न्याय दर्शन के प्रमुख सूत्र (1–6)

यह लेख न्याय दर्शन के प्रारम्भिक सूत्रों का सरल, उदाहरणयुक्त और क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत करता है। सभी सूत्र एक ही स्थान पर अध्ययन हेतु दिए गए हैं।

🔱 सूत्र 1 : पदार्थोद्देश

सूत्र:
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम् तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।।

सरल अर्थ:
इन सोलह तत्वों के यथार्थ ज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

🔱 सूत्र 2 : दुःख और अपवर्ग

सूत्र:
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ।।

सरल अर्थ:
मिथ्याज्ञान से दोष, प्रवृत्ति, जन्म और दुःख उत्पन्न होते हैं। इनका पूर्ण नाश ही अपवर्ग (मोक्ष) है।

🔱 सूत्र 3 : प्रमाण

सूत्र:
प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ।।

सरल अर्थ:
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द — ये चार प्रमाण हैं।

🔱 सूत्र 4 : प्रत्यक्ष

सूत्र:
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ।।

सरल अर्थ:
इन्द्रियों और विषय के संयोग से उत्पन्न, अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी और व्यवहारात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है।

🔱 सूत्र 5 : अनुमान

सूत्र:
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधम् अनुमानं पूर्ववत् शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च ।।

सरल अर्थ:
अनुमान प्रत्यक्ष पर आधारित होता है और तीन प्रकार का होता है — पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट।

🔱 सूत्र 6 : उपमान

सूत्र:
प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनम् उपमानम् ।।

सरल अर्थ:
किसी प्रसिद्ध वस्तु से समानता के आधार पर नई वस्तु का ज्ञान होना उपमान प्रमाण है।


📌 नोट: यह पोस्ट एक Mega Reference Article है। आगे के सूत्र (7–16) इसी संरचना में जोड़े जा सकते हैं।