दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
शब्दार्थ:
अयम् = यह
ते = तेरा
योनि: = उत्पत्ति स्थान, आधार
ऋत्विय: = यज्ञ से संबंधित, ऋतु अनुसार कर्म करने वाला
यतः = जहाँ से
जातः = उत्पन्न हुआ
अरोचथाः = प्रकाशित हुआ, चमका
तम् = उस (स्थान को)
जानन् = जानकर
अग्ने = हे अग्नि
आ रोह = आरोहण करो, स्थापित हो जाओ
अधा = तत्पश्चात्
नः = हमारा
वर्धय = बढ़ाओ
रयिम् = धन, समृद्धि, ऐश्वर्य
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अग्नि देव से संवाद करते हुए यज्ञीय अग्नि की स्थापना और उससे उत्पन्न होने वाली समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—हे अग्नि! यह तुम्हारा वह स्थान है, वह पवित्र योनि या आधार है, जहाँ से तुम उत्पन्न होकर प्रकाशित हुए हो। तुम इस स्थान को जानकर पुनः यहाँ प्रतिष्ठित हो जाओ और हमें धन, ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करो। यहाँ ‘योनि’ शब्द का अर्थ केवल जन्मस्थान नहीं है, बल्कि वह पवित्र केंद्र है जहाँ दिव्य शक्ति प्रकट होती है। यज्ञ वेदों में केवल अग्नि प्रज्वलन का कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि सृष्टि के नियमों के अनुसार संतुलित, समर्पित और समन्वित जीवन का प्रतीक है। अग्नि ज्ञान, प्रकाश, ऊर्जा और परिवर्तन की शक्ति है। जब अग्नि उचित स्थान पर, उचित विधि से प्रतिष्ठित होती है, तब वह अंधकार को दूर करती है और जीवन में प्रकाश भरती है।
इस मन्त्र का गहरा अर्थ यह है कि मनुष्य को अपने भीतर की अग्नि—अर्थात् ज्ञान, प्रेरणा और चेतना—को उसके शुद्ध आधार में स्थापित करना चाहिए। जब मन और बुद्धि शुद्ध संकल्प के साथ जागृत होते हैं, तब व्यक्ति का जीवन प्रकाशित हो उठता है। ‘रयिम् वर्धय’ का अर्थ केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि ज्ञान, सद्गुण, प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक उन्नति भी है। इस प्रकार यह मन्त्र हमें सिखाता है कि समृद्धि का वास्तविक स्रोत आंतरिक प्रकाश और धर्ममय कर्म है। जब हम अपने कर्मों को ऋतु और नियम के अनुसार संतुलित रखते हैं, तब जीवन में स्थिरता और प्रगति दोनों प्राप्त होती हैं। अग्नि यहाँ आत्मचेतना का प्रतीक है, जो सही स्थान और सही भावना में प्रतिष्ठित होकर व्यक्ति और समाज दोनों को उन्नत करती है।
ज्ञान:
सच्ची समृद्धि बाहरी साधनों से पहले आंतरिक जागृति और प्रकाश से उत्पन्न होती है।
विज्ञान:
ऊर्जा जब सही दिशा और संतुलन में प्रयुक्त होती है, तब वह विकास और समृद्धि का कारण बनती है।
ब्रह्मज्ञान:
अग्नि ब्रह्मचेतना की प्रतीक है। जब आत्मा अपने दिव्य स्रोत से जुड़ती है, तब जीवन प्रकाशित और पूर्ण हो जाता है।
English Explanation:
This mantra invokes Agni as the sacred source of light and prosperity, asking that divine energy be rightly established within and that true wealth—both material and spiritual—be increased.
शब्दार्थ:
अग्ने = हे अग्नि
अछा = हमारी ओर, समीप
वदेह = बोलो, अनुकूल वाणी दो
नः = हमारे लिए
प्रत्यङ्नः = हमारी ओर उन्मुख, सामने से
सुमना = शुभ मन वाला, प्रसन्नचित्त
भव = हो जाओ
प्र = आगे, विस्तार से
णः = हमें
यच्छ = प्रदान करो
विशाम् = प्रजा, लोगों के
पते = स्वामी, संरक्षक
धनदा = धन देने वाले
असि = हो
नः = हमारे
त्वम् = तुम
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अग्निदेव से अत्यंत स्नेहपूर्ण और आत्मीय प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—हे अग्नि! हमारी ओर अनुकूल होकर बोलो, हमारे प्रति प्रसन्नचित्त बनो, और हमें समृद्धि प्रदान करो; क्योंकि तुम प्रजाओं के स्वामी और धन देने वाले हो। यहाँ ‘अग्नि’ केवल भौतिक अग्नि नहीं, बल्कि दिव्य चेतना, प्रकाश, ऊर्जा और ईश्वर की सक्रिय उपस्थिति का प्रतीक है। जब मनुष्य अपने जीवन में अग्नि तत्व—अर्थात् सत्य, स्पष्टता और प्रेरणा—को आमंत्रित करता है, तब उसका जीवन आलोकित हो उठता है।
‘अछा वदेह’ का अर्थ है—हमारे पक्ष में बोलो, हमारे लिए मंगलकारी बनो। यह भाव दर्शाता है कि मनुष्य चाहता है कि उसकी आंतरिक चेतना, उसका विवेक और उसका भाग्य उसके अनुकूल हो जाए। जब मन शुद्ध होता है और कर्म धर्मसंगत होते हैं, तब प्रकृति और ईश्वरीय शक्तियाँ भी सहयोगी बनती हैं। ‘सुमना भव’—प्रसन्नचित्त बनो—का अर्थ यह भी है कि दिव्य शक्ति क्रोध या दण्ड के रूप में नहीं, बल्कि कृपा और आशीर्वाद के रूप में प्रकट हो।
‘विशां पते’ अग्नि को प्रजाओं का संरक्षक बताता है। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि अग्नि समाज की एकता और व्यवस्था को बनाए रखने वाली शक्ति है। यज्ञ की अग्नि समाज को जोड़ती है, परिवार को एकत्र करती है और राष्ट्र को सामूहिक चेतना देती है। ‘धनदा असि’—तुम धन देने वाले हो—यह केवल भौतिक धन की बात नहीं करता, बल्कि ज्ञान, स्वास्थ्य, कीर्ति और आध्यात्मिक उन्नति भी सच्चा धन है।
यह मन्त्र सिखाता है कि जब हम अपने जीवन में प्रकाश और सत्य को आमंत्रित करते हैं, तब वह शक्ति हमारे अनुकूल होकर हमारी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है। यदि हमारा अंतःकरण शुद्ध है, तो दिव्य ऊर्जा हमारे लिए मंगलकारी बनती है। अग्नि यहाँ आत्मा की उस ज्योति का प्रतीक है जो हमें मार्ग दिखाती है, प्रेरित करती है और समृद्ध बनाती है।
ज्ञान:
शुद्ध मन और धर्मयुक्त कर्म से ही दिव्य कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।
विज्ञान:
सकारात्मक मानसिक ऊर्जा और स्पष्ट लक्ष्य व्यक्ति तथा समाज को प्रगति की ओर ले जाते हैं।
ब्रह्मज्ञान:
अग्नि आत्मा की दिव्य ज्योति है; जब हम उससे जुड़ते हैं, तब भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश और समृद्धि प्रकट होती है।
English Explanation:
This mantra seeks Agni’s benevolent presence, asking divine energy to turn favorably toward us, bless us with prosperity, and guide society with light and wisdom.
शब्दार्थ:
प्र = आगे, पूर्ण रूप से
नः = हमें
यच्छतु = प्रदान करें
अर्यमा = आर्यमा देव (मित्रता और नियम के देवता)
भगः = भाग्य और ऐश्वर्य देने वाले देव
बृहस्पतिः = देवगुरु, ज्ञान के अधिष्ठाता
देवीः = देवियाँ
प्रोत = आगे बढ़ें, कृपा करें
सूनृता = मधुर वाणी, सत्ययुक्त वचन
रयिम् = धन, समृद्धि
देवी = दिव्य शक्ति
दधातु = स्थापित करे, दे
मे = मुझे
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अनेक दिव्य शक्तियों का आह्वान करते हुए समग्र कल्याण और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—अर्यमा हमें प्रदान करें, भग हमें प्रदान करें, बृहस्पति हमें प्रदान करें; देवियाँ और सूनृता (मधुर एवं सत्यवाणी की देवी) हमें समृद्धि दें। यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश निहित है—जीवन की पूर्णता केवल एक ही शक्ति से नहीं, बल्कि अनेक दिव्य गुणों के संतुलन से प्राप्त होती है।
‘अर्यमा’ सामाजिक मर्यादा, मैत्री और अनुशासन के देवता हैं। वे जीवन में नैतिक व्यवस्था और सौहार्द का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘भग’ भाग्य, आनंद और समृद्धि के दाता हैं—यह संकेत है कि समृद्धि ईश्वर की कृपा और पुण्य कर्मों का फल है। ‘बृहस्पति’ ज्ञान, वाणी और बुद्धि के अधिष्ठाता हैं—उनके बिना धन और शक्ति भी दिशाहीन हो सकते हैं। इस प्रकार ऋषि धन, ज्ञान, अनुशासन और सद्वाणी—सभी का समन्वय चाहते हैं।
‘सूनृता’ मधुर और सत्य वाणी की प्रतीक है। यह दर्शाता है कि केवल धन ही नहीं, बल्कि मधुर व्यवहार और सत्यनिष्ठ संवाद भी जीवन की वास्तविक समृद्धि हैं। यदि समाज में वाणी कठोर और असत्य हो जाए, तो धन और वैभव भी शांति नहीं दे सकते। अतः यह मन्त्र आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार की संपन्नता की कामना करता है।
‘रयिं देवी दधातु मे’—हे देवी, मुझे धन प्रदान करो—का अर्थ है कि दिव्य शक्ति मेरे जीवन में स्थिर समृद्धि स्थापित करे। यहाँ ‘धन’ केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ज्ञान, प्रतिष्ठा, सद्गुण और आध्यात्मिक उन्नति भी है। यह मन्त्र समग्र विकास की प्रार्थना है—जहाँ ज्ञान, भाग्य, अनुशासन और मधुरता मिलकर जीवन को पूर्ण बनाते हैं।
यह हमें सिखाता है कि सच्ची उन्नति संतुलित व्यक्तित्व से आती है। केवल धन, केवल शक्ति या केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं; इन सभी का सामंजस्य ही दिव्य समृद्धि का कारण बनता है।
ज्ञान:
समृद्धि तब स्थायी होती है जब वह ज्ञान, मर्यादा और सद्वाणी से जुड़ी हो।
विज्ञान:
समाज में संतुलित तंत्र—नैतिक नियम, बुद्धि और संसाधन—सतत विकास का आधार हैं।
ब्रह्मज्ञान:
जब जीवन में विभिन्न दिव्य गुणों का संतुलन स्थापित होता है, तब आत्मा ब्रह्म की पूर्णता का अनुभव करती है।
English Explanation:
This mantra invokes multiple divine powers—discipline, fortune, wisdom, and truthful speech—seeking holistic prosperity and balanced spiritual growth.
Word by Word
सोमं = सोम, अमृत और ऊर्जा का प्रतीक
राजानम् = राजा, सर्वोच्च नेतृत्व
अवसे = अपने स्थान पर, प्रतिष्ठित
अग्निम् = अग्नि, शक्ति और ऊर्जा का देव
गीर्भिः = वाणी, शब्द और संचार की शक्ति
हवामहे = हम अर्पित करते हैं, प्रार्थना करते हैं
आदित्यं = आदित्य, सूर्य देव, प्रकाश और चेतना के प्रतीक
विष्णुम् = विष्णु, पालन और संतुलन के देवता
सुर्यम् = सूर्य, जीवन और उर्जा का स्रोत
ब्रह्माणम् = ब्रह्मा, सृष्टि और ज्ञान का प्रतीक
च = और
बृहस्पतिम् = बृहस्पति, ज्ञान, वाणी और न्याय के देवता
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि सम्पूर्ण दिव्य शक्तियों का आह्वान करते हुए जीवन, ज्ञान, शक्ति और समृद्धि की प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हम सोम, राजा, अग्नि और उनकी शक्ति, वाणी और आहुति को अर्पित करते हैं। साथ ही आदित्य (सूर्य), विष्णु (पालनकर्ता), सूर्य और ब्रह्मा (ज्ञान और सृष्टि) तथा बृहस्पति को भी सम्मिलित करते हुए हम दिव्य गुणों से संपन्न समृद्धि की कामना करते हैं।
यह मन्त्र जीवन में **संतुलन और शक्ति का संदेश** देता है। सोम यहाँ न केवल पेय या औषधि का प्रतीक है, बल्कि अमृत, ऊर्जा और जीवन शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। राजा, अग्नि और गीर्भि (वाणी) जीवन के निर्णायक तत्व हैं—जहाँ नेतृत्व, ऊर्जा और संवाद सही दिशा में हों, वहां समाज और व्यक्तिगत जीवन समृद्ध होते हैं।
आदित्य, सूर्य और विष्णु की उपासना दर्शाती है कि प्रकाश, चेतना और संरक्षण के बिना समग्र समृद्धि संभव नहीं। सूर्य ऊर्जा का स्रोत है, आदित्य चेतना का प्रतीक और विष्णु जीवन में स्थिरता और संतुलन प्रदान करते हैं। बृहस्पति का आवाहन ज्ञान और न्याय के लिए किया जाता है—जीवन के प्रत्येक निर्णय में विवेक और शिक्षा आवश्यक है।
यह मन्त्र **ज्ञान विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण** है। ज्ञान के माध्यम से निर्णय सही होंगे, विज्ञान या तंत्र से संसाधनों का उचित प्रयोग होगा और ब्रह्मज्ञान से आत्मा और जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त होगा। ऋषि यह सिखाते हैं कि समग्र विकास केवल बाहरी शक्ति या धन से नहीं, बल्कि **ज्ञान, वाणी, ऊर्जा, नेतृत्व और आध्यात्मिक चेतना के संतुलन से** आता है।
English Explanation
This mantra invokes the complete spectrum of divine powers—Soma, the kingly energy, Agni (fire), speech, Sun, Vishnu, Brahma, and Brihaspati. It is a prayer for holistic prosperity, wisdom, energy, and balanced spiritual and material growth. Soma symbolizes life force, energy, and vitality. Sun and Aditya represent consciousness and illumination. Vishnu ensures sustenance and balance, while Brihaspati guides through knowledge, justice, and speech. Together, they teach that true growth arises from the harmony of knowledge, energy, divine guidance, and spiritual awareness.
Word by Word
त्वम् = तुम, हे अग्नि
नो = हमारे लिए
अग्निभिः = अग्नियों द्वारा
ब्रह्म = ब्रह्मज्ञान, सृष्टि और शक्ति
यज्ञम् = यज्ञ, धार्मिक और आध्यात्मिक कर्म
वर्धय = बढ़ाओ, सम्पन्न करो
त्वम् = तुम, हे देव
नो = हमारे लिए
देव = दैवीय शक्तियाँ
दातवे = दान देने वाले
रयिम् = संपत्ति, धन, समृद्धि
दानाय = दान, वितरण
चोदय = प्रेरित करो, प्रोत्साहित करो
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि अग्नि और देवताओं से सम्पूर्ण समृद्धि और आध्यात्मिक विकास की प्रार्थना कर रहे हैं। वे अग्नि से यज्ञ को सम्पन्न करने, ब्रह्मज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाने का आह्वान करते हैं। यज्ञ के माध्यम से समाज और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन, ऊर्जा और समृद्धि आती है।
अग्नि यहाँ केवल अग्नि नहीं, बल्कि **सक्रिय ऊर्जा और परिवर्तन का प्रतीक** है। अग्नि ब्रह्मज्ञानी यज्ञ को पूरक बनाती है, जिससे मन, शरीर और समाज में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है। “त्वं नो देव दातवे रयिं दानाय चोदय” का अर्थ है कि देवताओं से प्रेरणा प्राप्त हो, जो दान और वितरण के माध्यम से समाज में समानता और समृद्धि बढ़ाएँ।
इस मन्त्र का **ज्ञान विज्ञान और ब्रह्मज्ञान** के दृष्टिकोण से विश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्ञान और विज्ञान हमें यह बताते हैं कि यज्ञ और दान केवल बाहरी कर्म नहीं हैं; यह **आध्यात्मिक ऊर्जा और समाजिक संतुलन** पैदा करते हैं। यज्ञ में अग्नि का प्रयोग ऊर्जा के परिवहन, संसाधनों के संचलन और मन की शुद्धि के लिए किया जाता है। ब्रह्मज्ञान के अनुसार, यह मन्त्र जीवन के आध्यात्मिक उद्देश्य—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—को संतुलित करता है।
साथ ही यह मन्त्र यह शिक्षा देता है कि धन और संपत्ति का **सही उपयोग** केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए होना चाहिए। यज्ञ और दान के माध्यम से जो ऊर्जा और संसाधन संचालित होते हैं, वे जीवन और समाज में स्थिरता, शक्ति और समृद्धि लाते हैं।
English Explanation
This mantra calls upon Agni and the divine powers to enhance the Yajna (sacred ritual) through Agni, and to increase Brahma-knowledge and spiritual energy. Agni symbolizes active energy and transformation, while Yajna ensures balance, prosperity, and societal harmony. The mantra emphasizes invoking gods to inspire giving and distribution, teaching that wealth and resources should serve both individual and societal growth. From the perspective of knowledge, science, and Brahmgyan, this mantra integrates spiritual, social, and material prosperity through conscious action, ritual, and ethical management of energy and resources.
Word by Word
इन्द्रवायुः = इन्द्र और वायु (सशक्त देवता और जीवन शक्ति)
उभौ = दोनों
इहि = यहाँ
सुहवेह = शुभ और अनुकूल
हवामहे = हम हवि (हवन) करते हैं, प्रार्थना और यज्ञ करते हैं
यथा = जैसे
नः = हमारे लिए
सर्व = सभी
इज्जनः = सम्मान, मान-सम्मान
संगत्याम् = संगति, सामंजस्य
सुमना = सौभाग्य, शुभता
असद्दानकामः = अधूरी इच्छाओं से मुक्त
च = और
नो = हमारे लिए
भुवत् = हो, प्राप्त हो
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि इन्द्र और वायु दोनों देवताओं से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे हमारे यज्ञ और हवि को स्वीकार करें और इसे अनुकूल बनाएं। इन्द्र और वायु जीवन शक्ति और ऊर्जा के प्रतीक हैं। यज्ञ और हवि के माध्यम से हमें न केवल व्यक्तिगत जीवन में सामंजस्य और समृद्धि मिलती है, बल्कि सामाजिक और सामूहिक स्तर पर भी संतुलन और शक्ति आती है।
“यथा नः सर्व इज्जनः संगत्यां सुमना असद्दानकामश्च नो भुवत्” का अर्थ है कि हमारी सभी इच्छाएं पूरी हों, हमारे कार्यों में सौभाग्य और शुभता बनी रहे, और हमारे समाजिक संबंध और संगति हमेशा लाभदायक और सकारात्मक हों। यह मन्त्र हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक अभ्यास केवल व्यक्तिगत शांति के लिए नहीं, बल्कि समाज में सामूहिक कल्याण और सामंजस्य के लिए भी होना चाहिए।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान** के दृष्टिकोण से यह मन्त्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्ञान के अनुसार, इन्द्र और वायु के गुणों को समझना हमें जीवन में ऊर्जा, साहस और निर्णय शक्ति देता है। विज्ञान के दृष्टिकोण से हवि और यज्ञ में उत्पन्न ऊर्जा मन और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करती है। ब्रह्मज्ञान के अनुसार, यज्ञ और प्रार्थना हमारे भीतर की दिव्यता को जाग्रत करते हैं, इच्छाओं को नियंत्रित करते हैं और जीवन के उद्देश्य—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—को संतुलित करते हैं।
इस प्रकार, यह मन्त्र व्यक्तिगत समृद्धि, समाजिक कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति तीनों का मार्गदर्शन करता है। इसे नियमित रूप से जाप और यज्ञ में प्रयोग करने से न केवल ऊर्जा और समृद्धि मिलती है, बल्कि मन की शुद्धि, इच्छाओं का नियंत्रण और जीवन में सामंजस्य स्थापित होता है।
English Explanation
This mantra invokes both Indra and Vayu—the powerful deities of strength and life force—to accept and bless our Yajna and Havan. It emphasizes harmony, prosperity, and fulfillment of all desires. From a **knowledge, science, and Brahmgyan perspective**, it teaches that spiritual practice balances personal and societal well-being, enhances energy and mental clarity, and aligns human actions with higher objectives. Performing this Yajna inspires positive collective outcomes, purifies the mind, and strengthens our life force while harmonizing our worldly and spiritual pursuits.
Word by Word
अर्यमणम् = देवता अर्यमण, जो मित्रता और अनुशासन का दाता हैं
बृहस्पतिम् = बृहस्पति, धर्म और ज्ञान के देवता
इन्द्रम् = इन्द्र, शक्ति और वीरता के देवता
दानाय = दान और समाज कल्याण के लिए
च = और
उदय = प्रेरित करें / प्रोत्साहित करें
वातम् = वायु, जीवनशक्ति और गति के देवता
विष्णुम् = विष्णु, संरक्षण और संतुलन के देवता
सरस्वतीम् = सरस्वती, ज्ञान और कला की देवी
सवितारम् = सूर्य देव, प्रेरणा और प्रकाश देने वाले
वाजिनम् = शक्ति, बल और संपन्नता देने वाले
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि विभिन्न देवताओं की शक्तियों और गुणों का आवाहन कर रहे हैं। अर्यमण, बृहस्पति, इन्द्र, वायु, विष्णु, सरस्वती, सविता और वाजिन को हम अपने यज्ञ और हवन में सम्मिलित करते हैं। इसका उद्देश्य समाज, परिवार और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन, शक्ति, समृद्धि और ज्ञान का प्रवाह सुनिश्चित करना है।
“दानाय चोदय” का अर्थ है कि ये देवता हमें दान, उदारता और सामाजिक कल्याण की ओर प्रेरित करें। दान केवल धन देने का कार्य नहीं, बल्कि यह मनुष्य को समाजिक उत्तरदायित्व और करुणा की ओर ले जाता है। वायु और विष्णु का आवाहन जीवन शक्ति और संतुलन के लिए है। सरस्वती का आवाहन ज्ञान, कला और विज्ञान के विकास के लिए है। सविता, सूर्य देव, प्रज्ञा और प्रकाश के माध्यम से हमें सही मार्ग दिखाते हैं। वाजिन शक्ति और सफलता के प्रतीक हैं।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- ज्ञान: देवताओं के गुणों का अध्ययन और उनका जाप हमें मनोबल और विवेक प्रदान करता है।
- विज्ञान: यज्ञ और हवन के समय मंत्रोच्चारण से उत्पन्न ध्वनि और ऊर्जा मन और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती है।
- ब्रह्मज्ञान: यह मन्त्र हमें बताता है कि जीवन में धर्म, ज्ञान, शक्ति, और सामाजिक कल्याण को संतुलित रखना अत्यंत आवश्यक है।
इस मन्त्र के माध्यम से हम न केवल बाहरी दुनिया में सफलता और शक्ति प्राप्त करते हैं, बल्कि आंतरिक चेतना और आध्यात्मिक उन्नति भी होती है। इसका नियमित जाप और यज्ञ समाज में सामूहिक कल्याण और व्यक्तिगत प्रगति दोनों के लिए लाभकारी है।
English Explanation
This mantra invokes Aryaman, Brihaspati, Indra, Vayu, Vishnu, Saraswati, Savitar, and Vajin to bless the Yajna and the practitioners. It emphasizes strength, prosperity, wisdom, and societal well-being. From a **knowledge, science, and Brahmgyan perspective**, it teaches that invoking divine qualities enhances mental clarity, physical energy, social responsibility, and spiritual progress. By performing this Yajna, one attains inner balance, societal harmony, and holistic advancement in life.
Word by Word
वाजस्य = वाज / शक्ति और संपन्नता
नु = निश्चित रूप से / हे
प्रसवे = उत्पत्ति / जन्म के समय
सं बभूविम = उत्पन्न हो जाएँ / फलित हों
एमा = यह
च = और
विश्वा भुवनानि = सभी भुवन / लोक
अन्तः = अंदर / भीतर
उत आदित = उदित / स्फूर्तिदायक
सन्तम् = संत, जीवित और संपन्न
दापयतु = प्रदान करें
प्रजानन् = प्रजा / जनसंपदा
रयिं = समृद्धि / धन
च = और
नः = हमारे लिए
सर्ववीरं = सभी वीर और शक्तिशाली
नि यच्छ = प्रदान करें / वितरित करें
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि वाज, यानी शक्ति और संपन्नता, के माध्यम से सम्पूर्ण लोकों में जीवन, शक्ति और समृद्धि की उत्पत्ति और प्रसार की प्रार्थना कर रहे हैं। “प्रसवे सं बभूविम” का अर्थ है कि सभी जीव और प्राणी अपनी अपनी प्राकृतिक शक्ति और सामर्थ्य के साथ उत्पन्न हों। यह मन्त्र हमसे आंतरिक और बाह्य संतुलन की आवश्यकता को भी दर्शाता है, ताकि व्यक्ति अपने जीवन में ऊर्जा, साहस और कार्यक्षमता का सही उपयोग कर सके।
“विश्वा भुवनानि अन्तः” के माध्यम से यह कहा गया है कि यह शक्ति केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे संसार और लोकों में संतुलन और समृद्धि लाती है। “उत आदित्सन्तं दापयतु प्रजानन्” का आशय है कि उदित और संपन्न प्रजा समाज, राष्ट्र और लोककल्याण में योगदान करें। “रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छ” द्वारा यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी वीर, संपन्न और शक्तिशाली बने रहें, ताकि समाज और व्यक्ति दोनों में समान रूप से समृद्धि और शक्ति बनी रहे।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** मन्त्र हमें यह शिक्षा देता है कि शक्ति और समृद्धि का वास्तविक अर्थ केवल व्यक्तिगत लाभ में नहीं है, बल्कि इसे समाज और प्रजा के कल्याण में भी लागू करना चाहिए।
- **विज्ञान:** यज्ञ और मन्त्रोच्चारण से उत्पन्न ध्वनि और ऊर्जा शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, जो हमारी मानसिक और शारीरिक शक्ति को उत्तेजित करती है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यह मन्त्र बताता है कि सृष्टि के प्रत्येक जीव और प्राणी में वाज, शक्ति और ज्ञान का तत्व निहित है। इसे जागृत कर, हम अपने और समाज के कल्याण के लिए कार्य कर सकते हैं।
इस प्रकार यह मन्त्र व्यक्तिगत और सामाजिक समृद्धि, शक्ति और संतुलन का मार्ग दर्शाता है। इसे नियमित जाप और यज्ञ में प्रयोग करने से न केवल व्यक्ति की आंतरिक शक्ति बढ़ती है, बल्कि समाज में भी सामूहिक समृद्धि आती है।
English Explanation
This mantra invokes Vāj, the energy of strength and prosperity, to bless all beings and worlds with life, power, and abundance. “Prasave sam babhūvim” ensures that every being arises with innate capability and vigor. “Vishva bhuvanani antah” emphasizes that this energy is not just personal, but universal, benefiting all creation. The mantra also highlights the importance of social prosperity, encouraging the virtuous and strong to contribute to the welfare of society.
From a **knowledge, science, and Brahmgyan perspective**, it teaches that true power and wealth are realized when used for societal and spiritual advancement. The sound vibrations of chanting the mantra create energy in body and mind, stimulating strength and courage. It also reminds that every creature embodies Vāj—the divine power and wisdom—which can be awakened for personal and collective well-being.
Word by Word
दुह्रां = शक्ति / ऊर्जा / वीर्य
मे = मेरी
पञ्च प्रदिषो = पाँच दिशाओं में
दुह्राम् = बल / शक्ति
ऊर्वीर्यथा = पूरी सामर्थ्य के साथ
बलम् = शक्ति / सामर्थ्य
प्रापेयं = प्राप्त हो
सर्वा = सभी
आकूतीः = इच्छाएँ / आकांक्षाएँ
मनसा = मन से
हृदयेन = हृदय से
च = और
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि पूरे ब्रह्मांड की शक्ति और ऊर्जा का आवाहन कर रहे हैं। “दुह्रां मे पञ्च प्रदिषो” का अर्थ है कि मेरे जीवन और अस्तित्व में पाँच दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और आकाश) में पूरी शक्ति, सामर्थ्य और ऊर्जा प्रवाहित हो। यह केवल शारीरिक शक्ति नहीं बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक सामर्थ्य को भी संदर्भित करता है।
“दुह्रामुर्वीर्यथा बलम्” से यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति पूर्ण और अत्युत्कृष्ट हो, जो व्यक्ति को अपने कार्यों में समर्थ और साहसी बनाती है। “प्रापेयं सर्वा आकूतीः” का आशय है कि सभी इच्छाएँ, लक्ष्य और कार्य मन और हृदय के माध्यम से सफल हों। यहाँ मन्त्र बताता है कि शक्ति, इच्छाशक्ति और लक्ष्य की प्राप्ति केवल बाहरी साधनों से नहीं होती, बल्कि मन और हृदय की सामर्थ्य से होती है।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र शिक्षा देता है कि जीवन में संतुलित शक्ति केवल बाहरी साधनों से नहीं आती, बल्कि आंतरिक ऊर्जा, संकल्प और धैर्य से भी आती है।
- **विज्ञान:** पाँच दिशाओं में ऊर्जा प्रवाहित करने का अर्थ योग और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से शरीर और मन में ऊर्जा संतुलन स्थापित करना है। यह मन्त्र मानसिक और शारीरिक शक्ति दोनों को उत्तेजित करता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यहाँ दर्शाया गया है कि प्रत्येक प्राणी में समग्र शक्तियाँ निहित हैं, जिन्हें जागृत कर अपने जीवन और समाज के कल्याण के लिए उपयोग करना चाहिए। यह सम्पूर्ण शक्ति और सामर्थ्य ब्रह्म से ही उत्पन्न होती है और व्यक्ति उसे अपने भीतर अनुभव कर सकता है।
इस प्रकार यह मन्त्र न केवल व्यक्तिगत शक्ति, साहस और सामर्थ्य का आह्वान करता है, बल्कि समाज में सामूहिक प्रगति और समृद्धि की भी प्रेरणा देता है। इसे नियमित जाप और ध्यान में प्रयोग करने से व्यक्ति के मन, हृदय और जीवन में शक्ति का प्रवाह उत्तम रूप से बढ़ता है।
English Explanation
This mantra invokes complete strength and energy across the five directions (north, south, east, west, and sky) into one’s life. “Duhraam me pancha pradisho” ensures that power flows in every direction, not just physically but mentally, intellectually, and spiritually. “Duhraam urviryatha balam” emphasizes supreme and complete energy that empowers courage and capability in action. “Prapeyam sarva akooti manasa hridayena cha” highlights that all desires, intentions, and goals succeed through the mind and heart.
From a **knowledge, science, and Brahmgyan perspective**, it teaches that true strength is balanced, flowing, and internally cultivated. Scientific understanding aligns with the energy flow through the body and mind (yogic and Ayurvedic perspectives). Brahmgyan shows that every being has latent energies that, when awakened, serve both individual and societal well-being.
Word by Word
गोसनि = गायों की रक्षा / पोषण
वाचम् = वाणी / शब्द / मंत्र
उदेयं = उदित हो / प्रकट हो
वर्चसा = वैभव, शक्ति, प्रभाव
माभ्युदिहि = हमारे लिए बढ़ाए / बढ़ती रहे
आरुन्धाम् = हमारे जीवन में बह जाए / प्रवाहित हो
सर्वतः = सभी दिशाओं में
वायुः = ऊर्जा / प्राण / जीवन शक्ति
त्वष्टा = सृजनकर्ता देव
पोषं = पोषण / वृद्धि
दधातु = दे / बनाए रखे
मे = मेरे / हमारे
हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द)
इस मन्त्र में ऋषि गो-पूजा और वाणी के माध्यम से जीवन शक्ति और ऊर्जा के प्रवाह का आवाहन कर रहे हैं। “गोसनि वाचम् उदेयं” का अर्थ है कि गायों और वाणी के रूप में शक्ति का उदय हो। यहाँ गायें जीवनदायिनी शक्तियों का प्रतीक हैं, और वाणी का प्रयोग साधना और मन्त्रपाठ में ऊर्जा का संचार करता है।
“वर्चसा माभ्युदिहि” से यह सूचित होता है कि यह शक्ति, वैभव और सामर्थ्य हमारे जीवन में निरंतर बढ़े। “आरुन्धां सर्वतो वायुः” का आशय है कि जीवन शक्ति (प्राण ऊर्जा) सभी दिशाओं में प्रवाहित हो। यह केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति का भी प्रतीक है।
**ज्ञान, विज्ञान और ब्रह्मज्ञान के दृष्टिकोण से:**
- **ज्ञान:** यह मन्त्र सिखाता है कि शक्ति और सामर्थ्य केवल बाहरी साधनों से नहीं आती, बल्कि गायों, प्रकृति और वाणी के माध्यम से भी ऊर्जा प्राप्त होती है।
- **विज्ञान:** ‘सर्वतः वायुः’ ऊर्जा प्रवाह की वैज्ञानिक समझ दर्शाता है, जो शरीर और मन में संतुलन स्थापित करता है। आयुर्वेद और प्राणायाम की दृष्टि से यह जीवन शक्ति को संतुलित और प्रबल बनाता है।
- **ब्रह्मज्ञान:** यहाँ बताया गया है कि जीवन की सभी शक्तियाँ ब्रह्म से उत्पन्न होती हैं। जब हम सही वाणी, सही कर्म और जीवनशक्ति को जागृत करते हैं, तब हम अपने और समाज के लिए कल्याणकारी परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
इस प्रकार, यह मन्त्र हमें ऊर्जा, शक्ति और सामर्थ्य के व्यापक प्रवाह का स्मरण कराता है, जिससे न केवल व्यक्तिगत उन्नति होती है, बल्कि समाज और प्रकृति के संतुलन में भी योगदान मिलता है। नियमित जाप और ध्यान में इसका प्रयोग करने से मन, हृदय और जीवन में प्राण ऊर्जा और सामर्थ्य का प्रवाह उत्तम रूप से बढ़ता है।
English Explanation
This mantra invokes the rising of power and energy through cows and speech. “Gosani vacham udeyam” emphasizes the emergence of life-giving energy through cows and sound. “Varchasa mabhyudihi” asks that this energy, wealth, and power continuously increase in our lives. “Arundham sarvato vayuh” indicates that vital energy (prana) flows in all directions—physical, mental, intellectual, and spiritual.
From a **knowledge, science, and Brahmgyan perspective**, the mantra teaches that true strength arises not only from external means but through nature, speech, and sacred practice. Scientific understanding aligns with energy flow in the body and mind. Brahmgyan highlights that all powers originate from Brahman, and proper use of speech, action, and prana leads to individual and societal well-being.
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