एक समय की बात है। एक वृद्ध व्यक्ति था जो बहुत धनवान था। उसके चार पुत्र थे। जब चारों पुत्रों का विवाह हुआ, तो उस वृद्ध पिता ने प्रसन्नता से उन्हें विवाह-उपहार के रूप में अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा दे दिया।
कुछ समय बाद उसकी पत्नी का देहांत हो गया। पत्नी की मृत्यु के बाद उसके पुत्र ऊपर-ऊपर से तो उसका आदर-सत्कार करते रहे, किंतु उनके मन में एक छिपा हुआ स्वार्थ था—वे पिता की बची हुई सारी संपत्ति भी हथियाना चाहते थे। धीरे-धीरे उन्होंने चालाकी से पिता की शेष संपत्ति भी अपने हाथों में ले ली और वृद्ध पिता को लगभग निर्धन बना दिया।
अब वह स्वयं अपना जीवन संभाल पाने में असमर्थ हो गया। मजबूर होकर वह अपने सबसे बड़े पुत्र के घर रहने चला गया। लेकिन कुछ ही दिनों में उसकी बहू उसे बोझ समझने लगी और ताने देने लगी। अंततः उसने वृद्ध पिता को घर से निकाल दिया। दुख की बात यह थी कि उसका पुत्र भी अपनी पत्नी के विरुद्ध कुछ न बोला।
इसके बाद वृद्ध पिता अपने दूसरे, तीसरे और चौथे पुत्र के घर गया, लेकिन हर जगह उसे वही अपमान और उपेक्षा मिली। चारों पुत्रों और बहुओं ने उसे ठुकरा दिया।
अत्यंत दुखी और असहाय होकर वह वृद्ध व्यक्ति भगवान बुद्ध के पास पहुँचा। उसके पास अब केवल एक लाठी और एक भिक्षापात्र ही शेष था। उसने बुद्ध को अपने जीवन की पूरी व्यथा सुनाई—कैसे उसके पुत्रों ने धन लेकर उसे बेसहारा छोड़ दिया।
भगवान बुद्ध ने करुणा से उसकी बात सुनी और उसे एक उपाय बताया। उन्होंने कहा—
“जब भी तुम लोगों की सभा में जाओ, तो अपने दुख को सत्य के साथ सबके सामने कह देना।”
बुद्ध की आज्ञा के अनुसार वृद्ध व्यक्ति लोगों के बीच यह कहने लगा—
“मेरे पुत्र लोभी और कपटी हैं। वे मुझे पिता कहते हैं, पर पिता होने का अर्थ नहीं समझते। मेरी सारी संपत्ति लेने के बाद उन्होंने अपनी पत्नियों के द्वारा मुझे घर से निकलवा दिया।
आज मुझे अपने चार पुत्रों से अधिक इस टेढ़ी-मेढ़ी लाठी पर भरोसा है।”
एक दिन वह ऐसे ही बोलते हुए एक सभा में पहुँचा, जहाँ उसके चारों पुत्र भी उपस्थित थे। लोगों ने जब उसकी बात सुनी तो पहले उन्हें दया आई, लेकिन जब उन्हें यह पता चला कि जिन पुत्रों की वह शिकायत कर रहा है, वे वहीं मौजूद हैं, तो उनका क्रोध भड़क उठा।
भीड़ के डर से चारों पुत्र वहाँ से भाग खड़े हुए। सुरक्षित स्थान पर पहुँचकर उन्होंने आपस में विचार किया और स्वीकार किया कि उन्होंने अपने पिता के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। उन्हें अपने कृतघ्न व्यवहार पर गहरा पश्चाताप हुआ।
चारों पुत्र अपने पिता को खोजते हुए उसके पास पहुँचे और उससे क्षमा माँगी। उन्होंने वचन दिया कि अब वे उसकी सेवा करेंगे, उसका सम्मान करेंगे और उसे अपने जीवन का आधार बनाएँगे। उन्होंने अपनी पत्नियों को भी चेतावनी दी कि यदि पिता का अपमान किया गया तो उसके गंभीर परिणाम होंगे।
कुछ समय बाद बड़े पुत्र ने भगवान बुद्ध को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। भोजन के बाद भगवान बुद्ध ने उपदेश दिया कि—
“माता-पिता की सेवा करना महान पुण्य है। जो संतान अपने माता-पिता का आदर और पालन करती है, उसका जीवन सुख और कल्याण से भर जाता है।”
उपदेश में बुद्ध ने धनपाल हाथी की कथा भी सुनाई, जो अपने माता-पिता से इतना प्रेम करता था कि जब वह पकड़ा गया, तो उन्हें याद कर-करके भोजन तक नहीं कर पाया।
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जो संतान माता-पिता की सेवा नहीं करती, वह कृतघ्न कहलाती है।
माता-पिता का सम्मान और देखभाल करना सबसे बड़ा धर्म और पुण्य है।
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