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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Karma and Ethics in Traita-vāda: The Interplay of Action

 

त्रैतवाद में नैतिकता और कर्म


अध्याय 5

कर्म, कर्म और त्रैता-वाद में नैतिक आयाम

(त्रैतवाद में कर्म, क्रियाएँ और नैतिक आयाम)


5.1 परिचय: त्रैतावाद में कर्म

त्रैता-वाद में कर्म (क्रिया) केवल बाहरी कार्य तक सीमित नहीं है।
यह जीवन की संरचना, आत्मा की शुद्धि, और मोक्ष की दिशा निर्धारित करता है।

  • कर्म का उद्देश्य केवल फल की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मविकास और मोक्ष है है।
  • त्रैता-वाद के अनुसार, कर्म और ज्ञान सिद्धांत हैं:

    "ज्ञान बिना कर्म अधूरा, कर्म बिना ज्ञान निरर्थक।"


5.2 कर्म का वर्गीकरण

त्रैता-वाद में कर्म को तीन लक्ष्यों में शामिल किया गया है:

  1. सामान्य कर्म (सामान्य कर्म)

    • दैनिक कार्य, सामाजिक एवं पारिवारिक अनुकूलता
    • उद्देश्य: जीवन को सुचारु और निर्माण करना
  2. संस्कार कर्म (छाप-आधारित क्रिया / संस्कार कर्म)

    • पूर्व जन्म और वर्तमान दादा-दादी का संस्कार
    • उद्देश्य: आध्यात्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का निर्माण या परिवर्तन
  3. उपासना कर्म (आध्यात्मिक क्रिया/उपासना कर्म)

    • ध्यान, साधना, पूजा, सेवा
    • उद्देश्य: आत्मा का शुद्धिकरण और मोक्ष की प्राप्ति

5.3 त्रैता-वाद में नैतिक ढाँचा

त्रैता-वाद का नैतिक दृष्टिकोण कर्म और ग्रंथ के बीच संबंध पर आधारित है:

  • धर्म (धर्म/धार्मिक कर्तव्य) : प्रत्येक जीव का नैतिक कर्तव्य
  • अहिंसा (अहिंसा / अहिंसा) : सभी आतंकवादियों के प्रति करुणा
  • सत्य (सत्य / सत्यता) : ज्ञान और कर्म का आधार

त्रैता-वाद में कर्म का मूल्य केवल परिणाम से नहीं , बल्कि कर्म का नैतिक और आध्यात्मिक स्वरूप भी तय होता है।


5.4 कर्म और वैज्ञानिक समानताएँ

  • कारण और प्रभाव (कारण और परिणाम) :
    • आधुनिक विज्ञान में कार्य-कारण संबंध जैसा ही त्रैत-वाद में कर्म-फल सिद्धांत है।
  • फीडबैक लूप्स (प्रतिक्रिया चक्र) :
    • कर्म के परिणाम मन और समाज में प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं, जिससे भविष्य के कर्म प्रभावित होते हैं।
  • नैतिक क्रिया अनुसंधान (नैतिक क्रिया अनुसंधान) :
    • त्रैता-वाद का नैतिक दृष्टिकोण समाज और पर्यावरण के लिए जिम्मेदार कार्रवाई का समर्थन करता है।

5.5 कर्म, स्वतंत्रता और मुक्ति

त्रैता-वाद में कर्म का अंतिम लक्ष्य आत्मिक स्वतंत्रता (मोक्ष/मुक्ति) है:

  1. आसक्ति के बिना कर्म (निष्काम कर्म)
    • कर्म करना, लेकिन उसके फल में आस्था न रखना
  2. मन की शुद्धि (मन की शुद्धि)
    • नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से कर्म-मनोवैज्ञानिक संस्कारों को शुद्ध किया जाता है
  3. ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के साथ संरेखण (सृष्टि के नियम के अनुसार क्रम)
    • कर्म केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वभौमिक संतुलन बनाए रखते हैं

निष्काम और नैतिक त्रैत-वाद के ज्ञान के साथ मिलकर मोक्ष की दिशा तय करते हैं।


5.6 नैतिक कार्रवाई का आंतरिककरण

त्रैता-वाद में कर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं है, बल्कि आंतरिक मूल्य और स्वयं का प्रदर्शन है:

  • विचार कर्म के रूप में (विचार भी कर्म)
    • विचार, शब्द और क्रियाएँ तीनों कर्मों में शामिल हैं
  • माइंडफुलनेस एंड रिफ्लेक्शन (सतर्कता और आत्मनिरीक्षण)
    • प्रत्येक व्यवसाय के लिए आंतरिक एवं बाह्य उपचार की आवश्यकता होती है
  • परिवर्तनकारी शक्ति
    • नैतिक कर्म व्यक्ति को सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से अलग किया जाता है

5.7 निष्कर्ष

  • त्रैतवाद में कर्म और शास्त्र जीवन के मूल तत्व हैं।
  • कर्म केवल क्रिया या प्रयास नहीं, बल्कि ज्ञान, कृति और मुक्ति का संगम है।
  • आधुनिक नैतिक दर्शन और व्यवहार विज्ञान के दृष्टिकोण से त्रैत-वाद में क्रिया-परिणाम-परिवर्तन की स्पष्ट रूपरेखा है।
  • त्रैता-वाद का दृष्टिकोण बताता है कि जीवन का प्रत्येक कर्म, जब नैतिक और ज्ञानपूर्ण हो, तब वह मुक्ति का साधन बनता है।

👉 अगला अध्याय:
अध्याय 6 - चेतना, मन और त्रैत-वादChapter 6 – Consciousness, Mind, and Traita-vāda

अध्याय 4- त्रैतवाद में ज्ञान और ज्ञानमीमांसा: सच्ची बुद्धि को समझना

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