भारतीय दर्शन में Reality को अक्सर एकत्व (One) या द्वैत (Two) के रूप में समझने का प्रयास किया गया है। Advaita में Reality को अद्वैत, एकरस ब्रह्म माना गया; वहीं द्वैत में जीव और ईश्वर, विषय और वस्तु के बीच स्पष्ट भेद किया गया।
Traita-vāda इन दोनों दृष्टियों से आगे बढ़ते हुए Reality को Trika—एक त्रैतीय जीवित संरचना—के रूप में देखता है।
Traita-vāda के अनुसार Reality कोई स्थिर वस्तु (static substance) नहीं है, बल्कि एक dynamic living process है, जो तीन स्तरों पर स्वयं को प्रकट करता है:
ये तीनों अलग-अलग सत्ता नहीं हैं, बल्कि एक ही Reality की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ (layers of manifestation) हैं।
Traita-vāda में शरीर को न तो तुच्छ माना जाता है और न ही परम सत्य।
शरीर है — रथ (Ratha)।
“ज्योति रथः” — चेतना के प्रकाश से संचालित शरीर।
आधुनिक material science शरीर को biological machine मानती है।
कुछ आध्यात्मिक परंपराएँ शरीर को केवल बंधन या माया कहकर नकार देती हैं।
Traita-vāda इन दोनों से भिन्न दृष्टि देता है।
शरीर के बिना:
इसलिए Traita-vāda में शरीर त्याग का नहीं, रूपांतरण का विषय है।
शरीर ही वह क्षेत्र है जहाँ कर्म घटित होते हैं।
कर्म केवल physical action नहीं, बल्कि चेतना की दिशा में होने वाली गति है।
इसलिए Traita-vāda में शरीर को धर्म का आधार कहा गया है।
यदि शरीर रथ है, तो मन उसका नियंत्रण तंत्र (control system) है।
Traita-vāda में मन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण भेद किया गया है:
मन = ज्ञान नहीं है
आधुनिक psychology और common spiritual language में अक्सर कहा जाता है:
“Mind knows”, “Mind understands”
Traita-vāda इसे अधूरा कथन मानता है।
मन है:
लेकिन ज्ञान (Gyan) इन सबसे अलग है।
आपके दिए हुए सूत्र के अनुसार:
यहाँ मंत्र कोई शब्द मात्र नहीं, बल्कि चेतना की तरंग (conscious vibration) है।
ऋषि इसलिए मंत्रद्रष्टा कहलाए — क्योंकि उन्होंने:
Traita-vāda का सबसे radical statement यही है:
ज्ञान अनुभव नहीं है।
ज्ञान ही चेतना है।
आम भाषा में हम कहते हैं:
लेकिन Traita-vāda पूछता है:
अनुभव को जान कौन रहा है?
अनुभव बदलते हैं:
लेकिन जो इन सबको देख रहा है,
वही ज्ञान-तत्व (Gyan-tattva) है।
आत्मा को Traita-vāda में:
आत्मा:
इसलिए ज्ञान को अज्ञान का विपरीत नहीं कहा गया, बल्कि:
अज्ञान = ज्ञान का अपूर्ण प्रतिबिंब
जब:
तीनों एक साथ कार्य करते हैं,
तभी जीव (Jīva) प्रकट होता है।
जीव कोई स्थिर entity नहीं,
बल्कि चलती हुई त्रैतीय प्रक्रिया है।
जब Trika टूटता है:
तब:
उत्पन्न होते हैं।
जब:
तब:
स्वतः प्रकट होते हैं।
Traita-vāda न तो केवल metaphysical है,
न केवल ethical,
बल्कि existential philosophy है।
Traita-vāda में साधना का अर्थ:
साधना = त्रिक का संतुलन
आज का मनुष्य:
Traita-vāda इस fragmentation को heal करता है।
इन सबका एकीकृत framework प्रदान करता है।
Traita-vāda का Trika:
Reality न एक है, न दो —
Reality तीन के सामंजस्य में प्रकट होती है।
शरीर चलता है
मन दिशा देता है
चेतना प्रकाश देती है
यही Traita-vāda का त्रैतीय सत्य है।
अब प्रश्न उठता है:
👉 इसका उत्तर Chapter 6 – Consciousness, Mind, and Traita-vāda में मिलेगा।
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