यह सूक्त वायु और सविता देव की संयुक्त स्तुति है।
ऋषि उन दोनों दिव्य शक्तियों का स्मरण करते हैं —
जो आत्मा में प्रवेश करते हैं,
जो प्राण और चेतना की रक्षा करते हैं,
जो सम्पूर्ण विश्व के परिभू (सर्वव्यापक संरक्षक) हैं।
ऋषि प्रार्थना करते हैं —
हे वायु और सविता! आप हमें कभी न त्यागें, हमें पाप और संकट से मुक्त रखें।
---
शब्दार्थ
- वायोः = वायु देव के
- सवितुः = सविता (सूर्य-प्रेरक देव) के
- विदथानि = ज्ञान, उपदेश, विधान
- मन्महे = हम मनन करते हैं
- यौ = जो दोनों
- आत्मन्वत् = आत्मा में स्थित
- विशथः = प्रवेश करते हैं
- यौ च रक्षथः = जो रक्षा करते हैं
- यौ = जो दोनों
- विश्वस्य = सम्पूर्ण जगत के
- परिभू = चारों ओर से रक्षक
- बभूवथुः = बने हुए हैं
- तौ = वे दोनों
- नः = हमें
- मुञ्चतम् अंहसः = पाप और संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
हम वायु और सविता के ज्ञान का मनन करते हैं,
जो आत्मा में प्रवेश करते हैं और रक्षा करते हैं,
जो सम्पूर्ण विश्व के रक्षक हैं।
वे दोनों हमें संकट से मुक्त करें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ वायु = प्राणशक्ति
✔ सविता = चेतना को प्रेरित करने वाला प्रकाश
✔ आत्मन्वत् प्रवेश = सूक्ष्म ऊर्जा का आंतरिक संचार
✔ परिभू = सर्वव्यापक संरक्षण
✔ मुञ्चतमंहसः = नकारात्मकता से मुक्ति
यह मंत्र बताता है कि
जब प्राण (वायु) और चेतना (सविता) संतुलित होते हैं,
तब साधक आंतरिक और बाहरी संकटों से सुरक्षित रहता है।
---
योगिक दृष्टि
✔ वायु = प्राणायाम
✔ सविता = सूर्य ध्यान / गायत्री चेतना
✔ आत्म प्रवेश = प्राण का नाड़ियों में संतुलन
✔ संरक्षण = ओज और तेज की वृद्धि
---
दार्शनिक दृष्टि
✔ जीवन प्राण और प्रकाश का संयोजन है
✔ ऊर्जा और चेतना का संतुलन ही सुरक्षा है
✔ विश्व एक ही दिव्य शक्ति से आवृत है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
श्वास (वायु) और सूर्य ऊर्जा जीवन का आधार हैं।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
जब प्राण और चेतना एक हो जाते हैं,
तब आत्मा प्रकाशित और सुरक्षित होती है।
- **संदेश:**
प्राण + प्रकाश = जीवन की रक्षा।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ वायु = जीवन शक्ति
✔ सविता = दिव्य प्रेरणा
✔ आत्म प्रवेश = सूक्ष्म ऊर्जा का जागरण
✔ परिभू = सर्वव्यापक संरक्षण
✔ मुञ्चतमंहसः = पाप और संकट से मुक्ति
---
English Insight
We contemplate the wisdom of Vāyu and Savitṛ,
who enter the soul and protect it,
who encompass the whole universe —
may they free us from sin and distress.
भूमिका
यह मंत्र वायु और सविता की असीम व्यापकता और महिमा का वर्णन करता है।
ऋषि कहते हैं —
जिनकी महानता से पृथ्वी के विस्तार मापे जाते हैं,
जिनके द्वारा अंतरिक्ष व्यवस्थित और धारण किया गया है,
जिनकी सीमा तक कोई नहीं पहुँच सकता —
वे दोनों हमें संकट और पाप से मुक्त करें।
---
शब्दार्थ
- ययोः = जिन दोनों की
- संख्याता = मापी गई / निर्धारित
- वरिमा = महिमा, विस्तार
- पार्थिवानि = पृथ्वी से संबंधित क्षेत्र
- याभ्याम् = जिन दोनों के द्वारा
- रजः = अंतरिक्ष, मध्यलोक
- युपितम् = स्थापित, संयोजित
- अन्तरिक्षे = आकाश में
- ययोः = जिन दोनों की
- प्रायम् = सीमा, अंत
- न = नहीं
- अन्वानशे = प्राप्त कर सका
- कश्चन = कोई भी
- तौ = वे दोनों
- नः = हमें
- मुञ्चतम् अंहसः = पाप/संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
जिनकी महानता से पृथ्वी का विस्तार मापा जाता है,
जिनके द्वारा अंतरिक्ष व्यवस्थित है,
जिनकी सीमा कोई नहीं जान सकता —
वे वायु और सविता हमें संकट से मुक्त करें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ पृथ्वी = स्थूल शरीर
✔ अंतरिक्ष = मन और सूक्ष्म जगत
✔ असीम सीमा = अनंत चेतना
✔ वायु = प्राण
✔ सविता = दिव्य प्रकाश
यह मंत्र सिखाता है कि
प्राण और प्रकाश ही स्थूल और सूक्ष्म जगत के आधार हैं।
उनकी सीमा अनंत है,
और उन्हीं में सुरक्षा और मुक्ति निहित है।
---
योगिक दृष्टि
✔ पृथ्वी तत्व = मूलाधार
✔ अंतरिक्ष = विशुद्धि और आकाश तत्व
✔ प्राणायाम = वायु का संतुलन
✔ सूर्य ध्यान = सविता का प्रकाश
जब प्राण और प्रकाश संतुलित होते हैं,
तब साधक आंतरिक विस्तार अनुभव करता है।
---
दार्शनिक दृष्टि
✔ ब्रह्मांड सीमाहीन है
✔ मानव चेतना भी असीम संभावनाओं से युक्त है
✔ वास्तविक सुरक्षा अनंत चेतना से जुड़ने में है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
ब्रह्मांड का विस्तार असीम और मापन से परे है।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
चेतना भी उसी प्रकार अनंत है।
- **संदेश:**
प्राण + प्रकाश + अनंतता = दिव्य संरक्षण।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ वायु और सविता = विश्व के धारक
✔ पृथ्वी और अंतरिक्ष = स्थूल और सूक्ष्म जगत
✔ असीम महिमा = अनंत चेतना
✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति
---
English Insight
Whose greatness measures the earthly realms,
by whom the mid-space is upheld,
whose limit none can reach —
may those two free us from distress.
भूमिका
यह मंत्र वायु और सविता की उस दिव्य व्यवस्था का वर्णन करता है
जिसके अधीन समस्त प्राणी संचालित होते हैं।
ऋषि कहते हैं —
हे चित्रभानु (प्रकाशमान सविता)!
जब तुम उदित होते हो,
तब प्राणी अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त होते हैं।
हे वायु और सविता!
आप दोनों समस्त भुवनों की रक्षा करते हैं —
हमें संकट से मुक्त रखें।
---
शब्दार्थ
- तव = तुम्हारे
- व्रते = नियम, विधान, दिव्य व्यवस्था
- नि विशन्ते = प्रवेश करते हैं, स्थित होते हैं
- जनासः = लोग, प्राणी
- त्वयि उदिते = तुम्हारे उदित होने पर
- प्रेरते = प्रेरित होते हैं
- चित्रभानो = प्रकाशमान, तेजस्वी (सविता)
- युवम् = आप दोनों
- वायो = हे वायु
- सविता = हे सविता
- भुवनानि = समस्त लोक
- रक्षथः = रक्षा करते हैं
- तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे दोनों हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
जब तुम (सविता) उदित होते हो,
तो लोग तुम्हारे नियमों में स्थित होकर कर्म करते हैं।
हे वायु और सविता!
आप दोनों समस्त लोकों की रक्षा करते हैं,
हमें संकट से मुक्त रखें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ व्रत = ब्रह्मांडीय नियम (ऋत)
✔ उदित सविता = जागृत चेतना
✔ प्रेरणा = दिव्य ऊर्जा
✔ वायु = प्राण
✔ भुवन रक्षा = जीवन संतुलन
यह मंत्र सिखाता है कि
जीवन की गति किसी अराजकता से नहीं,
बल्कि दिव्य नियमों (ऋत) से संचालित होती है।
जब चेतना जागृत होती है (सूर्योदय),
तब कर्म स्वतः आरंभ होता है।
---
योगिक दृष्टि
✔ सूर्य उदय = सहस्रार जागरण
✔ वायु = प्राण का प्रवाह
✔ व्रत पालन = यम-नियम
✔ प्रेरणा = आंतरिक ऊर्जा
साधक जब प्राण और प्रकाश के संतुलन में रहता है,
तब उसका जीवन दिव्य अनुशासन में चलता है।
---
दार्शनिक दृष्टि
✔ प्रकृति नियमबद्ध है
✔ मानव जीवन भी उसी नियम का अंग है
✔ अनुशासन और जागरण से ही सुरक्षा है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
सूर्य के उदय से पृथ्वी पर जीवन सक्रिय होता है।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
जब चेतना जागती है,
तब जीवन का कर्म-चक्र संतुलित हो जाता है।
- **संदेश:**
अनुशासन + जागरण + प्राण संतुलन = सुरक्षा और उन्नति।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ सविता = चेतना का प्रकाश
✔ वायु = जीवन शक्ति
✔ व्रत = ब्रह्मांडीय नियम
✔ भुवन रक्षा = संतुलित जीवन
✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति
---
English Insight
In your sacred order all beings dwell;
when you rise, O radiant one, they are inspired.
You, O Vāyu and Savitṛ, protect the worlds —
may you free us from distress.
भूमिका
यह मंत्र वायु और सविता से रक्षा और शुद्धि की प्रार्थना है।
ऋषि निवेदन करते हैं —
हे वायु और सविता!
दुष्कर्मों को दूर करें,
राक्षसी प्रवृत्तियों और नकारात्मक शक्तियों को हटाएँ,
और हमें ऊर्जा तथा बल से परिपूर्ण करें।
---
शब्दार्थ
- अपेतः = दूर करें
- वायो = हे वायु
- सविता = हे सविता
- च = और
- दुष्कृतम् = पापकर्म, बुरा कर्म
- अप = दूर
- रक्षांसि = राक्षसी शक्तियाँ
- शिमिदाम् = हानिकारक, विनाशकारी तत्व
- सेधतम् = हटाएँ, नष्ट करें
- सं = साथ में
- हि = निश्चय ही
- ऊर्जया = ऊर्जा से
- सृजथः = उत्पन्न करें, प्रदान करें
- सं = साथ में
- बलेन = बल से
- तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे दोनों हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
हे वायु और सविता!
दुष्कर्म और नकारात्मक शक्तियों को दूर करें,
हमें ऊर्जा और बल से परिपूर्ण करें,
और हमें संकट से मुक्त रखें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ दुष्कृतम् = अशुद्ध विचार और कर्म
✔ रक्षांसि = भय, क्रोध, लोभ जैसी वृत्तियाँ
✔ शिमिदाम् = आंतरिक विनाशकारी प्रवृत्तियाँ
✔ ऊर्जया = प्राणशक्ति
✔ बलेन = आत्मबल
यह मंत्र शुद्धि और सशक्तिकरण दोनों की प्रार्थना है।
पहले नकारात्मकता दूर हो,
फिर सकारात्मक ऊर्जा और शक्ति का संचार हो।
---
योगिक दृष्टि
✔ वायु = प्राणायाम द्वारा शुद्धि
✔ सविता = सूर्य ध्यान द्वारा प्रकाश
✔ दुष्कृत नाश = चित्त शुद्धि
✔ ऊर्ज और बल = ओजस और तेजस की वृद्धि
---
दार्शनिक दृष्टि
✔ शुद्धि के बिना शक्ति अधूरी है
✔ प्रकाश और प्राण मिलकर जीवन को संतुलित करते हैं
✔ आंतरिक शत्रु ही बाहरी संकट का कारण बनते हैं
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
शुद्ध वायु और सूर्य ऊर्जा स्वास्थ्य और शक्ति का आधार हैं।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
जब प्राण और प्रकाश मिलते हैं,
तब अंधकार मिटता है और आत्मबल जागता है।
- **संदेश:**
शुद्धि + ऊर्जा + बल = सुरक्षा और उन्नति।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ वायु = जीवन ऊर्जा
✔ सविता = चेतना का प्रकाश
✔ दुष्कृत नाश = आंतरिक शुद्धि
✔ ऊर्ज और बल = जीवन सशक्तिकरण
✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति
---
English Insight
Drive away evil deeds, O Vāyu and Savitṛ;
remove harmful forces.
Fill us with energy and strength,
and free us from distress.
भूमिका
यह मंत्र वायु और सविता से समृद्धि, पोषण, दक्षता और स्वास्थ्य की प्रार्थना करता है।
ऋषि कहते हैं —
हे सविता और वायु!
मुझे धन, पोषण, स्वस्थ शरीर और कुशल कर्मशक्ति प्रदान करें।
रोगरहित दीर्घ जीवन दें,
और हमें संकट से मुक्त रखें।
---
शब्दार्थ
- रयिम् = धन, समृद्धि
- मे = मुझे
- पोषम् = पोषण, वृद्धि
- सविता उत = हे सविता और
- वायुः = हे वायु
- तनू = शरीर
- दक्षम् = दक्षता, कर्मयोग्यता
- आ सुवताम् = प्रदान करें
- सुशेवम् = कल्याणकारी, सुखद
- अयक्ष्मतातिम् = रोगरहित अवस्था
- महः = महान, व्यापक
- इह = यहाँ इस जीवन में
- धत्तम् = स्थापित करें
- तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे दोनों हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
हे सविता और वायु!
मुझे धन, पोषण, स्वस्थ शरीर और कर्मदक्षता दें।
मुझे रोगरहित और कल्याणकारी जीवन प्रदान करें,
और हमें संकट से मुक्त रखें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ रयि = केवल धन नहीं, बल्कि आंतरिक समृद्धि
✔ पोष = आत्मविकास
✔ तनू दक्ष = शरीर और कर्म की शक्ति
✔ अयक्ष्मता = रोगरहित चित्त और शरीर
✔ सुशेवम् = शांत और संतुलित जीवन
यह मंत्र बताता है कि
समृद्धि, स्वास्थ्य और दक्षता —
तीनों जीवन की पूर्णता के स्तंभ हैं।
---
योगिक दृष्टि
✔ वायु = प्राणबल
✔ सविता = जीवनप्रेरक सूर्य ऊर्जा
✔ अयक्ष्मता = दोष संतुलन (आयुर्वेदिक दृष्टि)
✔ तनू दक्ष = प्राणायाम + सूर्य साधना
जब प्राण और सूर्य ऊर्जा संतुलित होती है,
तब शरीर और मन दोनों पुष्ट होते हैं।
---
दार्शनिक दृष्टि
✔ धन और स्वास्थ्य दोनों आवश्यक
✔ कर्मदक्षता जीवन की सार्थकता है
✔ वास्तविक समृद्धि आंतरिक संतुलन है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
सूर्य और वायु जीवन के लिए अनिवार्य हैं।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
प्राण और चेतना का संतुलन ही स्वास्थ्य और समृद्धि का मूल है।
- **संदेश:**
प्राण + प्रकाश + संतुलन = समृद्ध और रोगरहित जीवन।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ रयि = भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि
✔ पोषण = विकास
✔ तनू दक्ष = कर्मयोग्यता
✔ अयक्ष्मता = स्वास्थ्य
✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति
---
English Insight
Grant me wealth and nourishment, O Savitṛ and Vāyu;
bestow skill and well-being upon my body.
Establish great freedom from disease here,
and free us from distress.
भूमिका
यह मंत्र सविता और वायु से उत्तम बुद्धि, अनुग्रह और शक्ति की प्रार्थना करता है।
ऋषि निवेदन करते हैं —
हे सविता और वायु!
हमारी ओर अपनी शुभ बुद्धि और संरक्षण की शक्ति प्रवाहित करें।
हमारे भीतर उत्साह और महान प्रेरणा जगाएँ।
और हमें संकट से मुक्त रखें।
---
शब्दार्थ
- प्र = आगे, प्रकट रूप से
- सुमतिम् = शुभ बुद्धि, उत्तम विचार
- सवितः = हे सविता
- वायो = हे वायु
- ऊतये = सहायता, संरक्षण हेतु
- महस्वन्तम् = महान, शक्तिशाली
- मत्सरम् = उत्साह, प्रेरक ऊर्जा
- मादयाथः = आनन्दित करें, प्रफुल्लित करें
- अर्वाक् = हमारी ओर
- वाम् = आप दोनों का
- अस्य = इस (जीवन) का
- प्रवतः = प्रवाह, गति
- नि यच्छतम् = प्रदान करें, स्थापित करें
- तौ नः मुञ्चतम् अंहसः = वे दोनों हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
हे सविता और वायु!
हमें शुभ बुद्धि और सहायता दें।
हमारे भीतर उत्साह और महान शक्ति उत्पन्न करें।
अपना अनुग्रह हमारी ओर प्रवाहित करें,
और हमें संकट से मुक्त रखें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ सुमति = शुद्ध विवेक
✔ ऊति = दिव्य संरक्षण
✔ मत्सर = सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह
✔ प्रवाह = जीवन की गति
यह मंत्र सिखाता है कि
जीवन में सफलता केवल शक्ति से नहीं,
बल्कि शुभ बुद्धि और दिव्य प्रेरणा से प्राप्त होती है।
---
योगिक दृष्टि
✔ सविता = सहस्रार का प्रकाश
✔ वायु = प्राणशक्ति का प्रवाह
✔ सुमति = आज्ञा चक्र की स्पष्टता
✔ मत्सर = प्राण ऊर्जा का उर्ध्वगमन
जब प्राण और चेतना संतुलित होते हैं,
तब बुद्धि निर्मल और कर्म शक्तिशाली होते हैं।
---
दार्शनिक दृष्टि
✔ विवेक + ऊर्जा = सफल जीवन
✔ संरक्षण + प्रेरणा = स्थायी उन्नति
✔ दिव्य प्रवाह में चलना ही मुक्ति है
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
सकारात्मक सोच और ऊर्जा उत्पादकता बढ़ाते हैं।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
शुभ बुद्धि और प्राण शक्ति का संतुलन ही दिव्य जीवन है।
- **संदेश:**
विवेक + उत्साह + संरक्षण = उन्नति और मुक्ति।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ सुमति = सही दिशा
✔ ऊति = सुरक्षा
✔ मत्सर = प्रेरणा
✔ प्रवाह = जीवन गति
✔ मुञ्चतमंहसः = संकट से मुक्ति
---
English Insight
Bestow upon us noble thought, O Savitṛ and Vāyu,
granting help and mighty inspiration.
Let your gracious flow come toward us,
and free us from distress.
भूमिका
यह मंत्र अथर्ववेद 4.25 सूक्त का समापन मंत्र है।
ऋषि यहाँ सविता और वायु की स्तुति करते हुए कहते हैं —
उनकी श्रेष्ठ आशीषें देवधाम में स्थित हैं।
मैं उन देवों — सविता और वायु — की स्तुति करता हूँ।
वे हमें संकट से मुक्त करें।
---
शब्दार्थ
- उप = समीप, निकट
- श्रेष्ठाः = उत्तम, सर्वोत्तम
- आशिषः = आशीर्वाद
- देवयोः = दोनों देवों (सविता और वायु) के
- धामन् = धाम, दिव्य लोक, तेजस्वी स्थिति
- अस्थिरन् = स्थापित हैं
- स्तौमि = मैं स्तुति करता हूँ
- देवं = देव को
- सवितारम् = सविता देव
- च = और
- वायुम् = वायु देव
- तौ नः मुञ्चन्तु अंहसः = वे दोनों हमें संकट से मुक्त करें
---
सरल अर्थ
दोनों देवों की श्रेष्ठ आशीषें उनके दिव्य धाम में स्थित हैं।
मैं सविता और वायु की स्तुति करता हूँ।
वे हमें संकट से मुक्त करें।
---
आध्यात्मिक अर्थ
✔ आशिष = दिव्य कृपा
✔ धाम = चेतना की उच्च अवस्था
✔ स्तुति = आंतरिक समर्पण
✔ मुक्ति = अज्ञान और भय से स्वतंत्रता
यह मंत्र बताता है कि
दिव्य अनुग्रह सदैव उपलब्ध है,
परंतु उसे प्राप्त करने के लिए
श्रद्धा और स्तुति आवश्यक है।
---
योगिक दृष्टि
✔ सविता = प्रकाश, ज्ञान
✔ वायु = प्राण, जीवन
✔ धाम = सहस्रार चेतना
✔ आशिष = आध्यात्मिक ऊर्जा
जब साधक प्राण और प्रकाश को साध लेता है,
तब वह दिव्य धाम में स्थित हो जाता है।
---
दार्शनिक दृष्टि
✔ देव = प्रकृति की दिव्य शक्तियाँ
✔ स्तुति = कृतज्ञता
✔ धाम = परम सत्य की स्थिति
जीवन में कृतज्ञता और श्रद्धा ही
दिव्य संरक्षण का द्वार खोलती है।
---
Gaya Vigyan Brahmgyan दृष्टि
- **विज्ञान कहता है:**
सूर्य और वायु जीवन के मूल आधार हैं।
- **ब्रह्मज्ञान कहता है:**
प्राण और प्रकाश की साधना से ही चेतना ऊर्ध्वगामी होती है।
- **संदेश:**
कृतज्ञता + साधना + संतुलन = मुक्ति।
---
समग्र निष्कर्ष
✔ सविता = ज्ञान का प्रकाश
✔ वायु = जीवन की शक्ति
✔ आशिष = दिव्य अनुग्रह
✔ धाम = उच्च चेतना
✔ मुञ्चन्त्वंहसः = संकट से मुक्ति
---
English Insight
Near us abide the supreme blessings
in the divine realm of the two gods.
I praise Savitṛ and Vāyu—
may they free us from distress.
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
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