ऋग्वेद-अध्याय(01) सूक्त पहला: मंत्र 1

ऋग्वेद-अध्याय(01)

सूक्त पहला: मंत्र 1

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। 

होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥

agnim īḻe purohitaṁ yajñasya devam ṛtvijam | hotāraṁ ratnadhātamam ||

पद पाठ

अ॒ग्निम्। ई॒ळे॒। पु॒रःऽहि॑तम्। य॒ज्ञस्य॑। दे॒वम्। 

ऋ॒त्विज॑म्। होता॑रम्। र॒त्न॒ऽधात॑मम् ॥

यहाँ प्रथम मन्त्र में अग्नि शब्द करके ईश्वर ने अपना और भौतिक अर्थ का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

हम लोग (यज्ञस्य) विद्वानों के सत्कार सङ्गम महिमा और कर्म के (होतारं) देने तथा ग्रहण करनेवाले (पुरोहितम्) उत्पत्ति के समय से पहिले परमाणु आदि सृष्टि के धारण करने और (ऋत्विज्ञं) बारंबार उत्पत्ति के समय में स्थूल सृष्टि के रचनेवाले तथा ऋतु-ऋतु में उपासना करने योग्य (रत्नधातमम्) और निश्चय करके मनोहर पृथिवी वा सुवर्ण आदि रत्नों के धारण करने वा (देवम्) देने तथा सब पदार्थों के प्रकाश करनेवाले परमेश्वर की (ईळे) स्तुति करते हैं। तथा उपकार के लिये हम लोग (यज्ञस्य) विद्यादि दान और शिल्पक्रियाओं से उत्पन्न करने योग्य पदार्थों के (होतारं) देनेहारे तथा (पुरोहितम्) उन पदार्थों के उत्पन्न करने के समय से पूर्व भी छेदन धारण और आकर्षण आदि गुणों के धारण करनेवाले (ऋत्विजम्) शिल्पविद्या साधनों के हेतु (रत्नधातमम्) अच्छे-अच्छे सुवर्ण आदि रत्नों के धारण कराने तथा (देवम्) युद्धादिकों में कलायुक्त शस्त्रों से विजय करानेहारे भौतिक अग्नि की (ईळे) बारंबार इच्छा करते हैं।

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार से दो अर्थों का ग्रहण होता है। पिता के समान कृपाकारक परमेश्वर सब जीवों के हित और सब विद्याओं की प्राप्ति के लिये कल्प-कल्प की आदि में वेद का उपदेश करता है। जैसे पिता वा अध्यापक अपने शिष्य वा पुत्र को शिक्षा करता है कि तू ऐसा कर वा ऐसा वचन कह, सत्य वचन बोल, इत्यादि शिक्षा को सुनकर बालक वा शिष्य भी कहता है कि सत्य बोलूँगा, पिता और आचार्य्य की सेवा करूँगा, झूठ न कहूँगा, इस प्रकार जैसे परस्पर शिक्षक लोग शिष्य वा लड़कों को उपदेश करते हैं, वैसे ही अग्निमीळे० इत्यादि वेदमन्त्रों में भी जानना चाहिये। क्योंकि ईश्वर ने वेद सब जीवों के उत्तम सुख के लिये प्रकट किया है। इसी वेद के उपदेश का परोपकार फल होने से अग्निमीळे० इस मन्त्र में ईडे यह उत्तम पुरुष का प्रयोग भी है। (अग्निमीळे०) इस मन्त्र में परमार्थ और व्यवहारविद्या की सिद्धि के लिये अग्नि शब्द करके परमेश्वर और भौतिक ये दोनों अर्थ लिये जाते हैं। जो पहिले समय में आर्य लोगों ने अश्वविद्या के नाम से शीघ्र गमन का हेतु शिल्पविद्या आविष्कृत की थी, वह अग्निविद्या की ही उन्नति थी। परमेश्वर के आप ही आप प्रकाशमान सब का प्रकाशक और अनन्त ज्ञानवान् होने से, तथा भौतिक अग्नि के रूप दाह प्रकाश वेग छेदन आदि गुण और शिल्पविद्या के मुख्य साधक होने से अग्नि शब्द का प्रथम ग्रहण किया है ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पुरोहित-ईडन

पदार्थान्वयभाषाः -१. (अग्निम्)-उस (अगि गतौ) सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले, सब जीवों की उन्नति के साधक, अग्रणी प्रभु को (ईळे)-मैं उपासित करता हूँ। उस प्रभु का मैं स्तवन करता हूँ (ईड-ईद उपासना) जो प्रभु २. (पुरोहितम्)-(पुरः हितम्) पहले से ही रखे हुए हैं, अर्थात् जो बनने से सृष्टि से पूर्व ही विद्यमान हैं। जो बने कभी नहीं-'स्वयं-भू हैं-अपने आप होनेवाले हैं-'खुद् आ' हैं। अथवा जो प्रभु हम जीवों के (पुर:)-सामने (हितम्)-एक आदर्श (Model) के रूप में विद्यमान हैं। उनके अनुरूप हमें अपने को बनाना है।

 ३. (यज्ञस्य देवम्)-वे प्रभु अपनी वेदवाणी में यज्ञों का प्रकाश करनेवाले हैं। हमारे सब कर्तव्य-कर्मों का प्रभु ने वेद में प्रतिपादन किया है। एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। -गीता 

४. (ऋत्विजम्)-ऋतौ-ऋती यजनीयम्-समय-समय पर, प्रत्येक ऋतु में वे प्रभु पूजा के योग्य हैं। उस प्रभु का ही हमें उपासन करना चाहिए। उसके पूजन से उसकी शक्ति का हममें प्रवाह होता है। हम घर के व आजीविकोपार्जन के कार्यों की समाप्ति पर स्वाध्याय श्रान्त होकर प्रभु के नाम का जप करने लगें तज्जपस्तदर्थभावनम्। -योग०१।२८। दिन में दुनिया के कार्यों से अवकाश न मिले तो रात्रि के समय प्रभु-नाम-जप करते हुए निद्रा की गोद में जाएँ ताकि सारी रात्रि प्रभु-सम्पर्क बना रहे-स्वप्न भी प्रभु का ही आएँ और उस स्वप्नगत प्रभु-दर्शन को हम जाग्रत में भी न भूलें, ऐसा प्रयत्न करें ('स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं बा'। -योग०१।३८)

 ५. (होतारम्)-(हू दान, अदन) वे प्रभु सब-कुछ देनेवाले हैं-प्रलय के समय सारे ब्रह्माण्ड को अपने अन्दर ले-लेनेवाले हैं। (यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इथा वेद यत्र स:-कठ०१।२।२५)। प्रभु ने हमारे हित के लिए सब आवश्यक पदार्थ हमें प्राप्त कराये हैं।

 ६. (रत्नधातमम्)-रमणीय वस्तुओं के धारण करनेवालों में वे सर्वोत्तम हैं। प्रभु ने शरीरों के अन्दर इस प्रकार व्यवस्था की है कि खाये हुए अन्न से रस-रुधिर-मांस मोदस्-अस्थि-मज्जा-वीर्य'-इन सात धातुओं का क्रमशः निर्माण होता है। ये सात धातुएँ ही सात रत्न हैं। इनकी उपयोगिता व महत्त्व शरीरशास्त्र में प्रसिद्ध है। इनके कारण शरीर रमणीय बना है, अत: ये ही रत्न हैं। प्रभु ने प्रत्येक शरीररूप घर में इन सात रत्नों की स्थापना की है। (दमे-दमे सप्त रत्ना दधाना-ऋ०६।७४।१)। इस रत्न-धातमम् प्रभु की हम स्तुति करें। 

भावार्थभाषाः -भावार्थ - मैं 'अग्नि-पुरोहित-यज्ञ के देव-ऋत्विज्-होता व रत्नधाता' प्रभु की स्तुति करता हूँ। 

सूक्त पहला: मंत्र 2

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः

अ॒ग्निः पूर्वे॑भि॒र्ऋषि॑भि॒रीड्यो॒ नूत॑नैरु॒त। 

स दे॒वाँ एह व॑क्षति॥

agniḥ pūrvebhir ṛṣibhir īḍyo nūtanair uta | sa devām̐ eha vakṣati ||

पद पाठ

अ॒ग्निः। पूर्वे॑भिः। ऋषि॑ऽभिः। ईड्यः॑। नूत॑नैः। उ॒त। सः। दे॒वान्। आ। इ॒ह। व॒क्ष॒ति॒ ॥

उक्त अग्नि किन से स्तुति करने वा खोजने योग्य है, इसका उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

यहाँ अग्नि शब्द के दो अर्थ करने में प्रमाण ये हैं कि-(इन्द्रं मित्रं०) इस ऋग्वेद के मन्त्र से यह जाना जाता है कि एक सद्ब्रह्म के इन्द्र आदि अनेक नाम हैं। तथा (तदेवाग्नि०) इस यजुर्वेद के मन्त्र से भी अग्नि आदि नामों करके सच्चिदानन्दादि लक्षणवाले ब्रह्म को जानना चाहिये। (ब्रह्म ह्य०) इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के प्रमाणों से अग्नि शब्द ब्रह्म और आत्मा इन दो अर्थों का वाची है। (अयं वा०) इस प्रमाण में अग्नि शब्द से प्रजा शब्द करके भौतिक और प्रजापति शब्द से ईश्वर का ग्रहण होता है। (अग्नि०) इस प्रमाण से सत्याचरण के नियमों का जो यथावत् पालन करना है, सो ही व्रत कहाता है, और इस व्रत का पति परमेश्वर है। (त्रिभिः पवित्रैः०) इस ऋग्वेद के प्रमाण से ज्ञानवाले तथा सर्वज्ञ प्रकाश करनेवाले विशेषण से अग्नि शब्द करके ईश्वर का ग्रहण होता है।

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

जो मनुष्य सब विद्याओं को पढ़के औरों को पढ़ाते हैं तथा अपने उपदेश से सब का उपकार करनेवाले हैं वा हुए हैं वे पूर्व शब्द से, और जो कि अब पढ़नेवाले विद्याग्रहण के लिये अभ्यास करते हैं, वे नूतन शब्द से ग्रहण किये जाते हैं, क्योंकि जो मन्त्रों के अर्थों को जाने हुए धर्म और विद्या के प्रचार, अपने सत्य उपदेश से सब पर कृपा करनेवाले, निष्कपट पुरुषार्थी, धर्म की सिद्धि के लिये ईश्वर की उपासना करनेवाले और कार्य्यों की सिद्धि के लिये भौतिक अग्नि के गुणों को जानकर अपने कर्मों के सिद्ध करनेवाले होते हैं, वे सब पूर्ण विद्वान् शुभ गुण सहित होने पर ऋषि कहाते हैं, तथा प्राचीन और नवीन विद्वानों के तत्त्व जानने के लिये युक्ति प्रमाणों से सिद्ध तर्क और कारण वा कार्य्य जगत् में रहनेवाले जो प्राण हैं, वे भी ऋषि शब्द से गृहीत होते हैं। इन सब से ईश्वर स्तुति करने योग्य और भौतिक अग्नि अपने-अपने गुणों के साथ खोज करने योग्य है।

और जो सर्वज्ञ परमेश्वर ने पूर्व और वर्त्तमान अर्थात् त्रिकालस्थ ऋषियों को अपने सर्वज्ञपन से जान के इस मन्त्र में परमार्थ और व्यवहार ये दो विद्या दिखलाई हैं, इससे इसमें भूत वा भविष्य काल की बातों के कहने में कोई भी दोष नहीं आ सकता, क्योंकि वेद सर्वज्ञ परमेश्वर का वचन है। वह परमेश्वर उत्तम गुणों को तथा भौतिक अग्नि व्यवहार-कार्यों में संयुक्त किया हुआ उत्तम-उत्तम भोग के पदार्थों का देनेवाला होता है। पुराने की अपेक्षा एक पदार्थ से दूसरा नवीन और नवीन की अपेक्षा पहिला पुराना होता है। देखो, यही अर्थ इस मन्त्र का निरुक्तकार ने भी किया है कि-जो प्राकृत जन अर्थात् अज्ञानी लोगों ने प्रसिद्ध भौतिक अग्नि पाक बनाने आदि कार्य्यों में लिया है, वह इस मन्त्र में नहीं लेना, किन्तु सब का प्रकाश करनेहारा परमेश्वर और सब विद्याओं का हेतु, जिसका नाम विद्युत् है, वही भौतिक अग्नि यहाँ अग्नि शब्द से कहा गया है।

इस मन्त्र का अर्थ नवीन भाष्यकारों ने कुछ का कुछ ही कर दिया है, जैसे सायणाचार्य ने लिखा है कि-(पुरातनैः०) प्राचीन भृगु, अङ्गिरा आदियों और नवीन अर्थात् हम लोगों को अग्नि की स्तुति करना उचित है। वह देवों को हवि अर्थात् होम में चढ़े हुए पदार्थ उनके खाने के लिये पहुँचाता है। ऐसा ही व्याख्यान यूरोपखण्डवासी और आर्यावर्त्त के नवीन लोगों ने अङ्ग्रेजी भाषा में किया है, तथा कल्पित ग्रन्थों में अब भी होता है। सो यह बड़े आश्चर्य की बात है, जो ईश्वर के प्रकाशित अनादि वेद का ऐसा व्याख्यान, जिसका क्षुद्र आशय और निरुक्त शतपथ आदि सत्य ग्रन्थों से विरुद्ध होवे, वह सत्य कैसे हो सकता है ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पूर्व व नूतन ऋषियों से ईड्य

पदार्थान्वयभाषाः -१. (ईड्यः) गत मन्त्र में वर्णित सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले–अग्रणी प्रभु  २. (ऋषिभिः) - [ऋषय द्रष्टारः] तत्त्वदर्शियों से  ३. (ईड्यः) स्तुति के योग्य होते हैं, अर्थात् वस्तुतः प्रभु का स्तवन ये ऋषि - तत्त्वद्रष्टा ही करते हैं ।

वे तत्त्व - द्रष्टा जो ४. (पूर्वेभिः) [पृ पालनपूरणयोः] अपना रक्षण करते हैं - अपने को रोगों से आक्रान्त नहीं होने देते तथा अपनी न्यूनताओं को दूर करते रहते हैं, अर्थात् अपना 'पूरण' करने का ध्यान करते हैं ।

  ५. (उत) और  ६. (नूतनैः)  [नू to Fraise, togo] जो प्रशंसात्मक शब्द ही बोलते हैं - जो कभी निन्दा नहीं करते तथा जो सदा गतिशील हैं - जिनका जीवन क्रियामय है । संक्षेप में भाव यह है कि प्रभु का स्तवन वे करते हैं जो [क] तत्त्वद्रष्टा हैं, [ख] अपने शरीर को रोगों का शिकार नहीं होने देते, [ग] अपनी न्यूनताओं को दूर करने का प्रयत्न करते हैं, [घ] जो प्रशंसात्मक शब्द बोलते हैं - कटु, निन्दात्मक शब्द नहीं बोलते, तथा [ङ] सदा क्रियात्मक जीवन बिताते हैं ।  

७. (सः) वह प्रभु ही इस प्रकार उपासित होकर इह - इस मानव - जीवन में हमें देवान् - दिव्यगुणों को  

८. (आवक्षति) - प्राप्त कराते हैं, अर्थात् प्रभु - उपासना का लाभ यह होता है कि हममें दिव्यगुणों की वृद्धि होती है ।

भावार्थभाषाः -१. प्रभु का सच्चा उपासक वह है, जो ज्ञान प्राप्त करता है, नीरोग व निर्मल है तथा प्रशंसात्मक मधुर शब्द ही बोलता है और क्रियाशील है । २. प्रभु की उपासना का लाभ यह है कि हम में दिव्यगुणों की वृद्धि होती है ।

सूक्त पहला: मंत्र 3

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अ॒ग्निना॑ र॒यिम॑श्नव॒त्पोष॑मे॒व दि॒वेदि॑वे। 

य॒शसं॑ वी॒रव॑त्तमम्॥

agninā rayim aśnavat poṣam eva dive-dive | yaśasaṁ vīravattamam ||

पद पाठ

अ॒ग्निना॑। र॒यिम्। अ॒श्न॒व॒त्। पोष॑म्। ए॒व। दि॒वेऽदि॑वे। य॒शस॑म्। वी॒रव॑त्ऽतमम् ॥

अब परमेश्वर की उपासना और भौतिक अग्नि के उपकार से क्या-क्या फल प्राप्त होता है, सो अगले मन्त्र से उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

निरुक्तकार यास्कमुनि जी ने भी ईश्वर और भौतिक पक्षों को अग्नि शब्द की भिन्न-भिन्न व्याख्या करके सिद्ध किया है, सो संस्कृत में यथावत् देख लेना चाहिये, परन्तु सुगमता के लिये कुछ संक्षेप से यहाँ भी कहते हैं-यास्कमुनिजी ने स्थौलाष्ठीवि ऋषि के मत से अग्नि शब्द का अग्रणी=सब से उत्तम अर्थ किया है अर्थात् जिसका सब यज्ञों में पहिले प्रतिपादन होता है, वह सब से उत्तम ही है। इस कारण अग्नि शब्द से ईश्वर तथा दाहगुणवाला भौतिक अग्नि इन दो ही अर्थों का ग्रहण होता है। (प्रशासितारं० एतमे०) मनुजी के इन दो श्लोकों में भी परमेश्वर के अग्नि आदि नाम प्रसिद्ध हैं। (ईळे०) इस ऋग्वेद के प्रमाण से भी उस अनन्त विद्यावाले और चेतनस्वरूप आदि गुणों से युक्त परमेश्वर का ग्रहण होता है। अब भौतिक अर्थ के ग्रहण में प्रमाण दिखलाते हैं-(यदश्वं०) इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के प्रमाणों से अग्नि शब्द करके भौतिक अग्नि का ग्रहण होता है। यह अग्नि बैल के समान सब देशदेशान्तरों में पहुँचानेवाला होने के कारण वृष और अश्व भी कहाता है, क्योंकि वह कलायन्त्रों के द्वारा प्रेरित होकर देवों=शिल्पविद्या के जाननेवाले विद्वान् लोगों के विमान आदि यानों को वेग से दूर-दूर देशों में पहुँचाता है।

(तूर्णि०) इस प्रमाण से भी भौतिक अग्नि का ग्रहण है, क्योंकि वह उक्त शीघ्रता आदि हेतुओं से हव्यवाट् और तूर्णि भी कहाता है। (अग्निर्वै यो०) इत्यादिक और भी अनेक प्रमाणों से अश्व नाम करके भौतिक अग्नि का ग्रहण किया गया है। (वृषो०) जब कि इस भौतिक अग्नि को शिल्पविद्यावाले विद्वान् लोग यन्त्रकलाओं से सवारियों में प्रदीप्त करके युक्त करते हैं, तब (देववाहनः) उन सवारियों में बैठे हुए विद्वान् लोगों को देशान्तर में बैलों वा घोड़ों के समान शीघ्र पहुँचानेवाला होता है। उस वेगादि गुणवाले अश्वरूप अग्नि के गुणों को (हविष्मन्तः) हवियुक्त मनुष्य कार्यसिद्धि के लिये (ईळते) खोजते हैं। इस प्रमाण से भी भौतिक अग्नि का ग्रहण है ॥१॥

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार से दो अर्थों का ग्रहण है। ईश्वर की आज्ञा में रहने तथा शिल्पविद्यासम्बन्धी कार्य्यों की सिद्धि के लिये भौतिक अग्नि को सिद्ध करनेवाले मनुष्यों को अक्षय अर्थात् जिसका कभी नाश नहीं होता, ऐसा धन प्राप्त होता है, तथा मनुष्य लोग जिस धन से कीर्त्ति की वृद्धि और जिस धन को पाके वीर पुरुषों से युक्त होकर नाना सुखों से युक्त होते हैं, सब को उचित है कि उस धन को अवश्य प्राप्त करें ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कैसा रयिः

पदार्थान्वयभाषाः - इस मन्त्र में ऋषियों द्वारा 'अग्नि - स्तवन' का उल्लेख हुआ है । उस प्रभु के उपासन से मनुष्य सांसारिक दृष्टि से असफल हो जाता हो - ऐसी बात नहीं । यदि प्रभु की उपासना करेंगे तो क्या लक्ष्मी के दर्शन नहीं होंगे? लक्ष्मी तो वहाँ है ही, इसलिए मन्त्र में कहते हैं कि  १. (अग्निना)  अग्नि से रयिम् - धन को  २. (अश्नवत्) प्राप्त करता है । संसार में सामान्यतः देखा यह जाता है कि धन मनुष्य को कुछ अवनति की ओर ले जाता है, परन्तु प्रभु का स्मरण करते हुए जो धन प्राप्त होता है, उस धन की यह विशेषता है कि  ३. ( दिवे - दिवे) दिन - प्रतिदिन  ४. (पोषम् एव) - यह हमारे पोषण का ही कारण बनता है । इससे हमारा किसी प्रकार का हास नहीं होता । यह धन मुझे निधन - मृत्यु की ओर न ले जाकर जीवन की ओर ले जाता है । इस धन को प्राप्त करके मैं  ५. (यशसम्) यशवाला बनता हूँ । धन के अभिमान में मैं ऐसे कार्य नहीं कर बैठता जो कार्य मेरे अपयश का कारण बनें, प्रत्युत यज्ञादि में धन का विनियोग करके यशस्वी होता हूँ ।  हम प्रभु - उपासना से वह धन प्राप्त करते हैं जो  ६. (वीरवत्तमम्) अत्यधिक शक्तिसम्पन्न बनाता है । सामान्यतः धनी पुरुष नौकरों से कार्य कराता हुआ आराम [हराम] का जीवन बिताने लगता है, परिणामतः वह निर्बल हो जाता है । "क्रिया' ही शक्ति को जन्म देती है और क्रिया का अभाव शक्तिक्षय का हेतु होता है । तुलना में बायें हाथ की निर्बलता का हेतु यही है कि वह दाहिने की अपेक्षा कम कार्य करता है । प्रभु - स्मरण के साथ प्राप्त होनेवाला धन हमें क्रियाशील बनाये रहकर वीर बनाता है ।

भावार्थभाषाः -प्रभु का उपासक उस धन को प्राप्त करता है जो [क] उसके पोषण का कारण बनता है, [ख] उसको यशस्वी बनाता है, [ग] उसमें वीरता को जन्म देता है ।

सूक्त पहला: मंत्र 4

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अग्ने॒ यं य॒ज्ञम॑ध्व॒रं वि॒श्वतः॑ परि॒भूरसि॑। 

स इद्दे॒वेषु॑ गच्छति॥

agne yaṁ yajñam adhvaraṁ viśvataḥ paribhūr asi | sa id deveṣu gacchati ||

पद पाठ

अग्ने॒। यम्। य॒ज्ञम्। अ॒ध्व॒रम्। वि॒श्वतः॑। प॒रि॒ऽभूः। असि॑। सः। इत्। दे॒वेषु॑। ग॒च्छ॒ति॒ ॥

उक्त भौतिक अग्नि और परमेश्वर किस प्रकार के हैं, यह भेद अगले मन्त्र में जनाया है-

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

(अग्ने) हे परमेश्वर! आप (विश्वतः) सर्वत्र व्याप्त होकर (यम्) जिस (अध्वरम्) हिंसा आदि दोषरहित (यज्ञम्) विद्या आदि पदार्थों के दानरूप यज्ञ को (विश्वतः) सर्वत्र व्याप्त होकर (परिभूः) सब प्रकार से पालन करनेवाले (असि) हैं, (स इत्) वही यज्ञ (देवेषु) विद्वानों के बीच में (गच्छति) फैलके जगत् को सुख प्राप्त करता है। तथा जो यह (अग्ने) भौतिक अग्नि (यम्) जिस (अध्वरम्) विनाश आदि दोषों से रहित (यज्ञम्) शिल्पविद्यामय यज्ञ को (विश्वतः) जल पृथिव्यादि पदार्थों के आश्रय से (परिभूः) सब प्रकार के पदार्थों में व्याप्त होकर सिद्ध करनेवाला है, (स इत्) वही यज्ञ (देवेषु) अच्छे-अच्छे पदार्थों में (गच्छति) प्राप्त होकर सब को लाभकारी होता है ॥४॥

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जिस कारण व्यापक परमेश्वर अपनी सत्ता से पूर्वोक्त यज्ञ की निरन्तर रक्षा करता है, इसीसे वह अच्छे-अच्छे गुणों को देने का हेतु होता है। इसी प्रकार ईश्वर ने दिव्य गुणयुक्त अग्नि भी रचा है कि जो उत्तम शिल्पविद्या का उत्पन्न करने वाला है। उन गुणों को केवल धार्मिक उद्योगी और विद्वान् मनुष्य ही प्राप्त होने के योग्य होता है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ - रक्षा

पदार्थान्वयभाषाः -गत मन्त्र के अनुसार अग्नि का स्तोता धन को प्राप्त करके उस धन का विनियोग यज्ञादि उत्तम कर्मों में करता है, परन्तु 'उन यज्ञों का भी उसे गर्व न हो जाए', इसके लिए वह प्रभु - स्मरण करता हुआ कहता है कि  १ .(अग्ने) हे सारे कर्मों के संचालक प्रभो! २. (यम्) - जिस  ३. (अध्वरम्) - हिंसा से शून्य यज्ञम् श्रेष्ठतम कर्म को  ४. (विश्वतः) सब ओर से  ५. (परिभूः) - [to surround, to take care of, to goverm] व्याप्त करनेवाले, रक्षा करनेवाले व व्यवस्थित करनेवाले आप हो, ६. (सः) वही यज्ञ  ७. (इत्)  निश्चय से  ८. (देवेषु)  देवताओं में  ९. (गच्छति) - प्राप्त होता है, अर्थात् यज्ञ तो प्रभु ही करते हैं, परन्तु देव उस यज्ञ का माध्यम बन जाते हैं, [निमित्तमात्र भव - गीता]  । वास्तविकता यही है कि संसार में सारे उत्तम कर्म उस प्रभु द्वारा सम्पन्न हो रहे हैं [जीव माध्यम - मात्र है, परन्तु अज्ञानवश हमें उन उत्तम कर्मों का गर्व हो जाता है और यह गर्व ही उन कर्मों की उत्तमता को समाप्त कर देता है । 'दानं दमश्च यज्ञश्च' इन शब्दों में यज्ञ देवीसम्पत्ति में परिगणित हुआ है । यज्ञ देवों में ही होता है [परन्तु यही यज्ञ अभिमानयुक्त होकर किया जाने पर आसुर हो जाता है, असुर उन यज्ञों का गर्व करते हैं और कहते हैं कि 'यध्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः' यज्ञ काँगा - खूब [यश मिलेगा, अतः] आनन्द होगा, इस प्रकार ये असुर आत्मकर्तृत्व के अज्ञान से मूढ बने रहते हैं । 'यजन्ते नामयजैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्' [गीता] - ये असुर केवल नाम के लिए दम्भपूर्वक यज्ञों का ढोंग करते हैं । देव यज्ञ करते हैं और उसे प्रभु - समर्पण कर देते है - 'यत्करोषि यदश्नासि यजुहोषि ददासि यत् । यत् तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्' [गीता] - देव सब क्रियाओं को प्रभु - अर्पण करके कर्तृत्व के अहंकार से बचे रहते हैं । इसप्रकार निर्मम व निरहंकार होकर ही वे प्रभु को प्राप्त करते व शान्त जीवनवाले होते हैं - 'निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति' [गीता] ।

भावार्थभाषाः -भावार्थ - हमारा जीवन यज्ञमय हो और हम उन सब यज्ञों को प्रभु से होता हुआ जानें । उत्तम कर्म करें, परन्तु उनका गर्व न हो । यही 'देव' बनने का मार्ग है ।

सूक्त पहला: मंत्र 5

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

अ॒ग्निर्होता॑ क॒विक्र॑तुः स॒त्यश्चि॒त्रश्र॑वस्तमः। 

दे॒वो दे॒वेभि॒रा ग॑मत्॥

agnir hotā kavikratuḥ satyaś citraśravastamaḥ | devo devebhir ā gamat ||

पद पाठ

अ॒ग्निः। होता॑। क॒विऽक्र॑तुः। स॒त्यः। चि॒त्रश्र॑वःऽतमः। दे॒वः। दे॒वेभिः॑। आ। ग॒म॒त् ॥

फिर भी परमेश्वर और भौतिक अग्नि किस प्रकार के हैं, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

जो (सत्यः) अविनाशी (देवः) आप से आप प्रकाशमान (कविक्रतुः) सर्वज्ञ है, जिसने परमाणु आदि पदार्थ और उनके उत्तम-उत्तम गुण रचके दिखलाये हैं, जो सब विद्यायुक्त वेद का उपदेश करता है, और जिससे परमाणु आदि पदार्थों करके सृष्टि के उत्तम पदार्थों का दर्शन होता है, वही कवि अर्थात् सर्वज्ञ ईश्वर है। तथा भौतिक अग्नि भी स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों से कलायुक्त होकर देशदेशान्तर में गमन करानेवाला दिखलाया है। (चित्रश्रवस्तमः) जिसका अति आश्चर्यरूपी श्रवण है, वह परमेश्वर (देवेभिः) विद्वानों के साथ समागम करने से (आगमत्) प्राप्त होता है। तथा जो (सत्यः) श्रेष्ठ विद्वानों का हित अर्थात् उनके लिये सुखरूप (देवः) उत्तम गुणों का प्रकाश करनेवाला (कविक्रतुः) सब जगत् को जानने और रचनेहारा परमात्मा और जो भौतिक अग्नि सब पृथिवी आदि पदार्थों के साथ व्यापक और शिल्पविद्या का मुख्य हेतु (चित्रश्रवस्तमः) जिसको अद्भुत अर्थात् अति आश्चर्य्यरूप सुनते हैं, वह दिव्य गुणों के साथ (आगमत्) जाना जाता है ॥५॥

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सब का आधार, सर्वज्ञ, सब का रचनेवाला, विनाशरहित, अनन्त शक्तिमान् और सब का प्रकाशक आदि गुण हेतुओं के पाये जाने से अग्नि शब्द करके परमेश्वर, और आकर्षणादि गुणों से मूर्त्तिमान् पदार्थों का धारण करनेहारादि गुणों के होने से भौतिक अग्नि का भी ग्रहण होता है। सिवाय इसके मनुष्यों को यह भी जानना उचित है कि विद्वानों के समागम और संसारी पदार्थों को उनके गुणसहित विचारने से परम दयालु परमेश्वर अनन्त सुखदाता और भौतिक अग्नि शिल्पविद्या का सिद्ध करनेवाला होता है।

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देव का देवों के साथ आगमन

पदार्थान्वयभाषाः -गतमन्त्र की भावना को प्रकट करते हुए कहते हैं कि - १. (अग्निः) सबको गति देनेवाले वे प्रभु ही  २. (होताः)  सब यज्ञों के करनेवाले हैं । प्रभुकृपा से ही हम उन यज्ञों के माध्यम बनते हैं और उन यज्ञों को पूर्ण होता हुआ देखते हैं । सृष्टि - यज्ञ के होता तो वे सर्वमहान् प्रभु स्पष्ट ही हैं ।  ३. ( कविक्रतुः) क्रान्तदर्शी होते हुए वे सब कर्मों के करनेवाले है [कविः क्रान्तदर्शी], इसीलिए उनके सृष्टि आदि कर्मों में अपूर्णता नहीं है "पूर्णमदः पूर्णमिदम्' - प्रभु पूर्ण हैं, अतः यह सृष्टियज्ञ पूर्ण होना ही था । हमें अज्ञानवश कई बार इस सृष्टि में कई न्यूनताएँ प्रतीत होने लगती हैं । भूकम्प आदि का आना घातक लगता है । शरीर में कई ग्रन्थियाँ [glands] निष्प्रयोजन प्रतीत होती हैं । कितने ही प्राणियों व पौधों का उपयोग हमें अज्ञात है, परन्तु जितना - जितना हमारा ज्ञान बढ़ता जाएगा, उतना - उतना हमें संसार पूर्ण प्रतीत होगा । ४. (सत्यः)  वे प्रभु सत्य हैं - सत्यस्वरूप हैं अथवा 'सत्सु भवः ' - सज्जनों में उनका निवास है । सर्वव्यापकता के नाते सर्वत्र होते हुए भी वे सज्जनहदयों में प्रकाशित होते हैं ।  ५. (चित्रश्रवस्तमः)  [चित्र] वे प्रभु सृष्टि के आरम्भ में वेदज्ञान देनेवाले हैं । ज्ञान देने का उनका प्रकार भी अद्भुत है । हृदयस्थ होते हुए वे बिना किसी प्रयास के पवित्र हृदयों को प्रकाशित कर देते हैं । वे प्रभु श्रवस्तमः अत्यन्त कीर्तिमान् हैं अथवा वे प्रभु सर्वाधिक ज्ञानवाले हैं [श्रवस् - श्रुति, ज्ञान], निरतिशय ज्ञान के अधिष्ठान ब्रह्म ही तो हैं ।  [क] वे  ६. (देवः) सब दिव्य गुणों के पुज, ज्योतिर्मय प्रभु  ७. (देवेभिः) देवताओं के साथ  ८. (आगमत्)  आते हैं अर्थात् हृदय में प्रभु का वास होने पर सब दिव्यगुण हममें स्वतः प्रादुर्भूत हो जाते हैं । [ख] अथवा देवेभिः - दिव्यगुणों के द्वारा देवः वे प्रभु हममें आगमत् - आते हैं, अर्थात् प्रभु - प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम अपने आचरण को देव - सदृश बनाएँ - हमारे व्यवहार असुरों - जैसे न हों । हम जितना - जितना दिव्यता को अपनाएँगे उतना - उतना प्रभु के समीप होते जाएँगे ।

भावार्थभाषाः -वे प्रभु 'अग्नि - होता - कविक्रतु - सत्य - चित्रश्रवस्तम व देव' हैं । वे प्रभु दिव्यगुणों के धारण के द्वारा प्राप्त होते हैं, अथवा जितना - जितना हम प्रभु को धारण करने का प्रयत्न करते हैं, उतना - उतना हम दिव्यगुणोंवाले बनते जाते हैं ।

सूक्त पहला: मंत्र 6

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: निचृद्गायत्री स्वर: षड्जः

यद॒ङ्ग दा॒शुषे॒ त्वमग्ने॑ भ॒द्रं क॑रि॒ष्यसि॑। तवेत्तत्स॒त्यम॑ङ्गिरः॥

yad aṅga dāśuṣe tvam agne bhadraṁ kariṣyasi | tavet tat satyam aṅgiraḥ ||

पद पाठ

यत्। अ॒ङ्ग। दा॒शुषे॑। त्वम्। अग्ने॑। भ॒द्रम्। क॒रि॒ष्यसि॑। तव॑। इत्। तत्। स॒त्यम्। अ॒ङ्गि॒रः॒॥

अब अग्नि शब्द से ईश्वर का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

हे (अङ्गिरः) ब्रह्माण्ड के अङ्ग पृथिवी आदि पदार्थों को प्राणरूप और शरीर के अङ्गों को अन्तर्यामीरूप से रसरूप होकर रक्षा करनेवाले हे (अङ्ग) सब के मित्र (अग्ने) परमेश्वर! (यत्) जिस हेतु से आप (दाशुषे) निर्लोभता से उत्तम-उत्तम पदार्थों के दान करनेवाले मनुष्य के लिये (भद्रम्) कल्याण, जो कि शिष्ट विद्वानों के योग्य है, उसको (करिष्यसि) करते हैं, सो यह (तवेत्) आप ही का (सत्यम्) सत्यव्रत=शील है ॥६॥

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

जो न्याय, दया, कल्याण और सब का मित्रभाव करनेवाला परमेश्वर है, उसी की उपासना करके जीव इस लोक और मोक्ष के सुख को प्राप्त होता है, क्योंकि इस प्रकार सुख देने का स्वभाव और सामर्थ्य केवल परमेश्वर का है, दूसरे का नहीं। जैसे शरीरधारी अपने शरीर को धारण करता है, वैसे ही परमेश्वर सब संसार को धारण करता है, और इसी से इस संसार की यथावत् रक्षा और स्थिति होती है ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दाश्वान् का कल्याण

पदार्थान्वयभाषाः -हे ( अङ्ग ) - सम्पूर्ण वस्तुओं को प्राप्त करानेवाले प्रभो । [अगि गतौ - गति - प्राप्ति] ( अग्ने ) सबके अग्रणी प्रभो! आप ( यत् ) - जो यह नियम करते हैं कि ( दाशुषे ) - दाश्वान् [दादाने] के लिए, देनेवाले के लिए अथवा आपके प्रति अपना अर्पण करनेवाले के लिए [वस्तुतः धन को देकर ही तो हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करते हैं, Mammon [धनदेव] व God [महादेव] दोनों की उपासना इकठे थोड़े हुआ करती है! इस दाश्वान् के लिए] ( त्वम् ) [Thou]=आप ( भद्रम् ) - कल्याण को "यद्वै पुरुषस्य वित्तं तद् भद्रं गृहा भद्रं प्रजा भद्रं पशवों भद्रम्' - वित्त - गृह - पशुरूप भद्र को  ( करिष्यसि ) करेंगे  ( तव ) - आपका  ( तत् ) - यह नियम ( इत् ) - निश्चय से ( सत्यम् ) - सत्य है और इस नियम के द्वारा उस दाश्वान् के अंग - प्रत्यंगों में रस का जीवनीशक्ति का संचार करते हुए आप सचमुच 'अंगिरः' - [अंगिरस] अंगों में रस का संचार करनेवाले हैं, जीवन देनेवाले हैं ।  एक बालक माता - पिता के प्रति अपना अर्पण कर देता है - अपनी इच्छा को उनकी इच्छा में मिला देता है तो माता - पिता उसका अधिक ध्यान करते हैं और उसका उत्तम निर्माण करते हैं । इसी प्रकार जब एक दाश्वान् पुरुष प्रभु के प्रति अपने को अर्पित कर देता है तो प्रभु का वह अधिक प्रिय होता है और प्रभु उसे सब आभ्युदयिक वस्तुएँ प्राप्त कराते हैं । जीव की अल्पज्ञता से जीव द्वारा धारण किया गया ऐसा कोई व्रत टूट भी जाए, तदपि परमात्मा का व्रत उसके पूर्ण ज्ञान के कारण टूट नहीं जाता । जीव अल्पज्ञता से कोई ग़लत वस्तु भी दे देता है, परन्तु प्रभु ठीक ही वस्तु देते हैं ।

भावार्थभाषाः -प्रभु दाश्वान् का कल्याण करते हैं - यह उनका सत्य व्रत है ।

सूक्त पहला: मंत्र 7

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम्। 

नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि॥

upa tvāgne dive-dive doṣāvastar dhiyā vayam | namo bharanta emasi ||

पद पाठ

उप॑। त्वा॒। अ॒ग्ने॒। दि॒वेऽदि॑वे। दोषा॑ऽवस्तः। धि॒या। व॒यम्। नमः॑। भर॑न्तः। आ। इ॒म॒सि॒॥

उक्त परमेश्वर कैसे उपासना करके प्राप्त होने के योग्य है, इसका विधान अगले मन्त्र में किया है॥

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

(अग्ने) हे सब के उपासना करने योग्य परमेश्वर ! (वयम्) हम लोग (धिया) अपनी बुद्धि और कर्मों से (दिवेदिवे) अनेक प्रकार के विज्ञान होने के लिये (दोषावस्तः) रात्रिदिन में निरन्तर (त्वा) आपकी (भरन्तः) उपासना को धारण और (नमः) नमस्कार आदि करते हुए (उपैमसि) आपके शरण को प्राप्त होते हैं॥७॥

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

हे सब को देखने और सब में व्याप्त होनेवाले उपासना के योग्य परमेश्वर ! हम लोग सब कामों के करने में एक क्षण भी आपको नहीं भूलते, इसी से हम लोगों को अधर्म करने में कभी इच्छा भी नहीं होती, क्योंकि जो सर्वज्ञ सब का साक्षी परमेश्वर है, वह हमारे सब कामों को देखता है, इस निश्चय से॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के समीप

पदार्थान्वयभाषाः -गतमन्त्र में वर्णित समर्पण को ही स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि - हे ( अग्ने ) - हमें सब आवश्यक पदार्थों को प्राप्त करानेवाले प्रभो! ( वयम् ) - हम ( दिवेदिवे ) - प्रतिदिन ( दोषावस्तः ) - रात्रि और दिन, अर्थात् प्रातः सन्धिवेला और सायं सन्धिवेला में ( धिया ) - बुद्धिपूर्वक कर्मों के द्वारा ( नमः भरन्तः ) - पूजा को प्राप्त करते हुए [स्वकर्मणा तमभ्यर्च - गीता २८४६] त्वा, ( उप ) - आपके समीप ( एमसि ) - [आ इमसि] सर्वथा प्राप्त होते हैं । प्रतिदिन प्रातः - सायं प्रभु - चरणों में उपस्थित होना मानव के लिए इसलिए आवश्यक है कि इससे [क] पवित्रता की भावना बनी रहती है [ख] शक्ति का सञ्चार होता है [ग] जीवन का उद्देश्य धन ही नहीं बनता और परिणामतः पारस्परिक प्रेम विनष्ट नहीं होता ।  वस्तुतः जैसे शरीर के लिए भोजन है, जैसे मस्तिष्क के लिए स्वाध्याय है, उसी प्रकार हृदय के लिए यह "दैनिक ध्यान' है । जैसे भोजन के बिना शरीर निर्बल होकर रोगाक्रान्त हो जाता है, स्वाध्याय के बिना मस्तिष्क दुर्बल होकर ठीक विचार नहीं कर पाता, उसी प्रकार उपासना के बिना हृदय मलिन होकर वासनाओं से अभिभूत हो जाता है । भोजन शरीर को सबल बनाता है, स्वाध्याय मस्तिष्क को तथा उपासना हदय को बलवान् बनाने के लिए आवश्यक है ।

भावार्थभाषाः -हम प्रतिदिन प्रातः - सायं प्रभु का उपासन करनेवाले बनें । दिनभर प्रज्ञापूर्वक कार्यों को करते हुए हम उन्हें प्रभु - चरणों में अर्पित करें । प्रातः शक्ति की याचना करें कि हम प्रज्ञापूर्वक कर्मों को करनेवाले बन पाएँ ।

सूक्त पहला: मंत्र 8

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: यवमध्याविराड्गायत्री स्वर: षड्जः

राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। 

वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॑॥

rājantam adhvarāṇāṁ gopām ṛtasya dīdivim | vardhamānaṁ sve dame ||

पद पाठ

राज॑न्तम्। अ॒ध्व॒राणा॑म्। गो॒पाम्। ऋ॒तस्य॑। दीदि॑विम्। वर्ध॑मानम्। स्वे। दमे॑॥

फिर भी वह परमेश्वर किस प्रकार का है, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

-हम लोग (स्वे) अपने (दमे) उस परम आनन्द पद में कि जिसमें बड़े-बड़े दुःखों से छूट कर मोक्ष सुख को प्राप्त हुए पुरुष रमण करते हैं, (वर्धमानम्) सब से बड़ा (राजन्तम्) प्रकाशस्वरूप (अध्वराणाम्) पूर्वोक्त यज्ञादि अच्छे-अच्छे कर्म धार्मिक मनुष्यों के (गोपाम्) रक्षक (ऋतस्य) सत्यविद्यायुक्त चारों वेदों और कार्य जगत् के अनादि कारण के (दीदिविम्) प्रकाश करनेवाले परमेश्वर को उपासना योग से प्राप्त होते हैं॥८॥

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

विनाश और अज्ञान आदि दोषरहित परमात्मा अपने अन्तर्यामिरूप से सब जीवों को सत्य का उपदेश तथा श्रेष्ठ विद्वान् और सब जगत् की रक्षा करता हुआ अपनी सत्ता और परम आनन्द में प्रवृत्त हो रहा है। उस परमेश्वर के उपासक हम भी आनन्दित, वृद्धियुक्त विज्ञानवान् होकर विज्ञान में विहार करते हुए परम आनन्दरूप विशेष फलों को प्राप्त होते हैं॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु - दर्शन

पदार्थान्वयभाषाः -गतमन्त्र के अनुसार प्रतिदिन प्रातः - सायं प्रभु के समीप उपस्थित होने से हम प्रभु - दर्शन के योग्य बनेंगे और देखेंगे कि वे प्रभु ( राजन्तम् ) - [राजृ दीप्तौ] देदीप्यमान हैं, आदित्यवर्ण हैं, सहस्रों सूर्यों की दीप्ति के समान उनकी दीप्ति है तथा [राज to regulate] वे प्रभु ही सारे संसार को व्यवस्थित कर रहे हैं । उस प्रभु के प्रशासन में ही ये सब ग्रह - नक्षत्र व नदियाँ गति कर रही हैं  ( अध्वराणां गोपाम् ) - वे प्रभु ही सब हिंसारहित यज्ञों के रक्षक हैं । प्रभु की कृपा से ही सब उत्तम कार्य पूर्ण हुआ करते हैं । विजय - मात्र' उस प्रभु की कृपा का ही परिणाम है ।  ( ऋतस्य दीदिविम् ) - सत्य के प्रकाशक हैं । वेदज्ञान द्वारा प्रभु ने सब सत्य विद्याओं का प्रकाश किया है, हमारे सत्य कर्तव्यों का उन वेदों में प्रतिपादन किया है । वे प्रभु ( स्वे दमे ) अपने स्थान में अथवा अपने पूर्ण दान्तरूप में [दमन में] ( वर्धमानम् ) - सदा से बढ़े हुए हैं । वस्तुतः वृद्धि दमन के अनुपात में होती है, जितना दमन उतनी वृद्धि । आदमी तो आदमी बनता ही दमन से है । हम इन इन्द्रियों को वश में करते हैं, मन का दमन करते हैं और वृद्धि को प्राप्त करते हैं । प्रभु में दमन की पराकाष्ठा है, अतः वृद्धि की भी वहाँ चरम सीमा है ।  प्रभु को इस रूप में देखकर स्तोता को भी ध्यान आता है कि वह [क] ज्ञान से देदीप्यमान बनने का प्रयत्न करे - अपने जीवन को नियमित बनाये । [ख] उसका जीवन सदा यज्ञमय हो । [ग] सत्य के प्रकाश को देखने के लिए यत्नशील हो । [घ] मन व इन्द्रियों के दमन से शक्तियों की वृद्धि करनेवाला हो ।

भावार्थभाषाः -प्रभु देदीप्यमान, यज्ञों के रक्षक, ऋत के प्रकाशक व सदा से बढ़े हुए हैं । हम भी अपने जीवन को इसी प्रकार का बनाने का प्रयत्न करें ।

सूक्त पहला: मंत्र 9

देवता: अग्निः ऋषि: मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः छन्द: विराड्गायत्री स्वर: षड्जः

स नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। 

सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥

sa naḥ piteva sūnave gne sūpāyano bhava | sacasvā naḥ svastaye ||

पद पाठ

सः। नः॒। पि॒ताऽइ॑व। सू॒नवे॑। अग्ने॑। सु॒ऽउ॒पा॒य॒नः। भ॒व॒। सच॑स्व। नः॒। स्व॒स्तये॑॥

वह परमेश्वर किस के समान किनकी रक्षा करता है, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषा (Material language):-

हे (सः) उक्त गुणयुक्त (अग्ने) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! (पितेव) जैसे पिता (सूनवे) अपने पुत्र के लिये उत्तम ज्ञान का देनेवाला होता है, वैसे ही आप (नः) हम लोगों के लिये (सूपायनः) शोभन ज्ञान, जो कि सब सुखों का साधक और उत्तम पदार्थों का प्राप्त करनेवाला है, उसके देनेवाले (भव) हूजिये तथा (नः) हम लोगों को (स्वस्तये) सब सुख के लिये (सचस्व) संयुक्त कीजिये॥९॥

भावार्थ भाषाः ( Deep-spirit Language):-

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को उत्तम प्रयत्न और ईश्वर की प्रार्थना इस प्रकार से करनी चाहिये कि-हे भगवन् ! जैसे पिता अपने पुत्रों को अच्छी प्रकार पालन करके और उत्तम-उत्तम शिक्षा देकर उनको शुभ गुण और श्रेष्ठ कर्म करने योग्य बना देता है, वैसे ही आप हम लोगों को शुभ गुण और शुभ कर्मों में युक्त सदैव कीजिये॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पिता - पुत्र के लिए

पदार्थान्वयभाषाः -गतमन्त्र के अनुसार स्तोता प्रभु - दर्शन करता हुआ कहता है कि हे ( अग्ने ) - हमारी उन्नतियों के साधक प्रभो! ( सः ) वह आप ( नः ) हमें, ( सूनवे पिता इव ) - पुत्र के लिए पिता की भाँति, ( सूपायनः ) - [सु+उप - अयनः] सुगमता से समीप होनेवाले, ( भव ) - होओ । पुत्र को पिता से भय नहीं लगता, वहाँ वह प्रेम का अनुभव करता है और निः शङ्क होकर पिता की गोद में पहुँचने की करता है । इसी प्रकार हम भी आपकी गोद में आ सकें । [सु - उपायन] पिता - पुत्र के लिए उत्तमोत्तम उपहार प्राप्त कराता है, आप भी हमें जीवन में उन्नति के लिए आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त कराइए । वस्तुतः आप तो प्राप्त कराते ही हैं, हम भी उन वस्तुओं का ठीक - ठीक प्रयोग करनेवाले बनें । हे प्रभो! सब आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त कराके ( नः ) - हमें  ( स्वस्तये ) [सु - अस्ति] - कल्याण के लिए, उत्तम स्थिति के लिए, ( सचस्व ) - संगत कीजिए । इन वस्तुओं का ठीक प्रयोग कर हम उन्नति को प्राप्त हों अथवा आप हमें प्राप्त होओ ताकि हमारी उत्तम स्थिति बनी रहे । प्रभु से दूर होते ही हम प्रायः मार्ग - भ्रष्ट हो जाते हैं । प्रभु - स्मरण जीवन की घड़ियों को पथभ्रष्ट [Derailed] नहीं होने देता । जैसे पिता की दृष्टि में रहनेवाले बालक का आचरण ठीक बना रहता है, उसी प्रकार प्रभु के सामीप्य में हमारा जीवन उत्तम मार्ग में ही स्थित रहता है ।

भावार्थभाषाः -प्रभु हमारे लिए उसी प्रकार सुगमता से प्राप्त होने योग्य हों जैसे पिता पुत्र के लिए । प्रभु के साथ हमारा मेल हो ताकि हमारी जीवन - स्थिति उत्तम बनी रहे ।  

टिप्पणी: सम्पूर्ण सूक्त का सार प्रथम व अन्तिम मन्त्र से स्पष्ट है । जीव प्रभु की उपासना करता है - अग्निमीळे और चाहता है कि प्रभु उसके लिए इस प्रकार सुगमता से प्राप्त होने योग्य हों जैसे पुत्र के लिए पिता ।

ऋग्वेद-अध्याय(01) सूक्त 02

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