कणाद - वैशेषिक दर्शन 10
कणाद - वैशेषिक दर्शन 10 (21 सूत्र)
आत्मसमवायः सुखदुःखयोः पञ्चभ्योऽर्थान्तरत्वे हेतुस्तदाश्रयिभ्यश्च गुणेभ्यः
अर्थ : आत्मसमवाय कारण होता है सुख-दुःख के अर्थान्तर में, तथा गुण और आश्रयी में।
इष्टानिष्टकारणविशेषाद्विरोधाच्च मिथः सुखदुःखयोरर्थान्तरभावः
अर्थ : इच्छित-अइच्छित कारण के विशेष और विरोध से सुख-दुःख का अर्थान्तर।
संशयनिर्णययोरर्थान्तरभावश्च ज्ञानान्तरत्वे हेतुः
अर्थ : संशय और निर्णय से अर्थान्तरभाव का कारण ज्ञानान्तर।
तयोर्निष्पत्तिः प्रत्यक्षलैङ्गिकाभ्यां ज्ञानान्तरत्वे हेतुः
अर्थ : प्रत्यक्ष और लैङ्गिक प्रमाण से निष्पत्ति का ज्ञानान्तर में कारण।
भूतं इति प्रत्यक्षं व्याख्यातम्
अर्थ : भूत को प्रत्यक्ष रूप में व्याख्यात किया।
भविष्यतीति कार्यान्तरे दृष्टत्वात्
अर्थ : भविष्यत् का ज्ञान कार्यान्तरे दृष्टत्व से।
तथा भवतीति सापेक्षेभ्योऽनपेक्षेभ्यश्च
अर्थ : भवतीति का ज्ञान सापेक्ष और अनपेक्ष दोनों से।
अभूदित्यभूतात्
अर्थ : अभूत का ज्ञान भूत से।
सति च कार्यासमवायात्
अर्थ : सत होने पर कार्य के समवाय से।
एकार्थसमवायिषु कारणान्तरेषु दर्शनादेकदेश इत्येकस्मिन्
अर्थ : एकार्थ समवाय में कारणान्तर में एकदेश का दर्शन।
शिरः पृष्ठं उदरं पाणिरिति तद्विशेषेभ्यः
अर्थ : शिर, पृष्ठ, उदर, पाणि – इन विशेषों से।
कारणं इति द्रव्ये कार्यसमवायात्
अर्थ : द्रव्य में कारण का ज्ञान कार्य समवाय से।
संयोगात्वा
अर्थ : संयोग से।
कारणसमवायात्कर्मणि
अर्थ : कर्म में कारण समवाय से।
तथा रूपे कारणकारणसमवायाच्च
अर्थ : रूप में कारण-कारण समवाय से।
कारणसमवायात्संयोगे
अर्थ : संयोग में कारण समवाय से।
तथा कारणाकारणसमवायाच्च
अर्थ : कारण-अकारण समवाय से।
संयुक्तसमवायादग्नेर्वैशेषिकम्
अर्थ : संयुक्त समवाय से अग्नि का वैशेषिक ज्ञान।
लैङ्गिकं प्रमाणं व्याख्यातम्
अर्थ : लैङ्गिक प्रमाण से व्याख्यान।
दृष्टानां दृष्टप्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोऽभ्युदयाय
अर्थ : दृष्ट और दृष्ट प्रयोजन के अभाव में प्रयोग का अभ्युदय।
तद्वचनादाम्नायप्रामाण्यं इति
अर्थ : तद्वचन से आम्नाय (शास्त्र) प्रामाण्य।
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