दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
यह मंत्र औषधि और उपचार से संबंधित है।
अथर्ववेद में अनेक सूक्त ऐसे हैं जो रोगनिवारण और शरीर-चिकित्सा से जुड़े हैं।
यहाँ “रोहणी” नामक औषधि का आवाहन किया गया है।
“रोह” धातु का अर्थ है — बढ़ना, जुड़ना, पुनः स्थापित होना।
यह मंत्र टूटे हुए अंग या अस्थि को पुनः जोड़ने की प्रार्थना है।
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शब्दार्थ
रोहण्यसि = तू रोहिणी है, जोड़ने वाली है
रोहण्यस्थ्नः = टूटी हुई अस्थि की जोड़ने वाली
छिन्नस्य = कटे हुए का
रोहणी = पुनः विकसित करने वाली
रोहयेत् = जोड़ दे, उगा दे
अमरुन्धति = अवरोध को दूर करे
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सरल अर्थ
तू रोहिणी है,
टूटी हुई अस्थि को जोड़ने वाली है।
कटे हुए अंग को पुनः उगाने वाली है।
वह अवरोध को हटाकर पुनः स्थापित करे।
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रोहिणी का प्रतीकात्मक अर्थ
रोहिणी केवल एक औषधि नहीं,
बल्कि पुनर्सृजन की शक्ति है।
✔ जो टूटा है उसे जोड़ती है
✔ जो बिखरा है उसे समेटती है
✔ जो क्षतिग्रस्त है उसे स्वस्थ करती है
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अथर्ववेद और चिकित्सा
अथर्ववेद को आयुर्वेद का मूल स्रोत माना जाता है।
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राचीन भारत में —
✔ हड्डी जुड़ने की जानकारी थी
✔ औषधीय पौधों का प्रयोग होता था
✔ मंत्र और औषधि का संयुक्त उपचार होता था
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आध्यात्मिक अर्थ
“छिन्नस्य” केवल शरीर का कटना नहीं।
यह संकेत हो सकता है —
✔ टूटा हुआ मन
✔ बिखरा हुआ संबंध
✔ क्षतिग्रस्त आत्मविश्वास
रोहिणी शक्ति इन्हें भी जोड़ सकती है।
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मनोवैज्ञानिक संकेत
✔ हर टूटन का उपचार संभव है।
✔ समय और प्रयास से घाव भरते हैं।
✔ जीवन में पुनर्निर्माण की क्षमता होती है।
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योगिक दृष्टि
रोहिणी = प्राणशक्ति
जब प्राण संतुलित होता है,
तो शरीर और मन दोनों स्वस्थ होते हैं।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.12.1 का यह मंत्र
उपचार और पुनर्स्थापन का दिव्य संदेश देता है।
जो टूटा है वह जुड़ सकता है।
जो कटा है वह फिर उग सकता है।
प्रकृति में पुनर्जनन की अद्भुत शक्ति है —
और वही रोहिणी है।
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English Insight
Thou art Rohani —
the healer, the restorer.
Join what is broken,
regrow what is cut,
remove obstruction and restore wholeness.
Nature carries
the power of renewal.
भूमिका
यह मंत्र रोहिणी सूक्त का अगला भाग है और उपचार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।
यहाँ “धाता” का आवाहन है — जो सृष्टि का धारक और संयोजक है।
यह प्रार्थना है कि जो अंग घायल, टूटे या चूर्ण हो गए हैं,
वे पुनः शुभ रीति से जुड़ जाएँ।
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शब्दार्थ
यत् = जो
ते = तेरा
रिष्टम् = क्षतिग्रस्त, घायल
द्युत्तम् = आहत, चोटिल
अस्ति = है
पेष्ट्रम् = चूर्णित, पिसा हुआ
त = वह
आत्मनि = शरीर में
धाता = धारण करने वाला, सृष्टिकर्ता
तत् = उसे
भद्रया = शुभ शक्ति से
पुनः = फिर से
सं दधत् = जोड़ दे
परुषा परुः = अंग-अंग, जोड़-जोड़
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सरल अर्थ
तेरे शरीर में जो कुछ घायल, चोटिल या चूर्णित है,
धाता उसे शुभ शक्ति से
फिर से अंग-अंग जोड़ दे।
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धाता – पुनर्निर्माण की शक्ति
धाता ब्रह्म का वह रूप है जो धारण करता है।
✔ सृष्टि को स्थिर रखता है
✔ जीवन को जोड़ता है
✔ व्यवस्था को पुनः स्थापित करता है
यहाँ उसी शक्ति से प्रार्थना है —
कि वह टूटे हुए को पुनः व्यवस्थित करे।
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परुषा परुः – अंग-प्रत्यंग का समन्वय
यह शब्द अत्यंत सुंदर है।
अर्थ है — प्रत्येक जोड़, प्रत्येक अंग।
ऋषि सूक्ष्म रूप से जानते थे कि
शरीर अनेक अंगों के समन्वय से चलता है।
चिकित्सा केवल बाहरी नहीं,
बल्कि संपूर्ण संरचना का संतुलन है।
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चिकित्सकीय संकेत
✔ फ्रैक्चर का जुड़ना
✔ मांसपेशियों का ठीक होना
✔ आंतरिक ऊतकों का पुनर्निर्माण
यह मंत्र प्राचीन भारतीय चिकित्सा ज्ञान का प्रमाण है।
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आध्यात्मिक अर्थ
यहाँ “रिष्ट” और “पेष्ट्र” केवल शरीर नहीं —
✔ टूटे हुए संबंध
✔ बिखरे हुए विचार
✔ घायल आत्मा
धाता की शुभ शक्ति से
ये सब पुनः जुड़ सकते हैं।
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ टूटना अंत नहीं है।
✔ हर विखंडन के बाद पुनर्निर्माण संभव है।
✔ भीतर की दिव्य शक्ति हमें फिर से संपूर्ण बना सकती है।
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योगिक दृष्टि
जब प्राण संतुलित होते हैं,
तो शरीर स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।
ध्यान, प्राणायाम और सकारात्मक संकल्प
आंतरिक धाता को जागृत करते हैं।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.12.2 का यह मंत्र
पुनर्संयोजन और पुनर्जीवन का संदेश देता है।
जो भी घायल या बिखरा है,
वह शुभ शक्ति से फिर से जुड़ सकता है।
सृष्टि की मूल प्रवृत्ति ही
पुनर्निर्माण और संतुलन है।
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English Insight
Whatever in you is injured or crushed,
may the Creator restore it again,
joint by joint,
with auspicious power.
Life holds within it
the force of renewal.
भूमिका
यह मंत्र शरीर के गहन उपचार का दिव्य आह्वान है।
अथर्ववेद में चिकित्सा-संबंधी ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक है।
यहाँ मज्जा (Bone Marrow), अस्थि (Bone) और मांस (Muscle) के पुनर्संयोग की प्रार्थना की गई है।
यह केवल शारीरिक उपचार नहीं,
बल्कि संपूर्ण पुनर्संतुलन का मंत्र है।
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शब्दार्थ
सं = साथ, संयुक्त
ते = तेरा
मज्जा = अस्थि-मज्जा
मज्ज्ञा = मज्जा से
भवतु = हो जाए
समु = पूर्णतः
परुषा परुः = अंग-अंग, जोड़-जोड़
मांसस्य = मांस का
विस्रस्तम् = बिखरा हुआ, अलग हुआ
सम् = पुनः
अस्थि अपि = अस्थि भी
रोहतु = उग जाए, जुड़ जाए
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सरल अर्थ
तेरी मज्जा मज्जा से जुड़ जाए।
तेरे अंग-प्रत्यंग फिर से एक हो जाएँ।
तेरा बिखरा हुआ मांस
और अस्थि भी पुनः जुड़कर विकसित हो जाए।
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चिकित्सकीय गहराई
यह मंत्र आश्चर्यजनक रूप से शारीरिक संरचना की समझ दर्शाता है:
✔ अस्थि (Bone)
✔ मज्जा (Bone Marrow)
✔ मांस (Muscle Tissue)
यह संकेत देता है कि प्राचीन ऋषि
शरीर की आंतरिक संरचना से परिचित थे।
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सं – एकता का सिद्धांत
मंत्र में “सं” शब्द बार-बार आया है।
यह दर्शाता है:
✔ एकता
✔ समन्वय
✔ संतुलन
स्वास्थ्य का अर्थ है —
शरीर के सभी भागों का समन्वय।
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आध्यात्मिक अर्थ
यहाँ शरीर के अंग प्रतीक भी हो सकते हैं:
✔ मज्जा = जीवन की गहराई
✔ अस्थि = आधार
✔ मांस = क्रियाशीलता
जब जीवन का आधार हिल जाता है,
तो व्यक्ति भीतर से टूट जाता है।
यह मंत्र उस टूटन को भरने की प्रार्थना है।
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मनोवैज्ञानिक संकेत
✔ विखंडन के बाद भी पुनर्निर्माण संभव है।
✔ भीतर की शक्ति हमें फिर से खड़ा कर सकती है।
✔ उपचार केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी है।
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योगिक दृष्टि
प्राणशक्ति जब संतुलित होती है,
तो शरीर की कोशिकाएँ पुनर्निर्माण करती हैं।
ध्यान और सकारात्मक संकल्प
उपचार प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.12.3 का यह मंत्र
पूर्ण स्वास्थ्य और पुनर्संयोग का मंत्र है।
यह सिखाता है कि —
जो बिखर गया है, वह फिर जुड़ सकता है।
जो टूट गया है, वह फिर उग सकता है।
प्रकृति की मूल प्रवृत्ति
पुनर्जीवन और संतुलन है।
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English Insight
May your marrow join with marrow,
joint with joint become whole.
May the scattered flesh unite,
may even the bone regrow.
Healing is the restoration
of inner unity.
भूमिका
यह मंत्र उपचार-सूक्त का अत्यंत गहन और वैज्ञानिक भाग है।
यहाँ शरीर के चार प्रमुख घटकों का उल्लेख है —
✔ मज्जा (Bone Marrow)
✔ चर्म (त्वचा)
✔ अस्थि (हड्डी)
✔ मांस (मांसपेशी)
ऋषि संपूर्ण जैविक पुनर्निर्माण की प्रार्थना करते हैं।
यह अद्भुत है कि इतनी प्राचीन वाणी में
शारीरिक संरचना की इतनी सूक्ष्म समझ दिखाई देती है।
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शब्दार्थ
मज्जा मज्ञा = मज्जा मज्जा से
सं धीयताम् = संयुक्त हो जाए
चर्मणा चर्म = त्वचा त्वचा से
रोहतु = उग जाए, जुड़ जाए
असृक्ते = जहाँ रक्त बहा है
अस्थि = हड्डी
मांसं मांसेन = मांस मांस से
रोहतु = पुनः जुड़ जाए
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सरल अर्थ
तेरी मज्जा मज्जा से जुड़ जाए।
त्वचा त्वचा से मिलकर भर जाए।
जहाँ रक्त बहा है वहाँ अस्थि उग आए।
मांस मांस से जुड़कर पूर्ण हो जाए।
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वैज्ञानिक दृष्टि
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राचीन भारत में:
✔ अस्थि-मज्जा की जानकारी थी
✔ ऊतक (Tissues) के स्तर पर उपचार की समझ थी
✔ रक्तस्राव और हड्डी-चिकित्सा का ज्ञान था
अथर्ववेद वास्तव में आयुर्वेद का आधार है।
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आध्यात्मिक संकेत
यहाँ प्रत्येक अंग प्रतीक भी है:
मज्जा = जीवन का मूल सार
चर्म = बाहरी व्यक्तित्व
अस्थि = स्थिरता
मांस = क्रियाशक्ति
जब जीवन में आघात आता है,
तो ये चारों स्तर प्रभावित होते हैं।
यह मंत्र कहता है —
पूर्ण उपचार आवश्यक है।
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“रोहतु” – पुनर्जनन का सिद्धांत
“रोह” का अर्थ है बढ़ना, अंकुरित होना।
प्रकृति में पुनर्जनन की अद्भुत शक्ति है।
घाव भरते हैं।
टूटी हड्डियाँ जुड़ती हैं।
त्वचा पुनः बनती है।
ऋषि उसी प्राकृतिक नियम को आह्वान करते हैं।
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मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अर्थ
यह मंत्र केवल शरीर नहीं —
✔ टूटे संबंध
✔ बिखरी भावनाएँ
✔ घायल आत्मविश्वास
इन सबको भी जोड़ने की प्रेरणा देता है।
समाज में भी यदि विखंडन हो,
तो समन्वय और पुनर्संयोजन आवश्यक है।
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योगिक दृष्टिकोण
जब प्राणशक्ति संतुलित होती है,
तो शरीर स्वयं उपचार करता है।
ध्यान, प्राणायाम और सकारात्मक संकल्प
उपचार की प्रक्रिया को तीव्र करते हैं।
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
यह मंत्र बताता है कि —
विज्ञान (शरीर की संरचना)
और ब्रह्मज्ञान (जीवन की एकता)
विरोधी नहीं, पूरक हैं।
जब हम शरीर, मन और आत्मा को
एक समग्र प्रणाली के रूप में समझते हैं,
तभी सच्चा उपचार संभव होता है।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.12.4 का यह मंत्र
पूर्ण उपचार और पुनर्संयोजन का दिव्य सूत्र है।
मज्जा से मज्जा,
चर्म से चर्म,
अस्थि से अस्थि,
मांस से मांस —
सब पुनः जुड़ जाएँ।
यह संदेश देता है —
जीवन की मूल प्रवृत्ति है पुनर्जीवन।
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English Insight
May marrow unite with marrow,
skin grow with skin.
Where blood has flowed,
may bone regrow.
May flesh join with flesh.
Healing is the restoration
of complete wholeness.
भूमिका
यह मंत्र उपचार-सूक्त का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक चरण है।
यहाँ शरीर के सबसे बाहरी और सूक्ष्म स्तर — लोम (बाल), त्वचा, अस्थि — तक पुनर्संयोजन की प्रार्थना की गई है।
अंत में “औषधे” कहकर औषधि का सीधा आवाहन किया गया है।
यह दर्शाता है कि वेद में मंत्र और चिकित्सा साथ-साथ चलते हैं।
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शब्दार्थ
लोम = रोम, बाल
लोम्ना = रोम से
सं कल्पया = जोड़ दे, व्यवस्थित कर
त्वचा = त्वचा
असृक्ते = जहाँ रक्त बहा है
अस्थि = हड्डी
रोहतु = उग आए
छिन्नम् = कटा हुआ
सं धेहि = जोड़ दे
औषधे = हे औषधि
---
सरल अर्थ
हे औषधि!
रोम को रोम से जोड़ दे।
त्वचा को त्वचा से मिला दे।
जहाँ रक्त बहा है वहाँ अस्थि उग आए।
जो कटा हुआ है उसे फिर से जोड़ दे।
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वैज्ञानिक संकेत
यह मंत्र दर्शाता है कि प्राचीन ऋषि जानते थे —
✔ त्वचा पुनः बनती है
✔ ऊतक (Tissues) पुनर्जीवित होते हैं
✔ रक्तस्राव के बाद हड्डी पुनः जुड़ सकती है
यह पुनर्जनन (Regeneration) की अवधारणा है।
---
“सं कल्पया” का गूढ़ अर्थ
सं + कल्प = पुनः व्यवस्थित करना
यह केवल जोड़ना नहीं,
बल्कि सही संरचना में पुनर्स्थापित करना है।
स्वास्थ्य का अर्थ है —
सही व्यवस्था (Proper Alignment)।
---
औषधि का महत्व
मंत्र के अंत में “औषधे” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह स्पष्ट करता है:
✔ चिकित्सा केवल प्रार्थना नहीं
✔ औषधि का वास्तविक उपयोग भी आवश्यक
✔ प्रकृति में उपचार शक्ति निहित है
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आध्यात्मिक संकेत
लोम = सूक्ष्म विचार
त्वचा = व्यक्तित्व की बाहरी परत
अस्थि = जीवन का आधार
जब जीवन में आघात आता है,
तो यह सभी स्तरों पर प्रभाव डालता है।
यह मंत्र पूर्ण पुनर्संयोजन का आह्वान है।
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मनोवैज्ञानिक अर्थ
✔ टूटे हुए आत्मविश्वास को जोड़ो
✔ बिखरी भावनाओं को संतुलित करो
✔ भीतर की शक्ति को पुनः जागृत करो
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योगिक दृष्टि
जब प्राणशक्ति संतुलित होती है,
तो कोशिकाएँ स्वयं पुनर्निर्माण करती हैं।
ध्यान, सकारात्मक संकल्प और प्रकृति-सम्मत जीवन
उपचार की प्रक्रिया को तीव्र करते हैं।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.12.5 का यह मंत्र
संपूर्ण जैविक और आध्यात्मिक पुनर्संयोजन का सूत्र है।
रोम से रोम,
त्वचा से त्वचा,
अस्थि से अस्थि —
सब पुनः संतुलित हो जाएँ।
हे औषधि,
जो कटा है उसे फिर से जोड़ दे।
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English Insight
Join hair with hair,
skin with skin.
Where blood has flowed,
let bone regrow.
O healing herb,
restore what is cut.
Wholeness is nature’s law.
भूमिका
पूर्व मंत्रों में अंग-संधान और उपचार की प्रार्थना थी।
अब यह मंत्र पुनरुत्थान (Recovery) की घोषणा है।
यहाँ रोगी से कहा जा रहा है —
उठो, आगे बढ़ो, दौड़ो!
तुम एक उत्तम रथ के समान हो —
जिसके चक्र सुस्थिर हैं,
जिसकी नाभि सुदृढ़ है,
और जो पुनः खड़ा हो सकता है।
---
शब्दार्थ
स = वह (तुम)
उत्तिष्ठ = उठो
प्रेहि = आगे बढ़ो
प्र द्रव = दौड़ो, गतिशील बनो
रथः = रथ
सुचक्रः = उत्तम चक्रों वाला
सुपविः = सुदृढ़ धुरी वाला
सुनाभिः = अच्छी नाभि (केन्द्र) वाला
प्रति तिष्ठ = पुनः खड़े हो जाओ
ऊर्ध्वः = ऊपर की ओर, सीधे
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सरल अर्थ
उठो! आगे बढ़ो!
दौड़ो, जैसे सुचक्र रथ चलता है।
मजबूत धुरी और नाभि वाले रथ की तरह
सीधे खड़े हो जाओ और स्थिर बनो।
---
रथ का प्रतीक
वेदों में रथ शरीर और जीवन का प्रतीक है।
✔ चक्र = कर्म
✔ नाभि = जीवन का केंद्र
✔ धुरी = स्थिरता
✔ गति = प्रगति
जब ये सब संतुलित हों,
तभी जीवन सुचारु चलता है।
---
चिकित्सकीय संकेत
यह मंत्र संकेत करता है कि:
✔ उपचार के बाद पुनर्वास (Rehabilitation) आवश्यक है
✔ रोगी को सक्रिय बनाना चाहिए
✔ केवल घाव भरना पर्याप्त नहीं, गतिशीलता भी जरूरी है
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आध्यात्मिक अर्थ
यह केवल शारीरिक उठना नहीं।
✔ निराशा से उठना
✔ भय से उठना
✔ कमजोरी से उठना
जीवन का संदेश है —
उत्थान ही प्रगति है।
---
मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ गिरना स्वाभाविक है
✔ परंतु उठना आवश्यक है
✔ स्थिरता और संतुलन से ही जीवन आगे बढ़ता है
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योगिक दृष्टि
ऊर्ध्व स्थिति का अर्थ है —
✔ मेरुदंड सीधा
✔ चेतना जागृत
✔ प्राण प्रवाहित
जब साधक सीधा और सजग खड़ा होता है,
तभी उसकी ऊर्जा संतुलित होती है।
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Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
यह मंत्र बताता है कि:
विज्ञान कहता है —
सक्रियता स्वास्थ्य का आधार है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
चेतना का उत्थान ही जीवन का लक्ष्य है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
उठो, आगे बढ़ो, और स्थिर होकर जीवन जियो।
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समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.12.6 का यह मंत्र
उपचार के बाद पुनरुत्थान का उद्घोष है।
उठो।
आगे बढ़ो।
दृढ़ बनो।
जीवन एक रथ है —
उसे संतुलित रखकर
ऊर्ध्वगामी बनो।
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English Insight
Rise up, move forward, run —
like a well-wheeled chariot.
With strong axle and firm center,
stand upright again.
Healing is not only recovery —
it is renewed movement.
भूमिका
यह मंत्र आघात और दुर्घटना के बाद पुनर्निर्माण की प्रार्थना है।
यदि कोई गड्ढे में गिर गया हो,
या पत्थर से चोट लगी हो,
तो भी पुनः संपूर्णता संभव है।
यहाँ “ऋभु” का उल्लेख है — वे दिव्य शिल्पी देवता हैं,
जो टूटी वस्तु को पुनः सुंदर बना देते हैं।
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शब्दार्थ
यदि = यदि
कर्तम् = गड्ढा
पतित्वा = गिरकर
संशश्रे = चोटिल हुआ
यदि = या
अश्मा = पत्थर
प्रहृतः = आघात किया गया
जघान = घायल किया
ऋभू = दिव्य शिल्पी देवता
रथस्य इव = रथ के समान
अङ्गानि = अंगों को
सं दधत् = जोड़ दें
परुषा परुः = जोड़-जोड़, अंग-अंग
---
सरल अर्थ
यदि तू गड्ढे में गिरकर घायल हुआ है,
या पत्थर से चोट लगी है,
तो ऋभु देवता
रथ के अंगों की भाँति
तेरे अंग-अंग को फिर से जोड़ दें।
---
ऋभु का महत्व
ऋभु वेदों में कुशल कारीगर और पुनर्निर्माता माने गए हैं।
✔ उन्होंने इंद्र का रथ बनाया
✔ मृत वस्तु को नया रूप दिया
✔ सूक्ष्म शिल्प-कला के प्रतीक हैं
यहाँ वे उपचार और पुनर्संरचना के प्रतीक हैं।
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रथ उपमा का गूढ़ अर्थ
रथ टूट जाए तो कुशल कारीगर
हर भाग को अलग-अलग जोड़ता है।
उसी प्रकार:
✔ शरीर के अंग
✔ नसें
✔ हड्डियाँ
✔ मांसपेशियाँ
सब क्रमपूर्वक पुनः जोड़ी जाती हैं।
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चिकित्सकीय संकेत
यह मंत्र दर्शाता है कि:
✔ दुर्घटना-जनित चोटों की समझ थी
✔ हड्डी और अंगों के पुनर्संयोजन की जानकारी थी
✔ शल्य-चिकित्सा की अवधारणा का बीज मौजूद था
---
आध्यात्मिक अर्थ
गड्ढा = जीवन का संकट
पत्थर = कठोर परिस्थितियाँ
जब जीवन हमें गिरा देता है,
तो भीतर की ऋभु-शक्ति
हमें फिर से खड़ा करती है।
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मनोवैज्ञानिक संदेश
✔ गिरना असफलता नहीं
✔ टूटना अंत नहीं
✔ पुनर्निर्माण संभव है
कुशल कारीगर की तरह
धैर्य और समय से
जीवन फिर से व्यवस्थित किया जा सकता है।
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
विज्ञान कहता है —
हर संरचना को पुनः जोड़ा जा सकता है।
ब्रह्मज्ञान कहता है —
जीवन का मूल स्वरूप अखंड है।
दोनों मिलकर कहते हैं —
टूटन अस्थायी है,
पूर्णता शाश्वत है।
---
समग्र निष्कर्ष
अथर्ववेद 4.12.7 का यह मंत्र
दुर्घटना के बाद पुनर्संरचना का दिव्य आश्वासन है।
ऋभु की तरह
कुशलता से, धैर्य से, क्रमपूर्वक
अंग-अंग को जोड़ो।
जीवन फिर से चल पड़ेगा।
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English Insight
If you have fallen into a pit,
or been struck by stone,
may the divine craftsmen,
like repairing a chariot,
restore each limb, joint by joint.
Fall is not the end —
restoration is always possible.
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