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अन्न ही ब्रह्म है

 

अन्न ही ब्रह्म है

भृगु के पिता वरुण ब्रह्मनिष्ठ ऋषि थे। एक बार भृगुजी की जिज्ञासा हुई कि पिताश्री से ब्रह्म का बोध प्राप्त करना चाहिए । उन्होंने उनके श्रीचरणों में बैठकर प्रश्न किया, मैंने अनेक धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है , किंतु ब्रह्म का बोध नहीं हो पाया । आप सरलतम भाषा में बताने की कृपा करें कि ब्रह्म क्या है ?

          वरुण ने पुत्र के सिर पर हाथ फेरा और बोले, अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोभं मनो वचमिति यानी अन्न, प्राण, तप, विज्ञान, आनंद , मन और वाणी ही ब्रह्म हैं ।

उन्होंने विस्तार से बताते हुए कहा, अन्न से ही ये सब भूत उत्पन्न होते हैं । अन्न खाकर जीते हैं , अतः अन्न ब्रह्म है । इसलिए अन्न को साक्षात् देवता मान कर उसका आदर करने को कहा गया है । प्राण के बिना शरीर का कोई महत्त्व नहीं है । प्राण प्रत्यक्ष ब्रह्म है । ज्ञान -विज्ञान के बिना मानव अधूरा रहता है । तप से ही परमानंद की अनुभूति संभव है । इसके बाद वरुण ने पुत्र को आदेश दिया कि वह स्वयं तप करके ब्रह्म का साक्षात्कार करे । भृगु ने घोर तप किया, तब उन्हें स्वयं अनुभूति हुई कि वास्तव में अन्न, प्राण, तप, विज्ञान , मन और आनंद ही ब्रह्म के साक्षात् स्वरूप हैं । अन्न को सर्वोपरि महत्त्व दिया गया है । शुद्ध कमाई से अर्जित अन्न ही मन- बुद्धि को सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त करता है । अन्न से ही प्राणों की रक्षा होती है । ज्ञान-विज्ञान परमानंद प्राप्ति के साधन हैं ।

इसलिए वस्तुतः ये सभी ब्रह्म के साक्षात् स्वरूप हैं ।


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