ये = जो
अग्नयो = अग्नि के लिए / अग्नि के रूप में
अप्स्वन्तर्ये = जल और अंतरिक्ष में
वृत्रे = शत्रु / बाधक
पुरुषे = मनुष्य / प्राणी
अश्मसु = पत्थरों में
य = जो
आ विवेश = प्रवेश किया
ओषधीर्यः = औषधियों और वनस्पतियों में
वनस्पतीम् = वनस्पतियों में
तेभ्यः = उनके द्वारा
अग्निभ्यः = अग्नि को
हुतम् = अर्पित / समर्पित
अस्तु = हो
एतत् = यह
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि अग्नि की शक्ति और उसके विभिन्न रूपों का आवाहन कर रहे हैं। “ये अग्नयो अप्स्वन्तर्ये वृत्रे” से यह स्पष्ट होता है कि अग्नि केवल एक स्थिर तत्व नहीं है, बल्कि जल, पृथ्वी, और आकाश में विद्यमान विभिन्न रूपों में व्याप्त है। यहाँ अग्नि को न केवल पूजा और यज्ञ के लिए बल्कि जीवन की सभी बाधाओं और शत्रुओं का नाश करने वाली शक्ति के रूप में माना गया है।
“ये पुरुषे ये अश्मसु” से संकेत मिलता है कि अग्नि का प्रभाव मनुष्य और पत्थरों में भी है। यह हमें यह सिखाता है कि प्राकृतिक तत्वों में छिपी शक्ति को समझकर उसका सदुपयोग करना चाहिए। “य आविवेश ओषधीर्यः वनस्पतीम्” का आशय है कि अग्नि औषधियों और वनस्पतियों में प्रवेश करती है, जिससे पौधों और औषधियों में जीवन शक्ति और औषधीय गुण उत्पन्न होते हैं।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र हमें प्रकृति की गहन समझ और उसकी शक्तियों का उपयोग करने की शिक्षा देता है। अग्नि केवल भौतिक नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य का आधार भी है।
- **विज्ञान:** यह प्राकृतिक तत्वों में ऊर्जा प्रवाह और जैविक प्रभावों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। अग्नि की ऊर्जा औषधियों और वनस्पतियों में जैविक क्रियाओं को प्रभावित करती है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यह मन्त्र हमें यह स्मरण कराता है कि सभी शक्तियाँ ब्रह्म से उत्पन्न होती हैं। अग्नि का सही साधना और प्रयोग हमें जीवन की उन्नति और बाधाओं के नाश की ओर ले जाता है।
इस प्रकार, यह मन्त्र हमें सिखाता है कि प्राकृतिक तत्वों, औषधियों और वनस्पतियों में विद्यमान अग्नि की शक्ति का सदुपयोग करना चाहिए, जिससे हम शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से प्रबल बन सकें। यज्ञ, पूजा और ध्यान में इसका प्रयोग जीवन शक्ति, स्वास्थ्य और समृद्धि को बढ़ाने में सहायक होता है।
English Explanation
This mantra invokes the power of Agni in its multiple forms across water, space, humans, stones, and plants. “Ye agnayo apsvantarye vrtre” indicates that fire is not just a single element but pervades all natural forms, acting as a force that removes obstacles and destroys enemies. “Ye puruse ye ashmasu” suggests that fire’s influence extends to humans and stones, teaching us to understand and use natural energies wisely.
From a **knowledge, science, and Brahmgyan perspective**, it emphasizes:
- **Knowledge:** Understanding natural forces and applying them beneficially.
- **Science:** Energy transfer in natural elements and its effect on biological processes.
- **Brahmgyan:** All powers arise from Brahman; correct practice with Agni leads to growth and removal of obstacles.
Thus, the mantra teaches harnessing Agni in plants, medicines, and natural elements to enhance life, health, and spiritual power.
Word by Word
यः = जो
सोमे = सोम में / सोम रस में
अन्तर्यो = अंतर में / भीतर
गोस्वन्तर्य = गायों के भीतर
आविष्टो = निविष्ट / प्रवेशित
वयःसु = यौवन / प्राणी
यो = जो
मृगेषु = वन्य प्राणियों में
य = जो
आ विवेश = प्रवेश किया
द्विपदो = द्विपाद प्राणियों में
यः चतुष्पद = और चतुष्पाद प्राणियों में
तेभ्यः = उनके द्वारा
अग्निभ्यः = अग्नि के लिए
हुतम् = अर्पित / हवन किया
अस्तु = हो
एतत् = यह
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि अग्नि की सर्वव्यापी शक्ति का वर्णन कर रहे हैं। “यः सोमे अन्तर्यो गोष्वन्तर्य आविष्टो वयःसु” का आशय है कि अग्नि सोमरस में और गायों के अंदर निविष्ट है; यह केवल यज्ञ या अग्नि के रूप में नहीं, बल्कि जीवन और पोषण का स्रोत भी है। “यो मृगेषु” और “द्विपदो यस्चतुष्पद” से पता चलता है कि अग्नि वन्य प्राणियों, द्विपाद और चतुष्पाद प्राणियों में भी विद्यमान है।
यह मन्त्र हमें यह सिखाता है कि प्राकृतिक ऊर्जा, विशेषकर अग्नि, सभी जीवों और पौधों में व्याप्त है। “तेभ्यः अग्निभ्यः हुतमस्त्वेतत्” का अर्थ है कि इस सर्वव्यापी अग्नि को हम हवन और यज्ञ के माध्यम से समर्पित करते हैं, जिससे जीवन, समृद्धि और सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र हमें बताता है कि अग्नि न केवल एक यज्ञ का अंग है बल्कि यह सभी जीवों और वनस्पतियों में जीवनदायिनी शक्ति के रूप में कार्य करती है।
- **विज्ञान:** यहाँ विज्ञान की दृष्टि से ऊर्जा का वितरण और जैविक प्रभाव दिखाई देता है। अग्नि की ऊर्जा पौधों और जीवों में पोषण और स्वास्थ्य का आधार बनती है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यह मन्त्र हमें यह स्मरण कराता है कि यह शक्ति ब्रह्म से उत्पन्न है। सही साधना और यज्ञ के माध्यम से इस अग्नि को समर्पित करना हमें आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति दोनों प्रदान करता है।
इस प्रकार, यह मन्त्र हमें सिखाता है कि अग्नि केवल यज्ञ का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जीवन शक्ति का प्रतीक है। इसके माध्यम से हम प्रकृति में छिपी शक्ति का सम्मान और उपयोग कर सकते हैं, जिससे सभी प्राणी स्वस्थ, समर्थ और समृद्ध बनें।
English Explanation
This mantra describes Agni’s omnipresent power in all living beings. “Yaḥ some antaryo gosvantarya avishto vayahsu” indicates that Agni is present in Soma, inside cows, and within youthful creatures. “Yo mrgeshu” and “dvipado yaschatushpada” show that fire pervades wild animals, bipeds, and quadrupeds alike.
We offer this omnipresent Agni through havan, which ensures life, prosperity, and protection.
From a **knowledge, science, and Brahmgyan perspective**:
- **Knowledge:** Agni is not merely an element in yajna; it is life-giving and present in all beings and plants.
- **Science:** This illustrates energy distribution and its biological effects in flora and fauna.
- **Brahmgyan:** The power originates from Brahman; proper ritual offering of Agni brings spiritual and material advancement.
Thus, this mantra teaches us to respect and harness the omnipresent Agni for the health, vitality, and prosperity of all creatures.
Word by Word
यः = जो
इन्द्रेण = इन्द्र द्वारा
सरथं = सारथी / वाहन
याति = जाता है / संचालित होता है
देवः = देवता
वैश्वानर = वैश्वानर / अग्नि
उत = और
विश्वदाव्यः = विश्व को द्रव्य देने वाला
यं = जिसे
जोहवीमि = मैं अर्पित करता हूँ
पृतनासु = प्राणियों / जीवों में
सासहिं = अत्यन्त शक्तिशाली / सहकारी
तेभ्यः = उनके लिए
अग्निभ्यः = अग्नियों के लिए
हुतम् = अर्पित / हवन किया
अस्तु = हो
एतत् = यह
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि अग्नि और देवताओं के माध्यम से जीवन शक्ति और समृद्धि का यथार्थ वर्णन करते हैं। “य इन्द्रेण सरथं याति” से यह संकेत मिलता है कि अग्नि और देवता इन्द्र की सारथी के समान सभी गतिविधियों और जीवन की प्रक्रियाओं को संचालित करते हैं। “देवो वैश्वानर उत विश्वदाव्यः” का अर्थ है कि यह शक्ति न केवल मानव जीवन में, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में व्यापक रूप से फैलती है।
“यं जोहवीमि पृतनासु सासहिं” हमें बताता है कि इस सर्वव्यापी अग्नि को हवन और यज्ञ के माध्यम से हम जीवों के कल्याण के लिए अर्पित करते हैं। अग्नि, देव और यज्ञ के माध्यम से हमें अपने जीवन, परिवार और समाज में समृद्धि और सुरक्षा प्राप्त होती है।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र बताता है कि अग्नि न केवल पदार्थ को जलाने का माध्यम है, बल्कि यह जीवन शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है।
- **विज्ञान:** अग्नि ऊर्जा का स्रोत है जो सभी जीवों और वनस्पतियों में पोषण और स्वास्थ्य प्रदान करती है। यह प्रकृति में ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यह मन्त्र हमें याद दिलाता है कि यह शक्ति ब्रह्म से उत्पन्न है। यज्ञ और हवन के माध्यम से इसे अर्पित करने से न केवल भौतिक लाभ, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है।
इस प्रकार, यह मन्त्र हमें सिखाता है कि अग्नि और देवताओं की शक्ति सर्वव्यापी है। इसे सही साधना और यज्ञ द्वारा सम्मानित करना न केवल हमारे जीवन और समाज की समृद्धि का मार्ग है, बल्कि यह ब्रह्मज्ञान के अनुभव का भी आधार है।
English Explanation
This mantra describes Agni and the gods as universal forces guiding life and prosperity. “Yaḥ Indrena saratham yāti” indicates that Agni and the gods act like Indra’s charioteer, directing all actions and life processes. “Devo Vaishvānara ut Vishvadāvyaḥ” shows that this energy pervades all living beings and the universe.
“Yaṃ johavīmi pratanāsu sāsaḥiṃ” tells us that this omnipresent Agni is offered through havan for the welfare of all beings. Through Agni, gods, and yajna, we attain prosperity, protection, and spiritual advancement.
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** Agni symbolizes life-force and energy, not just a medium for burning material.
- **Science:** Agni is an energy source sustaining health and growth in all living beings and plants, representing the flow of energy in nature.
- **Brahmgyan:** This power originates from Brahman; offering it through rituals grants both material and spiritual progress.
Thus, this mantra teaches that the power of Agni and gods is omnipresent. Honoring it through proper rituals ensures prosperity, health, and the experience of Brahmgyan.
Word by Word
यो = जो
देवः = देवता
विश्वाद्यम् = समस्त विश्व में पहला / सर्वप्रथम
उ = और
कामम् = इच्छा / कामना
आहुः = कहते हैं
यम् = जिसे
दातारम् = दान करने वाला
प्रतिगृह्णन्तम् = ग्रहण करने योग्य
आहुः = कहते हैं
यो = जो
धीरः = पराक्रमी / साहसी
शक्रः = इन्द्र
परिभूरदाभ्यः = पूरी भरी शक्ति से
तेभ्यः = उनके लिए
अग्निभ्यः = अग्नियों के लिए
हुतम् = अर्पित / हवन किया
अस्तु = हो
एतत् = यह
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि हमें बताते हैं कि जो देवता समस्त विश्व के पहले और प्रधान हैं, वही इच्छाओं और कल्याणकारी कार्यों के दाता हैं। “यो देवो विश्वाद्यम्” से यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति सार्वभौमिक है और सृष्टि के समस्त जीवों और तत्वों में विद्यमान है। “काममाहुः दातारं प्रतिगृह्णन्तम्” का अर्थ है कि यह देवता इच्छाओं और कल्याण को पूरा करने वाला है, और उसे ग्रहण करने योग्य कहा जाता है।
“यो धीरः शक्रः परिभूरदाभ्यः” हमें इंगित करता है कि यह देवता साहसी, पराक्रमी और सम्पूर्ण शक्ति से संपन्न हैं। उन्हें अग्नि द्वारा हवन करने से न केवल उनके आशीर्वाद प्राप्त होते हैं, बल्कि हम भी जीवन में शक्ति, साहस और समृद्धि का अनुभव कर पाते हैं।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र यह बताता है कि सृष्टि में सर्वोच्च शक्ति हमेशा उपलब्ध रहती है और उसे समझना ज्ञान प्राप्ति का मार्ग है।
- **विज्ञान:** यहाँ देवता की शक्ति और अग्नि के माध्यम से ऊर्जा का आदान-प्रदान दर्शाया गया है। यह बताता है कि ऊर्जा का सही उपयोग और समर्पण हमारे जीवन में समृद्धि लाता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** इस मन्त्र में कहा गया है कि देवता और अग्नि ब्रह्म से उत्पन्न हैं। सही हवन और यज्ञ से न केवल भौतिक लाभ होता है, बल्कि यह आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-प्रकाश का मार्ग भी है।
इस प्रकार, यह मन्त्र हमें सिखाता है कि देवताओं की शक्ति सार्वभौमिक और स्थायी है। यज्ञ और हवन के माध्यम से उसे सम्मान देने से हम जीवन में समृद्धि, साहस और ब्रह्मज्ञान का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।
English Explanation
This mantra describes the deity who is the first and foremost in the universe as the giver of desires and welfare. “Yo Devo Vishvādyaṃ” indicates that this power is universal and present in all beings and elements. “Kāmām āhuh dātāram pratigṛhṇantam” means that the deity fulfills our desires and is worthy of receiving offerings.
“Yo Dhīraḥ Śakraḥ paribhūrādābhyah” shows that the deity is courageous, powerful, and complete in strength. Offering him through Agni in havan brings blessings, strength, courage, and prosperity.
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** Understanding the supreme universal power is a path to wisdom.
- **Science:** The mantra illustrates the exchange of energy through Agni, showing that proper use and dedication of energy brings prosperity.
- **Brahmgyan:** Deities and Agni originate from Brahman. Correct rituals bring material benefits and spiritual advancement.
Thus, this mantra teaches that the power of the gods is universal and enduring. By honoring it through yajna and havan, one can experience prosperity, courage, and realization of Brahmgyan.
Word by Word
यं = जिसे
त्वा = आप / तुम्हें
होतारं = यज्ञ के प्रमुख होतर / आह्वान करने वाला
मनसाभि = मन, बुद्धि और संकल्प से
संविदु: = ज्ञानी / सजग
त्रयोदश = तेरह
भौवनाः = भूमियों / पृथ्वियों के रचयिता
पञ्च = पांच
मानवाः = मानव रूपी देवता
वर्चोधसे = महिमा, शक्ति और सामर्थ्य से
यशसे = यश और प्रसिद्धि से
सूनृतावते = सच्चाई और धर्म के साथ
तेभ्यः = उनके लिए
अग्निभ्यः = अग्नियों के लिए
हुतम् = अर्पित / हवन किया
अस्तु = हो
एतत् = यह
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में वर्णित होतर देवता का महत्व बताया गया है। “यं त्वा होतारं” कहकर ऋषि हमें बताते हैं कि अग्नि और यज्ञ के माध्यम से यह देवता सम्पूर्ण शक्ति, ज्ञान और कार्य संपन्न करता है। होतर केवल यज्ञ का प्रदर्शन करने वाला नहीं है, बल्कि अपने मन, बुद्धि और संकल्प से यज्ञ को सफल बनाता है।
“संविदुस्त्रयोदश भौवनाः पञ्च मानवाः” यह संकेत करता है कि यह शक्ति तेरह भौतिक या आध्यात्मिक क्षेत्रों में सक्रिय रहती है और पाँच मानव रूपी देवताओं के माध्यम से कार्य करती है। “वर्चोधसे यशसे सूनृतावते” से यह स्पष्ट होता है कि होतर की महिमा, शक्ति और यश सच्चाई और धर्म के आधार पर प्रतिष्ठित हैं।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र सिखाता है कि किसी भी यज्ञ या कर्म में केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी बुद्धिमत्ता और संकल्प शक्ति भी आवश्यक है।
- **विज्ञान:** यज्ञ और हवन ऊर्जा का आदान-प्रदान हैं, और होतर के माध्यम से यह प्रक्रिया नियंत्रित होती है। यह प्राकृतिक ऊर्जा और मानव चेतना के सामंजस्य को दर्शाता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यह मन्त्र हमें बताता है कि यज्ञ के माध्यम से ब्रह्म की सत्ता का अनुभव किया जा सकता है। होतर और यज्ञ द्वारा आराधना करने से न केवल भौतिक लाभ बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और आत्मज्ञान भी प्राप्त होता है।
इस प्रकार यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि यज्ञ के सफल संचालन में होतर का ज्ञान, शक्ति और धर्मनिष्ठा आवश्यक है। यज्ञ के माध्यम से हमें न केवल सामाजिक और व्यक्तिगत कल्याण मिलता है, बल्कि ब्रह्मज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का अनुभव भी होता है।
English Explanation
This mantra describes the importance of the Hotar deity in a yajna. “Yaṃ tvā Hotāraṃ” indicates that through Agni and yajna, this deity manifests complete strength, knowledge, and effectiveness. The Hotar is not just the performer of the ritual but ensures its success with mind, intellect, and resolve.
“Sanviduḥ trayodaśa bhauvanāḥ pañca mānavāḥ” points out that this power operates across thirteen physical or spiritual domains and through five human-like deities. “Varcodhase yaśase sūnṛtāvate” signifies that the Hotar’s glory, strength, and fame are established on truth and righteousness.
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** Success in any ritual requires not only action but also wisdom and resolute intent.
- **Science:** Yajna and havan represent energy exchange, regulated through the Hotar, reflecting the harmony of natural energy and human consciousness.
- **Brahmgyan:** Yajna allows the experience of Brahman. Through proper performance and devotion, one attains material benefits, spiritual growth, and self-realization.
Thus, this mantra emphasizes that the knowledge, power, and dharma of the Hotar are essential for a successful yajna, leading to prosperity, spiritual awakening, and realization of Brahmgyan.
Word by Word
उक्षान्नाय = अन्न और अन्न के बीज के लिए
वशान्नाय = वश, शक्ति और नियंत्रण के लिए
सोपमृष्ठाय = सोम का आधार / सोम रस के लिए
वेधसे = प्रेरित करते हो / प्रदान करते हो
वैश्वानरज्येष्ठेभ्यः = वैश्वानर देवों में श्रेष्ठ
तेभ्यः = उनके लिए
अग्निभ्यः = अग्नि को
हुतम् = अर्पित / हवन किया
अस्तु = हो
एतत् = यह
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में यजुर्वेदिक दृष्टि से अन्न, सोम और यज्ञ में अग्नि के महत्व को वर्णित किया गया है। “उक्षान्नाय वशान्नाय” कहकर यह मन्त्र हमें बताता है कि अन्न और अनाज के माध्यम से शक्ति, पोषण और वश बढ़ाया जाता है। अन्न ही जीवन का आधार है और यह समाज और परिवार की समृद्धि का प्रतीक है।
“सोपमृष्टाय वेधसे” से यह स्पष्ट होता है कि सोम रस, यज्ञ और ऊर्जा का स्रोत है। सोम का सेवन या उपयोग यज्ञ और हवन में देवताओं की कृपा, शक्ति और समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
“वैश्वानरज्येष्ठेभ्यस्तेभ्यः अग्निभ्यः हुतमस्त्वेतत्” यह दर्शाता है कि वैश्वानर देवताओं और अग्नि को हवन अर्पित किया जा रहा है। यहाँ पर यज्ञ के माध्यम से सामूहिक ऊर्जा का संचार होता है।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र सिखाता है कि अन्न और ऊर्जा के स्रोतों का सम्मान करना आवश्यक है। अन्न और सोम यज्ञ के माध्यम से सामाजिक और व्यक्तिगत कल्याण के साधन हैं।
- **विज्ञान:** यज्ञ और हवन प्रक्रियाओं में उर्जा आदान-प्रदान होता है। अन्न और सोम, भौतिक ऊर्जा और आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार का माध्यम हैं।
- **ब्रह्मज्ञान:** यह मन्त्र बताता है कि यज्ञ के माध्यम से ब्रह्म की कृपा और शक्ति प्राप्त होती है। अन्न और सोम के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति और दिव्य चेतना का अनुभव होता है।
इस प्रकार यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि अन्न, सोम और अग्नि यज्ञ के माध्यम से जीवन, शक्ति, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक तत्व हैं।
English Explanation
This mantra highlights the importance of food, soma, and Agni in a yajna. “Ukṣānnāya vaśānnāya” indicates that food and grains are sources of strength, nourishment, and control. They are the foundation of life and prosperity in society and family.
“Sopamṛṣṭhāya vedhase” emphasizes soma as the source of ritual energy. Soma, in yajnas and havans, brings divine blessings, power, and prosperity.
“Vaiśvānara-jyeṣṭhebhyaḥ tebhyaḥ agnibhyaḥ hutam astvat” shows that the offerings are dedicated to the supreme Vaiśvānara deities and Agni, channeling collective energy through ritual.
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** Respecting food and energy sources is essential; grains and soma in yajna bring both personal and social welfare.
- **Science:** Rituals facilitate energy transfer; food and soma act as mediums for physical and spiritual energy.
- **Brahmgyan:** Through yajna, one receives divine grace and spiritual power. Food and soma aid spiritual elevation and experience of divine consciousness.
Thus, this mantra emphasizes that food, soma, and Agni offerings in yajna are crucial for life, strength, and spiritual progress.
Word by Word
दिवं = आकाश / आकाशीय क्षेत्र
पृथिवी = पृथ्वी
मन्वन्तरिक्षं = अंतरिक्ष / आकाश और पृथ्वी के बीच
ये = जो
विद्युत् = बिजली / बिजली के चमकते रूप
अनुसंचरन्ति = विचरित होते हैं / गतिशील हैं
ये = जो
दिक्ष्वन्तर्ये = दिशाओं में / चारों ओर
वाते = वायु में
अन्तः = भीतर / अंत में
तेभ्यः = उनके लिए
अग्निभ्यः = अग्नि को
हुतम् = अर्पित / हवन किया
अस्त्वेतत् = हो यह
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मन्त्र दिव्य और प्राकृतिक शक्तियों का वर्णन करता है, विशेषकर आकाशीय और पृथ्वी तत्वों की गतिविधियों को। "दिवं पृथिवी मन्वन्तरिक्षं" कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि यह यज्ञ या हवन आकाश, पृथ्वी और उनके बीच के अंतरिक्ष को समर्पित है।
"ये विद्युत् अनुसंचरन्ति" से यह दर्शाया गया है कि बिजली और आकाशीय ऊर्जा की गतिशीलता भी यज्ञ में शामिल होती है। विद्युत् यानि बिजली प्राकृतिक ऊर्जा का प्रतीक है, जो अंधकार को दूर करती है और शक्ति का संचार करती है।
"ये दिक्ष्वन्तर्ये वाते अन्तः" यह दर्शाता है कि हवा और दिशाओं में गतिशील तत्व भी यज्ञ में उपस्थित हैं। यज्ञ केवल स्थिर नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव से आकाश, पृथ्वी, वायु और बिजली जैसी ऊर्जा गतिशील हो जाती है।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र हमें सिखाता है कि यज्ञ में समस्त प्राकृतिक तत्व सम्मिलित होते हैं। आकाशीय और पृथ्वी तत्वों का आदर करना मानव और प्रकृति के ज्ञान का प्रतीक है।
- **विज्ञान:** बिजली, वायु और आकाशीय ऊर्जा का संचरण यह दिखाता है कि यज्ञ या हवन प्रक्रियाओं में ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है। यह प्राचीन विज्ञान और पर्यावरणीय संतुलन का अनुभव कराता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यज्ञ के माध्यम से यह मन्त्र हमें ब्रह्म के अस्तित्व और शक्ति से जोड़ता है। आकाश, पृथ्वी और वायु के माध्यम से ब्रह्म की चेतना को महसूस किया जा सकता है, जो आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।
इस प्रकार यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि यज्ञ या हवन केवल मानव क्रिया नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय शक्तियों का सहयोग है। आकाश, पृथ्वी, वायु और बिजली के तत्व यज्ञ को दिव्यता प्रदान करते हैं और हमारे जीवन में ऊर्जा, समृद्धि और आध्यात्मिक जागृति लाते हैं।
English Explanation
This mantra describes the cosmic and natural forces, especially the dynamics of sky and earth. “Divam Prithivi manvantariksham” indicates that the yajna or havan is dedicated to the sky, the earth, and the space between them.
“Ye vidyut anusancharante” highlights that the movement of electricity and celestial energy is also involved in the yajna. Lightning represents natural energy, dispelling darkness and spreading power.
“Ye dikshvantarye vate antah” indicates that air and directional elements are also present in the ritual. The yajna is dynamic, energizing the sky, earth, air, and electricity.
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** This mantra teaches that all natural elements are part of the yajna, showing respect for cosmic and earthly forces.
- **Science:** The flow of electricity, air, and celestial energy demonstrates energy transfer in ancient rituals, reflecting early environmental science.
- **Brahmgyan:** Through yajna, one connects with the existence and power of Brahman. Sky, earth, and air act as mediums to experience divine consciousness and spiritual upliftment.
Thus, this mantra emphasizes that yajna is not merely a human ritual but a collaboration of cosmic energies, bringing divinity, vitality, and spiritual awakening into life.
Word by Word
हिरण्यपाणिं = जिनके हाथ स्वर्णमयी हैं / हिरण्यपाणि
सवितारम् = सूर्य देव / प्रेरक शक्ति
इन्द्रं = इन्द्र देव
बृहस्पतिं = बृहस्पति / ज्ञानी गुरु
वरुणं = वरुण देव / जल और धर्म के देवता
मित्रम् = मित्र देव / स्नेह और सामाजिक बन्धन के देवता
अग्निम् = अग्नि देव / यज्ञ का माध्यम
विश्वान् = सभी
देवान् = देवताओं को
अङ्गिरसः = ऋषि अङ्गिरस
हवामहे = हम हवन करते हैं / अर्पित करते हैं
इमं = इस
क्रव्यातम् = कृत्य / यह कार्य
शमयन्तु = शांत करें / नियंत्रित करें
अग्निम् = अग्नि
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में हम **हिरण्यपाणि, सवितार, इन्द्र, बृहस्पति, वरुण, मित्र और अग्नि** जैसी प्रमुख देवताओं और शक्ति तत्वों को हवन में समर्पित कर रहे हैं। "हिरण्यपाणिं" से यह स्पष्ट होता है कि यज्ञ में जो शक्ति शामिल है वह अत्यंत मूल्यवान और दिव्य है, जैसे स्वर्ण का हाथ।
सवितार (सूर्य) हमें जीवन शक्ति, ऊर्जा और प्रेरणा देता है। इन्द्र देव के माध्यम से हम आकाशीय शक्ति और विजय की प्राप्ति चाहते हैं। बृहस्पति ज्ञान और धर्म के प्रतीक हैं, जो हमारे कर्म और निर्णयों को शुद्ध करने में मदद करते हैं। वरुण और मित्र सामाजिक और प्राकृतिक संतुलन के देवता हैं, जो न्याय, मित्रता और संबंधों को मजबूत करते हैं।
अग्नि देव इस यज्ञ का माध्यम है। "हवामहे" कहकर हम अग्नि के माध्यम से सभी देवताओं को अपने यज्ञ में आमंत्रित करते हैं और उन्हें अर्पण समर्पित करते हैं। "विश्वान् देवान् अङ्गिरसः हवामहे" यह बताता है कि यज्ञ में केवल प्रमुख देवता नहीं बल्कि सभी देवता और ऋषि अङ्गिरस भी सम्मिलित होते हैं।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान का दृष्टिकोण:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र हमें यह सिखाता है कि यज्ञ केवल एक कर्मकाण्ड नहीं है, बल्कि सभी प्रमुख प्राकृतिक और दैवीय शक्तियों को समर्पित है। इससे मानव का जीवन और सामाजिक व्यवहार संतुलित और शुद्ध रहता है।
- **विज्ञान:** हवन के माध्यम से ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है। अग्नि और अन्य तत्व, जैसे सूर्य और वायु, प्राकृतिक ऊर्जा का संचार करते हैं। विद्युत, ताप और ऊर्जा प्रवाह के रूप में यह विज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यज्ञ के माध्यम से हम ब्रह्म के विभिन्न रूपों को अनुभव करते हैं। सूर्य, इन्द्र, वरुण, मित्र आदि देवता ब्रह्म की चेतना के प्रतीक हैं। इस प्रकार यज्ञ हमें आत्म-ज्ञान, आध्यात्मिक उन्नति और ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाता है।
इस मन्त्र का उद्देश्य केवल अग्नि हवन नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्माण्डीय तत्त्वों को संतुलित और नियंत्रित करना है। यज्ञ के माध्यम से हम प्रकृति, मानव और ब्रह्म का समन्वय अनुभव करते हैं और जीवन में ऊर्जा, समृद्धि और आध्यात्मिक जागृति प्राप्त करते हैं।
English Explanation
This mantra invokes the principal deities—Hiranyapani, Savitar, Indra, Brihaspati, Varuna, Mitra, and Agni—and offers the ritual through fire. Hiranyapani symbolizes divine, priceless power. Savitar (Sun) grants energy and inspiration; Indra brings cosmic power and victory; Brihaspati symbolizes wisdom and dharma; Varuna and Mitra maintain social and natural balance.
Agni, the fire deity, acts as the medium for offering. “Havamah” indicates that we present this offering to all gods and sages (Angiras), inviting them to participate in the yajna.
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** Yajna is a holistic practice involving cosmic and divine forces, not merely a ritual. It balances life and social conduct.
- **Science:** Fire and other elements such as Sun and air represent energy transfer, aligning with natural laws and environmental science.
- **Brahmgyan:** The deities symbolize aspects of Brahman, allowing participants to experience spiritual consciousness and self-realization.
Through this mantra, yajna becomes a medium to harmonize cosmic elements, nature, and the individual, fostering vitality, prosperity, and spiritual awakening.
Word by Word
शान्तः = शांत, स्थिर
अग्निः = अग्नि देव
क्रव्यात् = क्रिया / यज्ञ में आहुत
शान्तः = शांत, विनीत
पुरुषरेषणः = पुरुष की तेजस्विता / शक्ति का स्रोत
अथो = और
यो = जो
विश्वदाव्यः = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त
तं = उस
क्रव्यात् = यज्ञ में अर्पित
अमशीशम् = परम सत्ता / सर्वोच्च ब्रह्म
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मंत्र अग्नि के माध्यम से पूरे ब्रह्माण्ड को स्थिर और शांत करने का आह्वान है। "शान्तो अग्निः" यह बताता है कि यज्ञ में अग्नि केवल अग्नि नहीं, बल्कि एक स्थिर, शांत और विनीत शक्ति है। यह शक्ति मानव, देव और प्रकृति को संतुलित करती है। "पुरुषरेषणः" शब्द यह इंगित करता है कि इस यज्ञ के माध्यम से हम पुरुषत्व, वीर्य और जीवन शक्ति को सक्रिय करते हैं।
"अथो यो विश्वदाव्यः" से यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। हम इसे यज्ञ के माध्यम से संकल्पित करते हैं, समर्पित करते हैं और नियंत्रित करते हैं। "क्रव्याद् अमशीशम्" यह दर्शाता है कि यज्ञ केवल कर्मकाण्ड नहीं है, बल्कि परम ब्रह्म की चेतना को अनुभव करने का माध्यम है।
**ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान दृष्टि:**
- **ज्ञान:** इस मंत्र से यह स्पष्ट होता है कि यज्ञ में अग्नि केवल दहन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह ब्रह्माण्डीय शक्ति और चेतना का प्रतीक है। यज्ञ ज्ञान और ध्यान का माध्यम है।
- **विज्ञान:** अग्नि और यज्ञ के माध्यम से ऊर्जा, ताप और प्रकाश का आदान-प्रदान होता है। यह प्राकृतिक नियमों और ऊर्जा प्रवाह की वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** "अमशीशम्" के माध्यम से हम ब्रह्म की सर्वोच्च सत्ता और चेतना को अनुभव करते हैं। यज्ञ के समय समर्पण और ध्यान से व्यक्ति अपने भीतर के ब्रह्मत्व को पहचानता है और आध्यात्मिक उन्नति करता है।
इस प्रकार यह मंत्र हमें यह सिखाता है कि यज्ञ के माध्यम से अग्नि, पुरुषरेषण और विश्वदाव्य शक्तियों को नियंत्रित करके हम अपने जीवन, समाज और प्रकृति को संतुलित, शांत और समृद्ध बना सकते हैं। यज्ञ केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान, चेतना और ऊर्जा का संगम है।
English Explanation
This mantra invokes Agni as a calm, stable, and controlled force through which the entire universe can be harmonized. “Shanto Agni” indicates that fire in yajna is not just fire—it is a tranquil, steady, and devoted power that balances humans, deities, and nature. "Purusharesanah" refers to the activation of vital energy, courage, and life force.
"Atho yo Vishvadavyah" shows that this power pervades the entire universe and is offered through the yajna. "Krvyaad Amaseesham" indicates that the ritual is not merely an external act but a medium to experience the supreme consciousness (Brahman).
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** Agni symbolizes universal consciousness, not just combustion. Yajna is a medium of learning and meditation.
- **Science:** Fire, energy transfer, and light in yajna represent natural laws and energy flows.
- **Brahmgyan:** Through offering to Amaseesham, one experiences the supreme consciousness and awakens spiritually.
Thus, this mantra teaches that by offering and controlling Agni, Purusharesan, and Vishvadavyah energies, we can achieve balance, peace, and prosperity in life, society, and nature. Yajna is a convergence of action, energy, and spiritual wisdom.
Word by Word
ये = ये
पर्वताः = पर्वत/ऊँचाईयाँ
सॊम्पृष्ठा = सोम का आधार, पवित्र जल / अमृत का स्रोत
आप = जल / वर्षा
उत्तानशीवरीः = ऊँचे और श्रेष्ठ
वातः = वायु / पवन
पर्जन्य = वर्षा, बारिश के देवता
आदग्निः = अग्नि की प्रारंभिक शक्ति / उत्प्रेरक
ते = ये
क्रव्याद् = यज्ञ में अर्पित / समर्पित
अमशीशम् = परम सत्ता / सर्वोच्च ब्रह्म
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
यह मंत्र सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों का यज्ञ में समर्पण करता है। "ये पर्वताः सोमपृष्ठा" पर्वतों और सोम (अमृत) का उल्लेख करता है, जो जीवनदायिनी शक्ति और स्थिरता का प्रतीक हैं। "आप उत्तानशीवरीः" में जल और वर्षा की ऊँची स्थिति बताई गई है, जो जीवन के लिए आवश्यक है और यज्ञ में इसका महत्व अत्यंत है।
"वातः पर्जन्य आदग्निः" यह बताता है कि वायु, पवन और अग्नि की प्रारंभिक शक्ति भी यज्ञ में सम्मिलित होती है, और इसे यज्ञ के लिए सक्रिय और समर्पित किया जाता है। "ते क्रव्याद अमशीशम्" का अर्थ है कि इन सभी शक्तियों को परम ब्रह्म (अमशीशम्) के नाम पर यज्ञ में अर्पित किया जा रहा है।
**ज्ञान–विज्ञान–ब्रह्मज्ञान दृष्टि:**
- **ज्ञान:** यह मंत्र हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के सभी तत्त्व—पर्वत, जल, वायु और अग्नि—यज्ञ में सम्मिलित होकर आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह करते हैं। प्रत्येक तत्त्व का ज्ञान और महत्व समझना आवश्यक है।
- **विज्ञान:** पर्वत, जल, वायु और अग्नि प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत हैं। यज्ञ के समय इनका संतुलन और सक्रियता ऊर्जा विज्ञान की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह वातावरणीय ऊर्जा, ताप, वायु और जल के चक्र को नियंत्रित करता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** परम सत्ता (अमशीशम्) में इन प्राकृतिक शक्तियों का समर्पण आत्मा को ब्रह्म की चेतना से जोड़ता है। यज्ञ के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की स्थिरता, शक्ति और ब्रह्मत्व का अनुभव करता है।
इस मंत्र के माध्यम से हमें यह समझ आता है कि यज्ञ केवल कर्मकाण्ड नहीं है, बल्कि प्रकृति, ऊर्जा और ब्रह्म की चेतना का समन्वय है। पर्वत, जल, वायु और अग्नि जैसे प्राकृतिक तत्व यज्ञ में सम्मिलित होकर समग्र ब्रह्माण्ड को संतुलित, शांत और समृद्ध बनाते हैं।
English Explanation
This mantra offers all natural forces to the yajna. “Ye Parvatah Somprashta” refers to mountains and Soma (nectar), symbols of life-giving power and stability. “Ap Uttanashivarih” indicates the high and essential presence of water and rain, crucial for life and yajna.
“Vatah Parjanya Adagni” shows that air, wind, and primal fire also participate in the ritual and are dedicated to the yajna. “Te Krvyaad Amaseesham” means all these forces are offered to the supreme consciousness (Amaseesham).
**Knowledge, Science, and Brahmgyan Perspective:**
- **Knowledge:** Every natural element—mountains, water, air, and fire—contributes spiritual energy in yajna. Understanding their significance is essential.
- **Science:** Mountains, water, air, and fire are natural energy sources. Their balance and activation during yajna represent environmental and energetic control, including air, water, and thermal cycles.
- **Brahmgyan:** Offering these natural forces to Amaseesham connects the practitioner to supreme consciousness. Yajna allows one to experience inner stability, strength, and Brahm realization.
Thus, this mantra teaches that yajna is not merely ritual but a harmonization of nature, energy, and divine consciousness. Mountains, water, air, and fire participating in the yajna balance and enrich the universe.