क्रोध और
संदेह का दुष्परिणाम
राजा धर्मशील हर समय धर्म- कर्म और प्रजा के हित में लगे रहते थे।विद्वानों , शिक्षकों तथा वृद्धों की सेवा के लिए वे स्वयं
तत्पर रहा करते थे । गरीबों की सेवा के लिए उन्होंने राज्य भर में औषधालय खुलवाए
और कुएँ खुदवाए । राज - काज से बचा समय वे संतों के सत्संग और शास्त्र अध्ययन में
बिताते थे। एक दिन किसी बात को लेकर उन्होंने अपनी पत्नी का अपमान कर दिया । संदेह
के कारण वे उसे गालियाँ दे बैठे। कुछ क्षणों के बाद जब उनका क्रोध शांत हुआ, तो उन्हें पत्नी के निर्दोष होने का एहसास
हुआ। संदेह ने क्रोध को जन्म दिया और क्रोध ने उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी , जिस कारण उन्होंने एक निर्दोष और धर्मपरायण
सदाचारी महिला का अपमान कर घोर पाप कर्म कर डाला था ।
मृत्यु के बाद राजा के पाप - पुण्यों का लेखा-जोखा किया गया । दूतों को आदेश
दिया गया कि असंख्य सत्कर्मों से संचित पुण्यों के कारण राजा की जीवात्मा को
दिव्यलोक ले जाया जाए, लेकिन निर्दोष पत्नी के अपमान के कारण इन्हें नरक के रास्ते स्वर्ग ले जाया
जाए । उन्हें नरक के रास्ते ले जाया जा रहा था । उनके असीमित सत्कर्मों के पुण्यों
के कारण नरक लोक में फल भोग रही आत्माओं को अनूठी शांति मिली । यह देख उन्होंने
देवदूतों से कहा , मुझे स्वर्ग
न ले जाओ, यहीं रहने
दो । यदि मेरे कारण इनका दोष कम होता है, तो मेरा यहीं रहना सार्थक होगा ।
इस घटना से यही शिक्षा मिलती है कि बिना सोचे- समझे किसी पर आरोप लगाना और
उसका अपमान करना घोर पाप कर्म है ।
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