्द्रवायू ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
वाय॒विन्द्र॑श्च चेतथः सु॒तानां॑ वाजिनीवसू।
तावा या॑त॒मुप॑ द्र॒वत्॥
vāyav indraś ca cetathaḥ sutānāṁ vājinīvasū | tāv ā yātam upa dravat ||
पद पाठ
वायो॒ इति॑। इन्द्रः॑। च॒। चे॒त॒थः॒। सु॒ताना॑म्। वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू। तौ। आ। या॒त॒म्। उप॑। द्र॒वत्॥
अब पूर्वोक्त सूर्य्य और पवन, जो कि ईश्वर ने धारण किये हैं, वे किस-किस कर्म की सिद्धि के निमित्त रचे गये हैं, इस विषय का अगले मन्त्र में उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
-हे (वायो) ज्ञानस्वरूप ईश्वर ! आपके रचे हुए (वाजिनीवसू) उषा काल के तुल्य प्रकाश और वेग से युक्त (इन्द्रश्च) पूर्वोक्त सूर्य्यलोक और वायु (सुतानाम्) आपके उत्पन्न किये हुए पदार्थों का (चेतथः) धारण और प्रकाश करके उनको जीवों के दृष्टिगोचर कराते हैं, इसी कारण (तौ) वे दोनों उन पदार्थों को (द्रवत्) शीघ्रता से (आयातमुप) प्राप्त होते हैं॥५॥
भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-
यदि परमेश्वर इन सूर्यलोक और वायु को न बनावे, तो ये दोनों अपने कार्य को करने में कैसे समर्थ होवें॥५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उषःकालरूप धन - प्रातः जागरण
पदार्थान्वयभाषाः -१. पिछले मन्त्र में 'इन्द्रवायू' इस प्रकार इन्द्र का पहले और वायु का पीछे उल्लेख था । प्रस्तुत मन्त्र में 'वायो इन्द्रः च' इन शब्दों में वायु को पहले रक्खा है और इन्द्र को पीछे । यह केवल इसीलिए कि "वायु व इन्द्र' दोनों का समान महत्त्व समझा जाए । जितना क्रियाशीलता का महत्त्व है उतना ही महत्त्व जितेन्द्रियता का भी है । साथ ही इन दोनों में कार्य - कारणभाव भी इस प्रकार है कि क्रियाशीलता जितेन्द्रियता के लिए सहायक है और जितेन्द्रिय पुरुष क्रियाशील होता है । शक्ति - सम्पन्न होने के कारण उसे कर्म में आनन्द आता है । हे (वायो) - क्रियाशील पुरुष ! तू और (इन्द्रः) - जितेन्द्रिय पुरुष (सुतानाम्) - शरीर में उत्पन्न किये गये इन सोमों का (चेतथः) - संज्ञान प्राप्त करते हो , तुम इनके महत्त्व को समझते हो और इसीलिए इनकी रक्षा के लिए सदा सचेत रहते हो । २. इस सचेत रहने में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तुम (वाजिनीवसू) - (वाजिनी उषः - नि०) उषः कालरूप धनवाले बनते हो । इस उषः काल में तुम सोये नहीं रह जाते । ब्रह्मचर्य के दृष्टिकोण से यह बात बड़ी महत्वपूर्ण है । यही समय ब्राह्ममुहूर्त भी कहलाता है । यह समय प्रभु से मिलने का समय होता है , इस समय सोये रह जाना कितने महान् धन का विनाश है ! यह काल तो (उष दाहे) सब बुराइयों का दहन कर देनेवाला है । इस समय जागकर उत्तम कर्मों में निवास करना , सन्ध्या - स्वाध्याय आदि में लगे रहना ही ठीक है । ३. प्रभु इन उषः कालरूप धनवाले वायु व इन्द्र से कहते हैं कि (तौ) - वे तुम दोनों (द्रवत्) - शीघ्रता से दौड़ते हुए (उप आयतम्) - मेरे समीप आ जाओ । उषः काल में जागनेवालों को अवश्य प्रभु - प्राप्ति होती है । प्रसंगवश ब्रह्मचर्य में यह उषः जागरण सहायक होता है और इस प्रकार इसका महत्त्व अत्यन्त बढ़ जाता है ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हमें सोम की रक्षा के महत्त्व को समझना चाहिए । हम प्रातः जागरण के अभ्यासी बनें और प्रभु को प्राप्त करें ।
सूक्त 02 : मंत्र 6
देवता: इन्द्रवायू ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः
वाय॒विन्द्र॑श्च सुन्व॒त आ या॑त॒मुप॑ निष्कृ॒तम्।
म॒क्ष्वित्था धि॒या न॑रा॥
vāyav indraś ca sunvata ā yātam upa niṣkṛtam | makṣv itthā dhiyā narā ||
पद पाठ
वायो॒ इति॑। इन्द्रः॑। च॒। सु॒न्व॒तः। आ। या॒त॒म्। उप॑। निः॒ऽकृ॒तम्। म॒क्षु। इ॒त्था। धि॒या। न॒रा॒॥
पूर्वोक्त इन्द्र और वायु के शरीर के भीतर और बाहरले कार्य्यों का अगले मन्त्र में उपदेश किया है-
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
(वायो) हे सब के अन्तर्य्यामी ईश्वर ! जैसे आपके धारण किये हुए (नरा) संसार के सब पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (इन्द्रश्च) अन्तरिक्ष में स्थित सूर्य्य का प्रकाश और पवन हैं, वैसे ये-इन्द्रिय० इस व्याकरण के सूत्र करके इन्द्र शब्द से जीव का, और प्राणो० इस प्रमाण से वायु शब्द करके प्राण का ग्रहण होता है-(मक्षु) शीघ्र गमन से (इत्था) धारण, पालन, वृद्धि और क्षय हेतु से सोम आदि सब ओषधियों के रस को (सुन्वतः) उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार (नरा) शरीर में रहनेवाले जीव और प्राणवायु उस शरीर में सब धातुओं के रस को उत्पन्न करके (इत्था) धारण, पालन, वृद्धि और क्षय हेतु से (मक्षु) सब अङ्गों को शीघ्र प्राप्त होकर (धिया) धारण करनेवाली बुद्धि और कर्मों से (निष्कृतम्) कर्मों के फलों को (आयातमुप) प्राप्त होते हैं ॥६॥
भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-
ब्रह्माण्डस्थ सूर्य्य और वायु सब संसारी पदार्थों को बाहर से तथा जीव और प्राण शरीर के भीतर के अङ्ग आदि को सब प्रकाश और पुष्ट करनेवाले हैं, परन्तु ईश्वर के आधार की अपेक्षा सब स्थानों में रहती है ॥६॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पवित्र व प्रकाशमय हृदय
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के सोमरक्षण का ही प्रसंग आरम्भ करते हुए कहते हैं कि हे (वायो) क्रियाशील पुरुष ! तू (च) - और (इन्द्रः) - इन्द्रियों का अधिष्ठाता , अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष - तुम दोनों ही (सुन्वतः) सोम का सम्पादन करनेवाले के , अर्थात् सोमकणों की रक्षा से शरीर को 'ज्ञानयुक्त व अनामय' , अर्थात् ज्ञानी व नीरोग बनानेवाले के (निष्कृतम्) - पूर्णरूप से संस्कृत किये हुए हृदय को , उस हृदय को जिसमें से कि सब बुराइयों को निकाल दिया गया है , ऐसे शुद्ध हृदय को (उप आयातम्) - समीपता से प्राप्त करो , अर्थात् प्रभु - उपासना करते हुए हृदय को 'निष्कृत' पूर्ण पवित्र बना पाओ । २. (इत्था) - सचमुच इस प्रकार ही तुम (मक्षु) - शीघ्र (धिया) - ज्ञानपूर्वक कर्मों के द्वारा (नरा) [नृ नये] - [नेतारौ] अपने को अग्रस्थान में प्राप्त करानेवाले होओगे । आगे बढ़ने का मार्ग यही है कि हम (क) क्रियाशील व जितेन्द्रिय बनने का प्रयत्न करें [वायु+इन्द्र] । (ख) सोम का सम्पादन करें , सोमकणों की रक्षा करें । (ग) हृदय को संस्कृत करें , प्रकाशमय बनाएँ , प्रसंगवश शरीर को भी नीरोग रक्खें । (घ) ज्ञान - पूर्वक कर्मों को करते चलें ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - सोमरक्षा के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को संस्कृत करें । शरीर निरोग हो तो मन पवित्र व प्रकाशमय बनता है । ऐसा बनकर हम ज्ञानपूर्वक कर्मों को करते चलें , यही उन्नति का मार्ग है ।
सूक्त 02 : मंत्र 7
देवता: मित्रावरुणौ ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
मि॒त्रं हु॑वे पू॒तद॑क्षं॒ वरु॑णं च रि॒शाद॑सम्।
धियं॑ घृ॒ताचीं॒ साध॑न्ता॥
mitraṁ huve pūtadakṣaṁ varuṇaṁ ca riśādasam | dhiyaṁ ghṛtācīṁ sādhantā ||
पद पाठ
मि॒त्रम्। हु॒वे॒। पू॒तऽद॑क्षम्। वरु॑णम्। च॒। रि॒शाद॑सम्। धिय॑म्। घृ॒ताची॑म्। साध॑न्ता॥
ईश्वर पूर्वोक्त सूर्य्य और वायु को दूसरे नाम से अगले मन्त्र में स्पष्ट करता है-
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
मैं शिल्पविद्या का चाहनेवाला मनुष्य, जो (घृताचीम्) जलप्राप्त करानेवाली (धियम्) क्रिया वा बुद्धि को (साधन्ता) सिद्ध करनेवाले हैं, उन (पूतदक्षम्) पवित्रबल सब सुखों के देने वा (मित्रम्) ब्रह्माण्ड में रहनेवाले सूर्य्य और शरीर में रहनेवाले प्राण-मित्रो० इस ऋग्वेद के प्रमाण से मित्र शब्द करके सूर्य्य का ग्रहण है-तथा (रिशादसम्) रोग और शत्रुओं के नाश करने वा (वरुणं च) शरीर के बाहर और भीतर रहनेवाला प्राण और अपानरूप वायु को (हुवे) प्राप्त होऊँ अर्थात् बाहर और भीतर के पदार्थ जिस-जिस विद्या के लिये रचे गये हैं, उन सबों को उस-उस के लिये उपयोग करूँ॥७॥
भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्र आदि जलस्थलों से सूर्य्य के आकर्षण से वायु द्वारा जल आकाश में उड़कर वर्षा होने से सब की वृद्धि और रक्षा होती है, वैसे ही प्राण और अपान आदि ही से शरीर की रक्षा और वृद्धि होती है। इसलिये मनुष्यों को प्राण अपान आदि वायु के निमित्त से व्यवहार विद्या की सिद्धि करके सब के साथ उपकार करना उचित है॥७॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पूतदक्ष व रिशादस
पदार्थान्वयभाषाः -१. (मित्रम्) - स्नेह के देवता को (हुवे) - मैं पुकारता हूँ , अर्थात् मैं यह आराधना करता हूँ कि मेरे हृदय में 'मित्र' का निवास हो , अर्थात् सदा स्नेह की भावना से मैं भी सभी के साथ प्रेम से वर्तनेवाला बनूँ । यह स्नेह की भावना वह है जो कि (पूतदक्षम्) - हमारे बलों को पवित्र करनेवाली है । स्नेह की भावना होने पर भोजन से उत्तम रस आदि धातुओं का निर्माण होता है , इस प्रकार बल की वृद्धि होती है । २. (च) - और (वरुणम्) - द्वेष - निवारण के देवता को पुकारता हूँ । मैं प्रयत्न करता हूँ कि मेरे हृदय में किसी के प्रति द्वेष न हो । यह वरुण देवता (रिशादसम्) - [रिश हिंसक , अद् - खा जाना] हिंसकों को खा जानेवाला है , अर्थात् द्वेष के न होने पर हमारा शरीर हिंसक तत्त्वों का शिकार नहीं होता । द्वेष से तो मनुष्य अन्दर-ही-अन्दर जलता चला जाता है । हृदय में द्वेष की भावना की प्रबलता के समय खाया हुआ अन्न विषों को जन्म देता है , न कि रक्त आदि धातुओं को । इसी दृष्टिकोण से प्रसन्न मन से भोजन करने का महत्त्व अति स्पष्ट है । मनु लिखते हैं "दृष्ट्वा हृष्येत् प्रसीदेच्च" इसी का अनुवाद इन शब्दों में किसी कवि ने किया है कि - "अश्नीयात्तन्मना भूत्वा प्रसन्नेन मनसा सदा ।" ३. ये मित्र व वरुण , अर्थात् स्नेह व निर्द्वेषता (घृताचीम्) [घृ - क्षरण , दीप्ति] मलों के क्षरण व ज्ञान की दीप्ति को प्राप्त करानेवाले (धियम्) - ज्ञानपूर्वक कर्मों को (साधन्ता) सिद्ध करते हैं । स्नेह व निर्द्वेषता जहाँ हमारे शरीरों को मलों के शोधन द्वारा शुद्ध व निरोग बनाते हैं , वहाँ ये दोनों देव दीप्ति के द्वारा मस्तिष्क को भी उज्ज्वल करते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - स्नेह व द्वेषनिवारण के द्वारा हम अपने जीवनों को पवित्र व उज्ज्वल बनाएँ ।
सूक्त 02 : मंत्र 8
देवता: मित्रावरुणौ ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
ऋ॒तेन॑ मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा।
क्रतुं॑ बृ॒हन्त॑माशाथे॥
ṛtena mitrāvaruṇāv ṛtāvṛdhāv ṛtaspṛśā | kratum bṛhantam āśāthe ||
पद पाठ
ऋ॒तेन॑। मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ॒। ऋ॒ता॒ऽवृ॒धौ॒। ऋ॒त॒ऽस्पृ॒शा॒। क्रतु॑म्। बृ॒हन्त॑म्। आ॒शा॒थे॒ इति॑॥
किस हेतु से ये दोनों सामर्थ्यवाले हैं, यह विद्या अगले मन्त्र में कही है-
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
ऋतेन) सत्यस्वरूप ब्रह्म के नियम में बंधे हुए (ऋतावृधौ) ब्रह्मज्ञान बढ़ाने, जल के खींचने और वर्षानेवाले (ऋतस्पृशा) ब्रह्म की प्राप्ति कराने में निमित्त तथा उचित समय पर जलवृष्टि के करनेवाले (मित्रावरुणौ) पूर्वोक्त मित्र और वरुण (बृहन्तम्) अनेक प्रकार के (क्रतुम्) जगद्रूप यज्ञ को (आशाथे) व्याप्त होते हैं॥८॥
भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-
रमेश्वर के आश्रय से उक्त मित्र और वरुण ब्रह्मज्ञान के बढ़ानेवाले, जल वर्षानेवाले, सब मूर्त्तिमान् वा अमूर्तिमान् जगत् को व्याप्त होकर उसकी वृद्धि विनाश और व्यवहारों की सिद्धि करने में हेतु होते हैं॥८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ऋत का वर्धन
पदार्थान्वयभाषाः -१. गतमन्त्र के (मित्रावरुणौ) - मित्र व वरुण , स्नेह व निर्द्वेषता हमारे जीवन में (ऋतेन) - ऋत के साथ (बृहन्तं क्रतुम्) - वृद्धि के कारणभूत उत्तम कार्यों व संकल्पों को (आशाथे) - व्याप्त करते हैं । ऋत का अभिप्राय इंग्लिश के राइट [right] शब्द से आया है । 'ठीक' व ऋत वही है जो उचित स्थान में किया जाए , अतः अभिप्राय यह हुआ कि स्नेह व द्वेषाभाव के न होने पर हममें ऋत की वृद्धि होती है , हम प्रत्येक कार्य को ठीक समय व ठीक स्थान पर ही करते हैं और इसके साथ हमारे सब कार्य वृद्धि के कारणभूत होते हैं । २. वस्तुतः ये मित्र और वरुण देव हैं ही (ऋतावृधी) - ऋत का सदा वर्धन करनेवाले तथा (ऋतस्पृशौ) - ऋतयुक्त कार्यों का ही स्पर्श करनेवाले । स्नेह व निर्द्वेषता के होने पर 'अनृत' का सम्भव ही नहीं रहता , हमारे सब कार्यों में ऋत का समावेश हो जाता है । अनृत कार्यों में संकुचितता है , ऋत के कार्यों में विशालता । 'अनृत' के साथ अपवित्रता व ह्रास का सम्बन्ध है तथा ऋत पवित्र व उन्नतिशील है । ऋतवाले कार्य सदा वृद्धि के कारण बनते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम मित्र व वरुण की आराधना द्वारा ऋतयुक्त कार्यों को करते हुए वर्धमान हों , सदा वृद्धि को प्राप्त करते चलें ।
सूक्त 02 : मंत्र 9
देवता: मित्रावरुणौ ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः
क॒वी नो॑ मि॒त्रावरु॑णा तुविजा॒ता उ॑रु॒क्षया॑।
दक्षं॑ दधाते अ॒पस॑म्॥
kavī no mitrāvaruṇā tuvijātā urukṣayā | dakṣaṁ dadhāte apasam ||
पद पाठ
क॒वी इति॑। नः॒। मि॒त्रावरु॑णा। तु॒वि॒ऽजा॒तौ। उ॒रु॒ऽक्षया॑। दक्ष॑म्। द॒धा॒ते॒ इति॑। अ॒पस॑म्॥
वे हम लोगों के कौन-कौन पदार्थों के धारण कनरेवाले हैं, इस बात का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है-
पदार्थान्वयभाषा (Material language):-
(तुविजातौ) जो बहुत कारणों से उत्पन्न और बहुतों में प्रसिद्ध (उरुक्षया) संसार के बहुत से पदार्थों में रहनेवाले (कवी) दर्शनादि व्यवहार के हेतु (मित्रावरुणा) पूर्वोक्त मित्र और वरुण हैं, वे (नः) हमारे (दक्षम्) बल तथा सुख वा दुःखयुक्त कर्मों को (दधाते) धारण करते हैं॥९॥
भावार्थ भाषाः( Deep-spirit Language):-
जो ब्रह्माण्ड में रहनेवाले बल और कर्म के निमित्त पूर्वोक्त मित्र और वरुण हैं, उनसे क्रिया और विद्याओं की पुष्टि तथा धारणा होती है॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
कवि - तुविजात - उरुक्षय
पदार्थान्वयभाषाः -१. मन्त्रसंख्या सात में 'मित्र व वरुण' को बलवर्धक व हिंसा का नाशक कहा था । उसी भाव को पुष्ट करते हुए कहते हैं कि (मित्रावरुणा) - ये स्नेह व निर्द्वेषता (नः) - हमारे लिए (दक्षम्) - बल को तथा (अपसम्) - व्यापक व उदार कर्म को , गत मन्त्र के 'बृहत्क्रतु' को (दधाते) - धारण करते हैं । हम अपने जीवन में सदा व्यापक कर्मों को करनेवाले होते हैं , जब कि हम द्वेष से ऊपर उठकर कार्य करते हैं । हमारे कर्म शक्तिशाली होते हैं , जबकि वे प्रेम से प्रेरित होते हैं । मित्र - देवता वा स्नेह हममें 'दक्ष' का धारण कराता है तो 'वरुण' निर्द्वेषता हमारे कर्मों को अपस-व्यापक [अप् व्याप्तौ] बनाती है । २. ये मित्रावरुण (कवी) - क्रान्तदर्शी हैं , हमारी बुद्धि को तीव्र बनाते हैं । यह सूक्ष्म बुद्धि ही तो हमें अन्ततः प्रभुदर्शन के योग्य बनाती है । ३. (तुविजाता) - ['तुवि बहु , बहूनामुपकारकतया समुत्पन्नौ' - सायण] ये मित्र और वरुण तो मानो बहुतों के उपकारक के रूप में ही उत्पन्न हुए हैं , अर्थात् इन दो भावनाओं के होने पर इनके कार्य अधिक-से-अधिक प्राणियों का हित करनेवाले होते हैं , इनके कार्य स्वार्थ के संकुचित दृष्टिकोण से न होकर परार्थ की विशाल भावना से प्रेरित होते हैं । ४. (उरुक्षया) - ये विशाल निवासवाले [क्षि निवासे] होते हैं , ये विशालता में ही निवास करते हैं , ये कभी भी संकुचित भावनाओं को अपने में उत्पन्न नहीं होने देते , परिणामतः ये विशाल गतिवाले [क्षि - गति] होते हैं , इनके कार्य उदार होते हैं ।
भावार्थभाषाः -भावार्थ - हम मित्र और वरुण की उपासना से ' कवि , तुविजात व उरुक्षय ' बनें ।
टिप्पणी:विशेष - इस द्वितीय सूक्त में जीव प्रभु को 'वायु' नाम से स्मरण करता हुआ प्रभु की वेदवाणी को प्राप्त करने की कामना करता है [१-३] । प्रभु जितेन्द्रिय व क्रियाशील बनने के लिए कहते हैं और सोमकणों की रक्षा का ध्यान कराते हैं [४-६] । जीव अपने जीवन में स्नेह व निर्द्वेषता का व्रत लेता है और बहुतों का उपकारक व उदार बनकर जीने का निश्चय करता है [७-९] ।
