कणाद - वैशेषिक दर्शन 9
कणाद - वैशेषिक दर्शन 9 (28 सूत्र)
क्रियागुणव्यपदेशाभावादसत्
अर्थ : क्रिया और गुण के व्यपदेश (निषेध) के अभाव से सत्।
सदसत्
अर्थ : सत और असत का ज्ञान।
असतः सत्क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम्
अर्थ : असत से सत की क्रियाओं और गुणों में व्यपदेश के अभाव से अर्थान्तर।
सच्चासत्
अर्थ : सत और असत का संबंध।
यच्चान्यत्सतस्तदप्यसत्
अर्थ : अन्यथा सत, अन्यथा असत।
असदिति भूतप्रत्यक्षाभावाद्भूतस्मृतेर्विरोधिप्रत्यक्षत्वाच्च ज्ञानम्
अर्थ : असद के कारण भूत का प्रत्यक्ष न होने और स्मृति तथा विरोधी प्रत्यक्ष से ज्ञान।
तथाबावे भावप्रत्यक्षत्वाच्च
अर्थ : भाव के प्रत्यक्षत्व से ज्ञान।
एतेनाघटोऽगौरधर्मश्च व्याख्यातः
अर्थ : घट और गौण धर्म का व्याख्यान।
अभूतं नास्तीत्यनर्थान्तरम्
अर्थ : अभूत (असत्य) नहीं – अर्थान्तर।
नास्ति घटो गेह इति सतो घटस्य गेहसंयोगप्रतिषेधः
अर्थ : घट और गेह के संयोग में सत का प्रतिषेध।
नास्त्यन्यश्चन्द्रमा इति सामान्याच्चन्द्रमसः प्रतिषेधः
अर्थ : अन्य चन्द्रमा नहीं – सामान्य चन्द्रमा का प्रतिषेध।
सदसतोर्वैधर्म्यात्कार्ये सदसत्ता न
अर्थ : सत और असत में वैधर्म्य – कार्य में सदसत्ता नहीं।
आत्मन्यात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मप्रत्यक्षम्
अर्थ : आत्मा, मन और आत्मा के संयोग विशेष से प्रत्यक्ष।
तथा द्रव्यान्तरेषु
अर्थ : द्रव्यों के अंतर में भी।
आत्मेन्द्रियमनोऽर्थसन्निकर्षाच्च
अर्थ : आत्मा, इन्द्रिय और मन के अर्थ सन्निकर्ष से।
तत्समवायात्कर्मगुणेषु
अर्थ : कर्म और गुण में समवाय से।
आत्मसमवायादात्मगुणेषु
अर्थ : आत्म समवाय में आत्म गुणों में।
अस्येदं कार्यं कारणं संबन्ध्येकार्ह्तसमवायि विरोधि चेति लैङ्गिकम्
अर्थ : कार्य और कारण के सम्बंध में समवाय और विरोध का लैङ्गिक ज्ञान।
एतेन शाब्दं व्याख्यातम्
अर्थ : इसके द्वारा शाब्दिक ज्ञान व्याख्यायित।
हेतुरपदेशो लिङ्गं निमित्तं प्रमाणं कारणं इत्यनर्थान्तरम्
अर्थ : कारण, लिङ्ग और प्रमाण के अनुसार अर्थान्तर।
अस्येदं इति बुद्ध्यपेक्षत्वात्
अर्थ : "अस्येदं" – बुद्धि के अनुसार।
आत्ममनसोः संयोगविशेषात्संस्काराच्च स्मृतिः
अर्थ : आत्म और मन के संयोग विशेष और संस्कार से स्मृति।
तथा स्वप्नः स्वप्नान्तिकं च
अर्थ : स्वप्न और स्वप्नान्तिक का ज्ञान।
धर्माच्च
अर्थ : धर्म का ज्ञान।
इन्द्रियदोषात्संस्काराच्चाविद्या
अर्थ : इन्द्रिय दोष और संस्कार से अविद्या।
तद्दुष्टं ज्ञानम्
अर्थ : तद्दुष्ट (अशुद्ध) से ज्ञान।
अदुष्टं विद्या
अर्थ : अदुष्ट से विद्या।
आर्षं सिद्धदर्शनं च धर्मेभ्यः
अर्थ : आर्ष और सिद्ध दर्शन तथा धर्म से ज्ञान।
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