शब्दार्थ:
अयम् = यह
ते = तेरा
योनि: = उत्पत्ति स्थान, आधार
ऋत्विय: = यज्ञ से संबंधित, ऋतु अनुसार कर्म करने वाला
यतः = जहाँ से
जातः = उत्पन्न हुआ
अरोचथाः = प्रकाशित हुआ, चमका
तम् = उस (स्थान को)
जानन् = जानकर
अग्ने = हे अग्नि
आ रोह = आरोहण करो, स्थापित हो जाओ
अधा = तत्पश्चात्
नः = हमारा
वर्धय = बढ़ाओ
रयिम् = धन, समृद्धि, ऐश्वर्य
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अग्नि देव से संवाद करते हुए यज्ञीय अग्नि की स्थापना और उससे उत्पन्न होने वाली समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—हे अग्नि! यह तुम्हारा वह स्थान है, वह पवित्र योनि या आधार है, जहाँ से तुम उत्पन्न होकर प्रकाशित हुए हो। तुम इस स्थान को जानकर पुनः यहाँ प्रतिष्ठित हो जाओ और हमें धन, ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करो। यहाँ ‘योनि’ शब्द का अर्थ केवल जन्मस्थान नहीं है, बल्कि वह पवित्र केंद्र है जहाँ दिव्य शक्ति प्रकट होती है। यज्ञ वेदों में केवल अग्नि प्रज्वलन का कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि सृष्टि के नियमों के अनुसार संतुलित, समर्पित और समन्वित जीवन का प्रतीक है। अग्नि ज्ञान, प्रकाश, ऊर्जा और परिवर्तन की शक्ति है। जब अग्नि उचित स्थान पर, उचित विधि से प्रतिष्ठित होती है, तब वह अंधकार को दूर करती है और जीवन में प्रकाश भरती है। इस मन्त्र का गहरा अर्थ यह है कि मनुष्य को अपने भीतर की अग्नि—अर्थात् ज्ञान, प्रेरणा और चेतना—को उसके शुद्ध आधार में स्थापित करना चाहिए। जब मन और बुद्धि शुद्ध संकल्प के साथ जागृत होते हैं, तब व्यक्ति का जीवन प्रकाशित हो उठता है। ‘रयिम् वर्धय’ का अर्थ केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि ज्ञान, सद्गुण, प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक उन्नति भी है। इस प्रकार यह मन्त्र हमें सिखाता है कि समृद्धि का वास्तविक स्रोत आंतरिक प्रकाश और धर्ममय कर्म है। जब हम अपने कर्मों को ऋतु और नियम के अनुसार संतुलित रखते हैं, तब जीवन में स्थिरता और प्रगति दोनों प्राप्त होती हैं। अग्नि यहाँ आत्मचेतना का प्रतीक है, जो सही स्थान और सही भावना में प्रतिष्ठित होकर व्यक्ति और समाज दोनों को उन्नत करती है।
ज्ञान:
सच्ची समृद्धि बाहरी साधनों से पहले आंतरिक जागृति और प्रकाश से उत्पन्न होती है।
विज्ञान:
ऊर्जा जब सही दिशा और संतुलन में प्रयुक्त होती है, तब वह विकास और समृद्धि का कारण बनती है।
ब्रह्मज्ञान:
अग्नि ब्रह्मचेतना की प्रतीक है। जब आत्मा अपने दिव्य स्रोत से जुड़ती है, तब जीवन प्रकाशित और पूर्ण हो जाता है।
English Explanation:
This mantra invokes Agni as the sacred source of light and prosperity, asking that divine energy be rightly established within and that true wealth—both material and spiritual—be increased.
अयम् = यह
ते = तेरा
योनि: = उत्पत्ति स्थान, आधार
ऋत्विय: = यज्ञ से संबंधित, ऋतु अनुसार कर्म करने वाला
यतः = जहाँ से
जातः = उत्पन्न हुआ
अरोचथाः = प्रकाशित हुआ, चमका
तम् = उस (स्थान को)
जानन् = जानकर
अग्ने = हे अग्नि
आ रोह = आरोहण करो, स्थापित हो जाओ
अधा = तत्पश्चात्
नः = हमारा
वर्धय = बढ़ाओ
रयिम् = धन, समृद्धि, ऐश्वर्य
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अग्नि देव से संवाद करते हुए यज्ञीय अग्नि की स्थापना और उससे उत्पन्न होने वाली समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—हे अग्नि! यह तुम्हारा वह स्थान है, वह पवित्र योनि या आधार है, जहाँ से तुम उत्पन्न होकर प्रकाशित हुए हो। तुम इस स्थान को जानकर पुनः यहाँ प्रतिष्ठित हो जाओ और हमें धन, ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करो। यहाँ ‘योनि’ शब्द का अर्थ केवल जन्मस्थान नहीं है, बल्कि वह पवित्र केंद्र है जहाँ दिव्य शक्ति प्रकट होती है। यज्ञ वेदों में केवल अग्नि प्रज्वलन का कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि सृष्टि के नियमों के अनुसार संतुलित, समर्पित और समन्वित जीवन का प्रतीक है। अग्नि ज्ञान, प्रकाश, ऊर्जा और परिवर्तन की शक्ति है। जब अग्नि उचित स्थान पर, उचित विधि से प्रतिष्ठित होती है, तब वह अंधकार को दूर करती है और जीवन में प्रकाश भरती है। इस मन्त्र का गहरा अर्थ यह है कि मनुष्य को अपने भीतर की अग्नि—अर्थात् ज्ञान, प्रेरणा और चेतना—को उसके शुद्ध आधार में स्थापित करना चाहिए। जब मन और बुद्धि शुद्ध संकल्प के साथ जागृत होते हैं, तब व्यक्ति का जीवन प्रकाशित हो उठता है। ‘रयिम् वर्धय’ का अर्थ केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि ज्ञान, सद्गुण, प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक उन्नति भी है। इस प्रकार यह मन्त्र हमें सिखाता है कि समृद्धि का वास्तविक स्रोत आंतरिक प्रकाश और धर्ममय कर्म है। जब हम अपने कर्मों को ऋतु और नियम के अनुसार संतुलित रखते हैं, तब जीवन में स्थिरता और प्रगति दोनों प्राप्त होती हैं। अग्नि यहाँ आत्मचेतना का प्रतीक है, जो सही स्थान और सही भावना में प्रतिष्ठित होकर व्यक्ति और समाज दोनों को उन्नत करती है।
ज्ञान:
सच्ची समृद्धि बाहरी साधनों से पहले आंतरिक जागृति और प्रकाश से उत्पन्न होती है।
विज्ञान:
ऊर्जा जब सही दिशा और संतुलन में प्रयुक्त होती है, तब वह विकास और समृद्धि का कारण बनती है।
ब्रह्मज्ञान:
अग्नि ब्रह्मचेतना की प्रतीक है। जब आत्मा अपने दिव्य स्रोत से जुड़ती है, तब जीवन प्रकाशित और पूर्ण हो जाता है।
English Explanation:
This mantra invokes Agni as the sacred source of light and prosperity, asking that divine energy be rightly established within and that true wealth—both material and spiritual—be increased.
शब्दार्थ:
अग्ने = हे अग्नि
अछा = हमारी ओर, समीप
वदेह = बोलो, अनुकूल वाणी दो
नः = हमारे लिए
प्रत्यङ्नः = हमारी ओर उन्मुख, सामने से
सुमना = शुभ मन वाला, प्रसन्नचित्त
भव = हो जाओ
प्र = आगे, विस्तार से
णः = हमें
यच्छ = प्रदान करो
विशाम् = प्रजा, लोगों के
पते = स्वामी, संरक्षक
धनदा = धन देने वाले
असि = हो
नः = हमारे
त्वम् = तुम
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अग्निदेव से अत्यंत स्नेहपूर्ण और आत्मीय प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—हे अग्नि! हमारी ओर अनुकूल होकर बोलो, हमारे प्रति प्रसन्नचित्त बनो, और हमें समृद्धि प्रदान करो; क्योंकि तुम प्रजाओं के स्वामी और धन देने वाले हो। यहाँ ‘अग्नि’ केवल भौतिक अग्नि नहीं, बल्कि दिव्य चेतना, प्रकाश, ऊर्जा और ईश्वर की सक्रिय उपस्थिति का प्रतीक है। जब मनुष्य अपने जीवन में अग्नि तत्व—अर्थात् सत्य, स्पष्टता और प्रेरणा—को आमंत्रित करता है, तब उसका जीवन आलोकित हो उठता है। ‘अछा वदेह’ का अर्थ है—हमारे पक्ष में बोलो, हमारे लिए मंगलकारी बनो। यह भाव दर्शाता है कि मनुष्य चाहता है कि उसकी आंतरिक चेतना, उसका विवेक और उसका भाग्य उसके अनुकूल हो जाए। जब मन शुद्ध होता है और कर्म धर्मसंगत होते हैं, तब प्रकृति और ईश्वरीय शक्तियाँ भी सहयोगी बनती हैं। ‘सुमना भव’—प्रसन्नचित्त बनो—का अर्थ यह भी है कि दिव्य शक्ति क्रोध या दण्ड के रूप में नहीं, बल्कि कृपा और आशीर्वाद के रूप में प्रकट हो। ‘विशां पते’ अग्नि को प्रजाओं का संरक्षक बताता है। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि अग्नि समाज की एकता और व्यवस्था को बनाए रखने वाली शक्ति है। यज्ञ की अग्नि समाज को जोड़ती है, परिवार को एकत्र करती है और राष्ट्र को सामूहिक चेतना देती है। ‘धनदा असि’—तुम धन देने वाले हो—यह केवल भौतिक धन की बात नहीं करता, बल्कि ज्ञान, स्वास्थ्य, कीर्ति और आध्यात्मिक उन्नति भी सच्चा धन है। यह मन्त्र सिखाता है कि जब हम अपने जीवन में प्रकाश और सत्य को आमंत्रित करते हैं, तब वह शक्ति हमारे अनुकूल होकर हमारी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है। यदि हमारा अंतःकरण शुद्ध है, तो दिव्य ऊर्जा हमारे लिए मंगलकारी बनती है। अग्नि यहाँ आत्मा की उस ज्योति का प्रतीक है जो हमें मार्ग दिखाती है, प्रेरित करती है और समृद्ध बनाती है।
ज्ञान:
शुद्ध मन और धर्मयुक्त कर्म से ही दिव्य कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।
विज्ञान:
सकारात्मक मानसिक ऊर्जा और स्पष्ट लक्ष्य व्यक्ति तथा समाज को प्रगति की ओर ले जाते हैं।
ब्रह्मज्ञान:
अग्नि आत्मा की दिव्य ज्योति है; जब हम उससे जुड़ते हैं, तब भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश और समृद्धि प्रकट होती है।
English Explanation:
This mantra seeks Agni’s benevolent presence, asking divine energy to turn favorably toward us, bless us with prosperity, and guide society with light and wisdom.
अग्ने = हे अग्नि
अछा = हमारी ओर, समीप
वदेह = बोलो, अनुकूल वाणी दो
नः = हमारे लिए
प्रत्यङ्नः = हमारी ओर उन्मुख, सामने से
सुमना = शुभ मन वाला, प्रसन्नचित्त
भव = हो जाओ
प्र = आगे, विस्तार से
णः = हमें
यच्छ = प्रदान करो
विशाम् = प्रजा, लोगों के
पते = स्वामी, संरक्षक
धनदा = धन देने वाले
असि = हो
नः = हमारे
त्वम् = तुम
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अग्निदेव से अत्यंत स्नेहपूर्ण और आत्मीय प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—हे अग्नि! हमारी ओर अनुकूल होकर बोलो, हमारे प्रति प्रसन्नचित्त बनो, और हमें समृद्धि प्रदान करो; क्योंकि तुम प्रजाओं के स्वामी और धन देने वाले हो। यहाँ ‘अग्नि’ केवल भौतिक अग्नि नहीं, बल्कि दिव्य चेतना, प्रकाश, ऊर्जा और ईश्वर की सक्रिय उपस्थिति का प्रतीक है। जब मनुष्य अपने जीवन में अग्नि तत्व—अर्थात् सत्य, स्पष्टता और प्रेरणा—को आमंत्रित करता है, तब उसका जीवन आलोकित हो उठता है। ‘अछा वदेह’ का अर्थ है—हमारे पक्ष में बोलो, हमारे लिए मंगलकारी बनो। यह भाव दर्शाता है कि मनुष्य चाहता है कि उसकी आंतरिक चेतना, उसका विवेक और उसका भाग्य उसके अनुकूल हो जाए। जब मन शुद्ध होता है और कर्म धर्मसंगत होते हैं, तब प्रकृति और ईश्वरीय शक्तियाँ भी सहयोगी बनती हैं। ‘सुमना भव’—प्रसन्नचित्त बनो—का अर्थ यह भी है कि दिव्य शक्ति क्रोध या दण्ड के रूप में नहीं, बल्कि कृपा और आशीर्वाद के रूप में प्रकट हो। ‘विशां पते’ अग्नि को प्रजाओं का संरक्षक बताता है। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि अग्नि समाज की एकता और व्यवस्था को बनाए रखने वाली शक्ति है। यज्ञ की अग्नि समाज को जोड़ती है, परिवार को एकत्र करती है और राष्ट्र को सामूहिक चेतना देती है। ‘धनदा असि’—तुम धन देने वाले हो—यह केवल भौतिक धन की बात नहीं करता, बल्कि ज्ञान, स्वास्थ्य, कीर्ति और आध्यात्मिक उन्नति भी सच्चा धन है। यह मन्त्र सिखाता है कि जब हम अपने जीवन में प्रकाश और सत्य को आमंत्रित करते हैं, तब वह शक्ति हमारे अनुकूल होकर हमारी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है। यदि हमारा अंतःकरण शुद्ध है, तो दिव्य ऊर्जा हमारे लिए मंगलकारी बनती है। अग्नि यहाँ आत्मा की उस ज्योति का प्रतीक है जो हमें मार्ग दिखाती है, प्रेरित करती है और समृद्ध बनाती है।
ज्ञान:
शुद्ध मन और धर्मयुक्त कर्म से ही दिव्य कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।
विज्ञान:
सकारात्मक मानसिक ऊर्जा और स्पष्ट लक्ष्य व्यक्ति तथा समाज को प्रगति की ओर ले जाते हैं।
ब्रह्मज्ञान:
अग्नि आत्मा की दिव्य ज्योति है; जब हम उससे जुड़ते हैं, तब भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश और समृद्धि प्रकट होती है।
English Explanation:
This mantra seeks Agni’s benevolent presence, asking divine energy to turn favorably toward us, bless us with prosperity, and guide society with light and wisdom.
शब्दार्थ:
प्र = आगे, पूर्ण रूप से
नः = हमें
यच्छतु = प्रदान करें
अर्यमा = आर्यमा देव (मित्रता और नियम के देवता)
भगः = भाग्य और ऐश्वर्य देने वाले देव
बृहस्पतिः = देवगुरु, ज्ञान के अधिष्ठाता
देवीः = देवियाँ
प्रोत = आगे बढ़ें, कृपा करें
सूनृता = मधुर वाणी, सत्ययुक्त वचन
रयिम् = धन, समृद्धि
देवी = दिव्य शक्ति
दधातु = स्थापित करे, दे
मे = मुझे
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अनेक दिव्य शक्तियों का आह्वान करते हुए समग्र कल्याण और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—अर्यमा हमें प्रदान करें, भग हमें प्रदान करें, बृहस्पति हमें प्रदान करें; देवियाँ और सूनृता (मधुर एवं सत्यवाणी की देवी) हमें समृद्धि दें। यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश निहित है—जीवन की पूर्णता केवल एक ही शक्ति से नहीं, बल्कि अनेक दिव्य गुणों के संतुलन से प्राप्त होती है। ‘अर्यमा’ सामाजिक मर्यादा, मैत्री और अनुशासन के देवता हैं। वे जीवन में नैतिक व्यवस्था और सौहार्द का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘भग’ भाग्य, आनंद और समृद्धि के दाता हैं—यह संकेत है कि समृद्धि ईश्वर की कृपा और पुण्य कर्मों का फल है। ‘बृहस्पति’ ज्ञान, वाणी और बुद्धि के अधिष्ठाता हैं—उनके बिना धन और शक्ति भी दिशाहीन हो सकते हैं। इस प्रकार ऋषि धन, ज्ञान, अनुशासन और सद्वाणी—सभी का समन्वय चाहते हैं। ‘सूनृता’ मधुर और सत्य वाणी की प्रतीक है। यह दर्शाता है कि केवल धन ही नहीं, बल्कि मधुर व्यवहार और सत्यनिष्ठ संवाद भी जीवन की वास्तविक समृद्धि हैं। यदि समाज में वाणी कठोर और असत्य हो जाए, तो धन और वैभव भी शांति नहीं दे सकते। अतः यह मन्त्र आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार की संपन्नता की कामना करता है। ‘रयिं देवी दधातु मे’—हे देवी, मुझे धन प्रदान करो—का अर्थ है कि दिव्य शक्ति मेरे जीवन में स्थिर समृद्धि स्थापित करे। यहाँ ‘धन’ केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ज्ञान, प्रतिष्ठा, सद्गुण और आध्यात्मिक उन्नति भी है। यह मन्त्र समग्र विकास की प्रार्थना है—जहाँ ज्ञान, भाग्य, अनुशासन और मधुरता मिलकर जीवन को पूर्ण बनाते हैं। यह हमें सिखाता है कि सच्ची उन्नति संतुलित व्यक्तित्व से आती है। केवल धन, केवल शक्ति या केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं; इन सभी का सामंजस्य ही दिव्य समृद्धि का कारण बनता है।
ज्ञान:
समृद्धि तब स्थायी होती है जब वह ज्ञान, मर्यादा और सद्वाणी से जुड़ी हो।
विज्ञान:
समाज में संतुलित तंत्र—नैतिक नियम, बुद्धि और संसाधन—सतत विकास का आधार हैं।
ब्रह्मज्ञान:
जब जीवन में विभिन्न दिव्य गुणों का संतुलन स्थापित होता है, तब आत्मा ब्रह्म की पूर्णता का अनुभव करती है।
English Explanation:
This mantra invokes multiple divine powers—discipline, fortune, wisdom, and truthful speech—seeking holistic prosperity and balanced spiritual growth.
प्र = आगे, पूर्ण रूप से
नः = हमें
यच्छतु = प्रदान करें
अर्यमा = आर्यमा देव (मित्रता और नियम के देवता)
भगः = भाग्य और ऐश्वर्य देने वाले देव
बृहस्पतिः = देवगुरु, ज्ञान के अधिष्ठाता
देवीः = देवियाँ
प्रोत = आगे बढ़ें, कृपा करें
सूनृता = मधुर वाणी, सत्ययुक्त वचन
रयिम् = धन, समृद्धि
देवी = दिव्य शक्ति
दधातु = स्थापित करे, दे
मे = मुझे
विस्तृत हिन्दी व्याख्या (लगभग 500 शब्द):
इस मन्त्र में ऋषि अनेक दिव्य शक्तियों का आह्वान करते हुए समग्र कल्याण और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—अर्यमा हमें प्रदान करें, भग हमें प्रदान करें, बृहस्पति हमें प्रदान करें; देवियाँ और सूनृता (मधुर एवं सत्यवाणी की देवी) हमें समृद्धि दें। यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश निहित है—जीवन की पूर्णता केवल एक ही शक्ति से नहीं, बल्कि अनेक दिव्य गुणों के संतुलन से प्राप्त होती है। ‘अर्यमा’ सामाजिक मर्यादा, मैत्री और अनुशासन के देवता हैं। वे जीवन में नैतिक व्यवस्था और सौहार्द का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘भग’ भाग्य, आनंद और समृद्धि के दाता हैं—यह संकेत है कि समृद्धि ईश्वर की कृपा और पुण्य कर्मों का फल है। ‘बृहस्पति’ ज्ञान, वाणी और बुद्धि के अधिष्ठाता हैं—उनके बिना धन और शक्ति भी दिशाहीन हो सकते हैं। इस प्रकार ऋषि धन, ज्ञान, अनुशासन और सद्वाणी—सभी का समन्वय चाहते हैं। ‘सूनृता’ मधुर और सत्य वाणी की प्रतीक है। यह दर्शाता है कि केवल धन ही नहीं, बल्कि मधुर व्यवहार और सत्यनिष्ठ संवाद भी जीवन की वास्तविक समृद्धि हैं। यदि समाज में वाणी कठोर और असत्य हो जाए, तो धन और वैभव भी शांति नहीं दे सकते। अतः यह मन्त्र आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार की संपन्नता की कामना करता है। ‘रयिं देवी दधातु मे’—हे देवी, मुझे धन प्रदान करो—का अर्थ है कि दिव्य शक्ति मेरे जीवन में स्थिर समृद्धि स्थापित करे। यहाँ ‘धन’ केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ज्ञान, प्रतिष्ठा, सद्गुण और आध्यात्मिक उन्नति भी है। यह मन्त्र समग्र विकास की प्रार्थना है—जहाँ ज्ञान, भाग्य, अनुशासन और मधुरता मिलकर जीवन को पूर्ण बनाते हैं। यह हमें सिखाता है कि सच्ची उन्नति संतुलित व्यक्तित्व से आती है। केवल धन, केवल शक्ति या केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं; इन सभी का सामंजस्य ही दिव्य समृद्धि का कारण बनता है।
ज्ञान:
समृद्धि तब स्थायी होती है जब वह ज्ञान, मर्यादा और सद्वाणी से जुड़ी हो।
विज्ञान:
समाज में संतुलित तंत्र—नैतिक नियम, बुद्धि और संसाधन—सतत विकास का आधार हैं।
ब्रह्मज्ञान:
जब जीवन में विभिन्न दिव्य गुणों का संतुलन स्थापित होता है, तब आत्मा ब्रह्म की पूर्णता का अनुभव करती है।
English Explanation:
This mantra invokes multiple divine powers—discipline, fortune, wisdom, and truthful speech—seeking holistic prosperity and balanced spiritual growth.
