दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
अथर्ववेद के चतुर्थ काण्ड का एकादश सूक्त सृष्टि के आधारभूत सिद्धान्त को अत्यंत प्रतीकात्मक शैली में प्रस्तुत करता है।
यहाँ “अनड्वान्” शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका सामान्य अर्थ बैल या वृषभ है, परंतु वैदिक सन्दर्भ में यह केवल पशु नहीं, बल्कि एक ब्रह्माण्डीय शक्ति का प्रतीक है।
यह मंत्र सृष्टि-धारण करने वाली उस अदृश्य शक्ति का वर्णन करता है, जो पृथ्वी, आकाश, अंतरिक्ष और दिशाओं को स्थिर रखती है।
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मंत्र का शब्दार्थ
अनड्वान् = वृषभ, धारक शक्ति
दाधार = धारण किया
पृथिवीम् = पृथ्वी
द्याम् = आकाश
उर्वन्तरिक्षम् = विस्तृत अंतरिक्ष
प्रदिशः षट् = छहों दिशाएँ
विश्वं भुवनम् = सम्पूर्ण जगत
आ विवेश = प्रवेश किया, व्याप्त हुआ
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सरल अर्थ
वह अनड्वान् (दिव्य वृषभ-शक्ति) पृथ्वी को धारण करता है,
वही आकाश को संभालता है,
वही विस्तृत अंतरिक्ष को स्थिर रखता है।
वही छहों दिशाओं का आधार है,
और वही सम्पूर्ण जगत में प्रवेश कर उसे व्याप्त किए हुए है।
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अनड्वान् का प्रतीकात्मक रहस्य
वेदों में वृषभ शक्ति, धैर्य और स्थिरता का प्रतीक है।
यहाँ “अनड्वान्” का अर्थ है —
🔶 वह अदृश्य ब्रह्माण्डीय बल
🔶 जो सबका आधार है
🔶 जो स्थिर भी है और गतिशील भी
जैसे बैल खेत को जोतकर अन्न उत्पादन का आधार बनता है,
वैसे ही यह दिव्य शक्ति सृष्टि-व्यवस्था का आधार है।
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चार स्तरों की धारणा
मंत्र चार आयामों को जोड़ता है:
1. पृथ्वी — स्थूल भौतिक जगत
2. द्यौ (आकाश) — दिव्यता और ऊर्ध्व चेतना
3. अंतरिक्ष — गति और प्राण का क्षेत्र
4. दिशाएँ — विस्तार और संतुलन
यह संकेत है कि सृष्टि का प्रत्येक स्तर एक ही मूल शक्ति द्वारा संचालित है।
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दार्शनिक अर्थ
“अनड्वान् विश्वं भुवनमा विवेश” —
वह शक्ति केवल बाहर से धारण नहीं करती,
बल्कि भीतर प्रवेश कर सबमें व्याप्त है।
यह अद्वैत का संकेत है।
आधार और अधिष्ठान अलग नहीं हैं।
जो पृथ्वी को धारण करता है,
वही हमारे भीतर भी प्राण रूप से विद्यमान है।
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योगिक दृष्टिकोण
योगशास्त्र की भाषा में:
✔ पृथ्वी = मूलाधार चक्र (स्थिरता)
✔ अंतरिक्ष = प्राण प्रवाह
✔ द्यौ = सहस्रार (उच्च चेतना)
✔ दिशाएँ = इन्द्रियों का विस्तार
अनड्वान् = संतुलित प्राणशक्ति
जब प्राण संतुलित होता है, तब शरीर और मन दोनों संतुलित रहते हैं।
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मनोवैज्ञानिक संकेत
यह मंत्र हमें सिखाता है:
✔ स्थिरता ही शक्ति है।
✔ संतुलन ही सुरक्षा है।
✔ आंतरिक आधार के बिना बाहरी सफलता असंभव है।
यदि मनुष्य अपने भीतर की “अनड्वान्” शक्ति को पहचान ले,
तो वह जीवन के उतार-चढ़ाव में अडिग रह सकता है।
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आधुनिक संदर्भ
आज विज्ञान गुरुत्वाकर्षण और ऊर्जा-क्षेत्रों को ब्रह्माण्ड का आधार मानता है।
ऋषियों ने उसी सत्य को प्रतीकात्मक भाषा में व्यक्त किया।
अनड्वान् उस अदृश्य ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का वैदिक नाम है,
जो सृष्टि को संतुलित रखती है।
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समग्र सार
यह मंत्र बताता है कि —
एक ही दिव्य शक्ति
पृथ्वी, आकाश और अंतरिक्ष को धारण करती है।
वही दिशाओं में व्याप्त है।
वही सम्पूर्ण जगत में प्रवेश कर उसे जीवंत बनाए हुए है।
जब मनुष्य उस आधार-शक्ति को अपने भीतर अनुभव करता है,
तब वह स्वयं भी स्थिर, संतुलित और समर्थ बन जाता है।
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English Insight
The Cosmic Bull — the sustaining force —
upholds Earth, Heaven, and the vast mid-space.
It supports all directions
and permeates the entire universe.
It symbolizes the unseen foundation
that sustains existence within and without.
शब्दार्थ
अनड्वान् = दिव्य वृषभ, धारक शक्ति
इन्द्रः = ऐश्वर्यवान, शक्तिशाली देव
सः = वह
पशुभ्यः = प्राणियों के लिए
वि चष्टे = देखता है, व्यवस्था करता है
त्रयान् चक्रान् = तीन चक्र (तीन लोक / तीन काल)
वि मिमीते = मापता है, व्यवस्थित करता है
अध्वनः = मार्ग, पथ
भूतम् = अतीत
भविष्यत् = भविष्य
भुवनानि = लोक, संसार
दुहानः = दुहने वाला, पोषण करने वाला
सर्वा व्रतानि = सभी नियम, व्रत
देवानाम् = देवताओं के
चरति = पालन करता है
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सरल अर्थ
वह अनड्वान् ही इन्द्र है,
जो प्राणियों के लिए सबको देखता और व्यवस्थित करता है।
वह तीन चक्रों (तीन लोक या तीन काल) के मार्गों को मापता है।
वह अतीत और भविष्य के लोकों का पोषण करता हुआ
देवताओं के सभी नियमों का पालन करता है।
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अनड्वान् = इन्द्र
इस मंत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उद्घोष है —
अनड्वान् इन्द्रः
अर्थात् जो ब्रह्माण्ड को धारण करता है, वही इन्द्र है।
इन्द्र यहाँ केवल देवता नहीं, बल्कि —
🔶 शक्ति का सिद्धान्त
🔶 चेतन शासन
🔶 दिव्य व्यवस्था
का प्रतीक है।
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त्रयां चक्रो वि मिमीते अध्वनः
“तीन चक्र” कई अर्थ दे सकते हैं:
✔ त्रिलोक — पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्यौ
✔ त्रिकाल — भूत, वर्तमान, भविष्य
✔ त्रिगुण — सत्त्व, रजस्, तमस्
यह शक्ति इन तीनों आयामों को संतुलित करती है।
वह समय और स्थान दोनों को मापने वाली चेतना है।
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भूतं भविष्यद्भुवना दुहानः
“दुहानः” — दुहना, जैसे गाय से दूध निकालना।
यहाँ संकेत है कि यह शक्ति —
अतीत और भविष्य दोनों से जीवन-रस निकालती है।
अर्थात् सृष्टि एक सतत प्रवाह है।
समय भी उसी चेतना से पोषित है।
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सर्वा देवानां चरति व्रतानि
देवताओं के व्रत = प्राकृतिक नियम
✔ सूर्य का उदय-अस्त
✔ ऋतुओं का परिवर्तन
✔ जन्म और मृत्यु का चक्र
यह सब एक दिव्य नियम-व्यवस्था के अंतर्गत है।
अनड्वान् वही सार्वभौमिक नियम है,
जो प्रकृति को संतुलित रखता है।
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दार्शनिक अर्थ
यह मंत्र बताता है कि —
🔶 ब्रह्माण्ड अराजक नहीं है।
🔶 हर गति के पीछे एक चेतन व्यवस्था है।
🔶 वही शक्ति इन्द्र है, वही धारक है।
यह अद्वैत का गूढ़ संदेश है —
धारण करने वाला और शासन करने वाला एक ही है।
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योगिक संकेत
त्रयां चक्रो =
✔ शरीर
✔ मन
✔ आत्मा
जब आंतरिक “इन्द्र-शक्ति” जागृत होती है,
तब जीवन के मार्ग संतुलित होते हैं।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
यह मंत्र सिखाता है:
✔ अपने जीवन के तीन कालों को संतुलित करो।
✔ अतीत से सीखो।
✔ भविष्य के लिए संकल्प रखो।
✔ वर्तमान में नियमपूर्वक जियो।
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समग्र सार
अनड्वान् ही इन्द्र है —
वही शक्ति जो सृष्टि को धारण करती है,
समय को नियंत्रित करती है,
प्रकृति के नियमों का पालन कराती है,
और सम्पूर्ण जगत का पोषण करती है।
यह मंत्र ब्रह्माण्डीय शासन और आंतरिक आत्मबल दोनों का रहस्य प्रकट करता है।
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English Insight
The Cosmic Bull is Indra —
the governing intelligence of existence.
He measures the paths of the three realms,
nourishes past and future,
and walks in the sacred laws of the gods.
It symbolizes the divine order
that sustains time, space, and life itself.
भूमिका
अथर्ववेद के इस मंत्र में एक अत्यंत गूढ़ सत्य प्रकट किया गया है —
जिस अनड्वान् (ब्रह्माण्डीय धारक शक्ति) की चर्चा पहले की गई,
वही शक्ति अब मनुष्य के भीतर “इन्द्र” रूप में प्रकट होती है।
यह मंत्र बाह्य ब्रह्माण्ड से आंतरिक चेतना की ओर यात्रा कराता है।
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शब्दार्थ
इन्द्रः = शक्तिशाली चेतना, ऐश्वर्यवान तत्व
जातः = जन्मा हुआ
मनुष्येषु = मनुष्यों में
अन्तः घर्मः = भीतर का ताप, तप, ऊर्जा
तप्तः = तप्त, ऊर्जावान
चरति = चलता है, कार्य करता है
शोशुचानः = प्रकाशमान, तेजस्वी
सुप्रजाः = उत्तम संतति वाला, सृजनशील
सन्तः = होते हुए
उदारे = उदार, व्यापक हृदय
न सर्षत् = न क्षीण होता है
न अश्नीयात् = न नष्ट होता है
अनडुहः = दुग्ध न देने वाला (अयोग्य, निष्फल)
विजानन् = जानने वाला, ज्ञानी
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सरल अर्थ
वही इन्द्र मनुष्यों में जन्म लेकर
भीतर तप्त ऊर्जा के रूप में कार्य करता है,
प्रकाशमान होकर चलता है।
वह सृजनशील और उदार हृदय वाला होता है।
जो इस अनड्वान् शक्ति को जानता है,
वह न तो क्षीण होता है और न ही निष्फल जीवन जीता है।
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अन्तर्घर्मः – आंतरिक तप
“अन्तर्घर्म” अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है।
✔ यह शारीरिक ताप नहीं है।
✔ यह तपश्चर्या की अग्नि है।
✔ यह जीवन-ऊर्जा का स्रोत है।
यह वही शक्ति है जो —
प्रेरणा देती है,
संकल्प को मजबूत करती है,
और आत्मबल को जागृत करती है।
ऋषि कहते हैं कि इन्द्र बाहर नहीं,
बल्कि मनुष्य के भीतर ही तपस्वी ऊर्जा के रूप में विद्यमान है।
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शोशुचानः – प्रकाशमान चेतना
यह आंतरिक इन्द्र केवल शक्ति नहीं,
बल्कि प्रकाश भी है।
जब मनुष्य के भीतर विवेक जागृत होता है,
तो वह अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।
यही आंतरिक तेज जीवन को दिशा देता है।
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सुप्रजाः सन्त्स उदारे
“सुप्रजाः” का अर्थ केवल शारीरिक संतति नहीं,
बल्कि श्रेष्ठ विचारों और कर्मों की उत्पत्ति भी है।
“उदारे” — उदारता, विशालता।
अर्थात् जब भीतर का इन्द्र जागृत होता है,
तो मनुष्य —
✔ सृजनशील बनता है
✔ करुणामय बनता है
✔ व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है
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अनडुहो विजानन्
“अनडुह” का शाब्दिक अर्थ है — जो दूध न दे।
यहाँ इसका प्रतीकात्मक अर्थ है — निष्फल जीवन।
जो व्यक्ति अपने भीतर की दिव्य शक्ति को नहीं पहचानता,
वह जीवन की संभावनाओं को दुह नहीं पाता।
परन्तु “विजानन्” — जो जानता है,
वह अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग करता है।
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दार्शनिक संकेत
यह मंत्र कहता है:
🔶 परम शक्ति बाहर ही नहीं, भीतर भी है।
🔶 मनुष्य स्वयं दिव्यता का केंद्र है।
🔶 तप, तेज और सृजनशीलता ही वास्तविक इन्द्रत्व है।
यह अद्वैत का आंतरिक आयाम है।
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योगिक अर्थ
अन्तर्घर्म = कुंडलिनी ऊर्जा
शोशुचानः = सहस्रार का प्रकाश
जब साधक ध्यान और तप से अपनी ऊर्जा को जागृत करता है,
तो उसका जीवन उद्देश्यपूर्ण और प्रभावशाली बन जाता है।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
यह मंत्र हमें सिखाता है:
✔ अपनी आंतरिक ऊर्जा को पहचानो।
✔ तप और अनुशासन से उसे विकसित करो।
✔ उदार और सृजनशील बनो।
जो व्यक्ति अपने भीतर के इन्द्र को पहचान लेता है,
वह जीवन में कभी निष्फल नहीं होता।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.3 का यह मंत्र
मानव जीवन की महानता की घोषणा है।
वही ब्रह्माण्डीय अनड्वान् शक्ति
मनुष्य के भीतर इन्द्र रूप में जन्म लेती है।
वह तप है,
वह तेज है,
वह सृजन है।
जो इसे जान लेता है,
उसका जीवन कभी व्यर्थ नहीं होता।
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English Insight
Indra is born within human beings
as inner heat, discipline, and luminous energy.
The one who realizes this inner power
lives a fruitful, radiant, and purposeful life.
The cosmic force becomes personal consciousness.
भूमिका
इस मंत्र में “अनड्वान्” को एक दिव्य धेनु (कामधेनु सदृश) के रूप में चित्रित किया गया है।
पूर्व मंत्रों में वही शक्ति सृष्टि को धारण करने वाली और मनुष्य के भीतर इन्द्र रूप में स्थित बताई गई।
अब वही शक्ति “दुहने योग्य” पोषण-स्रोत के रूप में वर्णित है।
यहाँ पूरा ब्रह्माण्ड एक दिव्य यज्ञ-व्यवस्था के रूप में प्रकट होता है।
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शब्दार्थ
अनड्वान् = दिव्य धारक शक्ति
दुहे = दुहता है, दूध देता है
सुकृतस्य लोक = पुण्य कर्म करने वालों का लोक
एनम् = उसे
प्याययति = परिपूर्ण करता है, तृप्त करता है
पवमानः = शुद्ध करने वाली वायु / प्रवाहित शक्ति
पुरस्तात् = आगे से, पूर्व दिशा से
पर्जन्यः = वर्षा करने वाला मेघ
धारा = जल की धारा
मरुतः = वायु देवगण
ऊधः = थन (दूध देने का स्थान)
यज्ञः = यज्ञ
पयः = दूध
दक्षिणा = यज्ञ की अर्पण
दोहः = दुहने की क्रिया
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सरल अर्थ
यह अनड्वान् (दिव्य शक्ति) सुकर्म करने वालों के लिए लोक का दुग्ध दुहता है।
पवमान (शुद्ध प्रवाह) उसे परिपूर्ण करता है।
पर्जन्य उसकी धाराएँ हैं, मरुत उसके थन हैं।
यज्ञ उसका दूध है और दक्षिणा उसका दुहना है।
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ब्रह्माण्ड एक दिव्य धेनु
इस मंत्र में सृष्टि को एक गाय के रूप में देखा गया है।
✔ पर्जन्य (मेघ) उसकी वर्षा-धाराएँ हैं।
✔ मरुत (वायु) उसके ऊधः (थन) हैं।
✔ यज्ञ उसका पवित्र दूध है।
✔ दक्षिणा उस दूध को दुहने की क्रिया है।
अर्थात् प्रकृति स्वयं एक पोषण-व्यवस्था है।
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सुकृतस्य लोक
यह अत्यंत महत्वपूर्ण पद है।
“सुकृत” = शुभ कर्म करने वाला।
मंत्र का संदेश स्पष्ट है —
प्रकृति का पोषण उसी को मिलता है
जो धर्म और यज्ञभाव से जीवन जीता है।
यह कर्मफल सिद्धान्त का काव्यात्मक चित्रण है।
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पवमानः पुरस्तात्
“पवमान” का अर्थ है शुद्ध प्रवाह।
यह वायु भी हो सकता है,
या जीवन की वह शुद्ध चेतना
जो आगे से मार्ग प्रशस्त करती है।
यह संकेत है कि जीवन में शुद्धता ही समृद्धि का आधार है।
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यज्ञः पयो दक्षिणा दोहः
यहाँ अत्यंत गूढ़ तत्त्व है —
✔ यज्ञ = समर्पण
✔ पयः = पोषण
✔ दक्षिणा = कृतज्ञता
जब मनुष्य यज्ञभाव से कर्म करता है,
तो प्रकृति उसे पोषण देती है।
दक्षिणा केवल धन नहीं,
बल्कि आभार और समर्पण का भाव है।
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दार्शनिक दृष्टि
यह मंत्र कहता है:
🔶 ब्रह्माण्ड एक जीवित व्यवस्था है।
🔶 प्रकृति एक पोषणकारी माता है।
🔶 धर्मपूर्वक जीवन जीने वाला व्यक्ति ही वास्तविक लाभ पाता है।
अनड्वान् यहाँ केवल धारक नहीं,
बल्कि जीवन-रस का स्रोत है।
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योगिक अर्थ
अनड्वान् = मूल प्राणशक्ति
मरुत = प्राणवायु
पर्जन्य = ऊर्जा प्रवाह
यज्ञ = साधना
जब साधक तप और यज्ञभाव से जीवन जीता है,
तो भीतर की शक्ति उसे आध्यात्मिक अमृत प्रदान करती है।
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मनोवैज्ञानिक संकेत
✔ जीवन में जो बोओगे, वही पाओगे।
✔ समर्पण से ही पोषण मिलता है।
✔ प्रकृति संतुलन का नियम मानती है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.4 का यह मंत्र
सृष्टि को एक दिव्य गाय के रूप में चित्रित करता है,
जो सुकर्मियों के लिए अमृत रूपी दूध प्रदान करती है।
पर्जन्य उसकी धाराएँ हैं,
मरुत उसके ऊधः हैं,
यज्ञ उसका पवित्र दूध है,
और दक्षिणा उस दूध को प्राप्त करने की विधि।
यह मंत्र सिखाता है कि
समर्पण, धर्म और कृतज्ञता से जीवन जीने पर
प्रकृति स्वयं हमें पोषण देती है।
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English Insight
The Cosmic Bull becomes the divine Cow of abundance.
For the righteous, it yields nourishment.
Rain, wind, and sacrifice are parts of this sacred system.
Life is sustained by harmony, purity, and selfless offering.
भूमिका
इस मंत्र में अनड्वान् की महिमा को तीन महान विशेषणों द्वारा व्यक्त किया गया है —
विश्वजित्, विश्वभृत् और विश्वकर्मा।
यहाँ वही ब्रह्माण्डीय शक्ति अब सर्वविजेता, सर्वधारक और सर्वनिर्माता के रूप में प्रकट होती है।
अंत में ऋषि प्रार्थना करते हैं — वह हमें “घर्म” (आंतरिक तप, यज्ञाग्नि) का उपदेश दे।
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शब्दार्थ
यः = जो
विश्वजित् = सम्पूर्ण विश्व को जीतने वाला
विश्वभृत् = सम्पूर्ण जगत को धारण करने वाला
विश्वकर्मा = समस्त सृष्टि का निर्माता
घर्मम् = तप, ऊष्मा, यज्ञ की अग्नि
नः = हमें
ब्रूत = कहे, उपदेश दे
यतमः = संयमी, अनुशासित
चतुष्पात् = चार पादों वाला (स्थिर आधारयुक्त)
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सरल अर्थ
वह जो सम्पूर्ण विश्व को जीतने वाला है,
जो सम्पूर्ण जगत को धारण करने वाला है,
जो समस्त सृष्टि का कर्ता है —
वह हमें घर्म (तप और यज्ञ की अग्नि) का उपदेश दे,
वह संयमी और चार आधारों से युक्त है।
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विश्वजित् – वास्तविक विजय
विश्वजित् का अर्थ बाहरी युद्ध में विजय नहीं है।
यहाँ संकेत है —
✔ इन्द्रियों पर विजय
✔ अज्ञान पर विजय
✔ अव्यवस्था पर विजय
जो चेतना समस्त विश्व-तत्त्वों को संतुलित रखती है,
वही वास्तविक विजेता है।
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विश्वभृत् – धारण करने वाली शक्ति
“भृत्” धारण करने वाला।
वही शक्ति —
✔ पृथ्वी को संतुलित रखती है
✔ ऋतुओं का क्रम बनाए रखती है
✔ जीवन को चलाती है
मनुष्य के भीतर भी यही शक्ति —
आत्मबल और धैर्य के रूप में स्थित है।
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विश्वकर्मा – सृष्टि का दिव्य शिल्पी
विश्वकर्मा का अर्थ है —
जो समस्त जगत का रचनाकार है।
यह केवल निर्माण नहीं,
बल्कि निरंतर सृजन और परिवर्तन का सिद्धान्त है।
हर क्षण प्रकृति में जो परिवर्तन हो रहा है,
वह उसी विश्वकर्मा चेतना का कार्य है।
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घर्मं नो ब्रूत
ऋषि यहाँ प्रार्थना करते हैं —
हमें उस घर्म का ज्ञान दो।
“घर्म” केवल ताप नहीं,
बल्कि यज्ञ की जीवंत ऊष्मा है।
यह तप, अनुशासन और आत्मशुद्धि का प्रतीक है।
अर्थात् —
हमें वह आंतरिक अग्नि प्रदान करो,
जो जीवन को पवित्र और शक्तिशाली बनाए।
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यतमश्चतुष्पात्
“यतम” = संयमित
“चतुष्पात्” = चार पादों वाला
यह चार आधार हो सकते हैं:
✔ धर्म
✔ अर्थ
✔ काम
✔ मोक्ष
या फिर —
✔ सत्य
✔ तप
✔ श्रद्धा
✔ संयम
अर्थात् वह दिव्य शक्ति स्थिर है, संतुलित है, और चारों ओर से समर्थ है।
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आध्यात्मिक संकेत
यह मंत्र बताता है:
🔶 विजय का मूल आत्मसंयम है।
🔶 सृष्टि का आधार संतुलन है।
🔶 तप ही जीवन का वास्तविक बल है।
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मनोवैज्ञानिक अर्थ
जब मनुष्य अपने भीतर के “विश्वकर्मा” को पहचानता है,
तो वह स्वयं अपने जीवन का निर्माता बन जाता है।
जब वह “विश्वभृत्” को पहचानता है,
तो वह स्थिर और धैर्यवान बनता है।
जब वह “विश्वजित्” को पहचानता है,
तो वह अपने दोषों पर विजय पाता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.5 का यह मंत्र
दिव्य चेतना को तीन आयामों में प्रस्तुत करता है —
वह विजेता है।
वह धारक है।
वह सृष्टिकर्ता है।
और वही हमें आंतरिक तप और संयम का मार्ग सिखाए।
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English Insight
The One who conquers all,
sustains all,
and creates all —
may He teach us the sacred inner fire,
the disciplined heat of transformation.
True victory lies in inner mastery.
भूमिका
यह मंत्र आध्यात्मिक उत्कर्ष की पराकाष्ठा को प्रकट करता है।
पूर्व मंत्रों में अनड्वान् को विश्वधारक, विश्वकर्मा और तपस्वी शक्ति बताया गया।
अब यहाँ बताया गया है कि उसी तप और घर्म के द्वारा देवताओं ने अमृतत्व को प्राप्त किया।
यह केवल स्वर्गारोहण की कथा नहीं,
बल्कि आत्मोन्नति का रहस्य है।
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शब्दार्थ
येन = जिस द्वारा
देवाः = देवता
स्वर् आरुरुहुः = स्वर्ग में आरोहण किया
हित्वा = त्याग कर
शरीरम् = शरीर
अमृतस्य नाभिम् = अमृत का केंद्र, अमरत्व का मूल
तेन = उसी द्वारा
गेष्म = हम भी प्राप्त करें
सुकृतस्य लोकम् = शुभ कर्म का लोक
घर्मस्य व्रतेन = घर्म (तप) के व्रत द्वारा
तपसा = तपस्या से
यशस्यवः = यशस्वी होकर
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सरल अर्थ
जिस तप और घर्म के द्वारा देवताओं ने शरीर का अतिक्रमण कर
अमृत के केंद्र को प्राप्त करते हुए स्वर्ग में आरोहण किया,
उसी साधना द्वारा हम भी सुकृत के लोक को प्राप्त करें —
तप और व्रत से यशस्वी होकर।
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स्वरारुरुहुः – स्वर्गारोहण का तात्पर्य
यहाँ “स्वर्” का अर्थ केवल भौतिक स्वर्ग नहीं है।
यह चेतना का उच्चतम स्तर है।
देवताओं ने —
✔ शरीर की सीमाओं को पार किया
✔ मृत्यु के भय को त्यागा
✔ अमृतत्व की अनुभूति की
यह आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक है।
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अमृतस्य नाभिम्
“नाभि” का अर्थ केंद्र।
अमृतस्य नाभिम् = अमर चेतना का केंद्र।
यह संकेत है —
मनुष्य के भीतर एक ऐसा दिव्य केंद्र है
जहाँ आत्मा अमर है।
जब तप और घर्म से मन शुद्ध होता है,
तब साधक उस केंद्र का अनुभव करता है।
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घर्मस्य व्रतेन तपसा
“घर्म” = आंतरिक अग्नि
“व्रत” = अनुशासन
“तप” = आत्मसंयम और साधना
देवताओं ने भी अमृतत्व सहज नहीं पाया।
उन्होंने तप और व्रत का पालन किया।
यह संदेश स्पष्ट है —
✔ बिना अनुशासन के उत्कर्ष नहीं
✔ बिना तप के यश नहीं
✔ बिना समर्पण के अमृतत्व नहीं
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सुकृतस्य लोकम्
सुकृत = शुभ कर्म
यह लोक केवल मृत्यु के बाद का स्वर्ग नहीं,
बल्कि जीवन में प्राप्त होने वाला उच्च चेतना स्तर भी है।
जो तपस्वी और यशस्वी है,
वह यहीं रहते हुए सुकृत के लोक का अनुभव करता है।
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दार्शनिक संकेत
यह मंत्र बताता है:
🔶 अमृतत्व शरीर में नहीं, चेतना में है।
🔶 देवत्व साधना से प्राप्त होता है।
🔶 तप और व्रत जीवन को दिव्य बनाते हैं।
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योगिक अर्थ
अमृतस्य नाभि = सहस्रार या ब्रह्मरंध्र का प्रतीक।
जब साधक कुंडलिनी जागरण और ध्यान के द्वारा
ऊर्ध्वगामी ऊर्जा को अनुभव करता है,
तो वह “स्वरारोहण” करता है।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ आत्म-विकास के लिए अनुशासन आवश्यक है।
✔ शरीर सीमित है, पर चेतना असीम है।
✔ जो अपने दोषों का त्याग करता है, वही यशस्वी होता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.6 का यह मंत्र
मानव जीवन को देवत्व की ओर अग्रसर होने का आह्वान करता है।
जिस मार्ग से देवताओं ने अमृतत्व पाया,
उसी तप और व्रत से मनुष्य भी
सुकृत के उच्च लोक को प्राप्त कर सकता है।
यह मंत्र हमें स्मरण कराता है —
देवत्व बाहर नहीं,
बल्कि हमारे अनुशासित, तपस्वी जीवन में छिपा है।
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English Insight
By sacred heat and discipline
the gods rose beyond the body
to the center of immortality.
Through that same vow and tapas
may we attain the realm of the righteous
and become radiant in glory.
भूमिका
यह मंत्र अत्यंत दार्शनिक और ब्रह्मविद्यात्मक है।
यहाँ अनड्वान् की शक्ति को अनेक दिव्य रूपों में एकीकृत किया गया है —
इन्द्र
अग्नि
प्रजापति
परमेष्ठी
विराट
वैश्वानर
अर्थात् जो शक्ति ब्रह्माण्ड को धारण करती है, वही विभिन्न नामों और रूपों में प्रकट होती है।
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शब्दार्थ
इन्द्रः = शक्ति और ऐश्वर्य का देव
रूपेण = रूप में
अग्निः = अग्नि, ऊर्जा
वहेन = वहन करने वाला
प्रजापतिः = सृष्टिकर्ता
परमेष्ठी = सर्वोच्च स्थान पर स्थित
विराट् = विशाल ब्रह्माण्डीय रूप
विश्वानरे = समस्त प्राणियों में स्थित अग्नि
अक्रमत = प्रवेश किया
अनडुहि = दुहने योग्य, पोषण स्रोत
अदृंहयत = दृढ़ किया
अधारयत = धारण किया
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सरल अर्थ
वही इन्द्र रूप में अग्नि है,
वही वहन करने वाला प्रजापति और परमेष्ठी विराट है।
वह विश्वानर (सर्वव्यापी अग्नि) में प्रवेश करता है,
वैश्वानर में प्रवेश करता है,
और पोषण स्रोत में भी प्रवेश करता है।
वही सबको दृढ़ करता है और वही सबको धारण करता है।
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इन्द्र, अग्नि और प्रजापति का ऐक्य
यहाँ ऋषि स्पष्ट करते हैं कि —
✔ इन्द्र (शक्ति)
✔ अग्नि (ऊर्जा)
✔ प्रजापति (सृजन)
अलग-अलग सत्ता नहीं हैं।
ये सब एक ही ब्रह्मतत्त्व के विविध आयाम हैं।
यह अद्वैत दर्शन का वेदिक रूप है।
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विराट और परमेष्ठी
“विराट” — सम्पूर्ण दृश्य ब्रह्माण्ड।
“परमेष्ठी” — जो सर्वोच्च लोक में स्थित है।
अर्थात् वही शक्ति सूक्ष्म भी है और स्थूल भी।
वह परम भी है और व्यापक भी।
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विश्वानर और वैश्वानर
“विश्वानर” — समस्त प्राणियों में स्थित अग्नि।
“वैश्वानर” — वह अग्नि जो सबको पचाती, पोषित करती है।
योगिक दृष्टि से —
✔ यह जठराग्नि भी है
✔ यह प्राणाग्नि भी है
✔ यह ज्ञानाग्नि भी है
अर्थात् जो भोजन पचाती है,
जो जीवन चलाती है,
जो अज्ञान को जलाती है —
वह सब एक ही दिव्य ऊर्जा है।
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सोऽदृंहयत सोऽधारयत
यह पंक्ति अत्यंत गूढ़ है।
वही शक्ति —
✔ सृष्टि को स्थिर करती है
✔ संतुलन बनाए रखती है
✔ जीवन को आधार देती है
ब्रह्माण्ड का संतुलन उसी पर टिका है।
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दार्शनिक अर्थ
यह मंत्र कहता है:
🔶 विविध देवता वास्तव में एक ही सत्य के रूप हैं।
🔶 ऊर्जा, सृजन और पोषण — एक ही सत्ता के आयाम हैं।
🔶 वही शक्ति भीतर और बाहर दोनों में स्थित है।
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आध्यात्मिक संकेत
जब साधक यह अनुभव करता है कि —
✔ अग्नि वही है
✔ प्राण वही है
✔ चेतना वही है
तब उसका दृष्टिकोण अद्वैत में बदल जाता है।
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मनोवैज्ञानिक अर्थ
यह मंत्र हमें सिखाता है:
✔ अपनी आंतरिक ऊर्जा को पहचानो।
✔ सृजनशील बनो।
✔ अपने जीवन को दृढ़ और संतुलित बनाओ।
वही चेतना हमें स्थिर भी करती है और आगे बढ़ाती भी है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.7 में ऋषि ने एक महान सत्य उद्घाटित किया है —
वही शक्ति इन्द्र है।
वही अग्नि है।
वही प्रजापति है।
वही विराट है।
वही विश्वानर और वैश्वानर है।
और वही सम्पूर्ण सृष्टि को दृढ़ और धारण करने वाली परम चेतना है।
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English Insight
The One appears as Indra, as Fire, as Prajapati.
It enters all beings as the universal flame.
It strengthens and sustains the cosmos.
All divine names point to one sustaining Reality.
भूमिका
यह मंत्र अत्यंत सूक्ष्म और ध्यानयोग से संबंधित है।
यहाँ अनड्वान् (दिव्य धारक शक्ति) के “मध्य” स्वरूप का वर्णन है।
पूर्व मंत्रों में अनड्वान् को विश्वधारक, अग्नि, इन्द्र और वैश्वानर बताया गया।
अब ऋषि बताते हैं कि वह शक्ति कहाँ स्थित है और कैसे संतुलित है।
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शब्दार्थ
मध्यम् = मध्य भाग
एतत् = यह
अनडुहः = अनड्वान्, पोषण देने वाली शक्ति
यत्र = जहाँ
एषः = यह
वहः = वहन करने वाला, प्रवाह
आहितः = स्थापित है
एतावत् = इतना ही
अस्य = उसका
प्राचीनम् = पूर्व दिशा की ओर विस्तृत
यावान् = जितना
प्रत्यङ् = पीछे या भीतर की ओर
समाहितः = स्थापित, संतुलित
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सरल अर्थ
यह अनड्वान् का मध्य भाग है जहाँ यह प्रवाह स्थापित है।
जितना इसका विस्तार आगे (प्राचीन) है,
उतना ही यह पीछे (भीतर) की ओर समाहित है।
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मध्यम् – संतुलन का केंद्र
“मध्य” वेदों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
✔ न अत्यधिक बाह्य विस्तार
✔ न केवल आंतरिक संकोच
बल्कि दोनों का संतुलन।
यह जीवन के संतुलित मार्ग का संकेत है।
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वह आहितः – प्रवाह की स्थापना
यहाँ “वह” का अर्थ है प्रवाह —
✔ प्राण प्रवाह
✔ चेतना प्रवाह
✔ ब्रह्माण्डीय ऊर्जा
जहाँ यह प्रवाह संतुलित है,
वही अनड्वान् का केंद्र है।
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प्राचीन और प्रत्यङ्
“प्राचीन” = आगे, पूर्व दिशा, बाह्य विस्तार।
“प्रत्यङ्” = भीतर की ओर, आत्मदृष्टि।
ऋषि कहते हैं —
जितना विस्तार बाहर है,
उतना ही भीतर भी है।
यह अद्वैत का गूढ़ सिद्धान्त है।
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दार्शनिक अर्थ
यह मंत्र सिखाता है:
🔶 बाह्य और आंतरिक जगत समान हैं।
🔶 ब्रह्माण्ड और आत्मा का विस्तार एक-दूसरे के अनुरूप है।
🔶 संतुलन ही स्थिरता का आधार है।
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योगिक दृष्टि
मध्य = हृदय केंद्र या अनाहत चक्र।
यहीं प्राण का संतुलन होता है।
यदि साधक बाहरी संसार और आंतरिक साधना में संतुलन रखे,
तो उसका जीवन स्थिर और प्रकाशमान होता है।
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मनोवैज्ञानिक संकेत
✔ जीवन में संतुलन आवश्यक है।
✔ जितना समय बाहरी उपलब्धियों को दो,
उतना ही आत्मचिंतन को भी दो।
✔ आत्म-संतुलन ही स्थायी शक्ति देता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.8 का यह मंत्र
हमें मध्य मार्ग का उपदेश देता है।
अनड्वान् की शक्ति संतुलन में स्थित है।
जितना वह बाहर विस्तृत है,
उतना ही भीतर समाहित है।
यही संतुलन जीवन की सफलता और आध्यात्मिक उत्कर्ष का आधार है।
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English Insight
The center of the Cosmic Force
is where the flow is established.
As vast as it extends outward,
so deeply it is rooted within.
Balance between outer expansion and inner stillness
is the secret of harmony.
भूमिका
यह मंत्र अनड्वान् के रहस्य को और गहराई से प्रकट करता है।
यहाँ “सप्त दोह” (सात प्रकार के दुग्ध या सात स्रोत) का उल्लेख है।
ऋषि कहते हैं —
जो पुरुष इन सात दोहों को जानता है,
वह प्रजा और लोक दोनों को प्राप्त करता है।
और यह ज्ञान सप्तऋषियों द्वारा प्रमाणित है।
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शब्दार्थ
यः = जो
वेद = जानता है
अनडुहः = अनड्वान्, दिव्य पोषण शक्ति
दोहान् = दुहने योग्य स्रोत
सप्त = सात
अनुपदस्वतः = क्रमशः, उचित विधि से
प्रजाम् = संतान, सृजन शक्ति
लोकम् = लोक, उच्च अवस्था
च = और
आप्नोति = प्राप्त करता है
तथा = ऐसा ही
सप्तऋषयः = सात महान ऋषि
विदुः = जानते हैं
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सरल अर्थ
जो व्यक्ति अनड्वान् के सात दोहों को क्रम से जानता है,
वह प्रजा और लोक दोनों को प्राप्त करता है।
ऐसा ज्ञान सप्तऋषियों ने भी जाना है।
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सप्त दोह का रहस्य
“सात दोह” प्रतीकात्मक हैं।
इनके अनेक अर्थ हो सकते हैं:
✔ सात छन्द
✔ सात प्राण
✔ सात लोक
✔ सात ऋषि
✔ सात चक्र
✔ सात अग्नियाँ
✔ सात किरणें
अर्थात् यह सम्पूर्ण सृष्टि के सात आयामों का ज्ञान है।
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अनुपदस्वतः – विधिपूर्वक ज्ञान
केवल जान लेना पर्याप्त नहीं।
ज्ञान क्रमबद्ध और साधना सहित होना चाहिए।
यहाँ संकेत है —
✔ गुरु परम्परा
✔ अनुशासन
✔ साधना की क्रमबद्धता
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प्रजां च लोकं च
“प्रजा” का अर्थ केवल संतान नहीं।
यह सृजन-शक्ति है।
“लोक” का अर्थ केवल भौतिक स्थान नहीं।
यह चेतना का स्तर है।
जो इस रहस्य को जानता है —
✔ उसका जीवन सृजनशील होता है
✔ उसकी चेतना उच्च होती है
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सप्तऋषयो विदुः
सप्तऋषि ज्ञान के आदर्श प्रतीक हैं।
यहाँ संदेश है —
यह कोई सामान्य ज्ञान नहीं,
बल्कि महान ऋषियों द्वारा अनुभूत सत्य है।
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दार्शनिक संकेत
यह मंत्र बताता है:
🔶 ब्रह्माण्ड सात स्तरों में व्यवस्थित है।
🔶 जो इन स्तरों को समझता है,
वह जीवन के सम्पूर्ण आयामों को प्राप्त करता है।
🔶 ज्ञान और साधना साथ-साथ आवश्यक हैं।
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योगिक अर्थ
सात दोह = सात चक्रों की ऊर्जा।
जब साधक इन सात ऊर्जा केंद्रों को संतुलित करता है,
तो वह सृजन-शक्ति (प्रजा) और उच्च चेतना (लोक) दोनों प्राप्त करता है।
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मनोवैज्ञानिक अर्थ
✔ जीवन के सभी आयामों को समझना आवश्यक है।
✔ संतुलित विकास ही पूर्णता देता है।
✔ ज्ञान का अभ्यास ही सफलता देता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.9 का यह मंत्र
सात दिव्य स्रोतों के ज्ञान का महत्व बताता है।
जो अनड्वान् के सात दोहों को जानता है,
वह सृजन और चेतना दोनों में समृद्ध होता है।
यह वही रहस्य है
जिसे सप्तऋषियों ने जाना और सिखाया।
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English Insight
He who knows the seven milkings
of the Cosmic Source
gains both progeny and higher worlds.
Such wisdom was known
to the Seven Seers.
True completeness lies
in understanding all dimensions of existence.
भूमिका
यह मंत्र अत्यंत व्यावहारिक और कर्मप्रधान है।
पूर्व मंत्रों में अनड्वान् को ब्रह्माण्डीय शक्ति, अग्नि और विश्वधारक बताया गया।
यहाँ वही शक्ति श्रम और कृषि से जुड़ी हुई दिखाई देती है।
यह दर्शाता है कि वेद केवल आध्यात्मिक ही नहीं,
बल्कि कर्म और जीवन के यथार्थ से भी जुड़े हैं।
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शब्दार्थ
पद्भिः = पैरों से
सेदिम् = भूमि, खेत
अवक्रामन् = चलते हुए, रौंदते हुए
इराम् = अन्न, उर्वर भूमि
जङ्घाभिः = जंघाओं से
उत्खिदन् = खोदते हुए
श्रमेण = परिश्रम से
अनड्वान् = बैल, पोषण देने वाली शक्ति
कीलालम् = मधुर पेय, रस
कीनाशः = कृषक
अभि गच्छतः = प्राप्त करते हैं
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सरल अर्थ
पैरों से भूमि पर चलते हुए,
जंघाओं से उसे खोदते हुए,
परिश्रम द्वारा अनड्वान् और कृषक
कीलाल (रस, अन्न, फल) को प्राप्त करते हैं।
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कृषि का आध्यात्मिक महत्व
यहाँ अनड्वान् (बैल) और कीनाश (किसान) साथ-साथ कार्य कर रहे हैं।
यह सहयोग का प्रतीक है —
✔ मानव और पशु
✔ श्रम और साधन
✔ प्रकृति और पुरुष
वेद कृषि को केवल जीविका नहीं,
बल्कि पवित्र कर्म मानते हैं।
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श्रमेण – परिश्रम का सिद्धान्त
यह मंत्र स्पष्ट कहता है —
✔ बिना श्रम के फल नहीं
✔ बिना प्रयास के रस नहीं
✔ बिना परिश्रम के समृद्धि नहीं
यह कर्मयोग का वेदिक स्वरूप है।
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कीलालम् – रस और फल
कीलाल का अर्थ केवल पेय नहीं।
यह है —
✔ अन्न का रस
✔ जीवन की मिठास
✔ परिश्रम का फल
जब किसान और अनड्वान् मिलकर श्रम करते हैं,
तब जीवन में मधुरता आती है।
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दार्शनिक संकेत
यह मंत्र सिखाता है:
🔶 प्रकृति श्रम से ही फल देती है।
🔶 सहयोग से समृद्धि आती है।
🔶 कर्म ही जीवन का आधार है।
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योगिक अर्थ
भूमि = शरीर
हल चलाना = साधना
बीज = संकल्प
फसल = आत्मविकास
यदि साधक श्रमपूर्वक साधना करे,
तो उसे आत्मज्ञान का “कीलाल” प्राप्त होता है।
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सामाजिक संदेश
✔ किसान का कार्य पवित्र है।
✔ श्रम का सम्मान आवश्यक है।
✔ प्रकृति के साथ सामंजस्य ही समृद्धि है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.10 का यह मंत्र
कर्म, श्रम और सहयोग का महत्व बताता है।
अनड्वान् और किसान मिलकर
परिश्रम से अन्न और रस प्राप्त करते हैं।
यह संदेश स्पष्ट है —
जीवन में मधुरता और समृद्धि
केवल परिश्रम और सामंजस्य से आती है।
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English Insight
With feet they tread the field,
with effort they till the soil.
Through labour,
the ox and the farmer
attain the sweet nourishment of life.
True prosperity arises
from effort and harmony.
भूमिका
यह मंत्र अत्यंत गूढ़ ब्रह्मविद्या से संबंधित है।
यहाँ “द्वादश रात्रि” और “प्रजापति” का उल्लेख है।
ऋषि कहते हैं —
ये बारह रात्रियाँ प्रजापति की व्रत्या कही जाती हैं।
जो इनके भीतर स्थित ब्रह्म को जानता है,
वही अनड्वान् के व्रत को जानता है।
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शब्दार्थ
द्वादश = बारह
रात्रिः = रातें
व्रत्याः = व्रत से संबंधित, दीक्षित अवस्थाएँ
आहुः = कहते हैं
प्रजापतेः = प्रजापति की
तत्र = वहाँ
उप = समीप
ब्रह्म = परम सत्य
यः = जो
वेद = जानता है
तत् = वह
वा = निश्चय ही
अनडुहः = अनड्वान् की
व्रतम् = व्रत, नियम, अनुशासन
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सरल अर्थ
ये बारह रात्रियाँ प्रजापति की व्रतस्वरूप कही जाती हैं।
जो व्यक्ति उनमें स्थित ब्रह्म को जानता है,
वही अनड्वान् के व्रत को जानता है।
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द्वादश रात्रि का रहस्य
बारह का वेद में विशेष महत्व है:
✔ बारह मास
✔ बारह आदित्य
✔ बारह सूर्य चक्र
✔ काल का पूर्ण चक्र
यह समय की पूर्णता का प्रतीक है।
“रात्रि” अज्ञान या अव्यक्त अवस्था का संकेत भी है।
अर्थात् —
सम्पूर्ण कालचक्र में ब्रह्म का रहस्य छिपा है।
---
प्रजापति और काल
प्रजापति सृष्टि और काल के अधिपति हैं।
बारह रात्रियाँ संकेत हैं —
सृष्टि के क्रमिक विस्तार और संकोच की प्रक्रिया।
जो इस काल-चक्र के भीतर ब्रह्म को पहचानता है,
वह सृष्टि के नियम को समझ लेता है।
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अनडुहो व्रतम्
अनड्वान् का व्रत क्या है?
✔ धारण करना
✔ पोषण देना
✔ नियमपूर्वक कर्म करना
जो ब्रह्म को काल के भीतर पहचानता है,
वही इस दिव्य अनुशासन को समझता है।
---
दार्शनिक संकेत
यह मंत्र सिखाता है:
🔶 समय ही ब्रह्म का प्रकट रूप है।
🔶 काल के चक्र में ही सृष्टि का रहस्य है।
🔶 अनुशासन और व्रत से ही ब्रह्मज्ञान संभव है।
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योगिक अर्थ
द्वादश रात्रि = बारह नाड़ियों या बारह चक्रिक अवस्थाएँ।
जब साधक इन अवस्थाओं को पार करता है,
तो वह ब्रह्म के निकट पहुँचता है।
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मनोवैज्ञानिक संकेत
✔ जीवन में समय का सम्मान करें।
✔ अनुशासन से ही आत्म-विकास संभव है।
✔ अंधकार (रात्रि) में भी ज्ञान छिपा होता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.11 का यह मंत्र
समय, अनुशासन और ब्रह्मज्ञान का अद्भुत समन्वय है।
बारह रात्रियाँ कालचक्र का प्रतीक हैं।
जो उनमें स्थित ब्रह्म को जानता है,
वही अनड्वान् के व्रत —
धारण और पोषण के दिव्य नियम — को जानता है।
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English Insight
The twelve nights are said to belong to Prajapati.
He who knows the Brahman hidden within them
knows the sacred vow of the Cosmic Sustainer.
Time itself is a sacred discipline.
Within its cycle lies eternal truth.
भूमिका
यह मंत्र अनड्वान् सूक्त का अत्यंत सुंदर और व्यावहारिक निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।
यहाँ “दुहे” (दुहना) शब्द बार-बार आया है — सायं, प्रातः और मध्यंदिन।
यह केवल गौ-दोहन का वर्णन नहीं,
बल्कि जीवन के त्रिकाल अनुशासन का प्रतीक है।
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शब्दार्थ
दुहे = दुहता है, प्राप्त करता है
सायम् = संध्या समय
प्रातः = प्रातःकाल
मध्यंदिनम् = दोपहर
परि = चारों ओर, पूर्ण रूप से
दोहाः = दुग्ध या प्राप्ति के स्रोत
ये = जो
अस्य = उसके
संयन्ति = संयोजित होते हैं
तान् = उन्हें
विद्म = हम जानते हैं
अनुपदस्वतः = क्रमपूर्वक, विधिपूर्वक
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सरल अर्थ
वह संध्या में दुहता है,
प्रातःकाल दुहता है,
मध्याह्न में भी दुहता है।
उसके जो दोह (प्राप्ति के स्रोत) हैं,
हम उन्हें क्रमपूर्वक जानते हैं।
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त्रिकाल साधना का संकेत
सायं – आत्मचिंतन और विश्राम
प्रातः – आरंभ, संकल्प और ऊर्जा
मध्यंदिन – कर्म और परिश्रम
ऋषि संकेत करते हैं कि जीवन का फल
एक बार के प्रयास से नहीं मिलता।
✔ नियमितता आवश्यक है
✔ त्रिकाल साधना आवश्यक है
✔ निरंतरता ही सफलता का आधार है
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दोह का गूढ़ अर्थ
“दुहना” यहाँ प्रतीक है —
✔ ज्ञान प्राप्ति
✔ आत्मबल प्राप्ति
✔ कर्मफल अर्जन
जैसे गाय को समय पर दुहा जाए तो दूध मिलता है,
वैसे ही जीवन को अनुशासन से साधा जाए तो फल मिलता है।
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अनुपदस्वतः – क्रम का महत्व
वेद कभी अव्यवस्थित जीवन का समर्थन नहीं करते।
यहाँ स्पष्ट है —
✔ सही समय
✔ सही विधि
✔ सही क्रम
यही सफलता का सूत्र है।
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दार्शनिक अर्थ
यह मंत्र सिखाता है:
🔶 समय का सदुपयोग ही समृद्धि देता है।
🔶 ब्रह्मांड की व्यवस्था नियमित है।
🔶 अनुशासन ही आध्यात्मिक और लौकिक उन्नति का आधार है।
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योगिक दृष्टि
त्रिकाल = तीन अवस्थाएँ
✔ जाग्रत
✔ स्वप्न
✔ सुषुप्ति
जो साधक तीनों अवस्थाओं में सजग रहता है,
वह जीवन का “दोह” प्राप्त करता है।
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व्यावहारिक संदेश
✔ सुबह साधना
✔ दिन में कर्म
✔ शाम को आत्मपरीक्षण
यदि यह क्रम जीवन में हो,
तो समृद्धि और संतुलन निश्चित है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.11.12 का यह मंत्र
नियमितता और त्रिकाल साधना का संदेश देता है।
जीवन को समयानुसार साधो,
अनुशासन से कर्म करो,
और क्रमपूर्वक ज्ञान प्राप्त करो।
तभी जीवन का अमृत-दोह संभव है।
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English Insight
It is milked in the evening,
milked in the morning,
milked at midday.
Those streams of nourishment
we know in proper order.
Consistency and discipline
are the secret of abundance.
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