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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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न्याय दर्शन के प्रमुख सूत्र (1–6)

यह लेख न्याय दर्शन के प्रारम्भिक सूत्रों का सरल, उदाहरणयुक्त और क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत करता है। सभी सूत्र एक ही स्थान पर अध्ययन हेतु दिए गए हैं।

🔱 सूत्र 1 : पदार्थोद्देश

सूत्र:
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम् तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।।

सरल अर्थ:
इन सोलह तत्वों के यथार्थ ज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

🔱 सूत्र 2 : दुःख और अपवर्ग

सूत्र:
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ।।

सरल अर्थ:
मिथ्याज्ञान से दोष, प्रवृत्ति, जन्म और दुःख उत्पन्न होते हैं। इनका पूर्ण नाश ही अपवर्ग (मोक्ष) है।

🔱 सूत्र 3 : प्रमाण

सूत्र:
प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ।।

सरल अर्थ:
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द — ये चार प्रमाण हैं।

🔱 सूत्र 4 : प्रत्यक्ष

सूत्र:
इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ।।

सरल अर्थ:
इन्द्रियों और विषय के संयोग से उत्पन्न, अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी और व्यवहारात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है।

🔱 सूत्र 5 : अनुमान

सूत्र:
अथ तत्पूर्वकं त्रिविधम् अनुमानं पूर्ववत् शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च ।।

सरल अर्थ:
अनुमान प्रत्यक्ष पर आधारित होता है और तीन प्रकार का होता है — पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट।

🔱 सूत्र 6 : उपमान

सूत्र:
प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनम् उपमानम् ।।

सरल अर्थ:
किसी प्रसिद्ध वस्तु से समानता के आधार पर नई वस्तु का ज्ञान होना उपमान प्रमाण है।


📌 नोट: यह पोस्ट एक Mega Reference Article है। आगे के सूत्र (7–16) इसी संरचना में जोड़े जा सकते हैं।

 



🔱 न्याय दर्शन सूत्र 1.1.6

उपमान का लक्षण (Upamāna Pramāṇa)

📜 मूल सूत्र

प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनम् उपमानम् ।। ६ ।।
(उपमानलक्षणम्)


🌼 सरल अर्थ (Simple Hindi)

किसी प्रसिद्ध (पहचानी हुई) वस्तु के साथ समान धर्म (गुण) देखकर
किसी नई या अज्ञात वस्तु का ज्ञान होना — उपमान प्रमाण कहलाता है।

सीधे शब्दों में—

👉 पहले से जानी हुई वस्तु की सहायता से
नई वस्तु को समझना = उपमान


🧠 उपमान क्या है? (बहुत सरल)

जब हम कहते हैं—

  • “यह उस जैसा है”
  • “इसमें उसके गुण हैं”

और उसी से पहचान कर लेते हैं,
तो वह उपमान प्रमाण है।


🔍 सूत्र का पद-विभाग

1️⃣ प्रसिद्ध (Prasiddha)

जो वस्तु पहले से जानी-पहचानी हो।

उदाहरण:
गाय, सिंह, हाथी, अग्नि, सूर्य


2️⃣ साधर्म्य (Sādharmya)

समान गुण या विशेषता।

उदाहरण:

  • गाय और नीलगाय → आकृति समान
  • सिंह और शेर → वीरता समान

3️⃣ साध्य-साधनम्

जिससे जानने योग्य वस्तु जानी जाए।

अर्थ:
नई वस्तु का ज्ञान पुराने ज्ञान से होना।


4️⃣ उपमान (Upamāna)

समानता के आधार पर प्राप्त ज्ञान।


📘 शास्त्रीय उदाहरण (Classical Example)

ग्रंथों में प्रसिद्ध उदाहरण—

“नीलगाय गाय के समान होती है।”

प्रक्रिया:

  1. आपने पहले गाय देखी है
  2. जंगल में एक नया पशु देखा
  3. आकार-प्रकार गाय जैसा है
  4. स्मरण हुआ — “यह गाय के समान है”
  5. निष्कर्ष — यह नीलगाय है

👉 यही उपमान प्रमाण है।


🌍 दैनिक जीवन के उदाहरण

  • मोबाइल का नया मॉडल → “पुराने जैसा है”
  • नया फल → “सेब जैसा स्वाद है”
  • किसी व्यक्ति को देखना → “फलाँ जैसे स्वभाव वाला है”

🌸 भक्ति और अध्यात्म में उपमान

भारतीय भक्ति परंपरा में उपमा अत्यंत महत्वपूर्ण है—

  • आत्मा सूर्य के समान
  • ईश्वर सागर जैसा
  • संसार स्वप्न के समान
  • देह वस्त्र के समान

👉 यह सब उपमान प्रमाण पर आधारित है।

गीता 2.22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
देह को वस्त्र से समझाना — उपमान है।


🧘 दर्शन में उपमान का महत्व

  • जो प्रत्यक्ष नहीं
  • जो अनुमान से कठिन
  • उसे उपमान से सरल बनाया जाता है

इसी कारण—

  • वेदांत
  • पुराण
  • उपनिषद
    सबमें उपमा प्रचुर मात्रा में है।

🌺 निष्कर्ष

न्याय दर्शन सिखाता है—

सत्य को समझने के लिए
सिर्फ तर्क नहीं,
उपमा भी आवश्यक है।

इसी से—

  • कठिन दर्शन सरल बनता है
  • भक्ति रसपूर्ण होती है
  • और ज्ञान हृदय तक पहुँचता है


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