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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda kand 3 Sukta 29

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यत् = जब / जो राजानः = राजा / शासक विभजन्त = विभाजित करते हैं / बाँटते हैं इष्टापूर्तस्य = इष्ट (यज्ञादि) और पूर्त (दान, लोककल्याण) कर्मों का षोडशम् = सोलहवाँ भाग यमस्य = यम का / नियंता देव का अमी = ये सभासदः = सभा में बैठे हुए (निर्णायक) अविः = दोष / पाप / अपराध तस्मात् = उससे प्र मुञ्चति = मुक्त करता है दत्तः = दिया हुआ (दान) शितिपात् = पाप-क्षय से / दण्ड से स्वधा = स्वधा-शक्ति / पितरों के लिए अर्पण की शक्ति

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र न्याय, दान और धर्म-संरचना से संबंधित है। “यद् राजानः विभजन्त इष्टापूर्तस्य षोडशम्”—जब राजा इष्ट और पूर्त कर्मों का सोलहवाँ भाग विभाजित करते हैं। ‘इष्ट’ का अर्थ है यज्ञ, हवन आदि वैदिक अनुष्ठान। ‘पूर्त’ का अर्थ है लोककल्याण के कार्य—जैसे कुआँ, तालाब, धर्मशाला आदि बनाना। वैदिक समाज में राजा धर्म का संरक्षक माना जाता था। वह दान और यज्ञ के माध्यम से समाज में संतुलन बनाए रखता था। “यमस्य अमी सभासदः”—ये (राजा या सभासद) यम के समान न्याय करने वाले हैं। यहाँ यम केवल मृत्यु के देवता नहीं, बल्कि न्याय और नियम के प्रतीक हैं। दूसरी पंक्ति कहती है— “अविः तस्मात् प्र मुञ्चति”—यह दान या विभाजन उस व्यक्ति को दोष या पाप से मुक्त करता है। “दत्तः शितिपात् स्वधा”—जो दान स्वधा-भाव से (श्रद्धा और कर्तव्य से) दिया जाता है, वह दण्ड या पतन से रक्षा करता है। दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र बताता है कि धर्मपूर्वक किया गया दान और लोककल्याण व्यक्ति को नैतिक दोषों से मुक्त करता है। सामाजिक दृष्टि से यह शासन और समाज के संबंध को दर्शाता है—कि शासक का कर्तव्य है धर्म और लोकहित का संरक्षण। मनोवैज्ञानिक रूप से ‘दान’ व्यक्ति के भीतर के स्वार्थ को कम करता है और संतोष को बढ़ाता है। आध्यात्मिक रूप से यह शिक्षा देता है कि इष्ट (आध्यात्मिक साधना) और पूर्त (सामाजिक सेवा) दोनों आवश्यक हैं। केवल यज्ञ या केवल सेवा नहीं—दोनों का संतुलन ही पूर्ण धर्म है। यह मन्त्र वैदिक समाज की नैतिक और प्रशासनिक संरचना की झलक देता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: धर्म में साधना और सेवा दोनों का संतुलन आवश्यक है।
  • विज्ञान: न्यायपूर्ण वितरण सामाजिक स्थिरता को बढ़ाता है।
  • ब्रह्मज्ञान: श्रद्धा से किया गया दान आत्मा को पवित्र करता है।

English Explanation

This mantra speaks about kings distributing the sixteenth portion of “Ishta” (sacrificial rites) and “Purta” (charitable works). Such rulers are likened to Yama, the upholder of justice. Charity offered with reverence (Swadha) frees a person from sin and moral downfall. Spiritually, it teaches the balance between spiritual practice and social responsibility. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: True dharma includes both worship and welfare.
  • Science: Just distribution sustains social harmony.
  • Brahma-Gyan: Selfless charity purifies the soul.

Word by Word

सर्वान् = सभी कामान् = इच्छाएँ / अभिलाषाएँ पूरयति = पूर्ण करता है आभवन् = उत्पन्न होकर प्रभवन् = प्रकट होकर / प्रभावशाली होकर भवन् = होता हुआ / बनता हुआ आकूति-प्रः = संकल्प को आगे बढ़ाने वाला / इच्छाशक्ति से प्रेरित अविः = दोष / पाप दत्तः = दिया हुआ (दान) शितिपात् = पतन / दण्ड / विनाश न = नहीं उप दस्यति = समीप आता / प्रभावित करता

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र इच्छा-पूर्ति, संकल्प-शक्ति और धर्मपूर्वक दान के प्रभाव को स्पष्ट करता है। “सर्वान् कामान् पूरयति”—वह (धर्मयुक्त कर्म या दान) सभी इच्छाओं को पूर्ण करता है। यहाँ ‘काम’ का अर्थ केवल भौतिक इच्छाएँ नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यक और उचित अभिलाषाएँ भी हैं। “आभवन् प्रभवन् भवन्”—उत्पन्न होकर, प्रकट होकर और प्रभावशाली बनकर। अर्थात धर्मयुक्त कर्म धीरे-धीरे जीवन में फल देता है—पहले उत्पन्न होता है, फिर विकसित होता है और अंततः प्रभावशाली बनता है। दूसरी पंक्ति में— “आकूतिप्रः”—जो संकल्प से प्रेरित है। संकल्प (आकूति) वैदिक विचार में अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिना शुद्ध संकल्प के कर्म अधूरा है। “अविर्दत्तः”—जो दान स्पष्ट और निष्कपट भाव से दिया गया हो। “शितिपात् न उप दस्यति”—वह पतन या दोष के समीप नहीं ले जाता। अर्थात जो दान श्रद्धा, संकल्प और निष्कपट भाव से दिया जाता है, वह व्यक्ति को पाप या पतन से बचाता है। दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र कर्म और फल के सिद्धांत को पुष्ट करता है। सामाजिक रूप से यह बताता है कि जब व्यक्ति शुद्ध भावना से लोकहित करता है, तो उसकी इच्छाएँ भी संतुलित और शुद्ध हो जाती हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से शुद्ध संकल्प आत्मबल को बढ़ाता है। दान और सेवा व्यक्ति को आंतरिक संतोष देते हैं, जिससे इच्छाओं का संतुलन होता है। आध्यात्मिक रूप से यह शिक्षा देता है कि जब कर्म स्वार्थ से मुक्त और समर्पित होता है, तो वह आत्मा को पतन से बचाता है। यह मन्त्र पूर्व मन्त्र की भावना को आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट करता है कि धर्मयुक्त दान और संकल्प जीवन को उन्नत बनाते हैं। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: शुद्ध संकल्प से किया गया कर्म जीवन को पूर्ण करता है।
  • विज्ञान: सकारात्मक उद्देश्य मनोवैज्ञानिक संतुलन देता है।
  • ब्रह्मज्ञान: निष्कपट दान आत्मा को पतन से बचाता है और चेतना को उन्नत करता है।

English Explanation

This mantra states that righteous action and sincere charity fulfill all worthy desires. When actions arise from pure intention (Akuti) and are offered openly and selflessly, they do not lead to downfall or moral decay. Spiritually, it teaches that sincere intention and selfless giving elevate life and protect one from spiritual decline. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Pure intention fulfills meaningful desires.
  • Science: Positive intention strengthens psychological well-being.
  • Brahma-Gyan: Selfless giving safeguards the soul from decline.

Word by Word

यः = जो ददाति = देता है शितिपादम् = पाप-क्षयकारी / दोष-निवारक अंश अविम् = निर्दोष भाव से / निष्कपट लोकेन = लोकमान्य रीति से / समाजानुसार संमितम् = मापा हुआ / मर्यादित / उचित सः = वह नाकम् = स्वर्गलोक / उच्च अवस्था अभि आरोहति = ऊपर चढ़ता है / प्राप्त करता है यत्र = जहाँ शुल्कः = कर / बलपूर्वक लिया गया मूल्य न क्रियते = नहीं किया जाता अबलेन = निर्बल से बलीयसे = बलवान के लिए

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र दान, न्याय और सामाजिक समानता के आदर्श को प्रस्तुत करता है। “यो ददाति शितिपादम् अविम्”—जो व्यक्ति दोष-निवारक, पाप-क्षयकारी दान निष्कपट भाव से देता है। यहाँ ‘शितिपाद’ का अर्थ ऐसा दान या कर्म है जो पाप को दूर करे। ‘अवि’ का अर्थ है निर्दोष या शुद्ध भाव। “लोकेन संमितम्”—जो लोकमर्यादा और सामाजिक नियमों के अनुसार उचित मात्रा में दिया गया हो। अर्थात दान केवल मात्रा में नहीं, बल्कि मर्यादा और न्याय के अनुसार होना चाहिए। दूसरी पंक्ति में— “स नाकम् अभ्यारोहति”—वह व्यक्ति स्वर्ग या उच्च अवस्था को प्राप्त करता है। ‘नाक’ का अर्थ केवल भौतिक स्वर्ग नहीं, बल्कि उन्नत चेतना और सम्मानित जीवन भी है। “यत्र शुल्को न क्रियते अबलेन बलीयसे”—जहाँ निर्बल से बलवान के लिए कर या मूल्य नहीं लिया जाता। यह अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश है। आदर्श लोक वह है जहाँ कमजोरों का शोषण नहीं होता। यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि न्यायपूर्ण समाज ही स्वर्ग तुल्य है। दार्शनिक दृष्टि से यह धर्म और न्याय का सिद्धांत है—दान और शासन दोनों निष्पक्ष होने चाहिए। सामाजिक दृष्टि से यह शोषण-विरोधी आदर्श प्रस्तुत करता है। बलवान को निर्बल पर अत्याचार नहीं करना चाहिए। मनोवैज्ञानिक रूप से जब व्यक्ति निष्पक्ष और करुणामय होता है, तो उसे आंतरिक शांति मिलती है। आध्यात्मिक रूप से यह मन्त्र बताता है कि सच्चा स्वर्ग वही है जहाँ अन्याय नहीं है। यह सूक्त धर्म, दान और सामाजिक समानता को एक साथ जोड़ता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: न्यायपूर्ण और निष्कपट दान उन्नति का मार्ग है।
  • विज्ञान: शोषण-मुक्त समाज स्थायी और संतुलित होता है।
  • ब्रह्मज्ञान: जहाँ अन्याय नहीं, वही स्वर्ग है।

English Explanation

This mantra says that one who gives righteous and pure charity according to social order ascends to a higher realm (Naka – heaven). That realm is described as a place where the weak are not exploited by the strong, where no unjust tax or oppression exists. Spiritually, it teaches that true heaven is a state of justice and non-exploitation. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Just and sincere giving leads to elevation.
  • Science: A society free from exploitation is stable and harmonious.
  • Brahma-Gyan: True heaven is the realm of justice and compassion.

Word by Word

पञ्च-अपूपम् = पाँच अपूप (पक्व अन्न/पिण्ड) शितिपादम् = पाप-क्षयकारी अंश अविम् = निष्कपट / निर्दोष भाव से लोकेन = लोकमर्यादा के अनुसार संमितम् = मापा हुआ / विधिपूर्वक प्रदाता = देने वाला उप जीवति = समीप निवास करता है / जीवित रहता है पितॄणाम् = पितरों के लोके = लोक में अक्षितम् = अक्षय / न नष्ट होने वाला

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र पितृ-तर्पण, दान और अक्षय फल की भावना को व्यक्त करता है। “पञ्चापूपम्”—पाँच अपूप (पक्व अन्न या पिण्ड) का उल्लेख वैदिक परंपरा में विशेष विधि से जुड़े अर्पण का संकेत है। यह पितरों को अर्पित पिण्ड या दान का प्रतीक हो सकता है। “शितिपादम् अविम्”—जो पाप-क्षयकारी और निष्कपट भाव से दिया गया हो। “लोकेन संमितम्”—जो लोकमर्यादा और विधि के अनुसार मापा गया हो। अर्थात विधिपूर्वक, श्रद्धा और मर्यादा से दिया गया अर्पण। दूसरी पंक्ति में— “प्रदाता उप जीवति”—दाता जीवित रहता है या उसका पुण्य स्थिर रहता है। “पितॄणां लोके अक्षितम्”—वह पितरों के लोक में अक्षय (अविनाशी) फल को प्राप्त करता है। यहाँ ‘पितृलोक’ केवल मृत्यु के बाद का स्थान नहीं, बल्कि वंश परंपरा और स्मृति का भी प्रतीक है। जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि से दान देता है, उसका नाम और पुण्य अक्षय रहता है। दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र बताता है कि दान केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक प्रभाव डालता है। सामाजिक दृष्टि से यह पूर्वजों के सम्मान और परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। मनोवैज्ञानिक रूप से पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्ति में विनम्रता और स्थिरता लाती है। आध्यात्मिक रूप से यह शिक्षा देता है कि श्रद्धा से किया गया कर्म अक्षय होता है। ‘अक्षितम्’ का अर्थ है जो नष्ट न हो। यहाँ यह स्थायी पुण्य और स्मृति का संकेत है। यह मन्त्र दान, कृतज्ञता और परंपरा के संरक्षण का संदेश देता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: विधिपूर्वक और श्रद्धा से दिया गया दान अक्षय फल देता है।
  • विज्ञान: कृतज्ञता और परंपरा सामाजिक स्थिरता को बढ़ाती हैं।
  • ब्रह्मज्ञान: श्रद्धा से किया गया कर्म चेतना में अमर हो जाता है।

English Explanation

This mantra speaks of offering five sacred cakes (Apupa) in a righteous and measured way. The one who gives such an offering with sincerity lives on in the realm of the ancestors (Pitṛ-loka) with undiminished merit. Spiritually, it emphasizes gratitude toward forefathers and the enduring nature of sincere charity. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Proper and sincere offering yields lasting merit.
  • Science: Gratitude and tradition sustain social continuity.
  • Brahma-Gyan: Actions performed with reverence become imperishable.

Word by Word

पञ्च-अपूपम् = पाँच अपूप (पक्व अन्न/पिण्ड) शितिपादम् = पाप-क्षयकारी अंश अविम् = निष्कपट / निर्दोष भाव से लोकेन = लोकमर्यादा के अनुसार संमितम् = मापा हुआ / विधिपूर्वक प्रदाता = दान देने वाला उप जीवति = समीप निवास करता है / स्थिर रहता है सूर्य-मासयोः = सूर्य और मास (चन्द्र/कालचक्र) में अक्षितम् = अक्षय / अविनाशी

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र पूर्व मन्त्र की भावना को आगे बढ़ाते हुए दान के फल को और व्यापक बनाता है। “पञ्चापूपम्”—पाँच अपूप या पवित्र अर्पण। यह वैदिक यज्ञीय अन्न या पिण्ड का प्रतीक है। “शितिपादम् अविम्”—जो पाप-क्षयकारी और निष्कपट भाव से अर्पित हो। “लोकेन संमितम्”—जो विधि, मर्यादा और सामाजिक नियमों के अनुसार मापा गया हो। यह स्पष्ट करता है कि दान केवल मात्रा नहीं, बल्कि भावना और विधि का विषय है। दूसरी पंक्ति में— “प्रदाता उप जीवति”—दाता स्थिर रहता है, उसका पुण्य जीवित रहता है। “सूर्यामासयोः अक्षितम्”—सूर्य और मास (चन्द्र/कालचक्र) में अक्षय। यह अत्यंत गूढ़ अभिव्यक्ति है। सूर्य और मास समय के प्रतीक हैं—दिन और रात, प्रकाश और चक्र। अर्थात दान का फल समय के चक्र में भी अक्षय रहता है। दार्शनिक दृष्टि से यह कर्म के स्थायित्व का सिद्धांत है। समय सब कुछ नष्ट कर देता है, परन्तु धर्मयुक्त कर्म अक्षय रहता है। सामाजिक दृष्टि से यह बताता है कि सद्कर्म की कीर्ति पीढ़ियों तक चलती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जब व्यक्ति निःस्वार्थ दान करता है, तो उसे दीर्घकालीन संतोष मिलता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह शिक्षा देता है कि जो कर्म प्रकाश (सूर्य) और कालचक्र (मास) के साथ सामंजस्य में हो, वही अमर होता है। यह मन्त्र दान को कालातीत बनाता है— सच्चा दान समय से परे है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: विधिपूर्वक और निष्कपट दान अक्षय फल देता है।
  • विज्ञान: सत्कर्म का प्रभाव दीर्घकाल तक समाज में बना रहता है।
  • ब्रह्मज्ञान: समय से परे जो टिके, वही सच्चा धर्म है।

English Explanation

This mantra declares that one who offers five sacred cakes properly and sincerely attains imperishable merit within the realm of the Sun and the Moon—symbols of time itself. It implies that righteous charity transcends time and becomes enduring. Spiritually, it teaches that selfless giving aligned with cosmic order becomes immortal. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Sincere and proper offering yields lasting merit.
  • Science: Good deeds have long-term social impact.
  • Brahma-Gyan: True righteousness transcends time.

Word by Word

इरा इव = इरा (अन्न/पृथ्वी/पोषण शक्ति) के समान न उप दस्यति = कमी नहीं करता / घटाता नहीं समुद्रः इव = समुद्र के समान पयः महत् = महान जल / विपुल जलराशि देवौ = दो देवता स-वासिनौ इव = साथ रहने वाले / संयुक्त रूप से स्थित शितिपान् = शितिपा (पाप-क्षयकारी अर्पण ग्रहण करने वाला) न उप दस्यति = क्षय नहीं करता / हानि नहीं पहुँचाता

हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)

यह मन्त्र दान और उसके अक्षय फल की उपमा द्वारा महिमा का वर्णन करता है। “इरा इव नोप दस्यति”—जैसे इरा (पृथ्वी या अन्न की पोषण शक्ति) कभी कमी नहीं करती, उसी प्रकार धर्मयुक्त दान का फल घटता नहीं। इरा का अर्थ अन्न, वाणी या पृथ्वी की पोषक शक्ति है। यह जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है। “समुद्र इव पयो महत्”—जैसे समुद्र विशाल जलराशि से भरा रहता है और नदियों के आने से भी घटता नहीं, उसी प्रकार सत्कर्म का पुण्य विशाल और अक्षय रहता है। समुद्र यहाँ अनंतता और स्थिरता का प्रतीक है। दूसरी पंक्ति में— “देवौ सवासिनाविव”—जैसे दो देवता साथ निवास करते हैं और परस्पर हानि नहीं पहुँचाते। यह सूर्य-चन्द्र, द्यावापृथिवी या अन्य दिव्य युग्म का संकेत हो सकता है। “शितिपान् नोप दस्यति”—जो शितिपा (पाप-क्षयकारी अर्पण ग्रहण करने वाला) है, वह हानि नहीं करता, अर्थात उसका पुण्य नष्ट नहीं होता। इसका गूढ़ अर्थ है कि जो व्यक्ति धर्मपूर्वक दान करता है, उसका पुण्य समुद्र के समान असीम और इरा के समान पोषणकारी होता है। दार्शनिक रूप से यह स्थायित्व और अनंतता का सिद्धांत है। सत्कर्म का प्रभाव घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। सामाजिक दृष्टि से यह शिक्षा देता है कि दान समाज में समृद्धि को बढ़ाता है, घटाता नहीं। मनोवैज्ञानिक रूप से निःस्वार्थ दान से व्यक्ति का हृदय विस्तृत होता है, संकीर्णता घटती है। आध्यात्मिक रूप से यह बताता है कि धर्मयुक्त कर्म ब्रह्मांडीय व्यवस्था के साथ सामंजस्य रखता है और इसलिए अविनाशी है। यह मन्त्र समुद्र, इरा और देवयुग्म की उपमा से अक्षय पुण्य का चित्र प्रस्तुत करता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: धर्मयुक्त दान कभी घटता नहीं।
  • विज्ञान: उदारता समाज में संसाधनों का संतुलन बढ़ाती है।
  • ब्रह्मज्ञान: अनंत के साथ जुड़ा कर्म स्वयं अनंत हो जाता है।

English Explanation

This mantra compares righteous giving to the earth’s nourishment and the vast ocean that never diminishes despite receiving countless rivers. Similarly, the merit of sacred offering does not decrease. Like two divine powers dwelling together in harmony, such merit remains unharmed and undiminished. Spiritually, it teaches that selfless giving aligned with cosmic order becomes inexhaustible. Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
  • Knowledge: True charity never diminishes.
  • Science: Generosity increases collective abundance.
  • Brahma-Gyan: Actions aligned with infinity become infinite.

शब्दार्थ

कः = कौन इदम् = यह कस्मै = किसको अदात् = दिया कामः = इच्छा / दिव्य संकल्प कामाय = इच्छा की पूर्ति हेतु दाता = देने वाला प्रतिग्रहीता = ग्रहण करने वाला समुद्रम् आविवेश = समुद्र में प्रवेश किया कामेन = इच्छा के द्वारा त्वा प्रति गृह्णामि = मैं तुझे ग्रहण करता हूँ काम एतत् ते = यह सब तेरे लिए इच्छा ही है

हिन्दी व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मन्त्र अत्यंत गूढ़ दार्शनिक भाव रखता है। यहाँ दान और ग्रहण की प्रक्रिया को “काम” अर्थात् इच्छा या दिव्य संकल्प के रूप में देखा गया है। पहली पंक्ति में प्रश्न है— “क इदं कस्मा अदात्?” — यह किसने किसे दिया? उत्तर आता है— “कामः कामाय अदात्” — इच्छा ने इच्छा के लिए दिया। अर्थात् इस सृष्टि में जो कुछ भी आदान-प्रदान हो रहा है, उसका मूल प्रेरक तत्व “काम” है। यहाँ “काम” का अर्थ केवल लौकिक वासना नहीं, बल्कि सृजनात्मक संकल्प शक्ति है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में भी कहा गया— “कामस्तदग्रे समवर्तताधि” — सृष्टि के प्रारंभ में काम (संकल्प) उत्पन्न हुआ। दूसरी पंक्ति में— “कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता” — देने वाला भी काम है, लेने वाला भी काम है। यह अद्वैत की गहरी घोषणा है। दाता और ग्रहीता अलग नहीं, दोनों एक ही चेतना के रूप हैं। “कामः समुद्रम् आविवेश” — काम समुद्र में प्रवेश करता है। समुद्र यहाँ अनंतता का प्रतीक है। इच्छा का अंतिम विलय अनंत ब्रह्म में होता है। अंतिम पंक्ति— “कामेन त्वा प्रति गृह्णामि” — मैं तुझे इच्छा से ग्रहण करता हूँ। “काम एतत् ते” — यह सब तेरे लिए काम ही है। यहाँ यज्ञ या दान के समय कहा जाने वाला मंत्र है— दाता यह स्वीकार करता है कि यह लेन-देन व्यक्तिगत अहंकार से नहीं, बल्कि दिव्य संकल्प से है। दार्शनिक दृष्टि से यह कर्म, इच्छा और ब्रह्म के संबंध को प्रकट करता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से— हर क्रिया के पीछे इच्छा शक्ति होती है। यदि इच्छा शुद्ध है, तो कर्म भी शुद्ध होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से— जब व्यक्ति समझ लेता है कि दाता, ग्रहीता और दान—तीनों एक ही ब्रह्मचेतना के रूप हैं, तब अहंकार समाप्त होता है। यह मन्त्र हमें सिखाता है— दान करते समय “मैं दे रहा हूँ” का भाव न रहे। सिर्फ यह भाव रहे— दिव्य इच्छा अपने आप को अर्पित कर रही है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: हर कर्म के पीछे इच्छा शक्ति कार्य करती है।
  • विज्ञान: मानव व्यवहार का मूल प्रेरक तत्व संकल्प और इच्छा है।
  • ब्रह्मज्ञान: दाता, दान और ग्रहीता — तीनों एक ही परम चेतना के रूप हैं।

English Explanation

This profound mantra declares that desire (Kāma) is the giver and the receiver. Creation itself arises from divine will. When giving is done with the awareness that both the giver and receiver are expressions of one cosmic will, ego dissolves. It teaches non-duality in action — offering becomes sacred when it is seen as divine intention flowing through us. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Every action arises from intention.
  • Science: Human motivation is driven by desire and purpose.
  • Brahma-Gyan: Giver, gift, and receiver are one in the Absolute.

शब्दार्थ

भूमिः = पृथ्वी त्वा = तुझे प्रति गृह्णातु = ग्रहण करे अन्तरिक्षम् = मध्य लोक / आकाश इदं महत् = यह महान (विस्तृत) मा = न अहम् = मैं प्राणेन = प्राण से मा आत्मना = न आत्मबल से मा प्रजया = न संतति से प्रतिगृह्य = ग्रहण करके वि राधिषि = वंचित हो जाऊँ / क्षीण हो जाऊँ / हानि उठाऊँ ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 600 शब्द)

यह मन्त्र दान-ग्रहण की पवित्रता और उसके संतुलन की प्रार्थना है। “भूमिष्ट्वा प्रति गृह्णातु”—पृथ्वी तुझे ग्रहण करे। अर्थात यह अर्पण पृथ्वी की स्थिरता और धैर्य में स्थापित हो। “अन्तरिक्षम् इदं महत्”—यह महान अंतरिक्ष भी तुझे ग्रहण करे। अर्थात यह कर्म केवल व्यक्तिगत न होकर ब्रह्मांडीय व्यवस्था का अंग बने। यहाँ पृथ्वी और अंतरिक्ष दो व्यापक शक्तियों का प्रतीक हैं— स्थिरता और विस्तार। दान या अर्पण को इन दोनों में समाहित किया जा रहा है, जिससे वह सीमित न रहे। दूसरी पंक्ति अत्यंत गहन है— “मा अहं प्राणेन”—मैं अपने प्राण से क्षीण न हो जाऊँ। “मा आत्मना”—मैं अपने आत्मबल से दुर्बल न हो जाऊँ। “मा प्रजया”—मेरी संतति या वंश में कमी न आए। “प्रतिगृह्य वि राधिषि”—ग्रहण करने से मैं वंचित या दुर्बल न हो जाऊँ। यहाँ एक अत्यंत संतुलित वैदिक दृष्टि दिखाई देती है। दान करते समय यह प्रार्थना है कि— मैं दान देकर स्वयं को हानि न पहुँचाऊँ। अर्थात दान विवेकपूर्ण होना चाहिए। दान त्याग है, परंतु आत्म-विनाश नहीं। उदारता है, परंतु अविवेक नहीं। दार्शनिक दृष्टि से यह संतुलन का सिद्धांत है। धर्म वही है जो आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण दोनों को साधे। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह आत्म-संरक्षण का भाव है। व्यक्ति को इतना त्याग नहीं करना चाहिए कि उसका जीवन ही संकट में पड़ जाए। आध्यात्मिक दृष्टि से यह मन्त्र सिखाता है— त्याग और संरक्षण दोनों साथ चलें। पृथ्वी (स्थिरता) और अंतरिक्ष (विस्तार) के मध्य संतुलन ही धर्म है। यह मन्त्र दान को ब्रह्मांडीय संतुलन से जोड़ता है— और साथ ही व्यक्ति की प्राण, आत्मा और संतति की रक्षा की कामना करता है। ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
  • ज्ञान: दान विवेक और संतुलन के साथ होना चाहिए।
  • विज्ञान: संसाधनों का संतुलित उपयोग दीर्घकालिक स्थिरता देता है।
  • ब्रह्मज्ञान: त्याग और आत्म-संरक्षण का संतुलन ही उच्च चेतना का मार्ग है।
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English Explanation

This mantra prays that the offering be accepted by Earth (stability) and the vast mid-space (cosmic expansion). At the same time, it asks: may I not be diminished in my life-force, self, or progeny by this act of giving. It teaches balanced generosity — charity should not destroy one’s own vitality or responsibility. True dharma lies in harmony between giving and sustaining oneself. Knowledge – Science – Brahma-Gyan:
  • Knowledge: Giving must be wise and balanced.
  • Science: Sustainable resource use ensures long-term well-being.
  • Brahma-Gyan: True sacrifice harmonizes expansion with preservation.

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