दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन
अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं।
क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !
एहि = आओ, बचाओ, संरक्षित करो
जीवं = जीवन, प्राण
त्रायमाणं = सुरक्षा में रखा, संरक्षित
पर्वतस्य = पर्वत का
अस्य = उसका
अक्षमम् = अक्षम्य, अडिग, स्थिर
विश्वेभिः = सम्पूर्ण, सभी
देवैः = देवताओं द्वारा
दत्तम् = दिया गया
परिधिः = सीमा, सुरक्षा, क्षेत्र
जीवनाय = जीवन की रक्षा हेतु
कम् = कर्म, उपाय, प्रार्थना
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सरल हिन्दी अर्थ
हे देवताओं,
इस जीवन को बचाओ और सुरक्षित करो,
जो पर्वत की तरह अडिग और स्थिर है।
यह जीवन सभी देवताओं द्वारा दी गई दिव्य सुरक्षा और क्षेत्र में सुरक्षित है।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मंत्र जीवन की रक्षा और उसके स्थायित्व पर केंद्रित है।
“एहि जीवं त्रायमाणं पर्वतस्यास्यक्ष्यम्” में जीवन को पर्वत के समान अडिग और अविनाशी बताया गया है।
जैसे पर्वत स्थिर और सभी तूफानों और संकटों के बावजूद खड़ा रहता है,
वैसे ही जीवन भी दिव्य संरक्षण और सुरक्षा में स्थिर हो।
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“विश्वेभिर्देवैर्दत्तं परिधिर्जीवनाय कम्” —
यह जीवन देवताओं द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा और सीमा के अंतर्गत आता है।
परिधि का अर्थ केवल भौतिक सीमा नहीं है, बल्कि दिव्य सुरक्षा, संरक्षण और शक्ति का क्षेत्र भी है।
इस मंत्र के माध्यम से यह कहा गया है कि जीवन को केवल शरीर या सांस तक सीमित नहीं समझना चाहिए।
यह समग्र जीवन शक्ति, चेतना और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।
देवता इसकी सुरक्षा और स्थायित्व सुनिश्चित करते हैं।
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आध्यात्मिक अर्थ
मंत्र यह सिखाता है कि—
✔ जीवन की रक्षा केवल भौतिक उपायों से नहीं, बल्कि दिव्य और आध्यात्मिक सुरक्षा से भी होती है।
✔ जीवन की स्थिरता, पर्वत के समान अडिग होनी चाहिए।
✔ जीवन और चेतना की रक्षा सभी देवताओं द्वारा समर्थित है।
यह दृष्टिकोण जीवन को केवल अस्तित्व के रूप में नहीं,
बल्कि उसकी दिव्यता और स्थायित्व के रूप में देखने के लिए प्रेरित करता है।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
योग और ध्यान में जीवनशक्ति (प्राण) का संतुलित प्रवाह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह मंत्र उसी सिद्धांत को उजागर करता है—
✔ प्राण और चेतना को स्थिर और सुरक्षित रखना
✔ मानसिक ऊर्जा को नियंत्रित और संतुलित करना
✔ बाहरी और आंतरिक संकटों के बावजूद स्थिरता बनाए रखना
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ जीवन की सुरक्षा केवल शारीरिक नहीं, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी होनी चाहिए।
✔ जीवन को स्थिर और अडिग बनाने के लिए अनुशासन, विवेक और संतुलन आवश्यक हैं।
✔ सुरक्षित और संरक्षित जीवन मानसिक स्थिरता और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ जीवन की सुरक्षा और स्थायित्व प्राथमिकता है।
✔ प्राकृतिक और सामाजिक खतरों से जीवन को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
✔ मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन जीवन को मजबूत बनाता है।
मंत्र हमें यह भी याद दिलाता है कि जीवन केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि शक्ति, ऊर्जा और चेतना का अद्भुत रूप है।
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सारांश
1. जीवन की सुरक्षा और स्थायित्व, पर्वत के समान अडिग।
2. देवताओं द्वारा जीवन की दिव्य परिधि और संरक्षण।
3. जीवन की रक्षा केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी आवश्यक।
4. स्थिरता, सुरक्षा और संतुलित ऊर्जा जीवन का आधार हैं।
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English Insight
O protectors,
come to safeguard this life, steadfast like a mountain.
This life, granted by all the gods, lies within the divine boundary of protection.
The verse emphasizes that true life is not just physical existence,
but a sacred, stabilized energy that requires divine safeguarding
and steady balance in all circumstances.
शब्दार्थ
परिपाणं = संरक्षण करने वाला, रक्षा करने वाला
पुरुषाणां = मनुष्यों का
गवामसि = गायों और पशुओं का
अश्वानाम = घोड़ों का
अर्वतां = रथों और गतिशील शक्तियों का
परिपाणाय = रक्षा और संरक्षण के लिए
तस्थिषे = खड़ा होना, उपस्थित होना, स्थिर रहना
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सरल हिन्दी अर्थ
हे देवता,
तुम मनुष्यों और उनके जीवन की रक्षा के लिए खड़े हो,
जैसे तुम गायों और अश्वों (घोड़ों) के रक्षण में अडिग रहते हो।
तुम जीवन और शक्ति के हर रूप का संरक्षक हो।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
यह मंत्र जीवन और प्राणी जगत के संरक्षण पर केंद्रित है।
“परिपाणं पुरुषाणां” में मानव जाति के लिए सुरक्षा और सुरक्षा की आवश्यकता बताई गई है।
देवताओं की भूमिका केवल प्रकृति और आकाश तक सीमित नहीं है,
वे मनुष्य, पशु और सभी जीवों के कल्याण और संरक्षक भी हैं।
“परिपाणं गवामसि अश्वानामर्वतां परिपाणाय तस्थिषे” —
यह दर्शाता है कि देवता केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं,
बल्कि उनके साथ जुड़ी सभी शक्तियों और संसाधनों—
गाय, घोड़े, रथ और गतिशील ऊर्जा—का भी संरक्षण करते हैं।
यह जीवन और शक्ति के प्रत्येक रूप के लिए दिव्य सुरक्षा का प्रतीक है।
मंत्र यह भी सिखाता है कि जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं,
बल्कि पशु, कृषि और गतिशील शक्तियों जैसे संसाधनों के संरक्षण से भी जुड़ा है।
जैसे घोड़े और गाय समाज और जीवन में स्थायित्व और ऊर्जा का स्रोत हैं,
वैसे ही देवता उनकी सुरक्षा में स्थिर और अडिग रहते हैं।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन और शक्ति के सभी रूपों का सम्मान करना।
✔ स्थायित्व और सुरक्षा का आश्रय लेना।
✔ जीव-जगत और प्रकृति के हर रूप में दिव्य सहयोग और संरक्षण।
यह मंत्र यह सिखाता है कि वास्तविक शक्ति केवल अपने लिए नहीं,
बल्कि सभी प्राणियों और संसाधनों के कल्याण में होनी चाहिए।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ अपने जीवन और शक्ति के स्रोतों की रक्षा और संतुलन बनाए रखना।
✔ मानसिक और शारीरिक ऊर्जा का स्थिर प्रवाह सुनिश्चित करना।
✔ बाहरी और आंतरिक संकटों के बावजूद स्थिर रहना।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ जीवन की स्थिरता और सुरक्षा केवल स्वयं के लिए नहीं,
बल्कि समाज, परिवार और प्राकृतिक संसाधनों के लिए भी जरूरी है।
✔ स्थिर और संरक्षित जीवन मानसिक और सामाजिक संतुलन प्रदान करता है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ प्राकृतिक संसाधनों और पशुधन की रक्षा करना आवश्यक है।
✔ स्थिर ऊर्जा और शक्ति का प्रयोग कल्याण और सुरक्षा के लिए होना चाहिए।
✔ नेतृत्व और समाज में सुरक्षा और स्थिरता का कार्य मुख्य कर्तव्य है।
यह मंत्र हमें सिखाता है कि जीवन और शक्ति के हर रूप का संरक्षण करना
सिर्फ धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि सामाजिक और प्राकृतिक संतुलन का आधार है।
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सारांश
1. देवता मनुष्यों, पशुओं और शक्ति के स्रोतों के संरक्षक हैं।
2. जीवन की रक्षा और स्थिरता के लिए दिव्य सुरक्षा आवश्यक है।
3. सभी जीवों और संसाधनों के कल्याण में शक्ति और स्थिरता का प्रयोग करें।
4. स्थायित्व और सुरक्षा मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक जीवन का आधार हैं।
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English Insight
O Protector,
stand to safeguard humans, their lives, and their resources.
Just as you protect the cows, horses, and the forces of motion,
you uphold life in all its forms.
The verse emphasizes the sacred responsibility to protect not just human life,
but all beings, resources, and energies that sustain existence,
ensuring balance, stability, and prosperity for the universe.
शब्दार्थ
उतासि = ऊपर उठने वाला, समुच्चित
परिपाणं = संरक्षण करने वाला, शक्ति और सुरक्षा प्रदान करने वाला
यातुजम्भनमाञ्जन = व्याघ्रजम्भन, शक्ति और साहस का संहारक, संकट निवारक
उतामृतस्य = अमृत, जीवनदायिनी शक्ति
त्वं = तुम
वेत्थाथो = जानने वाला, विज्ञानी
असि = हो
जीवभोजनम् = जीवन के लिए भोजन, पोषण
अथो = और, अथवा
हरितभेषजम् = हरे औषधियों का दाता, जीवनवर्धक
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सरल हिन्दी अर्थ
हे देवता,
तुम ऊपर उठकर जीवन का संरक्षण करते हो,
व्याघ्र जैसी संकटकारी शक्तियों को नियंत्रित करते हो।
तुम अमृतधारा के ज्ञानी हो और जीवन का पोषण देने वाले हो,
साथ ही हरित औषधियों और भोजन के द्वारा जीवन को पुष्ट बनाते हो।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.3 जीवन के संरक्षण और पोषण पर केंद्रित है।
“उतासि परिपाणं यातुजम्भनमाञ्जन” में देवता को संकट निवारक और संरक्षक बताया गया है।
व्याघ्रजम्भन शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि देवता जीवन में आने वाले बड़े और कठिन संकटों को नियंत्रित करने वाले हैं।
वे न केवल जीवन को स्थिर बनाते हैं, बल्कि उसे ऊँचाइयों तक ले जाते हैं।
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“उतामृतस्य त्वं वेत्थाथो असि जीवभोजनमथो हरितभेषजम्” —
यहाँ जीवन का पोषण और उन्नति अमृत और हरित औषधियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
देवता जीवन और प्राणशक्ति का ज्ञानी हैं।
वे जीवन को सुरक्षित करने के साथ-साथ उसे पुष्ट और सक्रिय भी बनाते हैं।
हरितभेषज का अर्थ केवल औषधि नहीं, बल्कि जीवनवर्धक शक्ति और ऊर्जा का स्रोत भी है।
यह मंत्र यह सिखाता है कि जीवन केवल रक्षा और स्थिरता तक सीमित नहीं है,
बल्कि उसका विकास और पोषण भी आवश्यक है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन की सुरक्षा और पोषण दोनों ही दिव्य कर्तव्य हैं।
✔ संकटों और भय से जीवन को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
✔ जीवन के प्रति जागरूकता और ज्ञान से इसे स्थिर और पुष्ट बनाया जा सकता है।
मंत्र यह भी संकेत करता है कि जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं,
बल्कि ऊर्जा, चेतना और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का भी प्रतिनिधित्व करता है।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ जीवन और प्राणशक्ति को संतुलित और ऊर्जावान रखना।
✔ मानसिक और शारीरिक ऊर्जा के प्रवाह को स्थिर और नियंत्रित करना।
✔ संकटों और तनावों के बावजूद जीवन की सक्रियता बनाए रखना।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ जीवन का पोषण केवल भोजन और भौतिक साधनों तक सीमित नहीं,
बल्कि मानसिक स्थिरता, स्वास्थ्य और ऊर्जा का संरक्षण भी जरूरी है।
✔ हरितभेषज और जीवनवर्धक उपाय जीवन को पुष्ट और सुरक्षित बनाते हैं।
✔ जीवन में संकट और भय के बावजूद स्थिरता और पोषण का महत्व।
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आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ जीवन के सभी पहलुओं—शारीरिक, मानसिक, ऊर्जा और स्वास्थ्य का संरक्षण आवश्यक है।
✔ संकट और कठिनाइयों में जीवन की सुरक्षा और पोषण के उपाय अपनाना।
✔ जीवन और ऊर्जा के संतुलन से स्थिरता और सफलता सुनिश्चित होती है।
मंत्र हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल अस्तित्व नहीं,
बल्कि उसकी रक्षा और उन्नति दोनों ही आवश्यक हैं।
देवता जीवन के संरक्षक, संकट निवारक और पोषणकर्ता के रूप में प्रस्तुत हैं।
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सारांश
1. देवता जीवन के संरक्षक और संकट निवारक हैं।
2. जीवन केवल रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि पोषण और उन्नति भी आवश्यक है।
3. हरितभेषज और ऊर्जा जीवन को पुष्ट और स्थिर बनाते हैं।
4. जीवन का संरक्षण, पोषण और स्थायित्व मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक स्तर पर जरूरी हैं।
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English Insight
O Protector,
you rise above to safeguard life and restrain dangerous forces like the tiger.
You are the knower of immortality and the provider of nourishment,
sustaining life through food, vital energy, and herbal remedies.
The verse emphasizes that life requires not only protection from danger,
but also nourishment, growth, and active support for continued vitality.
It portrays divine guardianship as both preventive and sustaining.
शब्दार्थ
यस्य = जिसका, जिस पर
अञ्जन = रोग, संक्रमण, विशेषकर आँख और त्वचा से सम्बन्धित
प्रसर्पस्य = फैलने वाला, संचरण करने वाला
अङ्गमङ्गं = शरीर के अंग और उसके हिस्से
परुष्परुः = कठिन, तीव्र, प्रबल
ततः = वहाँ से, इसके द्वारा
यक्ष्मं = यक्ष्मा, रोग या दुर्बलता
वि = विरुद्ध
बाधस = बाधा डालने वाला, नष्ट करने वाला
उग्रो = प्रबल, तीव्र
मध्यमशीरिव = मध्य और शरीर के हिस्सों को प्रभावित करने वाला
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सरल हिन्दी अर्थ
जिस अंग और शरीर पर यह तीव्र रोग फैलता है,
उससे उत्पन्न यक्ष्मा और दुर्बलता को नष्ट करो।
हे देवता, इसे प्रबल और मध्य अंगों तक न पहुँचने दो।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.4 जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए है।
“यस्याञ्जन प्रसर्पस्य अङ्गमङ्गं परुष्परुः” में रोग और संक्रमण के फैलाव का वर्णन है।
अञ्जन का अर्थ केवल शारीरिक रोग नहीं, बल्कि जीवन शक्ति पर हमला करने वाला संक्रमण भी है।
देवताओं से प्रार्थना की जा रही है कि इस संक्रमण से शरीर और प्राणों को सुरक्षित रखा जाए।
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“ततो यक्ष्मं वि बाधस उग्रो मध्यमशीरिव” —
यह बताता है कि यदि यह रोग फैलता है तो यक्ष्मा (दुर्बलता या बीमारी) उत्पन्न होगी।
देवताओं से निवेदन किया गया है कि रोग को नष्ट करें और इसे शरीर के मध्य अंगों तक न पहुँचने दें।
मंत्र शरीर, प्राण शक्ति और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए दिव्य उपाय और आशीर्वाद का आग्रह करता है।
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आध्यात्मिक और चिकित्सीय दृष्टि
✔ रोगों और दुर्बलता के प्रति सचेत रहना।
✔ जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा में देवताओं और प्राकृतिक शक्तियों की सहायता लेना।
✔ मध्य और प्रमुख अंगों (जैसे हृदय, फेफड़े) को रोग से सुरक्षित रखना।
इस मंत्र से यह भी शिक्षा मिलती है कि जीवन केवल अस्तित्व का नाम नहीं,
बल्कि उसका स्वास्थ्य, शक्ति और स्थायित्व भी महत्वपूर्ण हैं।
देवता इस स्थायित्व और स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करते हैं।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ शरीर और मानसिक शक्ति का संतुलन बनाए रखना।
✔ बीमारी और नकारात्मक ऊर्जा से स्वयं की रक्षा करना।
✔ स्थिर प्राण ऊर्जा और स्वास्थ्य की रक्षा जीवन की सफलता के लिए अनिवार्य है।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ रोग और दुर्बलता से भय न रखें,
बल्कि सक्रिय और स्थिर उपाय अपनाएँ।
✔ मानसिक स्थिरता और जीवन की सुरक्षा रोगों के प्रभाव को कम करती है।
✔ स्वास्थ्य का संरक्षण मानसिक संतुलन और जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के समय में—
✔ जीवन और स्वास्थ्य का संरक्षण प्राथमिकता है।
✔ रोगों और संक्रमण से बचाव, स्वास्थ्यकर आहार और जीवनशैली के माध्यम से किया जा सकता है।
✔ मध्य अंगों और शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों की सुरक्षा विशेष रूप से आवश्यक है।
✔ इस मंत्र की शिक्षा है कि स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा केवल भौतिक उपायों तक सीमित नहीं,
बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और दिव्य उपाय भी इसमें सहायक हैं।
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सारांश
1. यह मंत्र रोग और यक्ष्मा से सुरक्षा का आह्वान करता है।
2. शरीर और प्राण शक्ति के मध्य और महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा आवश्यक है।
3. जीवन की सुरक्षा केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं, स्वास्थ्य, शक्ति और संतुलन के लिए भी जरूरी है।
4. देवता जीवन और स्वास्थ्य के संरक्षक हैं, रोगों को दूर करने में सहायक हैं।
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English Insight
O Protector,
prevent the disease (Yakshma) from spreading to the limbs and vital parts of the body.
Do not allow its destructive power to affect the central organs or weaken life.
The verse emphasizes that divine intervention, protection, and vigilance are necessary
to safeguard health, vitality, and the overall stability of life.
It teaches that protecting life includes shielding the body, mind, and vital energies
from illness and weakening forces.
शब्दार्थ
नैनं = इसे नहीं
प्राप्नोति = प्राप्त करता, प्रभावित करता
शपथो = शाप या दोष
न कृत्या = कृत्य या कर्म द्वारा
नाभिशोचनम् = रोष या आघात
नैनं विष्कन्धम् = शरीर के कमजोर हिस्सों तक
अश्नुते = पहुँचता, प्रभावित करता
यस्त्वा = जो तुम्हारे द्वारा
बिभर्त्याञ्जन = अञ्जन और सुरक्षा को धारण करता
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सरल हिन्दी अर्थ
हे देवता,
जो व्यक्ति तुम्हारे अञ्जन और सुरक्षा के अधिकार में है,
उसे शाप, दोष, आघात और दुर्बलता कभी नहीं पहुँचते।
जो तुम्हारे संरक्षण में है, वह रोगों और दुर्बलता से सुरक्षित रहता है।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.5 जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा पर केंद्रित है।
यह कहता है कि जो व्यक्ति देवता द्वारा अञ्जन (सुरक्षा और शक्ति) प्राप्त करता है,
उसे न तो शाप, न तो किसी दोष या आघात का असर होता है।
न ही शरीर के कमजोर हिस्से (विष्कन्ध) प्रभावित होते हैं।
यह मंत्र जीवन की दिव्य सुरक्षा का महत्व उजागर करता है।
“नैनं प्राप्नोति शपथो न कृत्या नाभिशोचनम्” —
अर्थात् जो इस सुरक्षा के अधिकार में है, उसे न तो किसी शाप से डरना है,
न ही किसी कर्म या कर्मों के परिणाम से भय है।
यह सुरक्षा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी है।
---
“नैनं विष्कन्धमश्नुते यस्त्वा बिभर्त्याञ्जन” —
जो इस दिव्य सुरक्षा को धारण करता है,
वह रोग और दुर्बलता के प्रकोप से अछूता रहता है।
अञ्जन का अर्थ केवल भौतिक सुरक्षा नहीं, बल्कि प्राण, चेतना और स्वास्थ्य की रक्षा भी है।
इस मंत्र के अनुसार, देवता की दी हुई सुरक्षा जीवन को स्थिर और पुष्ट बनाती है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन और चेतना की दिव्य सुरक्षा में विश्वास।
✔ शाप, रोग और दुर्बलता से मुक्त रहने का आश्वासन।
✔ जीवन की स्थिरता और शक्ति का दिव्य समर्थन।
यह मंत्र सिखाता है कि जीवन की सुरक्षा केवल भौतिक उपायों से नहीं होती।
देवता की कृपा और संरक्षण से जीवन का स्वास्थ्य और स्थायित्व सुनिश्चित होता है।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ मानसिक स्थिरता और सुरक्षा का अनुभव।
✔ रोग, आघात और नकारात्मक शक्तियों से जीवन को सुरक्षित रखना।
✔ प्राण शक्ति और चेतना का संतुलित प्रवाह बनाए रखना।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ जीवन की सुरक्षा से मानसिक स्थिरता और साहस मिलता है।
✔ भय और चिंता कम होते हैं, जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
✔ स्वास्थ्य और सुरक्षा का विश्वास जीवन को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाता है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ स्वास्थ्य, मानसिक और शारीरिक सुरक्षा सर्वोपरि है।
✔ सुरक्षा के उपाय अपनाकर ही व्यक्ति जीवन में स्थिर और पुष्ट रहता है।
✔ यह मंत्र यह सिखाता है कि जीवन की रक्षा केवल बाहरी उपायों तक सीमित नहीं,
बल्कि आंतरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा भी आवश्यक है।
देवता की कृपा और अञ्जन जीवन को सभी प्रकार के संकट और रोगों से बचाते हैं।
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सारांश
1. यह मंत्र जीवन, स्वास्थ्य और चेतना की सुरक्षा का आह्वान है।
2. शाप, दोष, आघात और रोग से सुरक्षा का आश्वासन देता है।
3. अञ्जन और दिव्य सुरक्षा जीवन को स्थिर और पुष्ट बनाती है।
4. जीवन की सुरक्षा केवल शारीरिक नहीं, मानसिक और आध्यात्मिक भी होनी चाहिए।
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English Insight
O Protector,
whoever carries your divine anjan (protection) is shielded from curses, harm, and weakness.
No malice, disease, or destructive influence can touch them.
This verse emphasizes that divine protection ensures stability, health, and vitality.
Life is not merely physical existence; it is safeguarded mentally, spiritually, and energetically
through divine grace and vigilant protection.
शब्दार्थ
असन्मन्त्राद् = बुरे मंत्रों, नकारात्मक ऊर्जा से
दुष्वप्न्यात् = बुरे सपनों से
दुष्कृताच् = बुरे कर्मों और दोषों से
श्मलादुत् = दुर्भावनापूर्ण दृष्टि या नकारात्मक प्रभाव से
दुर्हार्द = कठोर, प्रबल बुराई
श्चक्षुषः = दृष्टि, निगाह
घोरात् = भयकारी, संकटकारी
तस्मात् = इसलिए
नः = हमारे लिए
पाह्याञ्जन = अञ्जन द्वारा रक्षा करना, सुरक्षित करना
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सरल हिन्दी अर्थ
हे देवता,
हमें बुरे मंत्रों, बुरे सपनों, नकारात्मक कर्मों और दुर्भावनापूर्ण दृष्टियों से बचाओ।
तुम्हारे अञ्जन और सुरक्षा से हमें भय और संकट से मुक्त रखो।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.6 आध्यात्मिक और मानसिक सुरक्षा पर केंद्रित है।
यह हमें बुराई, नकारात्मकता और भय से बचाने का आह्वान करता है।
“असन्मन्त्राद्दुष्वप्न्यात्” यह संकेत देता है कि बुरे मंत्र, नकारात्मक विचार या दुर्भावनापूर्ण प्रभाव व्यक्ति के जीवन और मानसिक स्थिति पर हानिकारक प्रभाव डाल सकते हैं।
“दुष्कृताच्छमलादुत” में बुरे कर्म और नकारात्मक क्रियाओं से उत्पन्न परिणामों से बचाव की बात कही गई है।
यह मंत्र जीवन में नकारात्मकता और मनोवैज्ञानिक तनाव से रक्षा करता है।
“दुर्हार्दश्चक्षुषः घोरात्” — यह भय, संकट और मानसिक आघात को इंगित करता है।
देवताओं से प्रार्थना की जा रही है कि इन सभी नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करें और जीवन को सुरक्षित बनाएं।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ नकारात्मक ऊर्जा, बुरे सपनों और दुर्भावनाओं से जीवन को सुरक्षित रखना।
✔ मानसिक शांति और चेतना की स्थिरता सुनिश्चित करना।
✔ देवताओं और दिव्य उपायों के माध्यम से जीवन में सुरक्षा प्राप्त करना।
यह मंत्र हमें यह भी सिखाता है कि केवल भौतिक सुरक्षा पर्याप्त नहीं है;
मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ मानसिक स्थिरता और सुरक्षा का अनुभव करना।
✔ भय, तनाव और नकारात्मक विचारों से स्वयं को बचाना।
✔ चेतना और ऊर्जा का संतुलित प्रवाह बनाए रखना।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ बुरे सपनों और नकारात्मक प्रभाव से मनोवैज्ञानिक सुरक्षा।
✔ मानसिक स्वास्थ्य और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना।
✔ सुरक्षा और अञ्जन का विश्वास जीवन में आत्मनिर्भरता और साहस प्रदान करता है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के समय में—
✔ मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी शारीरिक सुरक्षा।
✔ नकारात्मक विचार, तनाव और भय से स्वयं को बचाना आवश्यक है।
✔ यह मंत्र यह शिक्षा देता है कि मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा जीवन की स्थिरता और संतुलन के लिए अनिवार्य है।
✔ देवता की कृपा और अञ्जन हमें जीवन के हर संकट से सुरक्षित रखते हैं।
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सारांश
1. मंत्र नकारात्मक शक्तियों, बुरे सपनों और दुर्भावनाओं से रक्षा का आह्वान करता है।
2. मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।
3. अञ्जन और दिव्य सुरक्षा जीवन को स्थिर और सुरक्षित बनाती है।
4. जीवन की रक्षा केवल शारीरिक नहीं, मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा के साथ होनी चाहिए।
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English Insight
O Protector,
shield us from evil spells, bad dreams, harmful deeds, and malicious sights.
Keep us safe from fear, danger, and mental affliction through your divine anjan.
This verse emphasizes that true protection involves not only physical safety,
but also safeguarding the mind and spirit from negative influences,
ensuring mental balance, stability, and vitality.
शब्दार्थ
इदं = यह
विद्वान् = ज्ञानी, समझदार
आञ्जन = दिव्य सुरक्षा, शक्ति
सत्यं = सत्य, वास्तविक
वक्ष्यामि = कहता हूँ, उद्घाटित करता हूँ
न अनृतम् = झूठ नहीं, सत्य है
सनेयम् = प्रिय, पोषित
अश्वं = अश्व, शक्ति, प्राणशक्ति
गाम् = गौ, पोषण और संपदा
अहम् = मैं
आत्मानं = स्वयं, अपने शरीर और प्राण को
तव पूरुष = तुम्हारे लिए, हे देवता
---
सरल हिन्दी अर्थ
हे देवता,
मैं यह विद्वतापूर्वक आञ्जन (दिव्य सुरक्षा और शक्ति) प्रस्तुत करता हूँ,
जो सत्य है और इसमें कोई झूठ नहीं।
यह तुम्हारे द्वारा प्रिय और पोषित है।
इस आञ्जन से मैं अपने शरीर, अश्व और गौ को तुम्हारे लिए सुरक्षित करता हूँ।
---
विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.7 जीवन की सुरक्षा, पोषण और सत्य पर आधारित है।
“इदं विद्वान् आञ्जन सत्यं वक्ष्यामि नानृतम्” में कहा गया है कि यह आञ्जन ज्ञानी और बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया गया है,
और यह पूरी तरह सत्य और निष्कलंक है।
यह झूठ या मिथ्या शक्ति नहीं है।
आञ्जन केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और ऊर्जा की रक्षा का प्रतीक है।
“सनेयमश्वं गामहमात्मानं तव पूरुष” —
यह बताता है कि आञ्जन से जीवन में शक्ति, पशु-पालन (अश्व और गा) और संपत्ति सुरक्षित रहती है।
यह मंत्र केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है;
यह जीवन, संपत्ति और प्राण शक्ति को भी देवता की कृपा से स्थिर बनाता है।
अश्व और गौ प्राचीन काल में शक्ति, गति, संसाधन और जीवन का प्रतीक थे।
इसलिए मंत्र जीवन की संपूर्ण सुरक्षा और पोषण का संदेश देता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन और शक्ति का दिव्य संरक्षण।
✔ सत्य और निष्कलंक आञ्जन के माध्यम से जीवन में स्थायित्व।
✔ देवता के माध्यम से जीवन, संपत्ति और प्राण शक्ति की सुरक्षा।
मंत्र यह सिखाता है कि जीवन केवल अस्तित्व का नाम नहीं है।
सत्य, ज्ञान और दिव्य शक्ति के माध्यम से जीवन स्थिर, पुष्ट और सुरक्षित बनता है।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ जीवन और मानसिक शक्ति का संतुलन बनाए रखना।
✔ दिव्य सुरक्षा और पोषण के माध्यम से मानसिक स्थिरता प्राप्त करना।
✔ प्राण ऊर्जा और चेतना का सुरक्षित प्रवाह बनाए रखना।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ जीवन, संपत्ति और शक्ति की सुरक्षा से मानसिक शांति मिलती है।
✔ आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है।
✔ आञ्जन और देवता की कृपा जीवन को नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रखती है।
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आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ यह मंत्र मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सुरक्षा की शिक्षा देता है।
✔ जीवन के सभी महत्वपूर्ण संसाधनों—स्वास्थ्य, शक्ति, संपत्ति और ऊर्जा—का संरक्षण आवश्यक है।
✔ सत्य और ज्ञान के माध्यम से जीवन स्थिर और सुरक्षित होता है।
✔ यह आञ्जन केवल प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन में स्थिरता और सुरक्षा का माध्यम है।
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सारांश
1. मंत्र जीवन, शक्ति और संपत्ति की सुरक्षा का आह्वान करता है।
2. आञ्जन सत्य, निष्कलंक और ज्ञानवर्धक है।
3. देवता और दिव्य शक्ति जीवन को सुरक्षित और स्थिर बनाती है।
4. जीवन की रक्षा केवल भौतिक नहीं, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी होनी चाहिए।
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English Insight
O Protector,
I, the wise, present this divine anjan, which is entirely true and without falsehood.
Through this anjan, I safeguard my life, my horse, and my cattle for your benefit.
This verse emphasizes that divine protection is not only for the physical body,
but also for vital energies, wealth, and sustenance.
Truth, knowledge, and divine power ensure life remains stable, nourished, and secure.
शब्दार्थ
त्रयो = तीन
दासा = सेवक, दूत, संरक्षणकर्ता
आञ्जनस्य = आञ्जन की, दिव्य सुरक्षा की
तक्मा = शक्ति, ऊर्जा
बलास् = बल, क्षमता
आदहिः = प्रबल, तेजस्वी, प्रखर
वर्षिष्ठः = श्रेष्ठ, महान
पर्वतानां = पर्वतों का
त्रिककुन् = त्रिककुन् नामक
ते = तुम्हारा
पिता = पिता, संरक्षक, आरंभकर्ता
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सरल हिन्दी अर्थ
हे देवता,
तुम्हारे आञ्जन (दिव्य सुरक्षा) के तीन सेवक हैं,
जो शक्ति और बल से पूर्ण हैं।
तुम्हारे पिता, त्रिककुन्, पर्वतों में श्रेष्ठ और महान हैं।
ये दूत और सेवक हमारे जीवन में सुरक्षा और संरक्षण लाते हैं।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.8 आञ्जन की शक्ति और उसके संरक्षक दूतों का वर्णन करता है।
“त्रयो दासा आञ्जनस्य” — यहाँ तीन प्रमुख दूत या सेवक बताए गए हैं, जो आञ्जन की शक्ति का संचालन करते हैं।
वे जीवन, शक्ति, और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए कार्यरत हैं।
“तक्मा बलास आदहिः” — यह दर्शाता है कि ये दूत और सेवक अत्यंत शक्ति और प्रबल ऊर्जा से परिपूर्ण हैं।
उनकी शक्ति इतनी प्रबल है कि वे सभी नकारात्मक प्रभाव, रोग और दुर्बलता को नष्ट करने में सक्षम हैं।
“वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन् नाम ते पिता” — यह देवता या संरक्षक त्रिककुन् की महिमा को व्यक्त करता है।
त्रिककुन् पर्वतों में श्रेष्ठ और महान है, और यह शक्ति का प्रतीक है।
इस मंत्र का अर्थ केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है;
यह हमें यह भी याद दिलाता है कि जीवन की सुरक्षा दिव्य संरक्षक और शक्तियों के माध्यम से सुनिश्चित होती है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन में तीन प्रमुख दूतों के माध्यम से दिव्य सुरक्षा का आह्वान।
✔ शक्ति और बल से जीवन की स्थिरता और सुरक्षा।
✔ पर्वतों के श्रेष्ठ संरक्षक, त्रिककुन्, से सुरक्षा और संरक्षण।
यह मंत्र हमें यह शिक्षा देता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र—शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक—में सुरक्षा आवश्यक है।
त्रिककुन् और आञ्जन के दूत जीवन की सुरक्षा का प्रतीक हैं।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ दिव्य ऊर्जा और संरक्षक दूतों का ध्यान करके मानसिक स्थिरता प्राप्त करना।
✔ शक्ति, बल और प्राण ऊर्जा का संतुलित प्रवाह बनाए रखना।
✔ मानसिक सुरक्षा और जीवन की स्थिरता सुनिश्चित करना।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ जीवन में सुरक्षा और संरक्षक शक्तियों के प्रति विश्वास।
✔ भय, नकारात्मकता और संकट से मनोवैज्ञानिक सुरक्षा।
✔ आञ्जन और संरक्षक दूत मानसिक संतुलन और साहस प्रदान करते हैं।
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आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ जीवन की सुरक्षा केवल भौतिक नहीं, मानसिक और आध्यात्मिक भी होनी चाहिए।
✔ तीन प्रमुख संरक्षक—शक्ति, ऊर्जा और स्थिरता—सभी संकटों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
✔ आञ्जन और त्रिककुन् का ध्यान जीवन में स्थायित्व, सुरक्षा और ऊर्जा बनाए रखता है।
✔ यह मंत्र यह शिक्षा देता है कि सुरक्षा केवल व्यक्ति के प्रयास से नहीं,
बल्कि दिव्य शक्ति और संरक्षक शक्तियों के सहयोग से संभव है।
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सारांश
1. मंत्र आञ्जन की शक्ति और उसके तीन प्रमुख सेवकों का आह्वान करता है।
2. त्रिककुन् पर्वतों में श्रेष्ठ और महान संरक्षक के रूप में प्रकट होता है।
3. जीवन, शक्ति और स्वास्थ्य की सुरक्षा दूतों और आञ्जन के माध्यम से सुनिश्चित होती है।
4. जीवन की रक्षा शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर होनी चाहिए।
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English Insight
O Protector,
three servants of your divine anjan act with great strength and power.
Your father, Trikakun, the greatest among the mountains, oversees them.
This verse emphasizes that divine protection operates through powerful agents.
Life, health, and vitality are safeguarded by these three servants and the supreme guardian, Trikakun.
True protection involves physical, mental, and spiritual security, guided by divine forces.
शब्दार्थ
यदा = जब
आञ्जनं = दिव्य सुरक्षा, आञ्जन
त्रैककुदं = त्रिककुड (त्रैतीय) नामक जन्म
जातं = उत्पन्न हुआ
हिमवतस्परि = हिमालय के आसपास, हिमवत की सीमा में
यातूंश्च = दुष्ट प्राणी और नकारात्मक शक्तियाँ
सर्वाञ्जम्भयत् = डरती और बाधित होती हैं, भयभीत होती हैं
सर्वाश्च = सभी
यातुधान्यः = बुरे प्राणी, शत्रु, दुष्ट शक्तियाँ
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सरल हिन्दी अर्थ
जब त्रैककुड नामक आञ्जन हिमालय के आसपास उत्पन्न हुआ,
तब सभी नकारात्मक शक्तियाँ, बुरे प्राणी और शत्रु भयभीत हो गए।
इस आञ्जन के जन्म से जीवन और प्राणी जगत में सुरक्षा और स्थिरता आई।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.9 आञ्जन की उत्पत्ति और उसकी शक्ति का वर्णन करता है।
“यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि” — यह दर्शाता है कि त्रैककुड नामक आञ्जन हिमालय के आसपास उत्पन्न हुआ।
हिमालय यहाँ दिव्य शक्ति, स्थिरता और उच्चतम सुरक्षा का प्रतीक है।
आञ्जन का जन्म न केवल शारीरिक सुरक्षा के लिए हुआ, बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक सुरक्षा के लिए भी आवश्यक था।
“यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत्सर्वाश्च यातुधान्यः” — जब यह आञ्जन उत्पन्न हुआ,
तब सभी दुष्ट प्राणी, नकारात्मक शक्तियाँ और शत्रु भयभीत हो गए।
यह मंत्र स्पष्ट करता है कि दिव्य आञ्जन न केवल जीवन की रक्षा करता है,
बल्कि बुराई, नकारात्मकता और संकट से सभी को भयभीत कर देता है।
त्रैककुड आञ्जन का जन्म जीवन में स्थिरता और सुरक्षा का प्रतीक है।
यह हमें यह भी याद दिलाता है कि जीवन की सुरक्षा केवल व्यक्ति के प्रयास से नहीं,
बल्कि दिव्य शक्ति और उच्चतम सुरक्षा उपायों से संभव होती है।
हिमालय का संदर्भ हमें जीवन में स्थिरता, दृढ़ता और उच्चतम सुरक्षा की भावना देता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ त्रैककुड आञ्जन का जन्म जीवन में दिव्य सुरक्षा लाता है।
✔ बुरे प्राणी और नकारात्मक शक्तियाँ आञ्जन की शक्ति से भयभीत होती हैं।
✔ जीवन, स्वास्थ्य और चेतना की सुरक्षा का दिव्य स्रोत।
यह मंत्र जीवन की सुरक्षा और स्थिरता के लिए आञ्जन और दिव्य शक्ति के महत्व को उजागर करता है।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा का अनुभव।
✔ भय, नकारात्मकता और आघात से मन और प्राण की रक्षा।
✔ जीवन में स्थायित्व और ऊर्जा का संतुलित प्रवाह।
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मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ नकारात्मक शक्तियों से जीवन की सुरक्षा और मानसिक शांति।
✔ आत्मविश्वास और साहस का विकास।
✔ आञ्जन के माध्यम से मानसिक स्थिरता और सुरक्षा।
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आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ नकारात्मकता, तनाव और संकट से मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा आवश्यक है।
✔ आञ्जन और दिव्य शक्तियों के माध्यम से जीवन में स्थिरता और सुरक्षा आती है।
✔ यह मंत्र जीवन में स्थायित्व, सुरक्षा और मानसिक शांति का प्रतीक है।
त्रैककुड आञ्जन का जन्म हमें यह सिखाता है कि जीवन की सुरक्षा केवल बाहरी उपायों से नहीं,
बल्कि दिव्य शक्ति और आन्तरिक सुरक्षा से सुनिश्चित होती है।
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सारांश
1. मंत्र त्रैककुड आञ्जन के जन्म और उसकी शक्ति का वर्णन करता है।
2. सभी दुष्ट प्राणी और नकारात्मक शक्तियाँ भयभीत हो जाती हैं।
3. जीवन, स्वास्थ्य और चेतना की सुरक्षा का दिव्य स्रोत है।
4. सुरक्षा शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर होनी चाहिए।
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English Insight
When the Trikakud anjan was born near the Himalayas,
all evil beings, negative forces, and hostile entities became terrified.
This verse emphasizes that divine protection not only safeguards life,
but also deters negative forces from affecting the world.
The birth of Trikakud anjan represents stability, security, and divine power in life.
शब्दार्थ
यदि = यदि, जब
वासि = वासना, निवास, या शारीरिक/आध्यात्मिक अस्तित्व
त्रैककुदं = त्रैककुड (त्रैतीय) नामक आञ्जन
यदि यामुनम् उच्यसे = यदि यह यमुना के साथ संबद्ध है या यमुना के माध्यम से प्रकट होता है
उभे = दोनों, दो
ते = तुम्हारे
भद्रे = शुभ, सुरक्षित
नाम्नी = नामों में, दिव्य संज्ञा में
ताभ्यां = इन दोनों के माध्यम से
नः = हमारे लिए
पाह्याञ्जन = आञ्जन द्वारा सुरक्षा करना
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सरल हिन्दी अर्थ
हे देवता,
यदि आञ्जन त्रैककुड और यमुना के माध्यम से प्रकट होता है,
तो इन दोनों दिव्य नामों द्वारा हमें रक्षा प्रदान करो।
यह आञ्जन हमारे जीवन और प्राणी जगत के लिए सुरक्षित और शुभ है।
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विस्तृत व्याख्या (लगभग 600 शब्द)
मंत्र 4.9.10 आञ्जन के दो प्रमुख स्रोत—त्रैककुड और यमुना—के माध्यम से सुरक्षा पर केंद्रित है।
“यदि वासि त्रैककुडं यदि यामुनम् उच्यसे” — यह बताता है कि आञ्जन दो रूपों में मौजूद है:
1. त्रैककुड (त्रैतीय) आञ्जन, जो हिमालय या पर्वतीय शक्तियों के प्रतीक के रूप में है।
2. यमुना के माध्यम से प्रकट होने वाला आञ्जन, जो जल, जीवन और प्रवाह का प्रतीक है।
“उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन” — यह स्पष्ट करता है कि इन दोनों दिव्य स्रोतों के माध्यम से हमें पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
यह सुरक्षा न केवल भौतिक स्तर पर है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा को भी सुनिश्चित करती है।
त्रैककुड और यमुना का संयोजन यह संदेश देता है कि आञ्जन जीवन के दो पहलुओं—स्थिरता और प्रवाह—को संतुलित करता है।
त्रैककुड स्थिरता, शक्ति और दृढ़ता का प्रतीक है, जबकि यमुना प्रवाह, जीवनशक्ति और पोषण का प्रतीक है।
इन दोनों के नाम और आञ्जन से नकारात्मक शक्तियाँ भयभीत होती हैं और जीवन सुरक्षित रहता है।
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आध्यात्मिक अर्थ
✔ जीवन में स्थिरता और सुरक्षा के दो स्तम्भ: त्रैककुड और यमुना।
✔ आञ्जन के माध्यम से मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सुरक्षा।
✔ दिव्य नामों का उच्चारण और स्मरण सुरक्षा और स्थायित्व को बढ़ाता है।
मंत्र यह सिखाता है कि सुरक्षा केवल बाहरी उपायों से नहीं,
बल्कि दिव्य स्रोतों, शक्तियों और उच्च चेतना के माध्यम से प्राप्त होती है।
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योगिक और मानसिक दृष्टि
✔ ध्यान और उच्च चेतना के माध्यम से सुरक्षा का अनुभव।
✔ जीवन में स्थिरता (त्रैककुड) और प्रवाह (यमुना) का संतुलन।
✔ मानसिक तनाव और भय से मुक्ति।
---
मनोवैज्ञानिक दृष्टि
✔ आञ्जन के दोनों रूपों में विश्वास मानसिक सुरक्षा देता है।
✔ भय और नकारात्मक प्रभावों से जीवन सुरक्षित रहता है।
✔ आञ्जन का स्मरण मानसिक स्थिरता और साहस प्रदान करता है।
---
आधुनिक संदर्भ
आज के जीवन में—
✔ स्थायित्व और जीवनशक्ति की सुरक्षा आवश्यक है।
✔ त्रैककुड और यमुना प्रतीकात्मक रूप से जीवन में शक्ति, स्थिरता और प्रवाह लाते हैं।
✔ आञ्जन के माध्यम से मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखना संभव है।
✔ दिव्य नाम और ऊर्जा का स्मरण संकटों और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा देता है।
---
सारांश
1. मंत्र आञ्जन के दो दिव्य स्रोत—त्रैककुड और यमुना—का वर्णन करता है।
2. इन दोनों के माध्यम से जीवन, शक्ति और प्राणी जगत की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
3. मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सुरक्षा में संतुलन और स्थायित्व आता है।
4. सुरक्षा केवल बाहरी उपायों से नहीं, दिव्य शक्तियों और चेतना से भी होती है।
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English Insight
If the Trikakud and Yamuna forms of anjan exist,
then through these two sacred names we seek protection.
This verse emphasizes that divine protection comes from multiple sources:
Trikakud represents stability and strength,
while Yamuna represents flow, life, and nourishment.
Together, they ensure complete safety for life, mind, and spirit.
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