कणाद - वैशेषिक दर्शन 6.2
कणाद - वैशेषिक दर्शन 6.2 (19 सूत्र)
दृष्टानां दृष्टप्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय
अर्थ : दृष्ट और दृष्ट प्रयोजन के अभाव में प्रयोग का अभ्युदय होता है।
अभिषेचनोपवासब्रह्मचर्यगुरुकुलवासवानप्रस्थ्ययज्ञदानप्रोक्षणदिङ्नक्षत्रमन्त्रकालनियमाश्चादृष्टाय
अर्थ : अभिषेक, उपवास, ब्रह्मचर्य, गुरुकुलवास, यज्ञ, दान, प्रक्षण, दिन-नक्षत्र, मन्त्र-काल नियम आदि अभ्युदय के लक्षण हैं।
चातुराश्रम्यं उपधाच्चानुपधाच्च
अर्थ : चार आश्रमों में उपधा और अनुपधा भी लक्षण हैं।
भावदोष उपधा
अर्थ : उपधा में भावदोष का होना।
अदोषोऽनुपधा
अर्थ : अनुपधा में दोष का अभाव।
इष्टरूपरसगन्धस्पर्शं प्रोक्षितं अभ्युक्षितं च तच्छुचि
अर्थ : इष्ट के रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का प्रोक्षण और अभ्युक्षण ही शुद्धता है।
अशुचीति शुचिप्रतिषेधः
अर्थ : अशुद्ध को शुद्ध से प्रतिषेध कहा गया।
अर्थान्तरं च
अर्थ : अर्थान्तर का भी ध्यान रखा जाता है।
अयतस्य शुचिभोजनादभ्युदयो न विद्यते यमाभावात्
अर्थ : शुद्ध भोजन के अभाव में अभ्युदय नहीं होता, क्योंकि यमाभाव है।
विद्यते चानर्थान्तरत्वाद्यमस्य
अर्थ : इसका अस्तित्व अन्यार्थ के कारण भी पाया जाता है।
असति चाभावात्
अर्थ : असत के अभाव से।
सुखाद्रागः
अर्थ : सुख से राग उत्पन्न होता है।
तन्मयत्वात्
अर्थ : तन्मय होने से प्रभाव होता है।
तृप्तेः
अर्थ : तृप्ति से संबंधित।
अदृष्टात्
अर्थ : अदृष्ट से संबंधित।
जातिविशेषाच्च रागविशेषः
अर्थ : जातिविशेष और रागविशेष के अनुसार।
इच्छाद्वेषपूर्विका धर्माधर्मयोः प्रवृत्तिः
अर्थ : इच्छाद्वेषपूर्वक धर्म-अधर्म में प्रवृत्ति।
ततः संयोगो विभागश्च
अर्थ : ततः संयोग और विभाग की व्याख्या।
आत्मकर्मसु मोक्षो व्याख्यातः
अर्थ : आत्मकर्मों में मोक्ष का व्याख्यान।
Next Chapter Of Vaisheshik Darshan 7.1
0 टिप्पणियाँ