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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Nayaya sutra 1.1. 1-25

न्याय दर्शन के सूत्र (1–25) – सरल व्याख्या

न्याय दर्शन के सूत्र (1–25)
सरल हिन्दी व्याख्या सहित

न्याय दर्शन का उद्देश्य तत्त्वज्ञान के द्वारा दुःख से पूर्ण मुक्ति (अपवर्ग/मोक्ष) प्राप्त करना है। नीचे सभी प्रमुख सूत्र क्रमबद्ध रूप से सरल भाषा में समझाए गए हैं।

सूत्र 1 – पदार्थोद्देश

प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम् तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ।।

इन सोलह पदार्थों के यथार्थ ज्ञान से मनुष्य को निःश्रेयस अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सूत्र 2

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ।।

मिथ्याज्ञान से दोष, दोष से प्रवृत्ति, प्रवृत्ति से जन्म और जन्म से दुःख होता है। इन सबका नाश ही मोक्ष है।
सूत्र 3 – प्रमाण

प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ।।

प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द – ये चार ज्ञान के प्रमाण हैं।
सूत्र 4 – प्रत्यक्ष

इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ।।

इन्द्रियों और विषय के संपर्क से उत्पन्न निश्चित ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है।
सूत्र 5 – अनुमान

अथ तत्पूर्वकं त्रिविधम् अनुमानं पूर्ववत् शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च ।।

अनुमान तीन प्रकार का होता है – पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट।
सूत्र 6 – उपमान

प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनम् उपमानम् ।।

समानता के आधार पर किसी नई वस्तु का ज्ञान होना उपमान है।
सूत्र 7 – शब्द

आप्तोपदेशः शब्दः ।।

विश्वसनीय व्यक्ति का उपदेश शब्द प्रमाण कहलाता है।
सूत्र 8

स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् ।।

शब्द प्रमाण दो प्रकार का होता है – लौकिक और वैदिक।
सूत्र 9 – प्रमेय

आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् ।।

आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, दुःख और मोक्ष – ये सब जानने योग्य विषय हैं।
सूत्र 10 – आत्मा

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानानि आत्मनः लिङ्गम् ।।

इच्छा, द्वेष, ज्ञान, सुख और दुःख आत्मा के लक्षण हैं।
सूत्र 11 – शरीर

चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।।

इन्द्रियों और क्रियाओं का आधार शरीर है।
सूत्र 12 – इन्द्रियाँ

घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणि इन्द्रियाणि भूतेभ्यः ।।

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच भूतों से बनी हैं।
सूत्र 13 – भूत

पृथिवी आपः तेजः वायुः आकाशं इति भूतानि ।।

पाँच महाभूत हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।
सूत्र 14

गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणाः तदर्थाः ।।

गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द – भूतों के गुण हैं।
सूत्र 15 – बुद्धि

बुद्धिः उपलब्धिः ज्ञानं इति अनर्थान्तरम् ।।

बुद्धि, ज्ञान और उपलब्धि एक ही अर्थ के शब्द हैं।
सूत्र 16 – मन

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिः मनसः लिङ्गम् ।।

एक समय में एक ही ज्ञान होना मन का लक्षण है।
सूत्र 17 – प्रवृत्ति

प्रवृत्तिः वाग्बुद्धिशरीरारम्भः ।।

वाणी, मन और शरीर की क्रिया को प्रवृत्ति कहते हैं।
सूत्र 18 – दोष

प्रवर्त्तनालक्षणाः दोषाः ।।

राग, द्वेष आदि जो कर्म में प्रवृत्त करते हैं, दोष कहलाते हैं।
सूत्र 19 – प्रेत्यभाव

पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ।।

मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होना प्रेत्यभाव है।
सूत्र 20 – फल

प्रवृत्तिदोषजनितः अर्थः फलम् ।।

कर्म और दोष से उत्पन्न परिणाम फल कहलाता है।
सूत्र 21 – दुःख

बाधनालक्षणं दुःखम् ।।

जो पीड़ा या बाधा दे वही दुःख है।
सूत्र 22 – अपवर्ग

तदत्यन्तविमोक्षः अपवर्गः ।।

दुःख से पूर्ण मुक्ति ही अपवर्ग या मोक्ष है।
सूत्र 23 – संशय

समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेः ... विमर्शः संशयः ।।

एक ही वस्तु के बारे में निश्चित ज्ञान न होना संशय है।
सूत्र 24 – प्रयोजन

यं अर्थं अधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ।।

जिस उद्देश्य से कार्य किया जाए वही प्रयोजन है।
सूत्र 25 – दृष्टान्त

लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिनर्थे बुद्धिसाम्यं सः दृष्टान्तः ।।

सभी को ज्ञात उदाहरण को दृष्टान्त कहते हैं।
सूत्र 26–41 (सार)
इन सूत्रों में सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद आदि तार्किक प्रक्रिया को समझाया गया है, जिससे सत्य का निर्धारण किया जाता है।

समापन: complete sutra of this Chapter

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