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जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Gyan Vigyan Brhamgyan (GVB the university of veda)

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AtharvaVeda, kand 4 sukta 2

शब्दार्थ

यः = जो आत्मदा = आत्मा (चेतना) देने वाला बलदा = बल देने वाला यस्य = जिसकी विश्वः = समस्त जगत उपासते = उपासना करता है प्रशिषम् = शासन, आदेश यस्य = जिसका देवाः = देवता यः = जो अस्य = इस (जगत) का ईशे = स्वामी है द्विपदः = दो पैरों वाले (मनुष्य) यः = जो चतुष्पदः = चार पैरों वाले (पशु) कस्मै = किस (देव) को देवाय = उस देवता को हविषा = हवि (आहुति) से विधेम = हम अर्पण करें / पूजा करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक है। यह प्रश्न करता है — हम किस देवता की उपासना करें? “य आत्मदा बलदा”— जो आत्मा देता है और बल देता है। यहाँ आत्मदा का अर्थ केवल जीवात्मा देना नहीं, बल्कि चेतना और जीवनशक्ति प्रदान करना है। बलदा — वह जो शक्ति, सामर्थ्य और स्थिरता देता है। अर्थात् वह परम सत्ता जो जीवन और शक्ति दोनों का स्रोत है। “यस्य विश्व उपासते”— जिसकी समस्त जगत उपासना करता है। यह संकेत करता है कि सभी देवशक्तियाँ और प्राणी उसी एक मूल स्रोत पर निर्भर हैं। “प्रशिषं यस्य देवाः”— जिसके आदेश का पालन देवता भी करते हैं। यहाँ देवता प्राकृतिक शक्तियाँ हैं— सूर्य, वायु, अग्नि, इंद्र आदि। अर्थात् वह सत्ता सभी नियमों और शक्तियों से भी परे है। “योऽस्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः”— जो दो पैरों वाले (मनुष्य) और चार पैरों वाले (पशु) सबका स्वामी है। यह मन्त्र स्पष्ट करता है कि वह परम तत्व समस्त जीवधारियों का नियंता है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देवता को हवि अर्पित करें? यह प्रश्न वास्तव में एक दार्शनिक उद्घोष है— जब सब कुछ उसी एक से उत्पन्न है, तो पूजा भी उसी एक की होनी चाहिए। ---

दार्शनिक महत्व

यह मन्त्र एकेश्वरवाद (Monotheistic Insight) की ओर संकेत करता है। 1. आत्मा और शक्ति का स्रोत एक है। 2. प्राकृतिक शक्तियाँ भी उसी के अधीन हैं। 3. समस्त जीव उसी एक सत्ता के अधीन हैं। यहाँ प्रश्न शैली (कस्मै देवाय…) मनुष्य को चिंतन के लिए प्रेरित करती है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. जीवन और शक्ति का मूल स्रोत पहचानो। 2. बाहरी विविधताओं के पीछे एक ही परम सत्य है। 3. उसी एक परम तत्व की उपासना करो जो सबका स्वामी है। यह मन्त्र हमें बाहरी रूपों से ऊपर उठकर मूल चेतना की खोज करने को प्रेरित करता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि जीवन और ऊर्जा का मूल स्रोत एक ही सार्वभौमिक ऊर्जा है। यह मन्त्र उसी सत्य को आध्यात्मिक भाषा में कहता है— एक मूल शक्ति, जिससे जीवन और सामर्थ्य दोनों उत्पन्न होते हैं। ---

आध्यात्मिक चिंतन

जब मनुष्य समझता है कि उसकी चेतना और शक्ति उसी परम स्रोत से है, तो अहंकार समाप्त होता है। तब उपासना बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि आंतरिक समर्पण बन जाती है। ---

English Explanation

This mantra asks: To which God shall we offer our oblation? It describes the one who gives life (Ātma-dā) and strength (Bala-dā), whose command even the gods obey, and who rules over all beings — two-footed and four-footed. The hymn subtly declares that behind all powers stands one supreme source. Core Insight: There is one ultimate giver of life and strength. True worship belongs to that supreme, all-governing reality.

शब्दार्थ

यः = जो प्राणतः = श्वास लेने वालों में / प्राणयुक्तों में निमिषतः = पलक झपकने वालों में महित्वा = अपनी महिमा से एकः = एकमात्र राजा = राजा / अधिपति जगतः = समस्त जगत का बभूव = हुआ यस्य = जिसकी छाया = छाया अमृतम् = अमरत्व यस्य = जिसकी मृत्युः = मृत्यु कस्मै = किस देव को देवाय = उस देवता को हविषा = आहुति से विधेम = हम अर्पण करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र अत्यंत दार्शनिक और गूढ़ है। यह उसी एक परम सत्ता का वर्णन करता है जो जीवन और मृत्यु दोनों का आधार है। “यः प्राणतो निमिषतो”— जो श्वास लेने वालों में भी है और पलक झपकने की क्षणिक क्रिया में भी। अर्थात् जीवन की हर सूक्ष्म गतिविधि उसी परम सत्ता से संचालित है। “महित्वैको राजा जगतो बभूव”— अपनी महिमा से वह एकमात्र राजा है संपूर्ण जगत का। यहाँ ‘राजा’ का अर्थ राजनीतिक शासक नहीं, बल्कि सर्वोच्च नियंता है। वह एक ही है, परंतु उसकी सत्ता सर्वत्र है। “यस्य छायामृतं”— जिसकी छाया अमरत्व है। अर्थात् अमरत्व भी उसी से प्राप्त होता है। “यस्य मृत्युः”— और मृत्यु भी उसी की व्यवस्था है। यह अत्यंत गहन विचार है— जीवन और मृत्यु दो विरोधी नहीं, बल्कि एक ही परम सत्ता के दो पक्ष हैं। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देव को आहुति दें? यह प्रश्न पुनः हमें उसी एक सत्ता की ओर ले जाता है— जो जीवन, मृत्यु, अमरत्व और समय का भी स्वामी है। ---

दार्शनिक अर्थ

1. परम सत्ता जीवन और मृत्यु दोनों का आधार है। 2. अमरत्व और मृत्यु विरोधी नहीं, एक ही स्रोत से हैं। 3. वह एक ही परम नियंता है। यह मन्त्र अद्वैत दर्शन का गहन संकेत देता है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. मृत्यु से भयभीत न हों— वह भी उसी दिव्य व्यवस्था का भाग है। 2. जीवन की प्रत्येक श्वास को पवित्र समझें। 3. उसी एक परम सत्ता में श्रद्धा रखें। जब मनुष्य समझता है कि जीवन और मृत्यु दोनों एक ही दिव्य नियम के अंग हैं, तो भय समाप्त हो जाता है। ---

आधुनिक संदर्भ

आज विज्ञान जीवन को जैव-रासायनिक प्रक्रिया मानता है, परंतु जीवन और मृत्यु का अंतिम रहस्य अभी भी अज्ञात है। यह मन्त्र कहता है— जीवन की हर धड़कन और मृत्यु का हर क्षण एक ही ब्रह्मांडीय शक्ति से संचालित है। ---

English Explanation

This mantra speaks of the One who rules over all breathing and blinking beings — the sole sovereign of the universe. Immortality is His shadow, and death too belongs to Him. It declares that life and death are not opposites, but expressions of one supreme reality. Core Insight: The One governs both life and death. True worship belongs to that singular, all-encompassing Lord.

शब्दार्थ

यम् = जिस (देव को) क्रन्दसी = द्यावा और पृथ्वी (दो लोक) अवत = नीचे से / आधार से चस्कभाने = धारण किए हुए भियसाने = भययुक्त होकर / श्रद्धाभाव से रोदसी = द्युलोक और पृथ्वी अह्वयेथाम् = पुकारती हैं यस्य = जिसका असौ = वह पन्थाः = मार्ग रजसः = अंतरिक्ष / आकाशीय क्षेत्र का विमानः = विस्तृत विस्तार / मापन कस्मै = किस देव को देवाय = उस देवता को हविषा = आहुति द्वारा विधेम = हम अर्पित करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र उस परम सत्ता का वर्णन करता है जिसके आधार पर आकाश और पृथ्वी स्थिर हैं। “यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने”— जिसने द्यावा (आकाश) और पृथ्वी को आधार देकर स्थिर किया। यह संकेत है कि ब्रह्मांड का संतुलन किसी अदृश्य नियम पर आधारित है। “भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्”— आकाश और पृथ्वी भी श्रद्धा और भय से उसे पुकारती हैं। यहाँ ‘भय’ का अर्थ आतंक नहीं, बल्कि दिव्य नियम के प्रति आदर है। अर्थात् प्राकृतिक शक्तियाँ भी उसी परम सत्ता के अधीन हैं। “यस्यासौ पन्था रजसो विमानः”— जिसका मार्ग अंतरिक्ष में विस्तृत है। यह अत्यंत गूढ़ प्रतीक है— वह सत्ता अंतरिक्ष के विस्तार से भी परे है। उसका मार्ग ब्रह्मांडीय विस्तार में व्याप्त है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देव को आहुति दें? यह प्रश्न पुनः उसी एक परम सत्ता की ओर संकेत करता है— जो ब्रह्मांड की संरचना और संतुलन का आधार है। ---

दार्शनिक अर्थ

1. ब्रह्मांड एक अदृश्य नियम से संचालित है। 2. प्राकृतिक शक्तियाँ भी उसी एक सत्ता पर निर्भर हैं। 3. अंतरिक्ष का अनंत विस्तार उसी का प्रतीक है। यह मन्त्र हमें ब्रह्मांडीय विनम्रता सिखाता है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. ब्रह्मांड के नियमों का सम्मान करें। 2. प्रकृति को दिव्य व्यवस्था का भाग मानें। 3. जीवन को ब्रह्मांडीय संतुलन से जोड़ें। जब मनुष्य समझता है कि आकाश और पृथ्वी भी उसी परम सत्ता से बंधे हैं, तो उसका अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

आधुनिक विज्ञान कहता है कि गुरुत्वाकर्षण और भौतिक नियम पृथ्वी और ग्रहों को स्थिर रखते हैं। यह मन्त्र उसी सत्य को प्रतीकात्मक रूप में कहता है— एक अदृश्य शक्ति जो ब्रह्मांड को धारण करती है। ---

English Explanation

This mantra describes the One who upholds heaven and earth, before whom even the cosmic realms stand in reverence. His path stretches through the vastness of space. The hymn again asks: To which God shall we offer our oblation? Core Insight: The cosmos rests upon one unseen foundation. Reverence belongs to that supreme sustaining power.

शब्दार्थ

यस्य = जिसका द्यौः = आकाश / स्वर्ग उर्वी = विस्तीर्ण पृथिवी = पृथ्वी च = और मही = महान, विशाल यस्य = जिसका अत् = तथा उर्वत् = विस्तृत अन्तरिक्षम् = मध्य आकाश यस्य = जिसका असौ = वह सूरः = सूर्य विततः = विस्तृत, व्याप्त महित्वा = अपनी महिमा से कस्मै = किस देव को देवाय = उस देवता को हविषा = आहुति द्वारा विधेम = हम अर्पित करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र उसी परम सत्ता की महिमा का विस्तार करता है जिसके अधीन आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष हैं। “यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही”— जिसकी है यह विशाल आकाश और महान पृथ्वी। यहाँ ‘यस्य’ शब्द बार-बार आकर एक ही परम स्वामी की ओर संकेत करता है। आकाश — अनंत विस्तार का प्रतीक। पृथ्वी — स्थिरता और जीवन का आधार। दोनों उसी एक परम तत्व की अभिव्यक्तियाँ हैं। “यस्याद उर्वन्तरिक्षम्”— जिसका यह विस्तृत अंतरिक्ष है। अंतरिक्ष तीनों लोकों को जोड़ने वाला क्षेत्र है। यह संकेत करता है कि वह सत्ता केवल पृथ्वी या स्वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। “यस्यासौ सूरो विततो महित्वा”— जिसकी महिमा से सूर्य भी प्रकाशित है। सूर्य यहाँ प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का प्रतीक है। वह स्वयं तेजस्वी है, परन्तु उसका तेज भी उसी परम सत्ता से है। अर्थात् ऊर्जा का भी मूल स्रोत वही है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देव को आहुति दें? यह प्रश्न हमें उसी निष्कर्ष पर ले जाता है— जो आकाश, पृथ्वी, अंतरिक्ष और सूर्य का भी स्वामी है, उसी की उपासना योग्य है। ---

दार्शनिक अर्थ

1. परम सत्ता ब्रह्मांड की संपूर्ण संरचना की अधिष्ठात्री है। 2. सूर्य का प्रकाश भी उसी से है। 3. समस्त लोक उसी के अधीन हैं। यह मन्त्र सृष्टि की एकात्मकता और सार्वभौमिकता को स्थापित करता है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. प्रकृति को दिव्य सत्ता का रूप समझें। 2. सूर्य, आकाश और पृथ्वी को पवित्र दृष्टि से देखें। 3. उस एक परम तत्व में श्रद्धा रखें जो सबका आधार है। जब मनुष्य प्रकृति को ईश्वर की अभिव्यक्ति समझता है, तो उसका जीवन संतुलित और विनम्र बनता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

आज विज्ञान कहता है कि सूर्य ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है, और अंतरिक्ष में गुरुत्व तथा नियम ब्रह्मांड को स्थिर रखते हैं। यह मन्त्र उसी सत्य का आध्यात्मिक रूप है— सभी भौतिक नियम एक मूल सत्ता से संचालित हैं। ---

English Explanation

This mantra proclaims the One whose are the vast heavens, the great earth, and the wide mid-space. Even the Sun shines by His greatness. Again the hymn asks: To which God shall we offer our oblation? Core Insight: Heaven, earth, space, and sun all belong to one supreme source. Worship is due to that all-encompassing reality.

शब्दार्थ

यस्य = जिसका विश्वे = समस्त हिमवन्तः = हिमाच्छादित पर्वत महित्वा = महिमा से / महानता में समुद्रे = समुद्र यस्य = जिसका रसम् = सार, जल, जीवनरस इति = ऐसा आहुः = कहते हैं इमाः = ये च = और प्रदिशः = दिशाएँ यस्य = जिसकी बाहू = भुजाएँ कस्मै = किस देव को देवाय = उस देवता को हविषा = आहुति द्वारा विधेम = हम अर्पित करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र उसी परम सत्ता की महिमा का विस्तार करता है जिसके अधीन पर्वत, समुद्र और दिशाएँ भी हैं। “यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा”— सभी हिमाच्छादित पर्वत उसकी महिमा का प्रतीक हैं। पर्वत स्थिरता, धैर्य और ऊँचाई का प्रतीक हैं। उनकी विराटता उसी परम शक्ति की महानता को दर्शाती है। “समुद्रे यस्य रसामिदाहुः”— समुद्र जिसका रस (सार, जल) कहा जाता है। समुद्र जीवन का स्रोत है। जल के बिना जीवन असंभव है। यह मन्त्र संकेत करता है कि जीवन का मूल रस भी उसी से है। “इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू”— ये सभी दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं। यह अत्यंत सुंदर रूपक है। दिशाएँ उस परम सत्ता के विस्तार की भाँति हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण— सब उसी के बाहु-प्रसार हैं। अर्थात् वह सत्ता केवल एक स्थान तक सीमित नहीं, बल्कि सर्वदिशाओं में व्याप्त है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देव को आहुति दें? यह प्रश्न पुनः उसी एक निष्कर्ष की ओर ले जाता है— जो पर्वतों की ऊँचाई, समुद्रों की गहराई और दिशाओं की व्यापकता का आधार है, उसी की उपासना उचित है। ---

दार्शनिक अर्थ

1. परम सत्ता प्रकृति की प्रत्येक शक्ति में प्रकट है। 2. पर्वत उसकी स्थिरता का प्रतीक हैं। 3. समुद्र उसका जीवनरस है। 4. दिशाएँ उसके विस्तार का प्रतीक हैं। यह मन्त्र ब्रह्मांड की एकात्मता का घोष है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. प्रकृति को ईश्वर का रूप मानें। 2. पर्वत से धैर्य सीखें। 3. समुद्र से गहराई और विनम्रता सीखें। 4. दिशाओं से विस्तार और समावेशिता सीखें। जब मनुष्य प्रकृति को पवित्र दृष्टि से देखता है, तो उसका जीवन भी पवित्र बन जाता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

पर्वत पृथ्वी की संरचना का भाग हैं। समुद्र जीवन की उत्पत्ति से जुड़े हैं। दिशाएँ भौगोलिक और खगोलीय व्यवस्था का आधार हैं। यह मन्त्र संकेत देता है कि संपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था एक ही ब्रह्मांडीय नियम से संचालित है। ---

English Explanation

This mantra declares that the snowy mountains manifest His greatness, the oceans are said to be His essence, and all directions are His arms. Again it asks: To which God shall we offer our oblation? Core Insight: Mountains, oceans, and directions reveal the presence of one supreme reality. All worship ultimately belongs to that universal source.

शब्दार्थ

आपः = जल / दिव्य जल अग्रे = प्रारंभ में विश्वम् = समस्त जगत आवन् = आवृत किए हुए / व्याप्त किए हुए गर्भम् = बीज, सृष्टि का भ्रूण दधाना = धारण करते हुए अमृताः = अमर, जीवनदायिनी ऋतज्ञाः = ऋत (सत्य/नियम) को जानने वाली यासु = जिनमें देवीषु = दिव्य शक्तियों में अधि = ऊपर / भीतर देवः = परम देव आसीत् = स्थित था कस्मै = किस देव को देवाय = उस देवता को हविषा = आहुति से विधेम = हम अर्पित करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र सृष्टि के आदिकालीन रहस्य का वर्णन करता है। “आपो अग्रे विश्वमावन्”— प्रारंभ में जल ने समस्त जगत को आवृत किया हुआ था। वेदों में ‘आपः’ केवल भौतिक जल नहीं, बल्कि आद्य तत्व, ऊर्जा और जीवन का प्रतीक है। अर्थात् सृष्टि की शुरुआत एक तरल, अविभाजित अवस्था से हुई। “गर्भं दधाना”— वे जल सृष्टि का गर्भ धारण किए हुए थे। यह अत्यंत गूढ़ प्रतीक है। जैसे माता गर्भ में जीवन धारण करती है, वैसे ही आद्य जल ने सृष्टि-बीज को धारण किया। “अमृता ऋतज्ञाः”— वे अमर और ऋत (सत्य, ब्रह्मांडीय नियम) को जानने वाली थीं। ऋत वेदों का मूल सिद्धांत है— ब्रह्मांड का शाश्वत नियम। अर्थात् सृष्टि का आरंभ अराजकता से नहीं, बल्कि दिव्य नियम से हुआ। “यासु देवीष्वधि देव आसीत्”— उन दिव्य जलों में ही परम देव स्थित था। यह अद्भुत घोषणा है— परम सत्ता सृष्टि के बीज में ही विद्यमान थी। अर्थात् ईश्वर सृष्टि से अलग नहीं, बल्कि उसके भीतर ही स्थित है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देव को आहुति दें? उत्तर वही है— जो सृष्टि के आदिगर्भ में स्थित था, जो जीवन और नियम दोनों का आधार है। ---

दार्शनिक अर्थ

1. सृष्टि का प्रारंभ आद्य तत्व (आपः) से हुआ। 2. ब्रह्मांड का जन्म दिव्य नियम (ऋत) के अधीन हुआ। 3. परम देव सृष्टि के भीतर ही विद्यमान है। यह मन्त्र ब्रह्म और प्रकृति की एकता को दर्शाता है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. जीवन को पवित्र समझें— वह दिव्य गर्भ से उत्पन्न है। 2. प्रकृति और ईश्वर को अलग न मानें। 3. ब्रह्मांडीय नियम (ऋत) के अनुसार जीवन जिएँ। जब मनुष्य समझता है कि वह उसी आदिगर्भ का अंश है, तो उसका जीवन श्रद्धा और संतुलन से भर जाता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

आधुनिक विज्ञान कहता है कि जीवन का प्रारंभ जल में हुआ। यह मन्त्र प्रतीकात्मक रूप में कहता है— जल ने सृष्टि-बीज को धारण किया। यह आध्यात्मिक भाषा में ब्रह्मांडीय विकास का संकेत है। ---

English Explanation

This mantra speaks of the primordial waters that enveloped the universe in the beginning, bearing the cosmic embryo. They were immortal and knew the cosmic order (Ṛta). Within those divine waters, the Supreme was present. Again the hymn asks: To which God shall we offer our oblation? Core Insight: Creation emerged from the sacred womb of cosmic waters, where the divine presence already existed.

शब्दार्थ

हिरण्यगर्भः = स्वर्णमय गर्भ / दिव्य सृष्टि-बीज समवर्तत = प्रकट हुआ / प्रकट होकर स्थित हुआ अग्रे = प्रारंभ में भूतस्य = समस्त भूतों (प्राणियों/तत्वों) का जातः = उत्पन्न होने पर पतिः = स्वामी एकः = एकमात्र आसीत् = था सः = वही दाधार = धारण किया पृथिवीम् = पृथ्वी को उत = और द्याम् = द्युलोक / आकाश कस्मै = किस देव को देवाय = उस देवता को हविषा = आहुति से विधेम = हम अर्पित करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र वेद के अत्यंत प्रसिद्ध और गहन मन्त्रों में से एक है। यह सृष्टि के आदिकारण का उद्घोष करता है। “हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे”— सृष्टि के प्रारंभ में हिरण्यगर्भ प्रकट हुआ। ‘हिरण्य’ का अर्थ है स्वर्ण, प्रकाश, दिव्य तेज। ‘गर्भ’ का अर्थ है बीज या भ्रूण। अर्थात् एक दिव्य प्रकाशमय सृष्टि-बीज प्रारंभ में विद्यमान था। यह हिरण्यगर्भ ब्रह्मांड की उत्पत्ति का मूल कारण है। “भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्”— समस्त भूतों (सभी प्राणियों और तत्वों) का वह एकमात्र स्वामी था। यह स्पष्ट घोषणा है— सृष्टि के पीछे एक ही परम कारण है। “स दाधार पृथिवीमुत द्यां”— उसी ने पृथ्वी और आकाश को धारण किया। धारण करने का अर्थ है उन्हें संतुलित और स्थिर रखना। अर्थात् ब्रह्मांड का आधार वही एक परम तत्व है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देव को आहुति दें? यह प्रश्न अब लगभग उत्तर बन चुका है— वही एक परम स्वामी जो सृष्टि-बीज के रूप में प्रारंभ में था। ---

दार्शनिक अर्थ

1. सृष्टि का मूल एक दिव्य चेतना है। 2. वह एक ही परम कारण है। 3. पृथ्वी और आकाश उसी के द्वारा धारण हैं। यह मन्त्र अद्वैत और एकत्व के दर्शन को स्थापित करता है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. जीवन का मूल दिव्य है। 2. सब कुछ एक ही स्रोत से उत्पन्न है। 3. उसी परम स्रोत में श्रद्धा और समर्पण रखें। जब मनुष्य समझता है कि वह उसी हिरण्यगर्भ का अंश है, तो उसका जीवन पवित्र और अर्थपूर्ण बन जाता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

आधुनिक विज्ञान “बिग बैंग” सिद्धांत की बात करता है— एक प्रारंभिक ऊर्जा बिंदु से ब्रह्मांड का विस्तार। वेद का “हिरण्यगर्भ” उसी आद्य प्रकाश-बीज का आध्यात्मिक रूपक माना जा सकता है। यह आध्यात्मिक भाषा में ब्रह्मांड की उत्पत्ति का संकेत है। ---

English Explanation

This famous mantra declares that in the beginning arose the Golden Embryo — the radiant cosmic seed. He alone was the lord of all that exists. He upheld the earth and the heavens. Again the hymn asks: To which God shall we offer our oblation? Core Insight: The universe emerged from one luminous divine source — the Golden Cosmic Seed.

शब्दार्थ

आपः = जल / आद्य जल वत्सम् = शिशु / पुत्र / सृष्टि-बीज जनयन्तीः = उत्पन्न करती हुई गर्भम् = भ्रूण / सृष्टि का बीज अग्रे = प्रारंभ में समैरयन् = एकत्रित होकर गति दी / प्रवाहित किया तस्य = उसके उत = और जायमानस्य = जन्म लेते हुए उल्बः = आवरण / झिल्ली / गर्भावरण आसीत् = था हिरण्ययः = स्वर्णमय / प्रकाशमय कस्मै = किस देव को देवाय = उस देवता को हविषा = आहुति द्वारा विधेम = हम अर्पित करें ---

हिन्दी व्याख्या (लगभग 900 शब्द)

यह मन्त्र सृष्टि के अत्यंत सूक्ष्म और काव्यमय चित्रण को प्रस्तुत करता है। “आपो वत्सं जनयन्तीः”— आद्य जलों ने वत्स (शिशु) को जन्म दिया। यहाँ ‘वत्स’ सृष्टि-बीज या हिरण्यगर्भ का प्रतीक है। जैसे गाय अपने बछड़े को जन्म देती है, वैसे ही आद्य जलों ने सृष्टि-बीज को उत्पन्न किया। “गर्भमग्रे समैरयन्”— प्रारंभ में उन्होंने उस गर्भ को गति दी, उसे प्रवाहित किया। यह संकेत है कि सृष्टि स्थिर नहीं थी, बल्कि गति और ऊर्जा से युक्त थी। “तस्योत जायमानस्य उल्ब आसीद्धिरण्ययः”— उस जन्म लेते हुए सृष्टि-बीज का आवरण स्वर्णमय था। ‘उल्ब’ गर्भावरण या झिल्ली को कहते हैं। यहाँ यह उस दिव्य प्रकाशमय आवरण का प्रतीक है जिसमें सृष्टि-बीज सुरक्षित था। ‘हिरण्ययः’ — स्वर्णमय, प्रकाशमय। अर्थात् सृष्टि का प्रारंभ प्रकाश से हुआ। यह चित्रण अत्यंत अद्भुत है— जल में स्थित एक दिव्य प्रकाशमय गर्भ, जो धीरे-धीरे जन्म ले रहा है। “कस्मै देवाय हविषा विधेम”— हम किस देव को आहुति दें? उत्तर वही— जो इस दिव्य सृष्टि-गर्भ का आधार है। ---

दार्शनिक अर्थ

1. सृष्टि का आरंभ जल और प्रकाश से हुआ। 2. ब्रह्मांड का जन्म एक दिव्य गर्भ से हुआ। 3. गति और ऊर्जा सृष्टि का मूल तत्व हैं। यह मन्त्र ब्रह्मांड को एक जीवंत प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। ---

आध्यात्मिक संदेश

1. जीवन को दिव्य जन्म मानें। 2. अपने भीतर स्थित प्रकाश को पहचानें। 3. सृष्टि के रहस्य के प्रति विनम्र रहें। जब मनुष्य समझता है कि वह उसी दिव्य गर्भ से उत्पन्न है, तो उसका जीवन श्रद्धा और प्रकाश से भर जाता है। ---

वैज्ञानिक संकेत

आधुनिक विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति ऊर्जा और प्रकाश से हुई। वेद इस सत्य को काव्यमय रूप में कहता है— जल में स्थित एक स्वर्णमय गर्भ से सृष्टि प्रकट हुई। यह आध्यात्मिक भाषा में कॉस्मिक उत्पत्ति का संकेत है। ---

English Explanation

This mantra poetically describes the primordial waters giving birth to the cosmic child — the embryo of creation. As it was born, it was enveloped in a golden sheath. Again the hymn asks: To which God shall we offer our oblation? Core Insight: Creation emerged from the cosmic waters, wrapped in a radiant golden light.

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