पितृ-धन का विषम विभाजन न करे―


भ्रातॄणामविभक्तानां यद्युत्थानं भवेत्सह।

 न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात्कथञ्चन॥२१५॥ (९०)


(अविभक्तानां भ्रातॄणां यदि सह उत्थानं भवेत्) सम्मिलित रूप में रहते हुए सब भाइयों ने यदि साथ मिलकर धन इकट्ठा किया हो तो (पिता) पिता (कथञ्चन पुत्रभागं विषमं न दद्यात्) किसी भी प्रकार पुत्रों के भाग को विषम अर्थात् किसी को अधिक किसी को कम रूप में न बांटे, सभी को बराबर दे॥२१५॥


ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम्। 

संसृष्टास्तेन वा स्युर्विभजेत स तैः सह॥२१६॥ (९१)


(विभागात् ऊर्ध्वं जातः तु) धन का बंटवारा करके [पिता की जीवित अवस्था में ही] पुत्रों के अलग हो जाने पर यदि कोई पुत्र उत्पन्न हो जाये तो (पित्र्यम्+एव धनं हरेत्) वह पिता के अंश के धन को ले ले (वा) अथवा (ये तेन संसृष्टाः स्युः) जो कोई पुत्र पिता के साथ सम्मिलित रूप में रह रहे हों तो (सः तैः सह विभजेत) वह उन सबके समान भाग प्राप्त करे॥२१६॥


इकलौते सन्तानहीन पुत्र के धन का उत्तराधिकार―


अनपत्यस्य पुत्रस्य माता दायमवाप्नुयात्। 

मातर्यपि च वृत्तायां पितुर्माता हरेद्धनम्॥२१७॥ (९२)


(अनपत्यस्य पुत्रस्य दायम्) सन्तानहीन और पत्नीहीन पुत्र के धन को (माता+अवाप्नुयात्) माता प्राप्त करे (च) और (मातरि+अपि वृत्तायाम्) माता मर गई हो तो (पितुः माता धनं हरेत्) पिता की माता अर्थात् दादी उसके धन को ले ले॥२१७॥ 


ऋणे धने च सर्वस्मिन् प्रविभक्ते यथाविधि। 

पश्चाद् दृश्येत यत्किंचित्तत्सर्वं समतां नयेत्॥२१८॥ (९३)


(सर्वस्मिन् ऋणे च धने) पिता के सारे ऋण और धन का (यथा-विधि प्रविभक्ते) विधिपूर्वक बंटवारा हो जाने पर (यत् किंचित् पश्चात् दृश्यते) यदि बाद में कुछ ऋण और धन के शेष रहने का पता लगे तो (तत् सर्वं समतां नयेत्) उस सबको भी समान रूप में बांट लें॥२१८॥


(१८) द्यूत-सम्बन्धी विवाद का निर्णय 

[२२०-२५०]


अयमुक्तो विभागो वः पुत्राणां च क्रियाविधिः। 

क्रमशः क्षेत्रजादीनां द्यूतधर्मं निबोधत॥२२०॥ (९४)


(अयम्) यह [९.१०३-२१९] (वः) तुमको (विभागः) दायभाग का विधान (च) और (क्षेत्रज+आदीनां पुत्राणां क्रियाविधिः) 'क्षेत्रज' आदि पुत्रों को [९.१४५-१४७] धन का भाग देने की विधि (क्रमश: उक्तः) क्रमशः कही। अब (द्यूतधर्मं निबोधत) जुआ-सम्बन्धी विधान सुनो―॥२२०॥ 


राष्ट्रघातक जुआ आदि का पूर्ण निवारण―


द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रान्निवारयेत्। 

राजान्तकरणावेतौ द्वौ दोषौ पृथिवीक्षिताम्॥२२१॥ (९५)


(राजा) राजा (द्यूतम्) जड़ वस्तुओं से बाजी लगाकर खेले जाने वाले 'जुआ' को (च) और (समाह्वयम्+एव) चेतन प्राणियों को दाव पर लगाकर खेल जाने वाले 'समाह्वय' नामक 'जुआ' को [२२३] (राष्ट्रात् निवारयेत्) अपने देश से समाप्त कर दे, क्योंकि (एतौ द्वौ दोषौ) ये दोनों बुराइयाँ (पृथिवीक्षितां राजान्तकरणौ) राजाओं के राज्य को नष्ट-भ्रष्ट कर देने वाली हैं॥२२१॥


जुआ एक तस्करी है―


प्रकाशमेतत्तास्कर्यं यद् देवनसमाह्वयौ।

तयोर्नित्यं प्रतीघाते नृपतिर्यत्नवान् भवेत्॥२२२॥ (९६)


(यत् देवन-समाह्वयौ) ये जो 'जुआ' और 'समाह्वय' है (एतत् प्रकाशं तास्कर्यम्) ये प्रत्यक्ष में होने वाली तस्करी=चोरी-ठगी हैं (नृपतिः) राजा (तयोः प्रतीघाते) इनको समाप्त करने के लिये (नित्यं यत्नवान् भवेत्) सदा प्रयत्नशील रहे॥२२२॥ 


द्यूत और समाह्वय में भेद―


अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमुच्यते।

प्राणिभिः क्रियते यस्तु स विज्ञेयः समाह्वयः॥२२३॥ (९७)


(अप्राणिभिः यत् क्रियते) बिना प्राणियों अर्थात् जड़ [ताश, पासा, कौड़ी, गोटी आदि] वस्तुओं के द्वारा बाजी लगाकर जो खेल खेला जाता है (लोके तत् 'द्यूतम्' उच्यते) लोक में उसे 'द्यूत'=जुआ कहा जाता है और (यः तु) जो (प्राणिभिः क्रियते) चेतन प्राणियों [मनुष्य, मुर्गा, तीतर, बटेर, घोड़ा आदि] के द्वारा बाजी लगाकर जो खेल खेला जाता है (सः 'समाह्वयः' विज्ञेयः) उसे 'समाह्वय' कहा जाता है॥२२३॥ 


द्यूतं समाह्वयं चैव यः कुर्यात्कारयेत वा।

तान्सर्वान् घातयेद्राजा शूद्रांश्च द्विजलिङ्गिनः॥२२४॥ (९८)


(राजा) राजा (यः) जो मनुष्य (द्यूतं च समाह्वयम्+एव) 'जुआ' और 'समाह्वय' (कुर्यात् वा कारयेत) स्वयं खेले या दूसरों से खिलाये (तान् सर्वान्) उन सबको (च) और (द्विजलिङ्गिनः शूद्रान्) कपटपूर्वक द्विजों के वेश में रहने वाले या उनका वेश धारण उनकी जीविका करने वाले शूद्रों को (घातयेत्) शारीरिक दण्ड [ताड़ना, कारावास, अंगच्छेदन] आदि दे॥२२४॥


कितवान्कुशीलवान्क्रूरान् पाखण्डस्थांश्च मानवान्।

विकर्मस्थाञ्छौण्डिकांश्च क्षिप्रं निर्वासयेत्पुरात्॥२२५॥ (९९)


(च) और (कितवान्) जुआरियों, (कुशीलवान्) अश्लील-असभ्य नाच-गानों से जीविका करनेवाले, (क्रूरान्) क्रूर=अत्याचार करने वाले, (पाखण्डस्थान्) पाखण्ड करके जीविका कमाने वाले, (विकर्मस्थान्) शास्त्रविरुद्ध बलात्कार चोरी आदि बुरे कर्म करने वाले, (शौण्डिकान्) शराब बनाने-बेचने, और पीने वाले (मानवान्) मनुष्यों को (पुरात् क्षिप्रं निर्वासयेत्) राजा अपने राज्य से यथा शीघ्र बाहर निकाल दे॥२२५॥


एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नतस्कराः।

विकर्मक्रियया नित्यं बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः॥२२६॥ (१००)


(एते प्रच्छन्न-तस्कराः) ये [९.२२५] छुपे हुए तस्कर=चोर-ठग (राष्ट्रे वर्तमानाः) राज्य में रहकर (विकर्मक्रियया) गलत और बुरे कामों को कर-करके (नित्यम्) सदा (राज्ञः) राजाओं और (भद्रिकाः प्रजाः) सज्जन प्रजाओं को (बाधन्ते) हानि और दुःख पहुंचाते रहते हैं॥२२६॥


द्यूतमेतत्पुरा कल्पे दृष्टं वैरकरं महत्। 

तस्माद् द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान्॥२२७॥ (१०१)


(एतत् द्यूतम्) यह 'जुआ' (पुराकल्पे महत् वैरकरं दृष्टम्) अब से पहले समय में भी महान् कष्ट एवं शत्रुता पैदा करने वाला देखा गया है (तस्मात्) इसलिए (बुद्धिमान्) बुद्धिमान् मनुष्य (हास्यार्थम्+अपि द्यूतं न सेवेत) मनोरंजन और हंसी-मजाक में भी 'जुआ' न खेले॥२२७॥ 


प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः।

तस्य दण्डविकल्पः स्याद्यथेष्टं नृपतेस्तथा॥२२८॥ (१०२)


(प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा) छुपकर वा सबके सामने (यः नरः तत् निषेवेत) जो मनुष्य 'जुआ' खेले (तस्य दण्डविकल्पः) उसका दण्ड-विधान निर्धारित नहीं है (नृपतेः यथेष्टं स्यात्) वह राजा की इच्छानुसार होता है, अर्थात् जुआ असह्य दुष्कर्म है [ २२१, २२४] उससे होने वाली हानि को देखकर राजा जो भी चाहे अधिक दण्ड दे दे॥२२८॥


मुकद्दमों के अन्त में उपसंहार―


रिश्वत लेकर अन्याय करने वालों को दण्ड―


ये नियुक्तास्तु कार्येण हन्युः कार्याणि कार्यिणाम्। 

धनोष्मणा पच्यमानास्तान्निःस्वान्कारयेन्नृपः॥२३१॥ (१०३)


(कार्येषु नियुक्ताः तु ये) राजकार्यों और मुकद्दमों के निर्णयों में राजा द्वारा लगाये गये जो अधिकारी-कर्मचारी (धन+उष्मणा पच्यमानाः) धन की गर्मी अर्थात् रिश्वत आदि के लालच में (कार्यिणां कार्याणि हन्युः) वादी-प्रतिवादियों के मुकद्दमों और कामों को बिगाड़ें (नृपः) राजा (तान् निःस्वान् कारयेत्) उनकी सारी संपत्ति छीन ले॥२३१॥


निर्णयों में कपट करने वालों को दण्ड―


कूटशासनकर्तॄंश्च प्रकृतीनां च दूषकान्। 

स्त्रीबालब्राह्मणघ्नांश्च हन्याद् द्विट्सेविनस्तथा॥२३२॥ (१०४)


(च) और (कूटशासनकर्तॄन्) राजा के निर्णयों में कपट करने वाले या उनको कपटपूर्वक लिखने वाले, (प्रकृतीनां दूषकान्) प्रकृति=प्रजा, मन्त्री, सेनापति आदि को [९.२९४] रिश्वत आदि बुरे कार्यों में फंसाकर बिगाड़ने वाले, (स्त्री-बाल-ब्राह्मणघ्नान् च) स्त्रियों, बच्चों और विद्वान् ब्राह्मणों की हत्या करने वाले, (तथा) तथा (द्विट्-सेविनः) शत्रु से मिले हुए जन, इनको (हन्यात्) वध से दण्डित करे अर्थात् इनको कठोर से कठोर और कष्टप्रद शारीरिक दण्ड दे॥२३२॥


ठीक निर्णय को किसी दबाव या लालच में आकर न बदले―


तीरितं चानुशिष्टं च यत्र क्वचन यद्भवेत्। 

कृतं तद्धर्मतो विद्यान्न तद्भूयो निवर्तयेत्॥२३३॥ (१०५)


(यत्र क्वचन) जहां किसी मुकद्दमे में (तीरितम्) ठीक निर्णय किया जा चुका हो (च) और (अनुशिष्टं भवेत्) किसी दण्ड का आदेश भी दिया जा चुका हो (धर्मतः तत् कृतं विद्यात्) धर्मपूर्वक किये उस निर्णय को पूरा हुआ जानना चाहिये (तत् भूयः न निवर्तयेत्) उस मुकद्दमे का पुनः निर्णय बार-बार न बदले [यह लोभ या ममत्व आदि के कारण अथवा अकारण निर्णय न बदलने का कथन है, कारण विशेष होने पर तो पुनः निर्णय का कथन किया गया है (८.११७; ९.२३४)]॥२३३॥ 


अमात्यों और न्यायाधीशों को अन्याय करने पर दण्ड―


अमात्याः प्राड्विवाको वा यत्कुर्युः कार्यमन्यथा।

तत्स्वयं नृपतिः कुर्यात्तान्सहस्रं च दण्डयेत्॥२३४॥ (१०६)


(अमात्याः वा प्राड्विवाकः) मंत्री अथवा न्यायाधीश (यत् कार्यम्+अन्यथा कुर्युः) जिस काम या मुकद्दमे के निर्णय को गलत या अन्यायपूर्वक कर दें तो (तत्) उस मुकद्दमे के निर्णय को (नृपतिः) राजा (स्वयं कुर्यात्) स्वयं देखकर ठीक करे (च) और (तान्) अन्याय करने वाले उन अधिकारियों को (सहस्रं दण्डयेत्) एक हजार पण [८.१३६] दण्ड से दण्डित करे॥२३४॥


यावानवध्यस्य वधे तावान् वध्यस्य मोक्षणे।

अधर्मो नृपतेर्दृष्टो धर्मस्तु विनियच्छतः॥२४९॥ (१०७)


(नृपतेः) राजा को (अवध्यस्य वधे) अदण्डनीय को दण्ड देने पर (यावान्+अधर्मः दृष्टः) जितना अधर्म=अन्याय होना शास्त्र में माना गया है (तावान् वध्यस्य मोक्षणे) उतना ही दण्डनीय को छोड़ने में अधर्म=अन्याय होता है (विनियच्छतः तु धर्मः) न्यायानुसार दण्ड देना ही धर्म है॥२४९॥ 


उदितोऽयं विस्तरशो मिथो विवदमानयोः।

अष्टादशसु मार्गेषु व्यवहारस्य निर्णयः॥२५०॥ (१०८)


(अयम्) यह [८.१ से ९.२४९ तक] (मिथः विवदमानयोः) परस्पर विवाद=मुकद्दमा करने वाले वादी-प्रतिवादियों के (अष्टादशसु मार्गेषु) अठारह प्रकार के (व्यवहारस्य निर्णयः) मुकद्दमों का निर्णय (विस्तरशः उदितः) विस्तारपूर्वक कहा॥२५०॥ 


एवं धर्म्याणि कार्याणि सम्यक्कुर्वन् महीपतिः। 

देशानलब्धांल्लिप्सेत लब्धांश्च परिपालयेत्॥२५१॥ (१०९)


(एवम्) इस पूर्वोक्त कही विधि के अनुसार (धर्म्याणि कार्याणि कुर्वन्) धर्मयुक्त कार्यों को करता हुआ न्यायानुसार शासन करता हुआ (महीपतिः) राजा (अलब्धान् देशान् लिप्सेत) अप्राप्त देशों को प्राप्त करने की इच्छा करे (च) और (लब्धान् परिपालयेत्) प्राप्त किये देशों का भलीभांति पालन करे॥२५१॥


राजा द्वारा लोककण्टकों का निवारण― 

(९.२५२ से ३२५ तक)


सम्यङ् निविष्टदेशस्तु कृतर्दुगश्च शास्त्रतः। 

कण्टकोद्धरणे नित्यमातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम्॥२५२॥ (११०)


राजा (सम्यक् निविष्टदेशः) अच्छे सस्यादि-सम्पन्न देश का आश्रय करके (च) और वहां (शास्त्रतः कृतदुर्गः) शास्त्रानुसार विधि [७.६९] से किला बनाकर (कण्टकोद्धरणे) अपने राज्य से कंटकों='प्रजा या शासन को पीड़ित करने वाले लोगों' को [२५६-२६०] दूर करने में (नित्यम् उत्तमं यत्नम्+आतिष्ठेत्) सदा अधिकाधिक यत्न करे॥२५२॥


रक्षणादार्यवृत्तानां कण्टकानां च शोधनात्। 

नरेन्द्रास्त्रिदिवं यान्ति प्रजापालनतत्पराः॥२५३॥ (१११)


(आर्यवृत्तानां रक्षणात्) श्रेष्ठ आचरण वाले व्यक्तियों की रक्षा करने से (च) और (कण्टकानां शोधनात्) कण्टकों=कष्टदायक दुष्ट व्यक्तियों को दण्डित करने से (प्रजापालनतत्परा: नरेन्द्राः) प्रजाओं के पालन करने में तत्पर रहने वाले राजा (त्रिदिवं यान्ति) विस्तृत राज्य के उत्तम सुख को भोगते हैं॥२५३॥


अशासंस्तस्करान्यस्तु बलिं गृह्णाति पार्थिवः। 

तस्य प्रक्षुभ्यते राष्ट्र स्वर्गाच्च परिहीयते॥२५४॥ (११२)


(यः तु पार्थिवः) जो राजा (तस्करान् अशासन्) ठग-चोर [९.२५७] आदि को नियंत्रित-दण्डित न करता हुआ (बलिं गृह्णाति) प्रजाओं से कर आदि ग्रहण करता है (तस्य राष्ट्र प्रक्षुभ्यते) उसके राष्ट्र में निवास करने वाली प्रजाएं क्षुब्ध होकर विद्रोह कर देती हैं (च) और वह (स्वर्गात् परिहीयते) राज्यसुख से विहीन हो जाता है॥२५४॥


निर्भयं तु भवेद्यस्य राष्ट्र बाहुबलाश्रितम्। 

तस्य तद्वर्धते नित्यं सिच्यमान इव द्रुमः॥२५५॥ (११३)


(यस्य बाहुबलाश्रितम्) जिस राजा के बाहुबल=सुरक्षा के सहारे (राष्ट्रं निर्भयं तु भवेत्) राष्ट्र अर्थात् प्रजाएं [चोर आदि से] निर्भय रहती है (तस्य तत्) उसका वह राज्य (सिच्यमानः द्रुमः इव) सींचे गये वृक्ष की भाँति (नित्यं वर्धते) सदा बढ़ता रहता है॥२५५॥


दो प्रकार के तस्कर लोककण्टक हैं―


द्विविधांस्तस्करान् विद्यात् परद्रव्यापहारकान्। 

प्रकाशांश्चाप्रकाशांश्च चारचक्षुर्महीपतिः॥२५६॥ (११४)


(चारचक्षुः महीपतिः) गुप्तचर ही हैं नेत्र जिसके अर्थात् गुप्तचरों के द्वारा सब प्रजा का काम देखने वाला राजा (प्रकाशान् च+अप्रकाशान् परद्रव्य+अपहारकान्) प्रकट और गुप्त रूप से दूसरों के द्रव्यों को चुराने वाले (द्विविधान् तस्कार विद्यात्) दोनों प्रकार के चोरों की जानकारी रखे॥२५६॥ 


प्रकाशवञ्चकास्तेषां नानापण्योपजीविनः।

प्रच्छन्नवञ्चकास्त्वेते ये स्तेनाटविकादयः॥२५७॥ (११५)


(तेषाम्) उन दोनों प्रकार के चोरों में (नानापण्य-उपजीविनः प्रकाशवञ्चकाः) नाना प्रकार के व्यापारी जो देखते-देखते माप, तोल या मूल्य में हेराफेरी करके ठगते हैं वे 'प्रकट-चोर' हैं (ये) और जो (स्तेनआटविकादयः) जंगल आदि में छिपे रहकर चोरी, राहगीरी आदि करने वाले हैं (ते) वे (प्रच्छन्नवञ्चकाः) 'गुप्तचोर' हैं॥२५७॥ 


लोककण्टकों की गणना―


उत्कोचकाश्चौपधिका वञ्चकाः कितवास्तथा। 

मङ्गलादेशवृत्ताश्च भद्राश्चेक्षणिकैः सह॥२५८॥ 

असम्यक्कारिणश्चैव महामात्राश्चिकित्सकाः। 

शिल्पोपचारयुक्ताश्च निपुणा: पण्ययोषितः॥२५९॥ 

एवमादीन्विजानीयात्प्रकाशांल्लोककण्टकान्। 

निगूढचारिणश्चान्याननार्यानार्यलिङ्गिनः॥२६०॥ (११६-११८)


(उत्कोचकाः) रिश्वतखोर, (औपधिकाः) भय दिखाकर धन ऐंठने वाले (वञ्चकाः) ठग, (कितवाः) जुआरी (मंगलादेशवृत्ताः) 'तुम्हें पत्र या धन प्राप्ति होगी' इत्यादि मांगलिक बातों को कहकर धन लूटने वाले, (भद्राः) साधु-संन्यासी आदि भद्ररूप धारण करके धन ठगने वाले, (ईक्षणिकैः सह) हाथ आदि देखकर भविष्य बताकर धन ठगने वाले, (असम्यक्-कारिणः महामात्राः) धन, वस्तु आदि लेकर गलत काम करने वाले उच्च कर्मचारी [मन्त्री आदि], (चिकित्सकाः) अनुचित मात्रा में धन लेने वाले या अयोग्य चिकित्सक (शिल्पोपचारयुक्ताः) अनुचित मात्रा में धन लेने वाले शिल्पी [चित्रकार आदि], (निपुणाः पण्ययोषितः) धन ठगने में चतुर वेश्याएं (एवम्+आदीन्) इत्यादियों को (च) और (अन्यान्) दूसरे जो (आर्यलिङ्गिनः निगूढचारिणः अनार्यान्) श्रेष्ठों का वेश या चिह्न धारण करके गुप्तरूप से विचरण करने वाले दुष्ट या बुरे व्यक्ति हैं, उनको (प्रकाशान् लोककण्टकान् विजानीयात्) प्रकट लोककण्टक=प्रजाओं को पीड़ित करने वाले व्यक्ति समझे और उनकी जानकारी रखे॥२५८-२६०॥


तान्विदित्वा सुचरितैर्गुढैस्तत्कर्मकारिभिः।

चारैश्चानेकसंस्थानैः प्रोत्साद्य वशमानयेत्॥२६१॥ (११९)


(तत् कर्मकारिभिः) जिस विषय में जानकारी प्राप्त करनी है वैसा ही कर्म करने में चतुर, (गूढैः) गुप्त रहने वाले (सुचरितैः) अच्छे आचरण वाले (अनेकसंस्थानैः) अनेक स्थानों में नियुक्त (चारैः) गुप्तचरों के द्वारा (तान् विदित्वा) उन ठगों या लोककण्टकों को मालूम करके (च) और फिर (प्रोत्साद्य) उन्हें पकड़कर (वशम्+आनयेत्) अपने वश में करे, कारागृह में रखे अर्थात् उन पर ऐसा नियंत्रण रखे कि वे पुनः ऐसे काम न कर पायें॥२६१॥ 


तेषां दोषानभिख्याप्य स्वे स्वे कर्मणि तत्त्वतः।

कुर्वीत शासनं राजा सम्यक् सारापराधतः॥२६२॥ (१२०)


(राजा) राजा (स्वे स्वे कर्मणि तेषां दोषान् तत्त्वत:+अभिख्याप्य) जो-जो उन्होंने बुरा काम किया है भलीभांति उनके दोषों की सही-सही घोषणा करके (सार अपराधतः) उनके बल और अपराध के अनुसार (सम्यक् शासनं कुर्वीत) न्यायोचित दण्ड से दण्डित करे॥२६२॥


नहि दण्डादृते शक्यः कर्तुं पापविनिग्रहः। 

स्तेनानां पापबुद्धीनां निभृतं चरतां क्षितौ॥२६३॥ (१२१)


(स्नेतानाम्) प्रकट चोरों, (क्षितौ निभृतं चरताम्) पृथ्वी पर गुप्तरूप से विचरण करने वाले चोरों या अन्य अपराधियों तथा (पापबुद्धीनाम्) पाप कर्म में बुद्धि रखने वालों के (पापविनिग्रहः) पापों पर नियंत्रण (दण्डात्+ऋते नहि कर्तुं शक्यः) दण्ड के बिना नहीं हो सकता, अतः दण्ड देने में कभी प्रमाद या शिथिलता न करें॥२६३॥ 


गुप्तचरों द्वारा किन स्थानों से अपराधों का पता लगाये―


सभाप्रपापूपशालावेशमद्यान्नविक्रयाः। चतुष्पथाश्चैत्यवृक्षाः समाजाः प्रेक्षणानि च॥२६४॥ जीर्णोद्यानान्यरण्यानि कारुकावेशनानि च। 

शून्यानि चाप्यगाराणि वनान्युपवनानि च॥२६४॥ एवंविधान्नृपो देशान्गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः। तस्करप्रतिषेधार्थं चारैश्चाप्यनुचारयेत्॥२६६॥ (१२२-१२४)


(सभा-प्रपा+अपूपशाला) सभाओं के आयोजन स्थल, प्याऊ, मालपूआ आदि बेचने का स्थान [भोजनालय, हलवाइयों की दुकान आदि], (वेश-मद्य-अन्न-विक्रयाः) बहुरूपी वेशभूषा, मद्य तथा अनाज बेचने का स्थान [मण्डी आदि], (चतुष्पथाः) चौराहे, (चैत्यवृक्षाः) प्रसिद्धवृक्ष जहां लोग इकट्ठे होकर बैठते हैं, (समाजाः) सार्वजनिक स्थान, (प्रेक्षणानि) मनोरंजन के स्थान, (जीर्ण+उद्यान+अरण्यानि) पुराने बगीचे और जंगल, (कारुक+आवेशनानि) शिल्पगृह=शिल्प विक्रय स्थान आदि (शून्यानि अगाराणि) सूने पड़े हुए घर, (वनानि च उपवनानि) वन और उपवन, (राजा) राजा (एवंविधान् देशान्) ऐसे स्थानों में (तस्कर-प्रतिषेधार्थम्) चोरों-ठगों के निवारण के लिए (स्थावर-जङ्गमैः गुल्मैः) एक स्थान पर (पुलिस चौकी बनाकर) रहने वाले और गश्त लगाने वाले सिपाहियों के दलों को (च) और (चारैः) गुप्तचरों को (अनुचारयेत्) विचरण कराये या नियुक्त करके उनको नियंत्रित करे॥२६४-२६६॥


तत्सहायैरनुगतैर्नानाकर्मप्रवेदिभिः। 

विद्यादुत्सादयेच्चैव निपुणैः पूर्वतस्करैः॥२६७॥ (१२५)


(तत् सहायैः+अनुगतैः) उन चोर आदि के सहायकों और अनुगामियों से (नानाकर्मप्रवेदिभिः निपुणैः पूर्वतस्करैः) अनेक प्रकार के कर्मों को जानने वाले चतुर भूतपूर्व चोरों से भी (विद्यात्) चोरों का पता लगावे (च) और पता लगने पर उन्हें (उत्सादयेत्) दण्डित करें॥२६७॥


भक्ष्यभोज्योपदेशैश्च ब्राह्मणानां च दर्शनैः। 

शौर्यकर्मापदेशैश्च कुर्युस्तेषां समागमम्॥२६८॥ (१२६)


वे सहयोगी या गुप्तचर लोग (भक्ष्य-भोज्य-अपदेशैः) खाने के पदार्थों का लालच देकर (च) और (ब्राह्मणानां दर्शनैः) ब्रह्मवेत्ता विद्वानों के दर्शनों के बहाने (च) तथा (शौर्यकर्म-अपदेशैः) कोई शौर्यकर्म दिखाने के बहाने से (तेषां समागमं कुर्युः) उन चोर आदि को सिपाहियों से मिला दें, गिरफ्तार करा दें॥२६८॥


ये तत्र नोपसर्पेयुर्मूलप्रणिहिताश्च ये। 

तान्प्रसह्य नृपो हन्यात्समित्रज्ञातिबान्धवान्॥२६९॥ (१२७)


(ये) जो चोर और उसके सहयोगी (तत्र न+उपसर्पेयुः) उपर्युक्त स्थानों [२६८] पर न आवें (च) और (ये) जो चोर (मूलप्रणिहिताः) पकड़े जाने की शंका से सावधान होकर बचते रहें अर्थात् पकड़ में न आवें तो (नृपः) राजा (समित्र-ज्ञातिबान्धवान् तान्) मित्र, रिश्तेदार और बान्धवों सहित उन चोरों को (प्रसह्य) बलपूर्वक पकड़कर (हन्यात्) दण्डित करे॥२६९॥ 


प्रमाण मिलने पर ही दण्ड दे―


न होढेन विना चौरं घातयेद्धार्मिको नृपः।

सहोढं सोपकरणं घातयेदविचारयन्॥२७०॥ (१२८)


(धार्मिकः नृपः) धार्मिक राजा (होढेन विना) चोरी का माल आदि प्रमाणों के बिना (चौरं न घातयेत्) चोर को न मारे, किन्तु (सहोढं स+उपकरणम्) चोरी का माल, और सेंध मारने आदि के औजार आदि प्रमाण उपलब्ध होने पर (अविचारयन् घातयेत्) अवश्य दण्डित करे॥२७०॥ 


चोरों के सहयोगियों को भी दण्ड दे―


ग्रामेष्वपि च ये केचिच्चौराणां भक्तदायकाः।

भाण्डावकाशदाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत्॥२७१॥ (१२९)


(च) और (ग्रामेषु+अपि ये केचित्) गांवों में भी जो कोई (चौराणां भक्तदायकाः भाण्डावकाशदाः) चोरों को भोजन देनेवाले, बर्तन, शरण और स्थान देने वाले हों (तान् सर्वान् अपि घातयेत्) राजा उन सबको भी दण्डित करे॥२७१॥ 


राष्ट्रेषु रक्षाधिकृतान्सामन्तांश्चैव चोदितान्।

अभ्याघातेषु मध्यस्थाञ्छिष्याच्चौरानिव द्रुतम्॥२७२॥ (१३०)


राजा (राष्ट्रेषु रक्षाधिकृतान्) राज्य में प्रजा की सेवा-सुरक्षा के लिए नियुक्त (च) और (चोदितान् सामन्तान्) सीमाओं पर नियुक्त राजपुरुषों को (अभ्याघातेषु मध्यस्थान्) यदि आक्रमण, चोरी-तस्करी आदि अपराधों में संलिप्त पायें तो उनको भी (चौरान्+इव द्रुतं शिष्यात्) चोर के समान ही शीघ्रतापूर्वक दण्ड दे। शीघ्रतापूर्वक इसलिए कहा है कि जिससे प्रजाओं के मन में राजपुरुष होने के कारण छूट जाने का संदेह न पनपे और चोरी, तस्करी पर शीघ्र नियन्त्रण हो सके।


सामूहिक हानि होने पर सहयोग न करने वाले को दण्ड―


ग्रामघाते हिताभङ्गे पथि मोषाभिदर्शने।

शक्तितो नाभिधावन्तो निर्वास्याः सपरिच्छदाः॥२७४॥ (१३१)


(ग्रामघाते) चोरों, लुटेरों आदि के द्वारा गांव को लूटने के मौके पर (हिताभङ्गे) नदियों या बांधों के तोड़ने पर (पथि मोष-अभिदर्शने) रास्ते में चोर आदि से मुकाबला होने पर (शक्तितः न+अभिधावन्तः) यथाशक्ति दौड़कर, रक्षा या बचाव न करने वालों को (सपरिच्छदाः निर्वास्याः) गृहसामग्री सहित देश से निकाल देवे॥२७४॥


राज्ञः कोषापहर्तॄंश्च प्रतिकूलेषु च स्थितान्। 

घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोपजापकान्॥२७५॥ (१३२)


(राज्ञः कोषहर्तॄन्) राजा के खजाने का धन को चुराने वाले (च) और (प्रतिकूलेषु स्थितान्) राज्य के विरोधी कार्यों में सलंग्न रहने वाले (च) तथा (अरीणाम् उपजापकान्) शत्रुओं को भेद देने वाले, इन्हें राजा (विविधैः दण्डैः घातयेत्) विविध प्रकार के दण्डों से दण्डित करे॥२७५॥


विभिन्न अपराधियों को दण्ड―


सन्धिं छित्त्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः। 

तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णे शूले निवेशयेत्॥२७६॥ (१३३)


(ये तस्कराः) जो चोर-लुटेरे (रात्रौ सन्धिं छित्त्वा) रात को सेंध लगाकर (चौर्यं कुर्वन्ति) चोरी करते हैं (नृपः) राजा (तेषां हस्तौ छित्त्वा) उनके दोनों हाथ काटकर (तीक्ष्णे शूले निवेशयेत्) तेज शूली पर चढ़ा दे॥२७६॥


अङ्गुलीर्ग्रन्थिभेदस्य छेदयेत्प्रथमे ग्रहे।

द्वितीये हस्तचरणौ तृतीये वधमर्हति॥२७७॥ (१३४)


राजा (ग्रन्थिभेदस्य) जेबकतरे आदि चोरों की (प्रथमे ग्रहे) पहली बार पकड़े जाने पर (अङ्गुलीः छेदयेत्) अंगुलियाँ कटवादे (द्वितीये हस्तचरणौ) दूसरी बार पकड़े जाने पर हाथ-पैर कटवादे (तृतीये वधम्+अर्हति) तीसरी बार पकड़े जाने पर वध करने योग्य है॥२७७॥


अग्निदान्भक्तदाँश्चैव तथा शस्त्रावकाशदान्।

संनिधातॄंश्च मोषस्य हन्याच्चौरमिवेश्वरः॥२७८॥ (१३५)


(ईश्वरः) राजा (मोषस्य अग्निदान् भक्तदान् शस्त्र-अवकाशदान् च संनिधातॄन्) चोरों को भोजन पकाने के लिए अग्नि, भोजन, शस्त्र, स्थान देने वाले और चोरी के माल को रखने वाले लोगों को भी (चौरम्+इव हन्यात्) चोर की तरह ही [९.२७७ जैसे] दण्डित करे॥२७८॥ 


तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन वा।

यद्वाऽपि प्रतिसंस्कुर्याद् दाप्यस्तूत्तमसाहसम्॥२७९॥ (१३६) 


राजा (तडागभेदकं हन्यात्) प्रजा के लिए बने तालाब आदि को तोड़ने वालों का वध करे (वा) अथवा (अप्सु शुद्धवधेन) जल में डुबोकर या साधारण उपायों से मारे (यद् वा+अपि) यदि दोषी (प्रतिसंस्कुर्यात्) तोड़े हुए को पुनः यथावत् ठीक करवा दे तो (उत्तमसाहसं दाप्यः) उसको 'उत्तम साहस' अर्थात् एक हजार पण का दण्ड [८.२३८] करे॥२७९॥


यस्तु पूर्वनिविष्टस्य तडागस्योदकं हरेत्।

आगमं वाऽप्यपां भिद्यात्स दाप्यः पूर्वसाहसम्॥२८१॥ (१३७)


(यः तु) जो व्यक्ति (पूर्वनिविष्टस्य तडागस्य) किसी के द्वारा पहले बनाये गये तालाब का (उदकं हरेत्) पानी चुराले (वा) अथवा (अपाम्+आगमं भिद्यात्) जल आने का रास्ता तोड़दे (सः पूर्वसाहसं दाप्यः) उसे 'पूर्वसाहस' अर्थात् २५० पण [८.१३८] का दण्ड दे॥२८१॥ 


समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वमेध्यमनापदि।

स द्वौ कार्षापणौ दद्यादमेध्यं चाशु शोधयेत्॥२८२॥ (१३८)


(यः तु) जो व्यक्ति (अनापदि) आपत्काल के बिना अर्थात् स्वस्थ अवस्था में (राजमार्गे) सड़क पर, मुख्य मार्ग या गली में (अमेध्यं समुत्सजेत्) मल, मूत्र आदि करे तो (सः द्वौ कार्षापणौ दद्यात्) उस पर दो 'कार्षापण' [८.१३६] दण्ड करे (च) और (आशु अमेध्यं शोधयेत्) तुरन्त उस गन्दगी को साफ करवाये॥२८२॥


आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव वा। परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः॥२८३॥ (१३९)


(आपद्गतः) कोई रोगी या आपत्तिग्रस्त व्यक्ति (वृद्धो गर्भिणी वा बालः) वृद्ध, गर्भवती या बालक राजमार्ग को गन्दा करें तो (परिभाषणम्+अर्हन्ति) उनको उसके न करने के लिए कहे या फटकार दे (च) और उनसे (तत् शोध्यम्) उसकी सफाई कराले (इति स्थितिः) ऐसी शास्त्रमर्यादा है॥२८३॥ 


चिकित्सकानां सर्वेषां मिथ्या प्रचरतां दमः।

अमानुषेषु प्रथमो मानुषेषु तु मध्यमः॥२८४॥ (१४०)


(सर्वेषां चिकित्सकानाम्) सभी चिकित्सकों में (अमानुषेषु मिथ्या प्रचरताम्) पशुओं की गलत चिकित्सा करने वालों को (प्रथमः दमः) 'प्रथम साहस' अर्थात् २५० पण [८.१३८] का दण्ड करे और (मानुषेषु मध्यमः) मनुष्यों की गलत चिकित्सा करने पर 'मध्यम साहस' अर्थात् ५०० पण का दण्ड करे॥२८४॥


संक्रमध्यवजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकः। 

प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्च दद्याच्छतानि च॥२८५॥ (१४१)


(संक्रम-ध्वजयष्टीनाम्) संक्रम अर्थात् रथ, उस रथ के ध्वजा की यष्टि जिसके ऊपर ध्वजा बांधी जाती है (च) और (प्रतिमानां भेदकः) प्रतिमा=छटांक आदिक बटखरे, जो इन तीनों को तोड़ डाले वा अधिक न्यून कर देवे (तत् सर्वं प्रतिकुर्यात्) उनको उससे राजा बनवा लेवे (च) और (पञ्चशतानि दद्यात्) जिसका जैसा ऐश्वर्य है, उसके योग्य दण्ड करे―जो दरिद्र होवे तो उससे पांच सौ पैसा राजा दण्ड लेवे; और जो कुछ धनाढ्य होवे तो पांच सौ रुपया उससे दण्ड लेवे; और जो बहुत धनाढ्य होवे उससे पांच सौ अशर्फी दण्ड लेवे॥२८५॥ 


अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा। 

मणीनामपवेधे च दण्डः प्रथमसाहसः॥२८६॥ (१४२)


(अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे) अच्छी वस्तुओं में खराब वस्तुओं की मिलावट करके उन्हें दूषित करने पर (तथा) तथा (भेदने) वस्तुओं को बिगाड़ने तोड़ने पर (च) और (मणीनाम्+अपवेधे) मणि आदि रत्नों को अनुचित बेधने के अपराध में (प्रथमसाहसः दण्डः) 'प्रथमसाहस' अर्थात् २५० पण [८.१३८] का दण्ड दे॥२८६॥ 


समैर्हि च विषमं यस्तु चरेद्वा मूल्यतोऽपि वा।

समाप्नुयाद्दमं पूर्वं नरो मध्यममेव वा॥२८७॥ (१४३)


(यः तु) जो (नरः) मनुष्य (समैः) समानमूल्य वाली वस्तुओं के बदले (अपि वा मूल्यतः) अथवा सही मूल्य से (विषमं चरेत्) कम वस्तु देने का अथवा अधिक मूल्य लेने का अनुचित व्यवहार करे, (पूर्वं वा मध्यमम्+एव दमं समाप्नुयात्) वह अपराधानुसार 'पूर्वसाहस' अर्थात् २५० पण या 'मध्यमसाहस' अर्थात् ५०० पण [८.१३८] दण्ड का भागी होता है॥२८७॥


बन्धनानि च सर्वाणि राजा मार्गे निवेशयेत्। 

दुःखिता यत्र दृश्येरन् विकृताः पापकारिणः॥२८८॥ (१४४)


(राजा) राजा (सर्वाणि बन्धनानि) कारागार आदि (मार्गे निवेशयेत्) प्रधान मार्गों पर बनवावे (यत्र) जहां (दुःखिताः विकृताः पापकारिणः दृश्येरन्) हथकड़ी, बेड़ी आदि से दुःखी हुए, बिगड़ी दशा वाले अपराधी लोग दिखाई देते रहें [जिससे कि उनको देखकर जनता के मन में अपराधों के प्रति भय उत्पन्न होता रहे]॥२८८॥


प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च पूरकम्।

द्वाराणां चैव भङ्क्तारं क्षिप्रमेव प्रवासयेत्॥२८९॥ (१४५)


राजा (प्राकारस्य भेत्तारम्) नगर के परकोटे को तोड़ने वाले (च) और (परिखाणां पूरकम्) नगर के चारों ओर की खाई को नष्ट करने वाले (च) तथा (द्वाराणां भक्तारम्) नगर-द्वारों को तोड़ने वाले व्यक्ति को (क्षिप्रम्+एव प्रवासयेत्) तुरन्त देशनिकाला दे दे॥२८९॥


सात राजप्रकृतियाँ और उनका महत्त्व―


स्वाम्यमात्यौ पुरं राष्ट्रं कोशदण्डौ सुहृत्तथा। 

सप्त प्रकृतयो ह्येताः सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते॥२९४॥ (१४६)


(स्वामी-अमात्यौ पुरं राष्ट्रं कोशदण्डौ सुहृत्) १. स्वामी, २. मन्त्री, ३. किला, ४. राष्ट्र, ५. कोश, ६. दण्ड व्यवस्था और, ७. मित्र (एताः सप्त प्रकृतयः) ये सात राजप्रकृतियां राज्य के मूल अंग हैं (सप्ताङ्गं राज्यम्+उच्यते) इनसे मिलकर ही राज्य 'सप्ताङ्ग'=सात अङ्गों वाला कहलाता है॥२९४॥


सप्तानां प्रकृतीनां तु राज्यस्यासां यथाक्रमम्। 

पूर्वं पूर्वं गुरुतरं जानीयाद् व्यसनं महत्॥२९५॥ (१४७)


(राज्यस्य+आसां सप्तानां प्रकृतीनां तु) राज्य की इन सात प्रकृतियों में (यथाक्रमं पूर्वं पूर्वं व्यसनं महत् गुरुतरं जानीयात्) क्रमशः पहली-पहली प्रकृति-सम्बन्धी आपत्ति को बड़ी समझे [जैसे―राजा पर आई आपत्ति सबसे बड़ी होती है, उससे कम मन्त्री पर आपत्ति, उससे कम किले पर आदि]॥२९५॥ 


सप्ताङ्गस्येह राज्यस्य विष्टब्धस्य त्रिदण्डवत्। 

अन्योन्यगुणवैशेष्यान्न किंचिदतिरिच्यते॥२९६॥ (१४८)


(इह) इस (त्रिदण्डवत्) तीन पायों वाली तिपाई के समान (सप्ताङ्गस्य विष्टब्धस्य राज्यस्य) पूर्वोक्त सात प्रकृतिरूपी मूल अंगों पर स्थित इस राज्य में (अन्योन्यगुणवैशेष्यात्) सभी अंगों के अपने-अपने गुणों की विशेषताओं से युक्त और परस्पर आश्रित होने के कारण (किंचित् न अतिरिच्यते) कोई अंग किसी से गुण में विशिष्ट या कम नहीं है अर्थात् अपने-अपने प्रसंग में सभी का विशेष महत्त्व है॥२९६॥ 


तेषु तेषु तु कृत्येषु तत्तदङ्गं विशिष्यते। 

येन यत्साध्यते कार्यं तत्तस्मिन् श्रेष्ठमुच्यते॥२९७॥ (१४९)


यतो हि (तेषु तेषु तु कृत्येषु) उन राज्य प्रकृतियों [९.२९४] के अपने-अपने कार्यों में (तत्-तत्+अङ्गं विशिष्यते) वही-वही प्रकृति-अंग विशेष है, और (यत् कार्यं येन साध्यते) जो कार्य जिस प्रकृति से सिद्ध होता है (तस्मिन् तत् श्रेष्ठम्+उच्यते) उसमें वही प्रकृति श्रेष्ठ मानी गई है, अर्थात् समयानुसार सभी प्रकृतियों की महत्ता और श्रेष्ठता है, अतः किसी को कम महत्त्वपूर्ण समझकर उपेक्षणीय न समझें॥२९७॥ 


चारेणोत्साहयोगेन क्रिययैव च कर्मणाम्। 

स्वशक्तिं परशक्तिं च नित्यं विद्यान्महीपतिः॥२९८॥ (१५०)


(महीपतिः) राजा (चारण) गुप्तचरों से (उत्साहयोगेन) सेना के उत्साह सम्बन्ध से (च) और (कर्मणां क्रियया) राज्यशक्ति-वर्धक नये-नये कार्यों के करने से अर्जित (स्वशक्तिं च परशक्तिं नित्यं विद्यात्) अपनी शक्ति और शत्रु की शक्ति की सदा जानकारी रखे और उसके अनुसार सन्धि, युद्ध आदि कार्य करे॥२९८॥


पीडनानि च सर्वाणि व्यसनानि तथैव च। 

आरभेत ततः कार्यं संचिन्त्य गुरुलाघवम्॥२९९॥ (१५१)


(सर्वाणि पीडनानि) अपने तथा शत्रु के राज्य में आई सभी व्याधि, आपत्ति आदि पीड़ाओं को (तथैव व्यसनानि) तथा व्यसनों [७.४५-५३] के प्रसार को (च) और (गुरु-लाघवं संचिन्त्य) बड़े-छोटे अर्थात् अपने और शत्रु राजा में कौन कम-अधिक शक्तिशाली है (संचिन्त्य) इन बातों पर विचार करके (ततः कार्यम्+आरभेत) उसके पश्चात् राजा सन्धि-विग्रह आदि [७.१६०-२१०] कार्य को प्रारम्भ करे॥२९९॥ 


आरभेतैव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः। 

कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते॥३००॥ (१५२)


(श्रान्तः श्रान्तः) बार-बार हारा-थका हुआ भी राजा (कर्माणि पुनः-पुनः आरभेत एव) राज्य के विकास कार्यों को [७.१६०-२००] फिर-फिर अवश्य आरम्भ करे (हि) क्योंकि (कर्माणि+आरभमाणं हि पुरुषम्) कर्मों को पुनः-पुन: आरम्भ करने वाले पुरुष को ही (श्रीः निषेवते) विजयलक्ष्मी प्राप्त होती है॥३००॥


राजा के शासन में ही चार युग―


कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च। 

राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते॥३०१॥ (१५३)


(कृतं त्रेतायुगं द्वापरं च कलिः) कृतयुग, त्रेतायुग द्वापरयुग और कलियुग (सर्वाणि राज्ञः वृत्तानि) ये सब राजा के ही आचार-व्यवहार विशेष हैं अर्थात् राजा जैसा राज्य को बनाता है उस राज्य में वैसा ही युग बन जाता है [९.३०२] (राजा हि युगम्+उच्यते) वस्तुतः राजा ही 'युग' कहलाता है अर्थात् राजा ही युगनिर्माता है॥३०१॥


कलिः प्रसुप्तो भवति स जाग्रद् द्वापरं युगम्। 

कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम्॥३०२॥ (१५४)


(प्रसुप्तः कलिः भवति) जब राजा सोता है अर्थात् राज्य के पालन-संवर्धन कार्यों की उपेक्षा करता है तो वह 'कलियुग' होता है, (सः जाग्रत् द्वापरं युगम्) जब वह जागता है अर्थात् राज्य कार्य को साधारणतः करता रहता है तो वह 'द्वापरयुग' है, और (कर्मसु+अभ्युद्यतः त्रेता) राज्य संवर्धन और प्रजा-हितकारी कार्यों में जब राजा सदा उचित उद्यत रहता है किन्तु यदि राज्यकार्य उस तत्परता से सम्पन्न नहीं होते तो वह 'त्रेतायुग' है, (विचरन् तु कृतं युगम्) जब राजा सभी कर्त्तव्यों को उत्साह और तत्परतापूर्वक करे और अपनी प्रजा के दुःखों को जानने के लिए राज्य में तत्पर होते हुए उन्हें जानकर न्यायानुसार सुख प्रदान करने के लिए उद्यत रहे, राजा का यह सत्यगुण है॥३०२॥


राजा के आठ रूप―


इन्द्रस्यार्कस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च। 

चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं नृपश्चरेत्॥३०३॥ (१५५)


(नृपः) राजा (इन्द्रस्य+अर्कस्य वायोः यमस्य वरुणस्य चन्द्रस्य+अग्नेः पृथिव्याः तेजः वृत्तम् चरेत्) इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, पृथिवी इनके तेजस्वी स्वभाव के अनुसार ही आचरण-व्यवहार करे [द्रष्टव्य ७.४-७]॥३०३॥


राजा का इन्द्ररूप आचरण―


वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति। 

तथाऽभिवर्षेत्स्वं राष्ट्र कामैरिन्द्रव्रतं चरन्॥३०४॥ (१५६)


(यथा+इन्द्रः वार्षिकान् चतुरः मासान्) जैसे इन्द्र [=वृष्टिकारक शक्ति] प्रत्येक वर्ष के श्रावण आदि चार मासों में (अभिप्रवर्षति) जल बरसाता है (तथा इन्द्रव्रतं चरन्) उसी प्रकार इन्द्र के व्रत को आचरण में लाता हुआ राजा (स्वं राष्ट्र कामैः अभिवर्षेत्) अपने राष्ट्र की प्रजाओं की कामनाओं को पूर्ण करे, यही राजा का इन्द्रवत नामक आचरण है॥३०४॥ 


राजा का सूर्यरूप आचरण―


अष्टौ मासान् यथाऽऽदित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः। 

तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत्॥३०५॥ (१५७)


(यथा+आदित्यः) जैसे सूर्य (रश्मिभिः) अपनी किरणों से (अष्टौ मासान् तोयं हरति) आठ मास तक जलग्रहण करता है (तथा) उसी प्रकार राजा (राष्ट्रात् नित्यं करं हरेत्) राष्ट्र से अपने अधिकारियों के माध्यम से थोड़ा-थोड़ा कर ग्रहण करे [७.१२७-१२९] (अर्कव्रतं हि तत्) यही राजा का 'अर्कव्रत' है॥३०५॥


राजा का वायुरूप आचरण―


प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः। 

तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम्॥३०६॥ (१५८)


(यथा मारुतः) जैसे वायु (सर्वभूतानि प्रविश्य) सब प्राणियों में प्रविष्ट होकर (चरति) विचरण करता है (तथा) उसी प्रकार (चारैः प्रवेष्टव्यम्) राजा को अपनी तथा शत्रु की प्रजाओं में गुप्तचरों द्वारा सर्वत्र प्रवेश रख कर राज्य सम्बन्धी सभी गतिविधियों का ज्ञान करना चाहिए (एतत् हि मारुतं व्रतम्) यही राजा का 'मारुतव्रत' है॥३०६॥ 


राजा का यमरूप आचरण―


यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति। 

तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतम्॥३०७॥ (१५९)


(यथा यमः) जिस प्रकार यम=ईश्वर की नियामक शक्ति=(काले प्राप्ते) कर्मफल का समय आने पर (प्रियद्वेष्यौ नियच्छति) प्रिय और शत्रु सबको अपने वश में करके यथायोग्य दण्डित करता है (राज्ञा तथा प्रजाः नियन्तव्याः) राजा को उसी प्रकार अपराध करने पर प्रिय-शत्रु सभी प्रजाओं को न्यायपूर्वक पक्षपातरहित दण्ड देना चाहिए (तत् हि यमव्रतम्) यही राजा का 'यमव्रत' है॥३०७॥ 


राजा का वरुणरूप आचरण―


वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एवाभिदृश्यते। 

तथा पापान्निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम्॥३०८॥ (१६०)


(यथा) जिस प्रकार अपराधी मनुष्य (वरुणेन पाशैः बद्धः एव+अभिदृश्यते) वरुण के द्वारा पाशों से अर्थात् जलीय या समुद्र की तरंगों, भंवरोंरूपी बंधनों में फंसकर जैसे मनुष्य बंधा-जकड़ा हुआ दीखता है अर्थात् अवश्य जकड़ा जाता है (तथा) उसी प्रकार राजा भी (पापान् निगृह्णीयात्) पापियों=अपराधियों को सुधारने तक साम-दाम भेद-दण्ड आदि से वश में करके रखे या बन्धन में=कारागार में डाले रखे (एतत् हि वारुणं व्रतम्) यही राजा का 'वरुणवत' है॥३०८॥


राजा का चन्द्ररूप आचरण―


परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः। 

तथा प्रकृतयो यस्मिन्स चान्द्रव्रतिको नृपः॥३०९॥ (१६१)


(यथा) जिस प्रकार (परिपूर्णं चन्द्रं दृष्ट्वा मानवाः हृष्यन्ति) पूर्ण प्रकाशित चन्द्रमा को देखकर मनुष्य प्रसन्न होते हैं (तथा) उसी प्रकार (यस्मिन् प्रकृतयः) जिस राजा को पाकर-देखकर, उस द्वारा प्रदत्त सुखों से प्रजाएं स्वयं को हर्षित अनुभव करें (सः नृपः चान्द्रव्रतिकः) वह राजा का 'चन्द्रव्रत' है॥३०९॥


राजा का अग्निरूप आचरण―


प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु ।

दुष्टसामन्तहिंस्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम्॥३१०॥ (१६२)


राजा (पापकर्मसु) पापियों में=पाप करने वालों के लिए (नित्यम्) सदैव (प्रतापयुक्तः तेजस्वी स्यात्) संतापित करने वाला और तेज से प्रभावित कर भयभीत करने वाला होवे (च) और (दुष्टसामन्तहिंस्रः) दुष्ट मन्त्री, माण्डलिक राजा आदि को दण्डित करने वाला होवे (तत्+आग्नेयं व्रतं स्मृतम्) यही राजा का 'आग्नेयव्रत' कहा है॥३१०॥ 


राजा का धरारूप आचरण―


यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम्। 

तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम्॥३११॥ (१६३)


(यथा) जिस प्रकार (धरा) धरती (सर्वाणि भूतानि समं धारयते) सब प्राणियों को बिना किसी भेदभाव अर्थात् समानभाव से धारण करती है (तथा) उसी प्रकार (सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः) समान भाव से सभी प्राणियों का धारण-पोषण करने वाले राजा का समान व्यवहार होना (पार्थिव व्रतम्) समान व्यवहार रखना 'पार्थिव व्रत' होता है॥३११॥ 


एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः।

स्तेनान् राजा निगृह्णीयात्स्वराष्ट्रे पर एव च॥३१२॥ (१६४)


(राजा) राजा (एतैः+उपायैः च अन्यैः युक्तः) इन पूर्वोक्त उपायों तथा इनसे भिन्न जो और उत्तम उपाय हों उनसे युक्त होकर (नित्यम्-अतन्द्रितः) सदा आलस्यहीन रहता हुआ (स्वराष्ट्रे च परे+एव) अपने राष्ट्र में रहने वाले और दूसरे राष्ट्र से आकर चोरी करने वाले (स्तेनान् निगृह्णीयात्) चोरों-ठगों और लोक कण्टकों को वश में करे॥३१२॥


एवं चरन् सदा युक्तो राजधर्मेषु पार्थिवः।

हितेषु चैव लोकस्य सर्वान्भृत्यान्नियोजयेत्॥३२४॥ (१६५)


(पार्थिवः) राजा (एवं चरन्) पूर्वोक्त [७.१ से ९.३१२] प्रकार के आचरण करता हुआ (सदा राजधर्मेषु युक्तः) सदा राजधर्मों में स्वयं संलग्न रहे (सर्वान् भृत्यान् एव) सभी राजकर्मचारियों को भी (लोकस्य हितेषु नियोजयेत्) प्रजाओं के हित सम्पादन में लगाये रखे॥३२४॥


राजधर्म विषय की समाप्ति का संकेत―


एषोऽखिलः कर्मविधिरुक्तो राज्ञः सनातनः। 

इमं कर्मविधिं विद्यात्क्रमशो वैश्यशूद्रयोः॥३२५॥ (१६६)


(एषः) यह [७.१ से ९.३१२ तक] (राज्ञः सनातनः अखिलः कर्मविधिः उक्तः) राजा का सनातन और सम्पूर्ण कर्त्तव्य-विधान कहा अर्थात् शाश्वत और सम्पूर्ण राजनीति का विधान कहा। अब (वैश्य-शूद्रयोः) वैश्यों और शूद्रों की (कर्मविधिं इमं विद्यात्) कर्त्तव्यों की विधि को इस आगे कहे अनुसार जानें―[उनका वर्णन अग्रिम दशम अध्याय में है]॥३२५॥


[नवम अध्याय के ३२६ से ३३६ श्लोक दशम अध्याय के अन्तर्गत देखिए] 


इति महर्षिमनुप्रोक्तायां सुरेन्द्रकुमारकृतहिन्दीभाष्यसमन्वितायाम् अनुशीलन-समीक्षाभ्यां विभूषितायाञ्च विशुद्धमनुस्मृतौ राजधर्मात्मकः नवमोऽध्यायः॥