ज्ञान खरीदा
नहीं जा सकता
राजा जनश्रुति ने ब्रह्मज्ञानी मुनि रैक्व की विरक्ति और ज्ञान की प्रशंसा
सुनी, तो वे उनका सत्संग-
दर्शन करने के लिए लालायित हो उठे । उन्हें पता चला कि रैक्व बैलगाड़ी में ही
विचरण करते हैं और बैलगाड़ी के नीचे बैठकर ही साधना व तपस्या में लीन रहते हैं ।
उन्होंने भाट को आदेश दिया कि वह पता लगाए कि मुनि रैक्व कहाँ मिलेंगे । कुछ क्षण
बाद भाट ने आकर बताया कि मुनि निर्जन जंगल में बैठे साधनारत हैं ।
राजा जनश्रुति तुरंत गायें, सोने के कंठहार और अन्य सामग्री लेकर रथ पर सवार होकर उनके पास जा पहुंचे ।
मुनि को साष्टांग प्रणाम कर उन्होंने कहा, ये छह सौ गायें, स्वर्णजडित कंठहार तथा रथ आपको भेंट करना चाहता हूँ । उपदेश
देने की कृपा करें । मुनि रैक्व ने कहा, इन गायों , स्वर्णाभूषण व रथ को अपने पास ही रखें । मैं निर्जन वन में ही पूर्ण संतुष्ट
हूँ ।
राजा निराश लौट आया । उन्होंने सोचा कि यदि उससे कई गुना धन- संपत्ति तथा
अपनी पुत्री को भी उन्हें सौंप दूँ, तो शायद उनसे ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । राजा फिर मुनि
रैक्व के पास पहुँचे और कहा , मेरी पुत्री को धर्मपत्नी के रूप में स्वीकारें और इस धन को दहेज समझें । ।
मुनि रैक्व ने उत्तर दिया, राजन् , स्पष्ट जान
लें कि ब्रह्मज्ञान कुछ देकर नहीं खरीदा जा सकता । मैं ज्ञान बेचने का व्यापार
नहीं करता । राजा जनश्रुति यह सुनते ही उनके चरणों में लोट गए । अभिमान दूर होते
ही मुनि रैक्व ने उन्हें ज्ञान प्रदान किया ।

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