दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
एकैकया = एक-एक रूप से / क्रमशः
एषा = यह (शक्ति / सत्ता)
सृष्ट्या = सृष्टि के द्वारा
सं बभूव = प्रकट हुई / संयुक्त हुई
यत्र = जहाँ
गाः = गौएँ / प्रकाश किरणें / वाणियाँ
असृजन्त = उत्पन्न की गईं
भूतकृतः = प्राणियों के रचयिता
विश्वरूपाः = अनेक रूपों वाले
यत्र = जहाँ
विजायते = उत्पन्न होता है
यमिनी = रात्रि / अंधकार
अपर्तुः = बिना रोक-टोक
सा = वह
पशून् = प्राणियों को
क्षिणाति = क्षीण करती है / नष्ट करती है
रिफती = पीड़ा देने वाली
रुशती = लालिमा युक्त / प्रज्वलित
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र सृष्टि के गूढ़ रहस्य का संकेत करता है। “एकैकया एषा सृष्ट्या सं बभूव”—यह सत्ता एक-एक करके, क्रमशः सृष्टि के माध्यम से प्रकट हुई। यहाँ सृष्टि को एक क्रमिक विस्तार के रूप में देखा गया है।
“यत्र गा असृजन्त भूतकृतो विश्वरूपाः”—जहाँ विश्वरूप भूतकृत (प्राणियों के रचयिता) ने ‘गा’ (गौएँ) उत्पन्न कीं। वैदिक भाषा में ‘गा’ का अर्थ केवल गौ नहीं, बल्कि प्रकाश, वाणी या ज्ञान की किरणें भी होता है।
यहाँ सृष्टि को प्रकाश के उद्भव के रूप में देखा गया है। विश्वरूप सृष्टिकर्ता ने विविध रूपों में जीवन और चेतना को प्रकट किया।
दूसरी पंक्ति—“यत्र विजायते यमिन्यपर्तुः”—जहाँ बिना अवरोध के रात्रि उत्पन्न होती है। ‘यमिनी’ अंधकार का प्रतीक है।
“सा पशून् क्षिणाति रिफती रुशती”—वह (रात्रि/अज्ञान) प्राणियों को क्षीण करती है, पीड़ा देती है, और लालिमा (प्रज्वलन) लिए होती है।
यहाँ दिन और रात्रि, प्रकाश और अंधकार, ज्ञान और अज्ञान का द्वंद्व चित्रित है।
दार्शनिक दृष्टि से सृष्टि एक सतत प्रक्रिया है। प्रकाश और अंधकार दोनों इसमें सम्मिलित हैं।
‘गा’ ज्ञान का प्रतीक है, और ‘यमिनी’ अज्ञान का। जब अज्ञान प्रबल होता है, तो जीवन क्षीण होता है।
मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो जब व्यक्ति के भीतर अंधकार (भय, भ्रम, अविद्या) बढ़ता है, तो उसकी ऊर्जा कम होती है।
आध्यात्मिक अर्थ में यह मन्त्र चेतावनी देता है कि यदि चेतना जाग्रत न रहे, तो अज्ञान जीवन-शक्ति को क्षीण कर देता है।
रुशती (लालिमा युक्त) का अर्थ यह भी हो सकता है कि अंधकार के भीतर भी प्रकाश का बीज छिपा है—जैसे उषा की लालिमा रात्रि के अंत में प्रकट होती है।
इस प्रकार यह मन्त्र सृष्टि की द्वैतात्मक प्रकृति—प्रकाश और अंधकार—का चित्रण करता है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: सृष्टि क्रमिक और बहुरूपी है।
विज्ञान: प्रकाश और अंधकार जीवन-चक्र का स्वाभाविक भाग हैं।
ब्रह्मज्ञान: जागरूकता ही अज्ञान के क्षय से रक्षा करती है।
English Explanation
This mantra speaks of creation unfolding step by step. The creators of beings manifested “cows,” symbolizing light or rays of knowledge.
Where darkness (night) arises unchecked, it weakens living beings. The imagery reflects the interplay of light and darkness, knowledge and ignorance.
Spiritually, it warns that without awareness, ignorance diminishes life-force, yet even within darkness lies the seed of dawn.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: Creation unfolds in diversity.
Science: Cycles of light and darkness are natural processes.
Brahma-Gyan: Awareness dispels ignorance and sustains life.
Word by Word
एषा = यह (शक्ति / सत्ता)
पशून् = प्राणियों को
सम् क्षिणाति = पूर्णतः क्षीण करती है / नष्ट करती है
क्रव्याद् भूत्वा = मांसभक्षी बनकर / हिंसक रूप धारण कर
व्यद्वरी = विदारने वाली / भक्षण करने वाली
उत = और / फिर
एनाम् = इसे
ब्रह्मणे = ब्रह्मज्ञ / ब्राह्मण / परम सत्य के लिए
दद्यात् = अर्पित करे / समर्पित करे
तथा = तब
स्योना = सुखद / कल्याणकारी
शिवा = मंगलमयी
स्यात् = हो जाती है
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र पूर्व मन्त्र की ही धारा को आगे बढ़ाता है। वहाँ जिस शक्ति का वर्णन हुआ था—जो अज्ञान या रात्रि के रूप में प्राणियों को क्षीण करती है—उसी का यहाँ विस्तार है।
“एषा पशून् सम् क्षिणाति”—यह शक्ति प्राणियों को पूर्णतः क्षीण कर देती है।
“क्रव्याद् भूत्वा व्यद्वरी”—वह मांसभक्षी (क्रव्याद्) बनकर, विदारने वाली बन जाती है।
यहाँ अज्ञान, हिंसा या अधर्म को प्रतीकात्मक रूप में मांसभक्षी बताया गया है। जब चेतना पर अंधकार छा जाता है, तो जीवन की ऊर्जा क्षीण होती है।
परन्तु मन्त्र का दूसरा भाग अत्यंत आशावादी है—
“उत एनां ब्रह्मणे दद्यात्”—यदि इस शक्ति को ब्रह्म के लिए, ब्रह्मज्ञान के लिए अर्पित कर दिया जाए…
“तथा स्योना शिवा स्यात्”—तो वही शक्ति कल्याणकारी और मंगलमयी बन जाती है।
यह अत्यंत गहन आध्यात्मिक सिद्धान्त है। वही शक्ति जो विनाशकारी प्रतीत होती है, जब उसे सही दिशा में लगाया जाता है, तो वह मंगलकारी बन जाती है।
दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र रूपांतरण (Transformation) का सिद्धान्त सिखाता है। नकारात्मक ऊर्जा को दबाना नहीं, बल्कि उसे ब्रह्मज्ञान की ओर मोड़ना चाहिए।
मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो क्रोध, ईर्ष्या या भय जैसी भावनाएँ यदि अनियंत्रित रहें, तो विनाशकारी होती हैं। परन्तु यदि उन्हें साधना, आत्मचिंतन या सृजनात्मक कार्य में लगाया जाए, तो वही ऊर्जा विकास का साधन बनती है।
आध्यात्मिक अर्थ में ‘ब्रह्मणे दद्यात्’ का अर्थ है—सभी शक्तियों को परम सत्य की सेवा में अर्पित करना।
जब जीवन की ऊर्जा ब्रह्म की ओर उन्मुख होती है, तो वह शांति और मंगल का कारण बनती है।
इस प्रकार यह मन्त्र सिखाता है कि संसार में कोई भी शक्ति पूर्णतः नकारात्मक नहीं है। उसका परिणाम इस पर निर्भर करता है कि उसे किस दिशा में प्रयुक्त किया जाए।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: विनाशकारी शक्ति का भी रूपांतरण संभव है।
विज्ञान: ऊर्जा का दिशा-निर्देशन उसके परिणाम को निर्धारित करता है।
ब्रह्मज्ञान: जब सब कुछ ब्रह्म को समर्पित होता है, तब वही शक्ति कल्याणकारी बन जाती है।
English Explanation
This mantra continues the theme of a destructive force that weakens beings, described as flesh-eating and devouring.
However, it adds a profound insight: if that same force is offered to Brahman (the Supreme Truth), it becomes auspicious and benevolent.
Spiritually, it teaches transformation—negative energies, when redirected toward higher realization, become forces of growth and blessing.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: Destructive tendencies can be transformed.
Science: The direction of energy determines its outcome.
Brahma-Gyan: Surrendering all forces to the Divine makes them auspicious.
Word by Word
शिवा = कल्याणकारी / मंगलमयी
भव = बनो / हो जाओ
पुरुषेभ्यः = मनुष्यों के लिए
गोभ्यः = गौओं के लिए
अश्वेभ्यः = अश्वों (घोड़ों) के लिए
शिवा = मंगलमयी
शिवा = कल्याणकारी
अस्मै = इस (हमारे)
सर्वस्मै = समस्त
क्षेत्राय = क्षेत्र के लिए / भूमि के लिए
शिवा = शुभ
नः = हमारे लिए
इह = यहाँ
एधि = बढ़ो / प्रकट हो / विकसित हो
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र मंगलकामना और सार्वभौमिक कल्याण का अत्यंत सुंदर प्रार्थना-रूप है। यहाँ साधक उस शक्ति से प्रार्थना करता है कि वह सबके लिए “शिवा”—अर्थात कल्याणकारी बने।
“शिवा भव पुरुषेभ्यः”—मनुष्यों के लिए मंगलमयी बनो।
“गोभ्यः अश्वेभ्यः शिवा”—गौओं और अश्वों के लिए भी शुभ बनो।
वैदिक युग में ‘गो’ और ‘अश्व’ समृद्धि, शक्ति और जीवन-व्यवस्था के प्रमुख आधार थे। गौ पोषण और अन्न का स्रोत थी, और अश्व गति, शक्ति तथा यज्ञीय कार्यों का प्रतीक था।
यहाँ केवल मनुष्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था के लिए कल्याण की कामना की गई है।
“शिवास्मै सर्वस्मै क्षेत्राय”—इस समस्त क्षेत्र (भूमि, समाज, वातावरण) के लिए भी मंगलमयी बनो।
‘क्षेत्र’ का अर्थ केवल खेती की भूमि नहीं, बल्कि जीवन का संपूर्ण कार्यक्षेत्र है—परिवार, समाज, राष्ट्र और प्रकृति।
“शिवा न इह एधि”—हमारे यहाँ (इस स्थान पर) शुभता का विकास हो।
दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र समग्रता का संदेश देता है। यह केवल व्यक्तिगत सुख नहीं, बल्कि सामूहिक और सार्वभौमिक कल्याण की कामना करता है।
मनोवैज्ञानिक रूप से यह सकारात्मक संकल्प (Positive Intention) का उदाहरण है। जब व्यक्ति सबके लिए शुभकामना करता है, तो उसका अपना मन भी शांत और संतुलित होता है।
आध्यात्मिक अर्थ में ‘शिव’ का अर्थ केवल भगवान शिव नहीं, बल्कि मंगल, शांति और कल्याण है। यह मन्त्र सृष्टि के प्रत्येक अंश में मंगलभाव के प्रसार की प्रार्थना है।
यह सूक्त के पूर्व भाग का परिपाक है—जहाँ विनाशकारी शक्ति को ब्रह्म में समर्पित कर उसे मंगलमयी बनाने की बात थी। यहाँ वही शक्ति अब पूर्णतः ‘शिवा’ बनकर सबके कल्याण का कारण बने—यह प्रार्थना है।
इस प्रकार यह मन्त्र विश्व-कल्याण की सार्वभौमिक भावना को व्यक्त करता है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: सच्चा धर्म सार्वभौमिक कल्याण की भावना रखता है।
विज्ञान: सकारात्मक सोच सामूहिक स्वास्थ्य और संतुलन को बढ़ाती है।
ब्रह्मज्ञान: जब चेतना सर्वभूत-हित में स्थिर होती है, तब वह ब्रह्मभाव को स्पर्श करती है।
English Explanation
This mantra is a prayer for universal auspiciousness. It asks that the force become benevolent for humans, cows, horses, and the entire field (environment and society).
It reflects holistic well-being—not only individual prosperity but collective harmony.
Spiritually, it invokes the spread of auspiciousness everywhere, transforming all forces into blessings.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Brahma-Gyan: Universal goodwill aligns consciousness with the Absolute.
Word by Word
इह = यहाँ
पुष्टिः = पोषण, समृद्धि
इह = यहाँ
रसः = रस, जीवन-सार, आनंद
इह = यहाँ
सहस्र-सातमा = सहस्रों प्रकार की संपदा देने वाली
भव = बनो / हो जाओ
पशून् = प्राणियों को / पशुधन को
यमिनि = नियंत्रित करने वाली / रात्रि-स्वरूपिणी शक्ति
पोषय = पोषण करो
यत्र = जहाँ
सुहार्दः = अच्छे हृदय वाले
सुकृतः = सत्कर्म करने वाले
मदन्ति = आनंदित होते हैं
विहाय = त्यागकर
रोगम् = रोग, व्याधि
तन्वः = शरीरों को
स्वायाः = अपने-अपने
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र पूर्णतः मंगलकामना और जीवन-संपन्नता की प्रार्थना है।
“इह पुष्टिः”—यहाँ पोषण हो।
“इह रसः”—यहाँ जीवन-रस, आनंद और ऊर्जा हो।
“इह सहस्रसातमा भव”—यहाँ सहस्रों प्रकार की संपदा देने वाली बनो।
यह केवल भौतिक समृद्धि की कामना नहीं है, बल्कि जीवन के सभी स्तरों पर सम्पन्नता की प्रार्थना है—शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक।
“पशून् यमिनि पोषय”—हे शक्ति! पशुओं और प्राणियों का पोषण करो।
यहाँ ‘पशु’ का अर्थ केवल पशुधन नहीं, बल्कि समस्त जीव-समुदाय है। यह पर्यावरणीय संतुलन और जीवन-समृद्धि का संकेत है।
दूसरी पंक्ति एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत करती है—
“यत्र सुहार्दः सुकृतो मदन्ति”—जहाँ शुभ हृदय वाले, सत्कर्म करने वाले लोग आनंदित होते हैं।
“विहाय रोगं तन्वः स्वायाः”—जहाँ लोग अपने-अपने शरीर के रोगों को त्यागकर स्वस्थ जीवन जीते हैं।
यह एक ऐसे समाज की कल्पना है जहाँ स्वास्थ्य, सद्भाव और नैतिकता साथ-साथ हों।
दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र समग्र जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है—पोषण (पुष्टि), आनंद (रस), संपन्नता (सहस्रसातमा), स्वास्थ्य (रोग-त्याग) और सद्भाव (सुहार्द)।
मनोवैज्ञानिक रूप से यह सकारात्मक संकल्प (affirmation) का रूप है। जब व्यक्ति और समाज ऐसे विचारों का चिंतन करते हैं, तो सामूहिक चेतना में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है।
आध्यात्मिक रूप से यह एक दिव्य लोक की झलक है—जहाँ सत्कर्म करने वाले आनंदित रहते हैं और रोग-रहित जीवन जीते हैं।
यह सूक्त अब पूर्ण रूप से अंधकार से प्रकाश, विनाश से पोषण और भय से मंगल की ओर रूपांतरण को दर्शाता है।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: सच्ची समृद्धि बहुआयामी होती है।
विज्ञान: स्वास्थ्य, पोषण और सकारात्मक समाज एक-दूसरे से जुड़े हैं।
ब्रह्मज्ञान: जब जीवन पुष्ट, आनंदित और रोग-मुक्त हो, तब चेतना उच्चतर सत्य की ओर उन्मुख होती है।
English Explanation
This mantra invokes nourishment, vitality, abundance, and well-being in this very place. It asks for prosperity in thousands of forms and for the nourishment of all beings.
It envisions a society where kind-hearted and righteous people rejoice, free from disease and suffering.
Spiritually, it reflects the transformation of destructive forces into life-sustaining harmony and collective well-being.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: True prosperity includes health and harmony.
Science: Nutrition, well-being, and social ethics are interconnected.
Brahma-Gyan: A harmonious life supports spiritual awakening.
Word by Word
यत्र = जहाँ
सुहार्दः = शुभ हृदय वाले
सुकृतः = सत्कर्म करने वाले
मदन्ति = आनंदित होते हैं
विहाय = त्यागकर
रोगम् = रोग, व्याधि
तन्वः = अपने शरीर
स्वायाः = अपने-अपने
तम् = उस
लोकम् = लोक, अवस्था, दिव्य स्थान
यमिनी = रात्रि-स्वरूपिणी शक्ति / संयमकारी शक्ति
अभिसंबभूव = प्राप्त करती है / पहुँचती है
सा = वह
नः = हमें
मा = न
हिंसीत् = हानि पहुँचाए
पुरुषान् = मनुष्यों को
पशून् च = और पशुओं को
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र एक आदर्श लोक की कल्पना प्रस्तुत करता है—ऐसा स्थान जहाँ सुहृदय (सुहार्द) और सुकर्मी लोग आनंदपूर्वक रहते हैं।
“यत्र सुहार्दः सुकृतो मदन्ति”—जहाँ शुभ हृदय और सत्कर्म वाले लोग आनंदित होते हैं। यह एक ऐसे समाज का चित्र है जहाँ नैतिकता और सद्भाव जीवन का आधार है।
“विहाय रोगं तन्वः स्वायाः”—जहाँ लोग अपने शरीर के रोगों को त्यागकर स्वस्थ रहते हैं। यहाँ शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का भी संकेत है।
दूसरी पंक्ति कहती है—
“तं लोकं यमिनी अभिसंबभूव”—वह संयमकारी या रात्रि-स्वरूपिणी शक्ति उस लोक तक पहुँचती है।
यहाँ ‘यमिनी’ केवल अंधकार नहीं, बल्कि संयम और नियम की प्रतीक भी हो सकती है। जीवन में रात्रि और विश्राम भी आवश्यक हैं।
“सा नो मा हिंसीत् पुरुषान् पशूंश्च”—वह शक्ति हमारे मनुष्यों और पशुओं को हानि न पहुँचाए।
यह एक सुरक्षात्मक प्रार्थना है—कि जो भी शक्तियाँ प्रकृति में सक्रिय हैं, वे कल्याणकारी बनें और किसी को हानि न पहुँचाएँ।
दार्शनिक दृष्टि से यह मन्त्र संतुलन की शिक्षा देता है। जीवन में प्रकाश और अंधकार दोनों आते हैं, परन्तु वे हानिकारक न बनें—यह प्रार्थना है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह आंतरिक शांति और सामूहिक सुरक्षा की कामना है।
आध्यात्मिक अर्थ में ‘लोक’ केवल भौतिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना की अवस्था भी है। जहाँ सद्भाव और स्वास्थ्य है, वही सच्चा लोक है।
यह मन्त्र विश्व-कल्याण और अहिंसा की भावना को पुष्ट करता है।
यह सूक्त के समापन की ओर एक सुंदर प्रार्थना है—कि आदर्श लोक की रक्षा हो और मनुष्य तथा पशु दोनों सुरक्षित रहें।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: आदर्श समाज सद्भाव और स्वास्थ्य पर आधारित होता है।
विज्ञान: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सामूहिक कल्याण के लिए आवश्यक है।
ब्रह्मज्ञान: जब चेतना अहिंसा और सद्भाव में स्थिर होती है, तब वह दिव्य लोक का अनुभव करती है।
English Explanation
This mantra describes an ideal realm where kind-hearted and righteous people rejoice, free from illness.
It prays that the regulating or night-like force may reach that realm but not harm humans or animals.
Spiritually, it reflects a balanced world where harmony, health, and non-violence prevail.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: A true ideal world is built on harmony and well-being.
Science: Health and social harmony are interconnected.
Brahma-Gyan: Non-violence and inner balance reveal the higher state of existence.
Word by Word
यत्र = जहाँ
सुहार्दाम् = शुभ हृदय वाले (जन)
सुकृताम् = सत्कर्म करने वालों का
अग्निहोत्र-हुताम् = अग्निहोत्र में आहुति देने वालों का
यत्र = जहाँ
लोकः = लोक, दिव्य अवस्था, संसार
तम् = उस
लोकम् = लोक को
यमिनी = संयमकारी / रात्रि-स्वरूपिणी शक्ति
अभिसंबभूव = प्राप्त करती है / पहुँचती है
सा = वह
नः = हमें
मा = न
हिंसीत् = हानि पहुँचाए
पुरुषान् = मनुष्यों को
पशून् च = और पशुओं को
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र पूर्व मन्त्र की भावना को और गहराई देता है। यहाँ उस लोक का वर्णन है जहाँ—
“सुहार्दाम् सुकृताम्”—शुभ हृदय और सत्कर्म करने वाले लोग निवास करते हैं।
“अग्निहोत्रहुताम्”—जो अग्निहोत्र में आहुति देते हैं, अर्थात जो यज्ञीय जीवन जीते हैं।
अग्निहोत्र वैदिक परंपरा में केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और कर्तव्य का प्रतीक है।
इस प्रकार यहाँ एक ऐसे लोक की कल्पना है जहाँ लोग सत्कर्मी, शुभचिंतक और यज्ञमय जीवन जीते हैं।
“यत्र लोकः”—वह लोक, वह अवस्था जहाँ धर्म और कर्तव्य का पालन होता है।
दूसरी पंक्ति पुनः सुरक्षा की प्रार्थना है—
“तं लोकं यमिनी अभिसंबभूव”—वह संयमकारी या रात्रि-स्वरूपिणी शक्ति उस लोक तक पहुँचती है।
यहाँ ‘यमिनी’ का अर्थ केवल अंधकार नहीं, बल्कि जीवन की परीक्षा और संयम भी हो सकता है।
“सा नो मा हिंसीत् पुरुषान् पशूंश्च”—वह हमारे मनुष्यों और पशुओं को हानि न पहुँचाए।
यह एक अत्यंत मानवीय प्रार्थना है—कि धर्मयुक्त समाज सुरक्षित रहे और प्रकृति की शक्तियाँ अनुकूल हों।
दार्शनिक रूप से यह मन्त्र बताता है कि धर्म, सत्कर्म और यज्ञमय जीवन से ही आदर्श लोक की रचना होती है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अग्निहोत्र त्याग और अनुशासन का प्रतीक है। जब व्यक्ति अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीता है, तो उसका समाज स्वस्थ और सुरक्षित रहता है।
आध्यात्मिक अर्थ में यह मन्त्र एक ऐसे चेतना-लोक का चित्रण है जहाँ व्यक्ति अपने कर्मों को समर्पित भाव से करता है।
यह सूक्त का समापन एक सार्वभौमिक प्रार्थना के साथ करता है—कि धर्ममय और यज्ञमय समाज की रक्षा हो।
ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान:
ज्ञान: सत्कर्म और यज्ञभाव से आदर्श समाज बनता है।
विज्ञान: अनुशासन और सहयोग सामाजिक स्वास्थ्य को बढ़ाते हैं।
ब्रह्मज्ञान: समर्पण और कर्तव्य से चेतना दिव्य लोक का अनुभव करती है।
English Explanation
This mantra describes a realm where kind-hearted, righteous people live and perform Agnihotra (sacrificial offerings), symbolizing disciplined and dedicated living.
It prays that even if the regulating or night-like force reaches that realm, it may not harm humans or animals.
Spiritually, it presents an ideal world sustained by righteousness, discipline, and sacred duty, protected from harm.
Knowledge–Science–Brahma-Gyan:
Knowledge: A righteous and disciplined life builds an ideal society.
Science: Cooperation and structured living sustain community well-being.
Brahma-Gyan: Selfless action and devotion elevate consciousness.
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