*🚩‼️ओ3म्‼️🚩*
🔥संसार में हर व्यक्ति योगी नहीं हो सकता है जो सुख और दुःख से परे हो,, दोनों ही सिद्धांतों में समभाव में रह रहे हैं,, संसार के भेद में निर्लेप भाव से रह रहे हैं,,हर व्यक्ति को सुख और दुःख दोनों ही प्रभावित करते हैं,,क्रोध भी आता है,,कोसाता भी है,,पहली बात तो यह है कि मित्र और शत्रु की पहचान करना दुरूह काम है,,,
हम मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र समझते हैं,, बस यही जीवन का मूल मंत्र है कि हम मित्र को मित्र और शत्रु को शत्रु समझते हैं, हमेशा मीठा मीठा बोलने वाला मित्र कभी भी जब भी कड़वा बोले,, तो समझ लीजिए कि उस मित्र का असली चेहरा यही है मित्र के किसी भी कोने में आपकी प्रति शत्रुता का भाव दबा है, हम पर विस्फोट कर जाता है।
संसार चाणक्य नीति सेवित है,, मित्र का मित्र मित्र होता है,, मित्र का शत्रु शत्रु होता है,,, शत्रु का मित्र शत्रु होता है और शत्रु का शत्रु मित्र होता है। यही दुनिया का नियम है।आप इसी दुनिया में इनके ही बीच में मौजूद हैं,,इस चाणक नीति के मर्म को समझें। यही जीवन की सफलता और असफलता का मानक है वही जो समय का इंतजार करे।
साक्षी कहते हैं कि सब कुछ इलाज की दृष्टि से देखता है,,ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर दृढ़ आस्था बनी रहती है,,,समय हर घाव का करता है,,बस ठीक समय की धैर्य के साथ प्रतीक्षा एक दिन न्याय जरूरी है,,,यह दुनिया अच्छी तरह से अन्याय करे,,लेकिन ईश्वर की न्याय व्यवस्था हमेशा बनी रहेगी।
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*🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩*
*🌷ओ3म् युष्मा इन्द्रो वृणित वृत्रातुर्ये युयमिन्द्रमवृणिध्वं वृत्रातृये प्रोक्षिता स्थ। अग्नये त्वा जुष्टं प्रोखम्याग्नीशोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोखमि। दैव्याय कर्मणे शुन्धध्वं देवयज्यै यद्वोशुद्धः प्राजघ्नुरिदं वस्तच्छुन्धामि।।(यजुर्वेद 0\13 )*
💐अर्थ :- इस मंत्र में लुप्तोपमालंकार है। भगवान ने अग्नि और सूर्य को इसलिए बनाया है कि वे सभी पदार्थों में प्रवेश करके अपने रस और जल को अलग-अलग कर दें, जिससे वे वायु मंडल में पहुंच कर पृथ्वी पर फिर से आके लोकसुख और शुद्धि करने वाले बनें। अग्नि में उत्तम सुख प्राप्त करने के लिए अग्नि में सुगन्धित मद्य के घर से वायु और वृष्टि जल की शुद्धि द्वारा श्रेष्ठ सुख बढ़ाने के लिए प्रीति को उत्तम सुख प्राप्त करना चाहिए जिससे इस संसार के सभी रोग आदि नष्ट होकर शुद्ध गुण प्रकाशित होते रहें। इसी प्रस्ताव के लिए मैं ईश्वर तुम सब लोगों को यज्ञ के निमित्त शुद्धि करने का उपदेश देता हूं कि हे मनुष्यो! लोग तुम परोपकार करने के लिए शुद्ध कर्मों को नित्य करो और कहा रीति से वायु, अग्नि और जल के गुणों को शिल्पक्रिया में शामिल करके अनेक यान आदि यंत्र अपने पुरुषार्थ से सदैव सुख युक्त हो।
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100 Questions based on Rigveda Samhita
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