बौद्ध साहित्य में अनेक कथाएँ ऐसी हैं जो मानव मन की दुर्बलताओं और जीवन के शाश्वत सत्य को अत्यंत सरल, ठोस रूप से स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं। इस कथा की चाहत है, मोह और शरीर की नश्वरता को कहानियों वाली एक गहन शिक्षाप्रद कथा है।
एक समय की बात है, एक गणिका बनी हुई थी जो अतुल्य थी। वह भिक्षुओं के अपने घर से आकर्षक आवासों और उन्हें सम्मानपूर्वक उत्तम भोजन उपलब्ध कराता था।
एक दिन भिक्षा लेने आए एक भिक्षु ने सहजा को ही उसकी प्राकृतिक संपदा की सराहना कर दी। यहां उपस्थित एक युवा भिक्षु के मन में यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसकी प्रतिकृति उत्पन्न हो गई।
अगले दिन वह युवा भिक्षु भी उस दल के साथ चल पड़ा, जो भिक्षाटन के क्रम में गणिका के घर के पास से साक्षात्कार वाला था। उस दिन गणिका वनस्पति थी, मखमली। उसने अपने सेवकों से कहा कि बाहर ले जाओ, ताकि वह स्वयं भिक्षुओं को भोजन दे सके। बीमार अवस्था में भी उसका प्राकृतिक रूप देखकर वह युवा भिक्षु का मोह और गहरा हो गया।
उसी रात उनकी बीमारी बढ़ गई और प्रातःकाल तक उनकी मृत्यु हो गई। जब भगवान बुद्ध को यह समाचार मिला, तो उन्होंने निर्देश दिया कि कुछ दिनों तक उनका दाह-संस्कार न किया जाये।
कुछ समय बाद बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ श्मशान में चले गये। जब युवा भिक्षु ने यह सुना कि वे गणिका को देखने जा रहे हैं, तो उनका कामभाव पुनः जाग उठा। उसे यह नहीं पता था कि वह अब इस दुनिया में नहीं रही।
श्मशान घाट पर उन्होंने देखा कि कभी अत्यंत सुंदर रही देह अब फूली हुई, दुर्गंधयुक्त और वैज्ञानिक हो गई थी। शरीर के सभी छिद्रों से सधांधयुक्त द्रव बह रहा था।
तब बुद्ध ने वहां उपस्थित लोगों से कहा कि यह गणिका की प्रदर्शनी की जाएगी-जो कोई एक हजार स्वर्ण मुद्राएं गिराएगा, वह एक रात उसके साथ रह सकता है।
किसी भी इस प्रस्ताव को स्वीकार करने की तैयारी नहीं हुई। यहां तक कि फ्री में भी कोई उसे स्वीकार नहीं करना चाहता था।
तब बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा—
“जब यह जीवित थी, तब लोग इसके लिए अपना सब कुछ देने को तैयार थे। आज कोई इसे निःशुल्क भी स्वीकार नहीं करता। यही शरीर की सच्चाई है।”
बुद्ध के इन वचनों को सुनकर वह युवा भिक्षु जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझ गया और इंद्रिय-वासनाओं के बंधन से मुक्त होने का प्रयास करने लगा।
यह कथा हमें सिखाती है कि:
जिस शरीर को हम आकर्षण और कामना का केंद्र मानते हैं, वही समय आने पर क्षय और विनाश का रूप धारण कर लेता है। इसलिए बुद्ध ने हमें सिखाया कि स्थायी सुख शरीर में नहीं, बल्कि विवेक, संयम और सत्यबोध में है।
“यह शरीर घावों का ढेर है, हड्डियों पर टिका हुआ है और न तो स्थायी है, न शाश्वत।”
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