Atharvaveda kand 4 Sukta 24

 

भूमिका

यह मंत्र इन्द्र देव की स्तुति और उनकी कृपा के लिए प्रार्थना है। ऋषि कहते हैं कि हम सदा इन्द्र का मनन करते हैं — वह वृत्रघ्न (अज्ञान और बाधा का नाश करने वाले) हैं। हमारी स्तुतियाँ उनके पास पहुँचें और वे हमारे शुभ कर्मों को स्वीकार करें। वे हमें कभी न त्यागें। ---

शब्दार्थ

- इन्द्रस्य = इन्द्र देव के - मन्महे = हम मनन करते हैं - शश्वत् = सदैव - वृत्रघ्न = वृत्र का नाश करने वाले (बाधाओं के विनाशक) - स्तोमाः = स्तुतियाँ - उप मेम आगुः = हमारे समीप आयें / पहुँचें - दाशुषः = यजमान / साधक - सुकृतः = शुभ कर्म करने वाला - हवम् एति = आह्वान को स्वीकार करता है - स नो मुञ्चत्वंहसः = वह हमें कभी न छोड़े ---

सरल अर्थ

हम सदैव इन्द्र का स्मरण करते हैं, जो बाधाओं के नाशक हैं। हमारी स्तुति उन तक पहुँचे। वे हमारे शुभ कर्मों को स्वीकार करें और हमें कभी न छोड़ें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ इन्द्र = चेतना की विजयी शक्ति ✔ वृत्र = अज्ञान, भय और मानसिक अवरोध ✔ स्तोम = सकारात्मक संकल्प और प्रार्थना ✔ सुकृत = धर्मयुक्त कर्म ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर संरक्षण यह मंत्र बताता है कि जब साधक निरंतर ईश्वर का मनन करता है, तो वह अपने आंतरिक वृत्र (बाधाओं) पर विजय प्राप्त करता है। ---

योगिक दृष्टि

✔ इन्द्र = मन और इंद्रियों का अधिपति ✔ वृत्रघ्न = मानसिक अवरोधों का नाश ✔ स्तुति = सकारात्मक विचार ✔ हवम् = ध्यान और आह्वान ---

सामाजिक और दार्शनिक दृष्टि

✔ सुकृत कर्म = समाज की उन्नति ✔ बाधाओं का नाश = प्रगति का मार्ग ✔ निरंतर स्मरण = स्थिर नेतृत्व और संरक्षण ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** सकारात्मक चिंतन और दृढ़ संकल्प बाधाओं को तोड़ता है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** इन्द्र-तत्त्व (आंतरिक शक्ति) जागृत होने पर अज्ञान और भय का नाश होता है। - **संदेश:** स्मरण + शुभ कर्म + आह्वान = विजय और सुरक्षा। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ इन्द्र का निरंतर स्मरण आंतरिक शक्ति को जागृत करता है ✔ वृत्रघ्न = बाधाओं पर विजय ✔ सुकृत कर्म = सफलता का आधार ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर ईश्वरीय संरक्षण ---

English Insight

We constantly contemplate Indra, the destroyer of obstacles (Vritra). May our hymns reach him. He who accepts the call of the righteous may he never abandon us. This symbolizes inner strength, victory over ignorance, and divine protection.

भूमिका

यह मंत्र इन्द्र की उग्र शक्ति, पराक्रम और विजय का वर्णन करता है। ऋषि स्मरण करते हैं उस इन्द्र का — जो उग्रों में भी उग्र है, जिसकी भुजाएँ सामर्थ्य से परिपूर्ण हैं, जिसने दानवों के बल को तोड़ा, जिसके द्वारा नदियाँ जीती गईं और गौओं की रक्षा हुई। वही इन्द्र हमें कभी न त्यागे। यह मंत्र केवल बाहरी युद्ध का नहीं, बल्कि आंतरिक दुर्बलताओं पर विजय का भी प्रतीक है। ---

शब्दार्थ

- यः = जो - उग्रीणाम् = उग्रों में - उग्रबाहुः = शक्तिशाली भुजाओं वाला - दानवानाम् = दानवों / विरोधी शक्तियों के - बलम् आरुरोज = बल को तोड़ दिया - येन = जिसके द्वारा - जिताः = जीते गए - सिन्धवः = नदियाँ - गावः = गौएँ - सः नः मुञ्चत्वंहसः = वह हमें न छोड़े ---

सरल अर्थ

जो इन्द्र उग्रों में भी उग्र और शक्तिशाली है, जिसने दानवों का बल नष्ट किया, जिसके द्वारा नदियाँ और गौएँ जीती गईं, वह हमें कभी न छोड़े। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ उग्रबाहु = आंतरिक साहस और आत्मबल ✔ दानव = अज्ञान, भय, लोभ और नकारात्मकता ✔ सिन्धु = जीवन की धारा, प्राणशक्ति ✔ गौ = ज्ञान और समृद्धि ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर संरक्षण यह मंत्र सिखाता है कि जब आंतरिक इन्द्र-शक्ति जागृत होती है, तो जीवन की धारा (सिन्धु) और ज्ञान-समृद्धि (गौ) सुरक्षित रहती है। ---

योगिक दृष्टि

✔ उग्रबाहु = प्राणशक्ति का उत्कर्ष ✔ दानव-विजय = मानसिक विकारों का दमन ✔ सिन्धु = नाड़ियों में प्रवाहित प्राण ✔ गौ = इंद्रियाँ और ज्ञान ---

सामाजिक और दार्शनिक दृष्टि

✔ शक्तिशाली नेतृत्व समाज को सुरक्षा देता है ✔ अन्याय और दुष्टता पर विजय आवश्यक है ✔ प्राकृतिक संसाधनों (नदी, गौ) की रक्षा सभ्यता का आधार है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस से बाधाएँ टूटती हैं। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** इन्द्र-तत्त्व (आंतरिक दिव्य शक्ति) जागृत होने पर जीवन की समृद्धि और ज्ञान सुरक्षित रहता है। - **संदेश:** साहस + शक्ति + धर्म = विजय और संरक्षण। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ इन्द्र = साहस और आत्मबल ✔ दानव-विजय = नकारात्मकता पर विजय ✔ सिन्धु और गौ = जीवन और समृद्धि ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर दिव्य संरक्षण ---

English Insight

He who is fierce among the fierce, mighty in arms, who shattered the strength of the demons, by whom rivers and cows were won — may that Indra never abandon us. This reflects courage, victory over negativity, and protection of life and prosperity.

भूमिका

यह मंत्र इन्द्र के उस दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है जो मनुष्यों के प्रेरक, पुरुषार्थ के प्रतीक और स्वर्ग (उच्च चेतना) के ज्ञाता हैं। ऋषि कहते हैं कि जिनके लिए यज्ञ में प्रयुक्त ग्रावाण (सोम-पाषाण) वीरता और पुरुषार्थ की घोषणा करते हैं, जिनका यज्ञ सात होताओं द्वारा सम्पन्न होता है, वे इन्द्र हमें कभी न त्यागें। यह मंत्र यज्ञ, पुरुषार्थ और दिव्य चेतना के सामंजस्य को प्रकट करता है। ---

शब्दार्थ

- यः = जो - चर्षणि-प्रः = मनुष्यों का प्रेरक / जनसमूह का अग्रणी - वृषभः = शक्तिशाली, श्रेष्ठ पुरुष - स्वर्वित् = स्वर्ग (उच्च लोक/चेतना) का ज्ञाता - अस्मै = उसके लिए - ग्रावाणः = सोम को पीसने वाले पाषाण - प्रवदन्ति = घोषणा करते हैं - नृम्णम् = वीरता, पुरुषार्थ - यस्य अध्वरः = जिसका यज्ञ - सप्तहोता = सात होताओं द्वारा सम्पन्न - मदिष्ठः = अत्यंत आनंददायक - सः नः मुञ्चत्वंहसः = वह हमें न छोड़े ---

सरल अर्थ

जो इन्द्र मनुष्यों के प्रेरक और श्रेष्ठ हैं, जो स्वर्ग के ज्ञाता हैं, जिनके लिए यज्ञ के पत्थर भी वीरता की घोषणा करते हैं, जिनका यज्ञ सात होताओं द्वारा सम्पन्न होता है, वह हमें कभी न त्यागें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ चर्षणि-प्रः = मानव चेतना का मार्गदर्शक ✔ वृषभ = शक्ति और स्थिरता ✔ स्वर्वित् = उच्च चेतना का ज्ञान ✔ सप्तहोता = सात इन्द्रियाँ / सात प्राण / सात चक्र ✔ अध्वर = जीवन रूपी यज्ञ ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर संरक्षण यह मंत्र बताता है कि जब जीवन रूपी यज्ञ सात शक्तियों (इंद्रियों/चक्रों) से संतुलित होता है, तब मनुष्य उच्च चेतना को प्राप्त करता है। ---

योगिक दृष्टि

✔ सप्तहोता = सात चक्रों का संतुलन ✔ स्वर्वित् = सहस्रार चेतना ✔ वृषभ = मूलाधार की स्थिर शक्ति ✔ यज्ञ = साधना और आत्मपरिवर्तन ---

सामाजिक और दार्शनिक दृष्टि

✔ नेतृत्व और पुरुषार्थ समाज को ऊँचाई देता है ✔ सामूहिक प्रयास (सप्तहोता) से ही यज्ञ सफल होता है ✔ वीरता और धर्म का संतुलन आवश्यक है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** सामूहिक ऊर्जा और समन्वय से उच्च उपलब्धि प्राप्त होती है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** सात चेतन केंद्रों के संतुलन से मनुष्य स्वर्गीय चेतना को प्राप्त करता है। - **संदेश:** पुरुषार्थ + संतुलन + यज्ञ = दिव्य उन्नति। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ इन्द्र = प्रेरणा और वीरता ✔ सप्तहोता = संतुलित चेतना ✔ यज्ञ = जीवन का साधन ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर ईश्वरीय संरक्षण ---

English Insight

He who inspires humanity, the mighty bull, knower of higher realms, for whom the pressing stones proclaim strength, whose sacrifice is performed by seven priests — may he never abandon us. This reflects leadership, coordinated effort, and ascent to higher consciousness.

भूमिका

यह मंत्र इन्द्र के उस दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है जो समस्त शक्तियों, पशुधन, तेज और ब्रह्मज्ञान के अधिपति हैं। ऋषि कहते हैं कि जिनके अधीन बलवान वृषभ (शक्ति), उक्षण (पोषण देने वाले तत्व) और स्वर (दिव्य ध्वनियाँ) स्थित हैं, जिनके लिए ब्रह्म से पवित्र किया हुआ तेज प्रवाहित होता है, वह इन्द्र हमें कभी न त्यागें। यह मंत्र शक्ति, ज्ञान और प्रकाश के समन्वय को दर्शाता है। ---

शब्दार्थ

- यस्य = जिसके - वशासः = अधीन / नियंत्रण में - ऋषभासः = श्रेष्ठ, बलवान वृषभ - उक्षणः = पोषण करने वाले, वर्षा देने वाले - यस्मै = जिसके लिए - मीयन्ते = अर्पित होते हैं - स्वरवः = दिव्य ध्वनियाँ / स्तुतियाँ - स्वर्विदे = स्वर्ग (उच्च चेतना) के ज्ञाता को - यस्मै = जिसके लिए - शुक्रः = तेजस्वी प्रकाश / सोमरस - पवते = प्रवाहित होता है - ब्रह्म-शुम्भितः = ब्रह्म द्वारा प्रकाशित / पवित्र किया हुआ - सः नः मुञ्चत्वंहसः = वह हमें न छोड़े ---

सरल अर्थ

जिस इन्द्र के अधीन बलवान शक्तियाँ और पोषण देने वाले तत्व हैं, जिसे दिव्य स्वर अर्पित होते हैं, जिसके लिए ब्रह्म से प्रकाशित तेज प्रवाहित होता है, वह हमें कभी न त्यागें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ वृषभ = स्थिरता और सामर्थ्य ✔ उक्षण = पोषण और जीवनदायिनी शक्ति ✔ स्वर = मंत्र और चेतना की ध्वनि ✔ शुक्र = तेज, प्रकाश, दिव्य ऊर्जा ✔ ब्रह्मशुम्भित = ब्रह्मज्ञान से प्रकाशित ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर संरक्षण यह मंत्र बताता है कि जब जीवन ब्रह्मप्रकाश से आलोकित होता है, तो शक्ति, पोषण और दिव्य ध्वनि सब संतुलित हो जाते हैं। ---

योगिक दृष्टि

✔ वृषभ = मूलाधार की स्थिर शक्ति ✔ उक्षण = प्राण का प्रवाह ✔ स्वर = मंत्र-जप और नादयोग ✔ शुक्र = सहस्रार का दिव्य प्रकाश ✔ ब्रह्मशुम्भित = समाधि की अवस्था ---

सामाजिक और दार्शनिक दृष्टि

✔ शक्ति और ज्ञान का संतुलन ही नेतृत्व की पहचान है ✔ ब्रह्मप्रकाश से प्रेरित व्यक्ति समाज को दिशा देता है ✔ पोषण, तेज और ध्वनि (संस्कृति) का संरक्षण आवश्यक है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** ऊर्जा, प्रकाश और ध्वनि का संतुलन जीवन की गुणवत्ता बढ़ाता है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** जब चेतना ब्रह्म से प्रकाशित होती है, तब मनुष्य दिव्य तेज से युक्त हो जाता है। - **संदेश:** शक्ति + पोषण + ब्रह्मप्रकाश = दिव्य जीवन। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ इन्द्र = शक्ति और ब्रह्मतेज ✔ वृषभ और उक्षण = जीवन की स्थिरता और पोषण ✔ स्वर और मंत्र = चेतना का उत्थान ✔ ब्रह्मशुम्भित = दिव्य प्रकाश ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर ईश्वरीय संरक्षण ---

English Insight

He under whose control are mighty powers and nourishing forces, to whom divine hymns are offered, for whom the radiant light purified by Brahman flows — may he never abandon us. This symbolizes strength, nourishment, sacred sound, and divine illumination.

भूमिका

यह मंत्र इन्द्र के उस स्वरूप की स्तुति करता है जो सोमप्रिय हैं, ओज और तेज के आधार हैं, और जिनमें स्तुति (अर्क) तथा शक्ति (ओज) आश्रय लेती है। ऋषि कहते हैं — जिनकी कृपा को सोमपान करने वाले साधक चाहते हैं, जिन्हें यज्ञ में आह्वान किया जाता है, जिनमें स्तुति और बल स्थित हैं — वह इन्द्र हमें कभी न त्यागें। ---

शब्दार्थ

- यस्य = जिसकी - जुष्टिम् = कृपा, अनुग्रह - सोमिनः = सोमपान करने वाले, साधक - कामयन्ते = इच्छा करते हैं - यम् = जिसे - हवन्ते = आह्वान करते हैं - इषुमन्तम् = शस्त्रयुक्त, शक्तिशाली - गविष्टौ = गौ-प्राप्ति के लिए, समृद्धि हेतु - यस्मिन् = जिसमें - अर्कः = स्तुति, सूर्यप्रकाश - शिश्रिये = आश्रय लेता है - ओजः = बल, ऊर्जा - सः नः मुञ्चत्वंहसः = वह हमें न छोड़े ---

सरल अर्थ

जिस इन्द्र की कृपा को सोमपान करने वाले चाहते हैं, जिसे यज्ञ में शक्ति और समृद्धि के लिए पुकारा जाता है, जिसमें स्तुति और बल आश्रित हैं, वह हमें कभी न त्यागें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ सोम = आनंद और अमृत चेतना ✔ जुष्टि = ईश्वरीय अनुग्रह ✔ इषुमन्त = सजग और शक्तिशाली चेतना ✔ अर्क = सूर्यतुल्य ज्ञान ✔ ओज = प्राणबल और आध्यात्मिक शक्ति ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर संरक्षण यह मंत्र सिखाता है कि जब साधक आनंद (सोम), ज्ञान (अर्क) और शक्ति (ओज) को इन्द्र-तत्त्व में समर्पित करता है, तब जीवन संतुलित और विजयी बनता है। ---

योगिक दृष्टि

✔ सोम = सहस्रार की अमृतधारा ✔ ओज = ब्रह्मचर्य और तप से उत्पन्न शक्ति ✔ अर्क = आज्ञा चक्र का प्रकाश ✔ गविष्टि = साधना द्वारा चेतना की उन्नति ---

सामाजिक और दार्शनिक दृष्टि

✔ शक्ति और ज्ञान का संतुलन नेतृत्व को प्रभावी बनाता है ✔ आनंद और अनुशासन का समन्वय समाज को स्थिर करता है ✔ समृद्धि (गौ) और ऊर्जा (ओज) का संरक्षण आवश्यक है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** ऊर्जा (ओज) और सकारात्मक प्रेरणा जीवन को ऊँचाई देती है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** सोम (आनंद) और अर्क (ज्ञान) के संतुलन से चेतना दिव्य बनती है। - **संदेश:** आनंद + ज्ञान + शक्ति = दिव्य विजय। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ इन्द्र = शक्ति और अनुग्रह ✔ सोम = आनंद और अमृत चेतना ✔ अर्क और ओज = ज्ञान और बल ✔ गविष्टि = समृद्धि की प्राप्ति ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर दिव्य संरक्षण ---

English Insight

Whose favor the Soma-drinkers desire, whom they invoke in the quest for strength and prosperity, in whom hymn (light) and vigor abide — may he never abandon us. This reflects grace, joy, strength, and divine support.

भूमिका

यह मंत्र इन्द्र के आद्य (प्रथम) और मूल शक्ति स्वरूप का वर्णन करता है। ऋषि स्मरण करते हैं उस दिव्य सत्ता का — जो कर्म के लिए सर्वप्रथम प्रकट हुई, जिसकी वीर्य-शक्ति आदि काल से ज्ञात और स्वीकार की गई, जिसके द्वारा उठाया गया वज्र अहि (अज्ञान और बाधा) पर प्रहार करता है। वह इन्द्र हमें कभी न त्यागे। यह मंत्र सृष्टि के प्रारंभिक पुरुषार्थ, दिव्य पराक्रम और धर्मयुक्त कर्म की घोषणा है। ---

शब्दार्थ

- यः = जो - प्रथमः = सर्वप्रथम - कर्मकृत्याय = कर्म करने हेतु - जज्ञे = उत्पन्न हुआ - यस्य = जिसकी - वीर्यम् = शक्ति, पराक्रम - प्रथमस्य = आद्य काल का - अनुबुद्धम् = पहचाना गया, जाना गया - येन = जिसके द्वारा - उद्यतः = उठाया गया - वज्रः = दिव्य अस्त्र, अडिग शक्ति - अभ्यायत = प्रहार किया - अहिम् = अहि (सर्प रूपी बाधा, वृत्र) - सः नः मुञ्चत्वंहसः = वह हमें न छोड़े ---

सरल अर्थ

जो इन्द्र कर्म के लिए सर्वप्रथम प्रकट हुए, जिनकी शक्ति आदिकाल से जानी गई, जिनके द्वारा उठाया गया वज्र बाधा रूपी अहि पर प्रहार करता है — वह हमें कभी न त्यागें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ प्रथम = मूल चेतना ✔ कर्मकृत्य = धर्मयुक्त कर्म ✔ वीर्य = आत्मबल और संकल्प शक्ति ✔ वज्र = अडिग निश्चय ✔ अहि = अज्ञान, आलस्य, भय ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर संरक्षण यह मंत्र बताता है कि जब साधक अपनी मूल चेतना से जुड़ता है, तो उसका निश्चय वज्र बन जाता है और वह अपने आंतरिक अहि (अवरोध) को परास्त करता है। ---

योगिक दृष्टि

✔ प्रथम चेतना = मूलाधार से सहस्रार तक जागरण ✔ वीर्य = ओज और तप ✔ वज्र = कुण्डलिनी की जागृत शक्ति ✔ अहि-विजय = नाड़ियों के अवरोधों का नाश ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ सृष्टि कर्म से प्रारंभ होती है ✔ प्रथम पुरुषार्थ ही विकास का आधार है ✔ दृढ़ निश्चय (वज्र) से ही बाधाएँ टूटती हैं ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** प्रारंभिक ऊर्जा (Initial impulse) ही क्रिया को जन्म देती है। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** जब चेतना जागती है, तब संकल्प वज्र बनकर अज्ञान को भेद देता है। - **संदेश:** जागरण + कर्म + अडिग निश्चय = विजय। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ इन्द्र = आद्य कर्मशक्ति ✔ वीर्य = जीवन की मूल ऊर्जा ✔ वज्र = अटल संकल्प ✔ अहि-विजय = बाधाओं पर विजय ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर दिव्य संरक्षण ---

English Insight

He who was born first for action, whose strength was recognized from the beginning, by whom the lifted thunderbolt struck down the serpent — may he never abandon us. This symbolizes primal action, unshakable will, and victory over ignorance.

भूमिका

यह मंत्र 4.24 सूक्त का समापन करता है। ऋषि उस इन्द्र की स्तुति करते हैं — जो संग्रामों का संचालन करते हैं, जो युद्ध में वशी (नियंत्रक) हैं, जो दोनों प्रकार की पुष्टियाँ (भौतिक और आध्यात्मिक) प्रदान करते हैं। साधक कहता है — मैं उस इन्द्र की स्तुति करता हूँ, आश्रित होकर उन्हें पुकारता हूँ, वे हमें कभी न त्यागें। ---

शब्दार्थ

- यः = जो - संग्रामान् = युद्धों, संघर्षों - नयति = नेतृत्व करता है - सं युधे = युद्ध में - वशी = नियंत्रक, विजयी - यः = जो - पुष्टानि = पोषण, समृद्धि - संसृजति = उत्पन्न करता है, प्रदान करता है - द्वयानि = दोनों प्रकार (दैहिक और आध्यात्मिक) - स्तौमि = मैं स्तुति करता हूँ - इन्द्रम् = इन्द्र देव को - नाथितः = आश्रित होकर - जोहवीमि = आह्वान करता हूँ - सः नः मुञ्चत्वंहसः = वह हमें न छोड़े ---

सरल अर्थ

जो इन्द्र संघर्षों का संचालन करते हैं, जो युद्ध में विजयी और नियंत्रक हैं, जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की समृद्धि देते हैं, मैं उनकी स्तुति करता हूँ। वे हमें कभी न त्यागें। ---

आध्यात्मिक अर्थ

✔ संग्राम = जीवन के संघर्ष ✔ वशी = आत्मसंयम और नियंत्रण ✔ द्वयानि पुष्टानि = शरीर और आत्मा की उन्नति ✔ नाथितः = समर्पित भाव ✔ मुञ्चत्वंहसः = निरंतर संरक्षण यह मंत्र बताता है कि जीवन स्वयं एक संग्राम है — अज्ञान और ज्ञान के बीच, दुर्बलता और शक्ति के बीच। इन्द्र-तत्त्व वह आंतरिक नेतृत्व है जो साधक को संतुलन और विजय प्रदान करता है। ---

योगिक दृष्टि

✔ संग्राम = इंद्रियों और मन का संघर्ष ✔ वशी = योग द्वारा आत्मनियंत्रण ✔ द्वय पुष्टियाँ = प्राणबल और आत्मबल ✔ जोहवीमि = ध्यान और जप ---

दार्शनिक दृष्टि

✔ जीवन में संघर्ष अनिवार्य है ✔ सही नेतृत्व से विजय संभव है ✔ संतुलित उन्नति ही पूर्णता है ---

Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि

- **विज्ञान कहता है:** चुनौतियाँ विकास का माध्यम हैं। - **ब्रह्मज्ञान कहता है:** जब मन संयमित होता है, तब जीवन का संग्राम विजय में बदल जाता है। - **संदेश:** आत्मसंयम + नेतृत्व + समर्पण = विजय और संरक्षण। ---

समग्र निष्कर्ष

✔ इन्द्र = जीवन संग्राम के नेतृत्वकर्ता ✔ वशी = आत्मनियंत्रण ✔ द्वय पुष्टियाँ = भौतिक + आध्यात्मिक उन्नति ✔ स्तुति और समर्पण = ईश्वरीय संरक्षण ✔ मुञ्चत्वंहसः = कभी न त्यागने वाली कृपा ---

English Insight

He who leads the battles and rules in conflict, who grants both forms of nourishment, I praise and invoke that Indra — may he never abandon us. This hymn concludes with surrender, strength, and divine protection.

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